ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य सहित)
Brahma Sutras with Shankara Bhashya - Gita Press
महर्षि बादरायण / आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस गोरखपुर · 1950 (उद्गम)
सूत्र ३२-३४] अध्याय ३ २७९
सूत्र ३२-३४] अध्याय ३ २७९
है' इत्यादि (बृह० उ० ३ । ८ । ८)। इस प्रकार वहाँ ब्रह्मको इन सब
पदार्थोंसे, इन्द्रियोंसे और शरीरधारी जीवोंसे अत्यन्त विलक्षण बतलाया गया
है। तथा मुण्डकोपनिषद्में अंगिरा ऋषिने शौनकसे कहा है कि 'वह परा
विद्या है, जिससे उस अक्षर (परब्रह्म परमात्मा) की प्राप्ति होती है, जो जानने
और पकड़नेमें आनेवाला नहीं है, जो गोत्र, वर्ण, आँख, कान, हाथ, पैर आदिसे
रहित है, किन्तु सर्वव्यापी, अतिसूक्ष्म, विनाशरहित और समस्त प्राणियोंका
कारण है, उसको ज्ञानी पुरुष सब ओरसे देखते हैं (मु० उ० १ । १ । ५, ६)।
इस प्रकार वेदमें उस अक्षरब्रह्मके जो विशेषण बतलाये गये हैं, उनको ब्रह्मके
वर्णनमें सभी जगह ग्रहण कर लेना चाहिये; क्योंकि ब्रह्मके सविशेष और
निर्विशेष सभी लक्षण समान है तथा सभी उसीके भाव हैं अर्थात् उस ब्रह्मके
स्वरूपका लक्ष्य करानेके लिये ही कहे हुए भाव हैं, इसलिये 'उपसत्' कर्म
सम्बन्धी मन्त्रोंकी भाँति उनका अध्याहार कर लेना उचित है। यह बात कही गयी है।
सम्बन्ध—'मुण्डक (३ । १ । १) और श्वेताश्वतर (४ । ६) में तो
पक्षीके दृष्टान्तसे जीव और ईश्वरको मनुष्यके हृदयमें स्थित बतलाया है और
कठोपनिषद्में छाया तथा धूपकी भाँति ईश्वर और जीवको मनुष्यके हृदयमें स्थित
बतलाया है, इन श्रुतियोंमें जिस विद्या अथवा विज्ञानका वर्णन है, वह एक
दूसरेसे भिन्न है या अभिन्न?' इस जिज्ञासापर कहते हैं—
इयदामननात् ॥ ३ । ३ । ३४ ॥
(उक्त तीनों मन्त्रोंमें एक ही ब्रह्मविद्याका वर्णन है) इयदामननात्=क्योंकि
सभी जगह इयत्ता (इतनापन) का वर्णन समान है।
व्याख्या—मुण्डक और श्वेताश्वतरमे तो कहा है कि 'एक साथ रहकर
परस्पर सखाभाव रखनेवाले दो पक्षी (जीवात्मा और परमात्मा) एक ही
शरीररूप वृक्षका आश्रय लेकर रहते हैं, उन दोनोंमेंसे एक तो कर्मफलरूप सुख-
दुःखोंको भोगता है और दूसरा न खाता हुआ केवल देखता रहता है। इस
प्रकार यह जीव शरीरकी आसक्तिमें निमग्न होकर असमर्थताके कारण मोहित
होकर चिन्ता करता रहता है। यदि यह भक्तोद्वारा सेवित अपने पास रहनेवाले
सखा परमेश्वर और उसकी विचित्र महिमाको देख ले तो तत्काल ही शोकरहित
हो जाय।' तथा कठोपनिषद्मे कहा है कि 'मनुष्य-शरीरमे परब्रह्मके उत्तम
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निवासस्थान् हृदयगुहामे छिपे हुए और अपने सत्यस्वरूपका अनुभव करनेवाले
( जीव और ईश्वर ) दोनो है, जो कि छाया और धूपकी भाँति भिन्न स्वभाववाले
है। ऐसा ब्रह्मवेत्ता कहते है।' ( क० उ० १ । ३ । १ )। इन सभी स्थलोमे
द्विवचनान्त शब्दोका प्रयोग करके जीव और ईश्वरको परिच्छिन्न स्थल—हृदयमें
स्थित बताया गया है। इससे सिद्ध होता है कि तीनो जगह कही हुई विद्या एक
है। इसी प्रकार जहाँ-जहाँ उस परब्रह्म परमेश्वरको प्राणियोके हृदयमे स्थित
बताया गया है, उन सब स्थलोमे वर्णित विद्याकी भी एकता समझ लेनी चाहिये।
सम्बन्ध—अब परमात्माको सर्वान्तर्यामी बतलानेवाली श्रुतियोंपर विचार
आरम्भ करते हैं—
अन्तरा भूतग्रामवत्स्वात्मनः ॥ ३ । ३ । ३५ ॥
भूतग्रामवत्=आकाशादि भूतसमुदायकी भाँति (वह परमात्मा); स्वात्मनः =
साधकके अपने आत्माका भी; अन्तरा =अन्तरात्मा (अन्तर्यामी है); (आमननात्)=
क्योकि यही बात अन्य श्रुतिमे कही गयी है।
व्याख्या—राजा जनककी सभामे याज्ञवल्क्यसे चक्रायणके पुत्र
उषस्तने कहा कि 'जो अपरोक्ष ब्रह्म है, जो सबका अन्तरात्मा है, उसको मुझे
समझाइये।' तब याज्ञवल्क्यने कहा—'जो तेरा अन्तरात्मा है, वही
सबका है।' उसके पुनः जिज्ञासा करनेपर याज्ञवल्क्यने विस्तारसे समझाया कि 'जो
प्राणके द्वारा सबको प्राणक्रियासम्पन्न करता है।' आदि। उसके बाद
उषस्तके पुनः पूछनेपर बताया कि 'दृष्टिके द्रष्टाको देखा नहीं जा सकता, श्रुतिके
श्रोताको सुना नहीं जा सकता, मतिके मन्ताको मनन नहीं किया जा सकता,
विज्ञातिके विज्ञाताको जाना नहीं जा सकता, यह तेरा अन्तरात्मा ही सबका
अन्तरात्मा है' (बृह० उ० ३ । ४ । १, २)। फिर कहोलऋषिने भी
वही बात पूछी कि 'जो साक्षात् अपरोक्ष ब्रह्म है, जो सबका अन्तरात्मा है,
उसको मुझे समझायें।' याज्ञवल्क्यने उत्तरमे कहा कि 'जो तेरा अन्तरात्मा है, वही
सबका अन्तरात्मा है। जो भूख, प्यास, शोक, मोह, बुढ़ापा और मृत्यु सबसे
अतीत है' इत्यादि (बृह० उ०३ । ५ । १)। इन दोनो प्रकरणोको दृष्टिमें
रखकर इस तरहके सभी प्रकरणोंका एक साथ निर्णय करते हैं।
यहाँ यह प्रश्न उठता है कि 'इसमे जो अन्तरात्मा बतलाया गया है, वह