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ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य सहित)

Brahma Sutras with Shankara Bhashya - Gita Press

महर्षि बादरायण / आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस गोरखपुर · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished417 पृष्ठ

प्रारंभिक पृष्ठ व भूमिका

ॐ
श्रीमन्महर्षि वेदव्यासप्रणीत
वेदान्त-दर्शन
[ ब्रह्मसूत्र ]
( सरल हिन्दी-व्याख्यासहित )
व्याख्याकार—
हरिकृष्णदास गोयन्दका

मुद्रक तथा प्रकाशक
घनश्यामदास जालान
-- गीताप्रेस, गोरखपुर
सं० २००९, प्रथम संस्करण १०,०००
मूल्य २) दो रुपया
पता—गीताप्रेस, पो० गीताप्रेस (गोरखपुर)

श्रीपरमात्मने नमः
निवेदन
त्वमेव माता च पिता त्वमेव त्वमेव बन्धुश्च सखा त्वमेव ।
त्वमेव विद्या द्रविणं त्वमेव त्वमेव सर्वं मम देवदेव ॥
मूकं करोति वाचालं पङ्गुं लङ्घयते गिरिम्।
यत्कृपा तमहं वन्दे परमानन्दमाधवम् ॥
महर्षि वेदव्यासरचित ब्रह्मसूत्र बड़ा ही महत्त्वपूर्ण ग्रन्थ है। इसमें थोड़े-से
शब्दोंमें परब्रह्मके स्वरूपका साङ्गोपाङ्ग निरूपण किया गया है, इसीलिये इसका
नाम 'ब्रह्मसूत्र' है। यह ग्रन्थ वेदके चरम सिद्धान्तका निदर्शन कराता है, अतः
इसे 'वेदान्त-दर्शन' भी कहते हैं। वेदके अन्त या शिरोभाग—ब्राह्मण,
आरण्यक एवं उपनिषद्‌के सूक्ष्म तत्त्वका दिग्दर्शन करानेके कारण भी इसका
उक्त नाम सार्थक है। वेदके पूर्वभागकी श्रुतियोंमें कर्मकाण्डका विषय है, उसकी
समीक्षा आचार्य जैमिनिने पूर्वमीमांसा-सूत्रोंमे की है। उत्तरभागकी श्रुतियोंमें
उपासना एवं ज्ञानकाण्ड है; इन दोनोंकी मीमांसा करनेवाले वेदान्त-दर्शन या
ब्रह्मसूत्रको 'उत्तर मीमांसा' भी कहते हैं। दर्शनोंमें इसका स्थान सबमे ऊँचा
है; क्योंकि इसमें जीवके परम प्राप्य एवं चरम पुरुषार्थका प्रतिपादन किया गया
है। प्रायः सभी सम्प्रदायोंके प्रधान-प्रधान आचार्योंने ब्रह्मसूत्रपर भाष्य लिखे हैं
और सबने अपने-अपने सिद्धान्तको इस ग्रन्थका प्रतिपाद्य बतानेकी चेष्टा की
है। इससे भी इस ग्रन्थकी महत्ता तथा विद्वानोंमें इसकी समादरणीयता सूचित
होती है। प्रस्थानत्रयीमें ब्रह्मसूत्रका प्रधान स्थान है।
संस्कृत भाषामें इस ग्रन्थपर अनेक भाष्य एवं टीकाएँ उपलब्ध होती हैं;
परंतु हिन्दीमें कोई सरल तथा सर्वसाधारणके समझने योग्य टीका नहीं थी;
इससे हिन्दीभाषा-भाषियोंके लिये इस गहन ग्रन्थका भाव समझना बहुत
कठिन हो रहा था। यद्यपि 'अच्युत ग्रन्थमाला' ने ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य एवं
रत्नप्रभा व्याख्याका हिन्दीमें अनुवाद प्रकाशित करके हिन्दी-जगत्‌का महान्
उपकार किया है; तथापि भाष्यकारकी व्याख्या शास्त्रार्थकी शैलीपर लिखी
जानेके कारण साधारण बुद्धिवाले पाठकोंको उसके द्वारा सूत्रकारके भावों

