ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य सहित)
Brahma Sutras with Shankara Bhashya - Gita Press
महर्षि बादरायण / आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस गोरखपुर · 1950 (उद्गम)
सूत्र ११-१३ ] अध्याय १ ५५
सूत्र ११-१३ ] अध्याय १ ५५
प्रकृतिका वाचक नहीं हो सकता । अतः यही सिद्ध होता है कि यहाँ 'अक्षर'
नामसे परब्रह्मका ही प्रतिपादन किया गया है ।
सम्बन्ध-उपर्युक्त प्रकरणमे 'अक्षर' शब्दको परब्रह्मका वाचक सिद्ध किया
गया । किन्तु प्रश्नोपनिषद् ( ५ । २-७ ) में ॐकार अक्षरको परब्रह्म और
अपरब्रह्म दोनोंका प्रतीक बताया गया है । अतः वहाँ अक्षरको अपरब्रह्म भी
माना जा सकता है, इस शङ्काकी निवृत्तिके लिये अगला प्रकरण आरम्भ किया
जाता है—
ईक्षतिकर्मव्यपदेशात् सः ॥ १ । ३ । १३ ॥
ईक्षतिकर्मव्यपदेशात् = यहाँ परम पुरुषको 'ईक्षते' क्रियाका कर्म बताये
जानेके कारण; सः = यह परब्रह्म परमेश्वर ही ( त्रिमात्रासम्पन्न 'ओम्' इस
अक्षरके द्वारा चिन्तन करनेयोग्य बताया गया है ) ।
व्याख्या-इस सूत्रमे जिस मन्त्रपर विचार चल रहा है, वह इस प्रकार है-
'यः पुनरेतं त्रिमात्रेणोमित्येतेनैवाक्षरेण परं पुरुषमभिध्यायीत स तेजसि
सूर्ये सम्पन्नः । यथा पादोदरस्त्वचा विनिर्मुच्यत एवं ह वै स पाप्मना विनिर्मुक्तः
स सामभिरुन्नीयते ब्रह्मलोकं स एतस्माज्जीवघनात् परात्परं पुरिशयं पुरुषमीक्षते ।'
( प्र० उ० ५ । ५ ) । अर्थात् 'जो तीन मात्राओवाले 'ओम्' रूप इस
अक्षरके द्वारा ही इस परम पुरुषका निरन्तर ध्यान करता है, वह तेजोमय सूर्यलोकमे
जाता है। तथा जिस प्रकार सर्प केचुलीसे अलग हो जाता है, ठीक उसी तरह, वह
पापोंसे सर्वथा मुक्त हो जाता है । इसके बाद वह सामवेदकी श्रुतियोद्वारा ऊपर
ब्रह्मलोकमे ले जाया जाता है। वह इस जीव-समुदायरूप परतत्त्वसे अत्यन्त
श्रेष्ठ अन्तर्यामी परम पुरुष पुरुषोत्तमको साक्षात् कर लेता है।' इस मन्त्रमे
जिसको तीनों मात्राओंसे सम्पन्न ॐकारके द्वारा ध्येय बतलाया गया है, वह पूर्ण-
ब्रह्म परमात्मा ही है, अपरब्रह्म नहीं; क्योकि उस ध्येयको, जीव-समुदायके
नामसे वर्णित हिरण्यगर्भरूप अपरब्रह्मसे अत्यन्त श्रेष्ठ बताकर 'ईक्षते' क्रियाका
कर्म बतलाया गया है ।
सम्बन्ध-उपर्युक्त प्रकरणमें मनुष्यशरीररूप पुरमें शयन करनेवाले पुरुषको
'परब्रह्म परमात्मा सिद्ध किया गया है । किन्तु छान्दोग्योपनिषद् ( ८ । १ । १ )
में ब्रह्मपुरान्तर्गत दहर ( सूक्ष्म ) आकाशका वर्णन करके उसमे स्थित वस्तुको
जाननेके लिये कहा है। वह एकदेशीय वर्णन होनेके कारण जीवपरक हो
सकता है। इसलिये यह जिज्ञासा होती है कि उक्त प्रकरणमें 'दहर' नामसे
कहा हुआ तत्त्व क्या है ? इसपर कहते हैं—
दहर उत्तरेभ्यः ॥ १ । ३ । १४ ॥
दहरः=उक्त प्रकरणमे 'दहर' शब्दसे जिस ज्ञेय तत्त्वका वर्णन किया गया
है, वह ब्रह्म ही है; उत्तरेभ्यः=क्योकि उसके पश्चात् आये हुए वचनोसे यही
सिद्ध होता है।
व्याख्या—छान्दोग्य ( ८ । १ । १ ) मे कहा है कि 'अथ यदिदमस्मिन्ब्रह्म-
पुरे दहरं पुण्डरीकं वेश्म दहरोऽस्मिन्नन्तराकाशस्तस्मिन् यदन्तस्तदन्वेष्टव्यं तद्
वाव विजिज्ञासितव्यम् ।' अर्थात् 'इस ब्रह्मके नगररूप मनुष्य-शरीरमे कमलके
आकारवाला एक घर ( हृदय ) है, उसमे सूक्ष्म आकाश है। उसके भीतर
जो वस्तु है, उसको जाननेकी इच्छा करनी चाहिये।' इस वर्णनमे जिसे ज्ञातव्य बताया
गया है, वह 'दहर' शब्दका लक्ष्य परब्रह्म परमेश्वर ही है; क्योकि आगेके वर्णनमे इसीके
भीतर समस्त ब्रह्माण्डको निहित बताया है तथा उसके विषयमे यह भी कहा है
कि 'यह आत्मा, सब पापोसे रहित, जरामरणवर्जित, शोकशून्य, भूख-प्याससे
रहित, सत्यकाम तथा सत्यसंकल्प है। इत्यादि ( ८ । १ । ५ ) । तदनन्तर
आगे चलकर ( छा० उ० ८ । ३ । ४ मे ) कहा है कि 'यही आत्मा, अमृत,
अभय और ब्रह्म है । इसीका नाम सत्य है।' इससे यही सिद्ध होता है कि
यहाँ 'दहर' शब्द परब्रह्मका ही बोधक है।
सम्बन्ध—प्रकारान्तरसे इसी बातको सिद्ध करते हैं—
गतिशब्दाभ्यां तथा दृष्टं लिङ्गं च ॥ १ । ३ । १५ ॥
गतिशब्दाभ्याम्=ब्रह्ममे गतिका वर्णन और ब्रह्मवाचक शब्द होनेसे;
तथा दृष्टम्=एवं दूसरी श्रुतियोमे ऐसा ही वर्णन देखा गया है; च=और;
लिङ्गम्=इस वर्णनमे आये हुए लक्षण भी ब्रह्मके हैं; इसलिये यहाँ 'दहर' नामसे
ब्रह्मका ही वर्णन हुआ है।
व्याख्या—इस प्रसङ्गमे यह बात कही गयी है कि—'इमाः सर्वाः प्रजा
अहरहर्गच्छन्त्य एतं ब्रह्मलोकं न विन्दन्त्यनृतेन हि प्रत्यूढाः ॥ ( छा० उ० ८।