ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य सहित)
Brahma Sutras with Shankara Bhashya - Gita Press
महर्षि बादरायण / आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस गोरखपुर · 1950 (उद्गम)
सूत्र ३५-३६ ] अध्याय २ १२७
सूत्र ३५-३६ ] अध्याय २ १२७
चन्द्रमा आदि जगत्की रचना की। इससे जड-चेतनात्मक जगत्की अनादि
सत्ता सिद्ध होती है। प्रलयकालमें सर्वशक्तिमान् परब्रह्म परमात्मामें विलीन
हो जानेपर भी उसकी सत्ता एवं सूक्ष्म विभागका अभाव नहीं होता। उपर्युक्त
श्रुतिसे ही यह बात भी सिद्ध है कि जगत्की उत्पत्तिके पहले भी वह अव्यक्त
रूपसे उस सर्वशक्तिमान् परमात्मामें है, उसका अभाव नहीं हुआ है। 'लीङ्
श्लेषणे' धातुसे लय शब्द बनता है। अतः उसका अर्थ संयुक्त होना या मिलना
ही है। उस वस्तुका अभाव हो जाना नहीं। जैसे नमक जलमें घुल-मिल जाता
है, तो भी उसकी सत्ता नहीं मिट जाती। उसके पृथक् स्वादकी उपलब्धि
होनेके कारण जलसे उसका सूक्ष्म विभाग भी है ही। उसी प्रकार जीव और
उनके कर्म प्रलयकालमें ब्रह्मसे अविभक्त रहते हैं तो भी उनकी सत्ता एव सूक्ष्म
विभागका अभाव नहीं होता। इसलिये परमात्माको जीवोंके शुभाशुभ कर्मानुसार
विचित्र जगत्का कर्ता माननेमें कोई आपत्ति नहीं है।
सम्बन्ध—इसपर यह जिज्ञासा होती है कि जीव और उनके कर्म अनादि
हैं, इसमें क्या प्रमाण है ? इसपर कहते हैं—
उपपद्यते चाप्युपलभ्यते च ॥ २ । १ । ३६ ॥
च=इसके सिवा ( जीव और उनके कर्मोंका अनादि होना );
उपपद्यते=युक्तिसे भी सिद्ध होता है; च=और; उपलभ्यते= ( वेदों तथा
स्मृतियोंमें ) ऐसा वर्णन उपलब्ध भी होता है ।
व्याख्या—जीव और उनके कर्म अनादि हैं, यह बात युक्तिसे भी सिद्ध होती है;
क्योकि यदि इनको अनादि नहीं माना जायगा तो प्रलयकालमें परमात्माको प्राप्त हुए
जीवोंके पुनरागमन माननेका दोष प्राप्त होगा। अथवा प्रलयकालमें सब जीव अपने
आप मुक्त हो जाते हैं, यह स्वीकार करना होगा। इससे शास्त्र और उनमें बताये
हुए सब साधन व्यर्थ सिद्ध होंगे, जो सर्वथा अनुचित है। इसके सिवा श्रुति भी
बारंबार जीव और उनके कर्मोंको अनादि बताती है। जैसे—'यह जीवात्मा
नित्य, शाश्वत और पुरातन है। शरीरके नाशसे इसका नाश नहीं होता।'*
तथा 'वह यह प्रत्यक्ष जगत् उत्पन्न होनेसे पहले नाम-रूपसे प्रकट नहीं था, वही
- अजो नित्यः शाश्वतोऽयं पुराणो न हन्यते हन्यमाने शरीरे । ( क० उ० १ । २ । १८ )
१२८ वेदान्त-दर्शन [ पाद १
पीछे प्रकट किया गया।' (बृ० उ० १ । ४ । ७) 'परमात्माने शरीरकी
रचना करके उसमें इस जीवात्माके सहित प्रवेश किया।' (तै० उ० २ । ७)
इत्यादि । इन सब वर्णनोंसे जीवात्मा और यह जगत् अनादि सिद्ध होते हैं।
इसी प्रकार स्मृतिमें भी स्पष्ट कहा गया है कि 'पुरुष (जीवसमुदाय) और
प्रकृति (स्वभाव, जिसमें जीवोंके कर्म भी संस्काररूपमें रहते हैं)—इन दोनोंको
ही अनादि समझो।' (गीता १३ । १९) इस प्रकार जीव और उनके कर्म
अनादि सिद्ध होनेसे उनका विभक्त होना अनिवार्य है; अतः कर्मोंकी अपेक्षासे
परमेश्वरको इस विचित्र जगत्का कर्ता माननेमे कोई विरोध नहीं है।
सम्बन्ध—अपने पक्षमें अविरोध (विरोधका अभाव) सिद्ध करनेके लिये
आरम्भ किये हुए इस पहले पादका उपसंहार करते हुए सूत्रकार कहते हैं—
सर्वधर्मोपपत्तेश्च ॥ २ । १ । ३७ ॥
सर्वधर्मोपपत्तेः=(इस जगत्कारण परब्रह्ममे) सब धर्मोकी सङ्गति है,
इसलिये; च=भी (किसी प्रकारका विरोध नहीं है)।
व्याख्या—इस जगत्कारणरूप परब्रह्म परमात्मामें सभी धर्मोंका होना सङ्गत है;
क्योंकि वह सर्वज्ञ, सर्वशक्तिमान्, सर्वधर्मा, सर्वाधार और सब कुछ बननेमें समर्थ
है। इसीलिये वह सगुण भी है और निर्गुण भी। समस्त जगद्व्यापारसे
रहित होकर भी सब कुछ करनेवाला है। वह व्यक्त भी है और अव्यक्त भी।
उस सर्वधर्माश्रय परब्रह्म परमेश्वरके लिये कुछ भी दुष्कर या असम्भव
नहीं है। इस प्रकार विवेचन करनेसे यह सिद्ध हुआ कि ब्रह्मको जगत्का
कारण माननेमें कोई भी दोष या विरोध नहीं है।
इस पादमें आचार्य बादरायणने प्रधानतः अपने पक्षमे आनेवाले दोषोंका
निराकरण करते हुए अन्तमे जीव और उनके कर्मोंको अनादि बतलाकर इस
जगत्की अनादि-सत्ता तथा सत्कार्यवादकी सिद्धि की है। इससे यह भी स्पष्ट
हो जाता है कि ग्रन्थकार परमेश्वरको केवल निर्गुण, निराकार और निर्विशेष ही
नहीं मानते; किन्तु सर्वज्ञता आदि सब धर्मोंसे सम्पन्न भी मानते हैं।
पहला पाद सम्पूर्ण