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समझनेमे कठिनाई होती है। इसके सिवा, वह ग्रन्थ भी बहुत बड़ा एवं
बहुमूल्य हो गया है। जिससे साधारण जनता उसे प्राप्त भी नहीं कर सकती।
अतः हिन्दीमें ब्रह्मसूत्रके एक ऐसे संस्करणको प्रकाशित करनेकी
आवश्यकता प्रतीत हुई, जो सर्वसाधारणके लिये समझनेमें सुगम एवं सस्ता
होनेके कारण सुलभ हो। इन्हीं बातोंको दृष्टिमे रखकर गतवर्ष वैशाख मासमें,
जब मै गोरखपुरमें था, मेरे एक पूज्य स्वामीजी महाराजने मुझे आज्ञा
दी कि 'तुम सरल हिन्दीमें ब्रह्मसूत्रपर संक्षिप्त व्याख्या लिखो।' यद्यपि
अपनी अयोग्यताको समझकर मै इस महान् कार्यका भार अपने ऊपर
लेनेका साहस नहीं कर पाता था, तथापि पूज्य स्वामीजीकी आग्रहपूर्ण
प्रेरणाने मुझे इस कार्यमें प्रवृत्त कर दिया। मै उसी समय गोरखपुरसे
स्वर्गाश्रम (ऋषिकेश) चला गया और वहाँ पूज्यपाद भाईजी श्रीजयदयालजीसे
स्वामीजीकी उक्त आज्ञा निवेदन की। उन्होंने भी इसका समर्थन किया।
इससे मेरे मनमे और भी उत्साह और बल प्राप्त हुआ। भगवान्‌की
अव्यक्त प्रेरणा मानकर मैंने कार्य प्रारम्भ कर दिया और उन्हीं सर्वान्तर्यामी
परमेश्वरकी सहज कृपासे एक मास इक्कीस दिनमे ब्रह्मसूत्रकी यह व्याख्या
पूरी हो गयी। इसमें व्याकरणकी दृष्टिसे तो बहुत-सी अशुद्धियाँ थीं ही,
अन्य प्रकारकी भी त्रुटियाँ रह गयी थीं, अतः इस व्याख्याकी एक प्रति
नकल कराकर मैंने उन्हीं पूज्य स्वामीजीके पास गोरखपुर भेज दी। उन्होंने
मेरे प्रति विशेष कृपा और स्वाभाविक प्रेम होनेके कारण समय निकालकर
दो मासतक परिश्रमपूर्वक इस व्याख्याको देखा और इसकी त्रुटियोंका मुझे
दिग्दर्शन कराया। तदनन्तर चित्रकूटमे सत्सङ्गके अवसरपर पूज्यपाद श्रीभाई
जयदयालजी तथा पूज्य स्वामी श्रीरामसुखदासजी महाराजने भी व्याख्याको
आद्योपान्त सुना और उसके संशोधनके सम्बन्धमें अपनी महत्त्वपूर्ण सम्मति
देनेकी कृपा की। यह सब हो जानेपर इस ग्रन्थको प्रकाशित करनेकी
उत्सुकता हुई। फिर समय मिलते ही मै गोरखपुर आ गया। फाल्गुन कृष्ण
प्रतिपदासे इसके पुनः संशोधन और छपाई आदिका कार्य आरम्भ किया गया।
इस समय पूज्य पण्डित श्रीरामनारायणदत्तजी शास्त्रीने इस व्याख्यामें व्याकरण
आदिकी दृष्टिसे जो-जो अशुद्धियाँ रह गयी थीं, उनका अच्छी तरह संशोधन
किया और भाषाको भी सुन्दर बनानेकी पूरी-पूरी चेष्टा की। साथ ही

