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ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य सहित)

Brahma Sutras with Shankara Bhashya - Gita Press

महर्षि बादरायण / आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस गोरखपुर · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished417 पृष्ठ

सूत्र ४—६ ] अध्याय ३ २५९

सूत्र ४—६ ] अध्याय ३ २५९
भी प्रयोजन-भेद न होनेके कारण एक जगह कही हुई अधिक बातोका दूसरी
जगह उपसंहार ( अध्याहार ) कर लेना चाहिये ।
सम्बन्ध—श्रुतिमें वर्णित जो ब्रह्मविद्याएँ है, उनमें कहीं शब्दभेदसे, कहीं
नामभेदसे और कहीं प्रकरणके भेदसे भिन्नता प्रतीत होती है, अतः उनकी
एकताका प्रतिपादन करनेके लिये सूत्रकार स्वयं शङ्का उठाकर उसका समाधान
करते हैं—
अन्यथात्वं शब्दादिति चेन्नाविशेषात् ॥ ३ । ३ । ६ ॥
चेत्=यदि ऐसा कहो कि; शब्दात्=कहे हुए शब्दसे; अन्यथात्वम्=दोनोकी
भिन्नता प्रतीत होती है, अतः एकता सिद्ध नहीं होती; इति न=तो ऐसी बात नहीं
है, अविशेषात्=विधि और फल आदिमे भेद न होनेके कारण (दोनो विद्याओंमे
समानता है ) ।
व्याख्या—छान्दोग्योपनिषद्के 'आठवे अध्यायमे दहरविद्या और प्राजापत्य-
विद्या—इस प्रकार दो ब्रह्मविद्याओका वर्णन है। वे दोनो विद्याएँ परब्रह्म परमात्मा-
की प्राप्तिका मार्ग बतानेवाली है, इसलिये उनकी समानता मानी जाती है।
इसपर पूर्वपक्षकी ओरसे शङ्का उठायी जाती है कि दोनो विद्याओंमे शब्दका
अन्तर है अर्थात् दहरविद्याके प्रकरणमे तो यह कहा गया है कि 'मनुष्य-शरीररूप
ब्रह्मपुरमे हृदयरूप घरके भीतर जो आन्तरिक आकाश है और उसके भीतर जो
वस्तु है, उसका अनुसन्धान करना चाहिये।' (छा० उ० ८ । १ । १) तथा
प्राजापत्यविद्यामे 'अपहतपाप्मा' आदि विशेषणोसे युक्त आत्माको जाननेके योग्य
बताया गया है (८ । ७ । १) । इस प्रकार दोनो विद्याओंके वर्णनमे शब्दका
भेद है, इसलिये वे दोनो एक नहीं हो सकतीं। इसके उत्तरमे सूत्रकार कहते हैं
कि ऐसी बात नहीं है, क्योकि दहरविद्यामे उस अन्तराकाशको ब्रह्मलोक, आत्मा
और सबको धारण करनेवाला कहा गया है तथा उसे सब पापो और सब विकारोसे
रहित तथा सत्यसङ्कल्प आदि समस्त दिव्य गुणोसे सम्पन्न बताकर (छा० उ० ८ ।
१ । ५) उसी जाननेयोग्य तत्त्वको ( छा० उ० ८ । १ । ६ ) परब्रह्म निश्चित
किया गया है, उसी प्रकार प्राजापत्य-विद्यामे भी उस जाननेयोग्य तत्त्वको आत्मा
नामसे कहकर उसे समस्त पापो औरविकारोसे रहित तथा सत्यसङ्कल्पत्व, सत्यकामत्व
आदि दिव्य गुणोसे युक्त परब्रह्म निश्चित किया गया है। दहर-विद्यामे दहर

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आकाशको ही उपास्य बताया गया है, न कि उसके अन्तर्वर्ती लोकोंको ।, वहाँ
प्रकारान्तरसे उस ब्रह्मको सबका आधार बतानेके लिये पहले उसके भीतरकी
वस्तुओंको खोजनेके लिये कहा गया है । इस प्रकार वास्तवमे कोई भेद न
होनेके कारण दोनो विद्याओंकी एकता है । इसी प्रकार दूसरी विद्याओंमे भी
समानता समझ लेनी चाहिये ।
सम्बन्ध—पूर्वोक्त विद्याओंकी एकता सिद्ध करनेके लिये दूसरी असमान
विद्याओंसे उनकी विशेषताका प्रतिपादन करते हैं—
न वा प्रकरणभेदात्परोवरीयस्त्वादिवत् ॥ ३ । ३ । ७ ॥
वा=अथवा; परोवरीयस्त्वादिवत्=परम उत्कृष्टता आदि गुणोंसे युक्त
दूसरी विद्याओंकी भाँति; प्रकरणभेदात्=प्रकरणके भेदसे उक्त दोनों विद्याएँ
भिन्न; न=सिद्ध नहीं हो सकतीं ।
व्याख्या—छान्दोग्य और बृहदारण्यकोपनिषद्में उद्गीथ-विद्याका प्रकरण आता
है, किन्तु छान्दोग्यमे जो उद्गीथ-विद्या है वह अत्यन्त श्रेष्ठ है, क्योकि वहाँ
उद्गीथकी ॐ कार' अक्षरके साथ एकता करके उसका महत्त्व बढ़ाया गया है;
( छा० उ० १ । १ पूरा खण्ड ) इसलिये उसका फल भी अत्यन्त श्रेष्ठ बताया गया
है (छा० उ० १ । ९ । १ से ४ तक ); किन्तु बृहदारण्यककी उद्गीथविद्या केवल
प्राणोंका श्रेष्ठत्व सम्पादन करनेके लिये तथा यज्ञादिमें उद्गीथगानके समय स्वरकी
विशेषता दिखानेके लिये है (बृह० उ० १ । ३ । १ से २७ तक) । इसलिये उसका
फल भी वैसा नहीं बताया गया है । दोनो प्रकरणोंमे केवल देवासुर-संवाद-
विषयक समानता है, पर उसमें भी उपासनाके प्रकारका भेद है । अतः किञ्चिन्मात्र
समानताके कारण दोनोंकी समानता नहीं हो सकती। समानताके लिये उद्देश्य,
विधेय और फलकी एकता चाहिये, वह उन प्रकरणोमे नहीं है । इसलिये
उनमें भेद होना उचित है । किन्तु ऊपर कही हुई दहरविद्या और प्राजापत्य
विद्यामे ऐसी बात नहीं है, केवल वर्णनका भेद है । अतः वर्णनमात्रका भेद
होनेके कारण उत्तम और मध्यम फल आदिके भेदसे युक्त उद्गीथविद्याकी भाँति
ऊपर कही हुई दहरविद्या और प्राजापत्यविद्यामे भेद सिद्ध नहीं हो सकता;
क्योंकि दोनोके उद्देश्य, विधेय और फलमे भेद नहीं है ।
सम्बन्ध—अब दूसरे प्रकारकी शङ्काका उत्तर देकर दोनों विद्याओंकी एकता
सिद्ध करते हैं—