ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य सहित)
Brahma Sutras with Shankara Bhashya - Gita Press
महर्षि बादरायण / आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस गोरखपुर · 1950 (उद्गम)
सूत्र २६-२८ ] अध्याय २ १४९
सूत्र २६-२८ ] अध्याय २ १४९
हो सकती। बीज और दूधका अभाव नहीं होता। किन्तु रूपान्तर मात्र होता है, अतः
जगत्का कारण सत् है और वह सर्वथा सत्य है। इसलिये बौद्धोकी उपर्युक्त
मान्यता असङ्गत है।
सम्बन्ध—किसी नित्य चेतन कर्त्ताके बिना क्षणिक पदार्थोंसे अपने-आप कार्य
उत्पन्न होते हैं, इस मान्यताका खण्डन दूसरी युक्तिके द्वारा करते हैं—
उदासीनानामपि चैवं सिद्धिः ॥ २ । २ । २७ ॥
च=इसके सिवा; एवम्=इस प्रकार ( बिना कर्ताके स्वतः कार्यकी उत्पत्ति )
माननेपर; उदासीनानाम्=उदासीन ( कार्य-सिद्धिके लिये चेष्टा न करनेवाले )
पुरुषोंका; अपि=भी; सिद्धिः=कार्य सिद्ध हो सकता है।
व्याख्या—यदि ऐसा माना जाय कि 'कार्यकी उत्पत्ति होनेमे किसी नित्य
चेतन कर्ताकी आवश्यकता नहीं है, क्षणिक पदार्थोंके समुदायसे अपने-आप कार्य
उत्पन्न हो जाता है' तब तो जो लोग उदासीन रहते है, कार्य आरम्भ नहीं
करते या उसकी सिद्धिकी चेष्टासे विरत रहते हैं, उनके कार्य भी पदार्थ-
गत शक्तिसे अपने-आप सिद्ध हो जाने चाहिये। परन्तु ऐसा नहीं देखा
जाता। इससे यही सिद्ध होता है कि उपर्युक्त मान्यता समीचीन नहीं है।
सम्बन्ध—यहाँतक बौद्धोंके क्षणिकवादका खण्डन किया गया। अब विज्ञान-
वादका खण्डन करनेके लिये अगला प्रकरण आरम्भ किया जाता है। विज्ञानवादी
बौद्ध (योगाचार) मानते हैं कि प्रतीत होनेवाला बाह्यपदार्थ वास्तवमे कुछ नहीं है,
केवलमात्र स्वप्नकी भाँति बुद्धिकी कल्पना है; इस मान्यताका खण्डन करते हैं—
नाभाव उपलब्धेः ॥ २ । २ । २८ ॥
अभावः=जाननेमे आनेवाले पदार्थोंका अभाव; न=नहीं है; उपलब्धेः=
क्योकि उनकी उपलब्धि होती है।
व्याख्या—जाननेमे आनेवाले बाह्यपदार्थ मिथ्या नहीं हैं, वे कारणरूपमें
तथा कार्यरूपमे भी सदा ही सत्य है। इसलिये उनकी प्रत्यक्ष उपलब्धि होती
है। यदि वे स्वप्नगत पदार्थों तथा आकाशमे दीखनेवाली नीलिमा आदिकी भाँति
सर्वथा मिथ्या होते तो इनकी उपलब्धि नहीं होती।
सम्बन्ध—विज्ञानवादियोंकी ओरसे यह कहा जा सकता है कि 'उपलब्धि-
मात्रसे पदार्थकी सत्ता सिद्ध नहीं हो सकती; क्योंकि स्वप्नमे प्रतीत होनेवाले तथा
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बाजीगरद्वारा उपस्थित किये जानेवाले पदार्थ यद्यपि सत्य नहीं होते तो भी
इनकी उपलब्धि देखी जाती है; इसपर कहते हैं—
वैधर्म्याच्च न स्वप्नादिवत् ॥ २ । २ । २९ ॥
वैधर्म्यात् = जाग्रत् अवस्थासे अन्य अवस्थाओके धर्ममे भेद होनेके कारण;
च=भी; ( जाग्रत्मे उपलब्ध होनेवाले पदार्थ ) स्वप्नादिवत्=स्वप्नादिमें उपलब्ध
पदार्थोंकी भाँति; न=मिथ्या नहीं हैं।
व्याख्या—स्वप्नावस्थामे प्रतीत होनेवाले पदार्थ पहलेके देखे, सुने और
अनुभव किये हुए ही होते है तथा वे जगनेपर उपलब्ध नहीं होते। एकके
स्वप्नकी घटना दूसरेको नहीं दीखती। उसी प्रकार बाजीगरद्वारा कल्पित पदार्थ
भी थोड़ी देरके बाद नहीं उपलब्ध होते। मरुभूमिकी तप्त बालुकाराशिमें प्रतीत
होनेवाले जल, सीपमे दीखनेवाली चाँदी तथा भ्रमवश प्रतीत होनेवाली दूसरी
किसी वस्तुकी भी सत्तारूपसे उपलब्धि नहीं होती है। परन्तु जो जाग्रत्-कालमे
प्रत्यक्ष दिखायी देनेवाली वस्तुएँ हैं, उनके विषयमे ऐसी बात नहीं है। वे एक ही
समय बहुतोंको समान रूपसे उपलब्ध होती है, कालान्तरमे भी उनकी उपलब्धि
देखी जाती है। एक प्रकारका आकार नष्ट कर दिया जानेपर भी दूसरे आकारमें
उनकी सत्ता विद्यमान रहती है। इस प्रकार स्वप्नादिमें भ्रान्तिसे प्रतीत होनेवाले
पदार्थोंके और सत्पदार्थोंके धर्मोंमें बहुत अन्तर है। इसलिये स्वप्नादिके दृष्टान्तके
बलपर यह कहना उपयुक्त नहीं है कि 'उपलब्धिमात्रसे पदार्थकी सत्ता सिद्ध
नहीं होती।'
सम्बन्ध—विज्ञानवादी ऐसा कहते हैं कि बाह्य पदार्थ न होनेपर भी पूर्व-
वासनाके कारण बुद्धिद्वारा उन विचित्र पदार्थोंका उपलब्ध होना सम्भव है; अतः
इसका खण्डन करते हैं—
न भावोऽनुपलब्धेः ॥ २ । २ । ३० ॥
भावः=विज्ञानवादियोद्वारा कल्पित वासनाकी सत्ता; न=सिद्ध नहीं होती;
अनुपलब्धेः=क्योंकि उनके मतके अनुसार बाह्य पदार्थोंकी उपलब्धि ही
नहीं हो सकती।
व्याख्या—जो वस्तु पहले उपलब्ध हो चुकी है, उसीके संस्कार बुद्धिमे
जमते हैं और वे ही वासनारूपसे स्फुरित होते हैं। पदार्थोंकी सत्ता स्वीकार न