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आदिसे अन्ततक साथ रहकर प्रूफ देखने आदिके द्वारा भी प्रकाशनमें पूरा
सहयोग किया। पूज्य भाई श्रीहनुमानप्रसादजी पोद्दार तथा उपर्युक्त पूज्य स्वामीजीने
भी प्रूफ देखकर उचित एवं आवश्यक संशोधनमे पूर्ण सहायता की। इन सब
महानुभावोंके अथक परिश्रम और सहयोगसे आज यह ग्रन्थ पाठकोंके समक्ष
इस रूपमें उपस्थित हो सका है।
इस ग्रन्थकी व्याख्या लिखते समय मेरे पास हिन्दी या अन्य किसी भारतीय
भाषाकी कोई पुस्तक नहीं थी। संस्कृत भाषाके आठ ग्रन्थ मेरे पास थे, जिनसे
मुझे बहुत सहायता मिली और एतदर्थ मैं उन सभी व्याख्याकारोका कृतज्ञ हूँ।
उक्त ग्रन्थोंके नाम इस प्रकार हैं—( १ ) श्रीशङ्कराचार्यकृत शारीरक-भाष्य,
( २ ) श्रीरामानुजाचार्यकृत श्रीभाष्य, ( ३ ) श्रीवल्लभाचार्यकृत अणुभाष्य,
( ४ ) श्रीनिम्नार्कभाष्य, ( ५ ) श्रीभास्कराचार्यकृत भाष्य, ( ६ ) ब्रह्मानन्ददीपिका,
( ७ ) श्रीविज्ञानभिक्षुकृत भाष्य तथा ( ८ ) आचार्य श्रीरामानन्दकृत व्याख्या।
पाठक मेरी अल्पज्ञतासे तो परिचित होगे ही; क्योंकि पहले योगदर्शनकी
भूमिकामें मैं यह बात निवेदन कर चुका हूँ। मैं न तो संस्कृतभाषाका विद्वान् हूँ और
न हिन्दी-भाषाका ही। अन्य किसी आधुनिक भाषाकी भी जानकारी मुझे नहीं
है। इसके सिवा, आध्यात्मिक विषयमें भी मेरा विशेष अनुभव नहीं है। ऐसी
दशामें इस गहन शास्त्रपर व्याख्या लिखना मेरे-जैसे अल्पज्ञके लिये सर्वथा
अनधिकार चेष्टा है, तथापि अपने आध्यात्मिक विचारोंको दृढ़ बनाने, गुरुजनोंकी
आज्ञाका पालन करने तथा मित्रोंको संतोष देनेके लिये अपनी समझके अनुसार
यह टीका लिखकर इसे प्रकाशित करानेकी मैने जो धृष्टता की है, उसे अधिकारी
विद्वान् तथा संत महापुरुष अपनी सहज उदारतासे क्षमा करेंगे; यह आशा है।
वस्तुतः इसमें जो कुछ भी अच्छापन है, वह सब पूर्वके प्रातःस्मरणीय पूज्य-
चरण आचार्यों और भाष्यकारोंका मङ्गलप्रसाद है और जो त्रुटियाँ हैं, वे सब मेरी
अल्पज्ञताकी सूचक तथा मेरे अहङ्कारका परिणाम है। जहाँतक सम्भव हुआ
है, मैंने प्रत्येक स्थलपर किसी भी आचार्यके ही चरणचिह्नोंका अनुसरण करने-
की चेष्टा की है। जहाँ स्वतन्त्रता प्रतीत होती है, वहाँ भी किसी-न-किसी
प्राचीन महापुरुष या टीकाकारके भावोंका आश्रय लेकर ही वैसे भाव निकाले
गये हैं। अनुभवी विद्वानोंसे मेरी विनम्र प्रार्थना है कि वे कृपापूर्वक इसमे प्रतीत