ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य सहित)
Brahma Sutras with Shankara Bhashya - Gita Press
महर्षि बादरायण / आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस गोरखपुर · 1950 (उद्गम)
सूत्र ४१—४४ ] अध्याय ३ ३२९
सूत्र ४१—४४ ] अध्याय ३ ३२९
( इसलिये वे ); अशनवत्=भोजनके नियमभङ्गके प्रायश्चित्तकी भाँति; भावम्=
इसके लिये भी प्रायश्चित्तका भाव मानते है; तदुक्तम्=यह बात शास्त्रमे कही
है ( यह भी उनका कहना है ) ।
व्याख्या—कई एक आचार्योंका कहना है कि जिस प्रकार ब्रह्मचारी अपने
व्रतसे भ्रष्ट होकर प्रायश्चित्तका अधिकारी होता है, वैसे ही वानप्रस्थी और
संन्यासियोंका भी प्रायश्चित्तमे अधिकार है; क्योकि यह महापातक नहीं है; किन्तु
उपपातक है और उपपातकके प्रायश्चित्तका शास्त्रमे विधान है ही । अत. अभक्ष्य-
भक्षण आदिके प्रायश्चित्तकी भाँति इसका भी प्रायश्चित्त अवश्य होना उचित है ।
सम्बन्ध—इसपर आचार्य अपनी सम्मति बताते हैं—
बहिस्तूभयथापि स्मृतेराचाराच्च ॥ ३ । ४ । ४३ ॥
तु=किन्तु; उभयथापि=दोनो प्रकारसे ही; बहिः=यह विद्याके अधिकारसे
बहिष्कृत है; स्मृतेः=क्योकि स्मृतिप्रमाणसे, च=और; आचारात्=शिष्टाचारसे
भी ( यही बात सिद्ध होती है ) ।
व्याख्या—वे उच्च आश्रमसे पतित हुए सन्यासी और वानप्रस्थी लोग
महापातकी हों या उपपातकी, दोनों प्रकारसे ही शिष्ट-सम्प्रदाय और वैदिक
ब्रह्मविद्याके अधिकारसे सर्वथा बहिष्कृत है; क्योकि स्मृति-प्रमाण और
शिष्टोके आचार-व्यवहारसे यही बात सिद्ध होती है । उनका पतन भोगोकी
आसक्तिसे ही होता है । अतः वे ब्रह्मविद्याके अधिकारी नहीं हैं । श्रेष्ठ पुरुष
उनके साथ यज्ञ, स्वाध्याय और विवाह आदि सम्बन्ध भी नहीं करते है ।
सम्बन्ध—इस प्रकार उच्च आश्रमसे भ्रष्ट हुए द्विजोंका ब्रह्मविद्यामे अधिकार
नहीं है, यह सिद्ध किया गया । अब जो कर्मोंके अङ्गभूत उद्गीथ आदिमें
उपासना की जाती है,' उसका कर्ता यजमान होता है या कर्म करनेवाला
ऋत्विक्—इसपर विचार करनेके लिये अगला प्रकरण आरम्भ किया जाता है—
स्वामिनः फलश्रुतेरित्यात्रेयः ॥ ३ । ४ । ४४ ॥
स्वामिनः=उस उपासनामे यजमानका ही कर्तापन है; इति=ऐसा,
आत्रेयः=आत्रेय मानते हैं; फलश्रुतेः=क्योकि श्रुतिमे यजमानके लिये ही फलका
वर्णन किया गया है ।
३३० वेदान्त-दर्शन [ पाद ४
व्याख्या-आत्रेय ऋषि मानते हैं कि श्रुतिमे 'जो इस उपासनाको इस
प्रकार जानता है, वह पुरुष वृष्टिमे पाँच प्रकारके सामकी उपासना करता है,
उसके लिये वर्षा होती है, वह वर्षा करानेमे समर्थ होता है।' (छा० उ० २।
३। २) बृहदारण्यकोपनिषद्में प्रस्तोताद्वारा की जानेवाली अनेक प्रार्थनाओंका
उल्लेख करके अन्तमे उद्गाताका कर्म बताते हुए कहा है कि 'उद्गाता अपने
या यजमानके लिये जिसकी कामना करता है, उसका आगान करता है'
(बृह० उ० १। ३। २८)। इस प्रकार फलका वर्णन करनेवाली श्रुतियोंसे सिद्ध
होता है कि यज्ञके स्वामीको उसका फल मिलता है, अतएव इन फलकामनायुक्त
उपासनाओंका कर्तापन भी स्वामी अर्थात् यजमानका ही होना उचित है।
सम्बन्ध-इसपर दूसरे आचार्यका मत कहते हैं-
आर्त्विज्यमित्यौडुलोमिस्तस्मै हि परिक्रीयते ॥ ३ । ४ । ४५ ॥
आर्त्विज्यम्=कर्तापन ऋत्विक्का है; इति=ऐसा; औडुलोमिः=औडुलोमि
आचार्य मानते हैं; हि=क्योंकि; तस्मै=उस कर्मके लिये; परिक्रीयते=वह
ऋत्विक् यजमानद्वारा धनदानादिसे वरण कर लिया जाता है।
व्याख्या-आचार्य औडुलोमि ऐसा मानते हैं कि कर्तापन यजमानका नहीं,
किन्तु ऋत्विक्का ही है; तथापि फल यजमानको मिलता है, क्योकि वह ऋत्विक्
उस कर्मके लिये यजमानके द्वारा धनदानादिसे वरण कर लिया जाता है।
अतः वह दाताद्वारा दी हुई दक्षिणाका ही अधिकारी है; उसका फलमें अधिकार
नहीं है।
सम्बन्ध-सूत्रकार श्रुतिप्रमाणसे अपनी सम्मति प्रकट करते हैं-
श्रुतेश्च ॥ ३ । ४ । ४६ ॥
श्रुतेः=श्रुतिप्रमाणसे; च=भी (औडुलोमिका ही मत उचित सिद्ध होता है)।
व्याख्या-यज्ञका ऋत्विक् जो कुछ भी कामना करता है, वह निःसन्देह
यजमानके लिये ही करता है (शत० १। ३ । १ । १६) इसलिये इस प्रकार
जाननेवाला उद्गाता यजमानसे कहे कि 'मैं तेरे लिये किन-किन भोगोका आगान
करूँ' (छा० उ० १। ७। ८) इत्यादि श्रुतियोंसे भी कर्मका कर्तापन ऋत्विक्का
और फलमे अधिकार यजमानका सिद्ध होता है।