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ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य सहित)

Brahma Sutras with Shankara Bhashya - Gita Press

महर्षि बादरायण / आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस गोरखपुर · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished417 पृष्ठ

सूत्र ४-६ ] अध्याय ४ ३३९

सूत्र ४-६ ] अध्याय ४ ३३९
उत्कर्षात्=ब्रह्म ही सर्वश्रेष्ठ है, इसलिये; ब्रह्मदृष्टिः=प्रतीकमें ब्रह्मदृष्टि
करनी चाहिये (क्योंकि निकृष्ट वस्तुमे ही उत्कृष्टकी भावना की जाती है)।
व्याख्या—जब किसी देवताकी प्रत्यक्ष उपासना करनेका साधन सुलभ
नहीं हो, तब सुविधापूर्वक उपलब्ध हुई साधारण वस्तुमे उस देवताकी
भावना करके उपासना की जाती है, देवतामे उस वस्तुकी भावना नहीं
की जाती है; क्योंकि वैसा करनेका कोई उपयोग ही नहीं है।
उसी प्रकार जो साधक उस परब्रह्म परमात्माके तत्त्वको नहीं समझ
सकता, उसके लिये प्रतीकोपासनाका विधान किया गया है, अतः उसे चाहिये
कि इन्द्रिय आदिसे प्रत्यक्ष अनुभवमे आनेवाले प्राण, मन, सूर्य, चन्द्रमा आदि
किसी भी पदार्थको उस परब्रह्म परमात्माका प्रतीक बनाकर उसमे ब्रह्मकी भावना
करके उपासना करे; क्योंकि परब्रह्म परमात्मा ही सर्वश्रेष्ठ है और निकृष्टमें
ही श्रेष्ठकी भावना की जाती है, श्रेष्ठमे निकृष्टकी नहीं। इस प्रकार प्रतीकमें
ब्रह्मभाव करके उपासना करनेसे वह परब्रह्म परमात्मा उस उपासनाको अपनी
ही उपासना मानते हैं।
सम्बन्ध—अब कर्मके अङ्गभूत उद्गीथ आदिके विषयमे कहते हैं—
आदित्यादिमतयश्चाङ्ग उपपत्तेः ॥ ४ । १ । ६ ॥
च=तथा; अङ्गे=कर्माङ्गभूत उद्गीथ आदिमे; आदित्यादिमतयः=आदित्य
आदिकी बुद्धि करनी चाहिये; उपपत्तेः=क्योंकि ऐसा करनेसे कर्मसमृद्धिरूप
फलकी सिद्धि होती है।
व्याख्या—कर्मके अङ्गभूत उद्गीथ आदिमे जो आदित्य आदिकी भावना-
पूर्वक उपासना करनेका विधान किया गया है (छा० उ० १।३।१ तथा २।
२।१) वह अवश्य कर्तव्य है; क्योंकि ऐसा करनेसे कर्म-समृद्धिरूप फलकी
सिद्धि होती है। आत्मभाव करनेका ऐसा कोई फल नहीं दिखायी देता, अतः
उसका निषेध किया गया है। इसलिये यही सिद्ध होता है कि कनिष्ठ वस्तुमें
श्रेष्ठकी भावनाका नाम प्रतीक-उपासना है।
सम्बन्ध—यह जिज्ञासा होती है कि साधकको किसी आसनपर बैठकर
उपासना करनी चाहिये या चलते-फिरते प्रत्येक परिस्थितिमें वह उपासना कर
सकता है? इसपर कहते हैं—

३४० वेदान्त-दर्शन [ पाद १
आसीनः सम्भवात् ॥ ४ । १ । ७ ॥
आसीनः=बैठे हुए ही ( उपासना करनी चाहिये ); सम्भवात्=क्योंकि
बैठकर ही निर्विघ्न उपासना करना सम्भव है ।
व्याख्या—परब्रह्म परमेश्वरका जैसा रूप सुनने और विचार करनेपर
समझमें आया है, उसका बार-बार तैलधाराकी भाँति निरन्तर चिन्तन करते
रहनेका नाम उपासना है । यह उपासना चलते-फिरते या अन्य शरीरसम्बन्धी
काम करते समय नहीं हो सकती; क्योंकि उस समय चित्त विक्षिप्त रहता है
तथा सोते हुए करनेमें भी निद्रारूप विघ्नका आना स्वाभाविक है; अतः केवल
बैठकर करनेसे ही निर्विघ्न उपासना हो सकती है । इसलिये उपासनाका
अभ्यास बैठकर ही करना चाहिये । भगवान् श्रीकृष्णने भी कहा है कि
'उपविश्यासने युञ्ज्याद् योगमात्मविशुद्धये ।' अर्थात् 'आसनपर बैठकर अन्तः-
करणकी शुद्धिके लिये योगका अभ्यास करे ।' ( गीता ६ । १२ ) ।
सम्बन्ध—उसी बातको दृढ़ करनेके लिये दूसरा हेतु उपस्थित करते हैं—
ध्यानाच्च ॥ ४ । १ । ८ ॥
ध्यानात्=उपासनाका स्वरूप ध्यान है, इसलिये; च=भी ( यही सिद्ध
होता है कि बैठकर उपासना करनी चाहिये ) ।
व्याख्या—अपने इष्टदेवका ध्यान ही उपासनाका स्वरूप है ( मु० उ० ३ । १ ।
८) और चित्तकी एकाग्रताका नाम ध्यान है । अतएव यह बैठकर ही किया जा
सकता है, चलते-फिरते या सोकर नहीं किया जा सकता ।
सम्बन्ध—पुनः उसी बातको दृढ़ करते हैं—
अचलत्वं चापेक्ष्य ॥ ४ । १ । ९ ॥
च=तथा श्रुतिमें; अचलत्वम्=शरीरकी निश्चलताको; अपेक्ष्य=रखते
हुए ध्यान करनेका उपदेश है ।
व्याख्या—श्रुतिमें कहा है कि—
त्रिरुन्नतं स्थाप्य समं शरीरं हृदीन्द्रियाणि मनसा संनिवेश्य ।
ब्रह्मोडुपेन प्रतरेत विद्वान् स्रोतांसि सर्वाणि भयावहानि ॥
'ब्रह्मकी प्राप्तिके लिये ध्यानका अभ्यास करनेवालेको चाहिये कि सिर, ग्रीवा
और छाती—इन तीनोंको उठाये हुए, शरीरको सीधा और स्थिर करके समस्त