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ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य सहित)

Brahma Sutras with Shankara Bhashya - Gita Press

महर्षि बादरायण / आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस गोरखपुर · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished417 पृष्ठ

सूत्र ३३—३६ ] अध्याय २ १८३

सूत्र ३३—३६ ] अध्याय २ १८३
उपादानात्=इन्द्रियोंको ग्रहण करके विचरनेका वर्णन होनेसे (भी
यही सिद्ध होता है कि इन्द्रिय आदिके सम्बन्धसे जीवात्मा 'कर्ता' है)।
व्याख्या—यहाँ 'उपादान' शब्द उपादान कारणका वाचक नहीं; किन्तु
'ग्रहण' रूप क्रियाका बोधक है। श्रुतिमें कहा है कि--'स यथा महाराजो जान-
पदान् गृहीत्वा स्वे जनपदे यथाकामं परिवर्तेतैवमेवैष एतत्प्राणान् गृहीत्वा स्वे
शरीरे यथाकामं परिवर्तते ॥' (बृह० उ० २।१।१८) अर्थात् 'जिस प्रकार
कोई महाराज प्रजाजनोंको साथ लेकर अपने देशमें इच्छानुसार भ्रमण करता है,
वैसे ही यह जीवात्मा स्वप्नावस्थामे प्राणशब्दवाच्य इन्द्रियोंको ग्रहण करके
इस शरीरमे इच्छानुसार विचरता है। इस प्रकार इन्द्रियोंके द्वारा कर्म करनेका
वर्णन होनेसे यह सिद्ध होता है कि प्रकृति या इन्द्रियों स्वतन्त्र 'कर्ता' नहीं हैं;
उनसे युक्त हुआ जीवात्मा ही कर्ता है (गीता १५।७, ९)।
सम्बन्ध—प्रकारान्तरसे जीवात्माका कर्तापन सिद्ध करते हैं—
व्यपदेशाच्च क्रियायां न चेन्निर्देश-
विपर्ययः ॥ २।३।३६॥
क्रियायाम्=क्रिया करनेमे; व्यपदेशात्=जीवात्माके कर्तापनका श्रुतिमें
कथन है, इसलिये; च=भी (जीवात्मा कर्ता है); चेत्=यदि; न=जीवात्माको कर्ता
बताना अभीष्ट न होता तो; निर्देशविपर्ययः=श्रुतिका सङ्केत उसके विपरीत होता।
व्याख्या—श्रुतिमें कहा है कि 'विज्ञानं यज्ञं तनुते कर्माणि तनुतेऽपि च।'
(तै० उ० २।५) अर्थात् 'यह जीवात्मा यज्ञका विस्तार करता है और
उसके लिये कर्मोंका विस्तार करता है।' इस प्रकार जीवात्माको कर्मोंका विस्तार
करनेवाला कहा जानेके कारण उसका कर्तापन सिद्ध होता है। यदि कहो
'विज्ञान' शब्द बुद्धिका वाचक है, अतः यहाँ बुद्धिको ही कर्ता बताया गया है
तो यह कहना उस प्रसङ्गके विपरीत होगा; क्योंकि वहाँ विज्ञानमयके नामसे
जीवात्माका ही प्रकरण है। यदि 'विज्ञान' नामसे बुद्धिको ग्रहण करना अभीष्ट होता
तो मन्त्रमें 'विज्ञान' शब्दके साथ प्रथमा विभक्तिका प्रयोग न होकर करणद्योतक
तृतीया विभक्तिका प्रयोग होता।
सम्बन्ध—यहाँ यह जिज्ञासा होती है कि जीव यदि स्वतन्त्र कर्ता
है, तब तो इसे अपने हितका ही काम करना चाहिये, अनिष्टकार्यमें इसकी

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प्रवृत्ति नहीं होनी चाहिये; किन्तु ऐसा नहीं देखा जाता, इसका क्या कारण है ?
इसपर कहते हैं—
उपलब्धिवदनियमः ॥ २ । ३ । ३७ ॥
उपलब्धिवत्=सुख-दुःखादि भोगोंकी प्राप्तिकी भाँति; अनियमः=कर्म
करनेमें भी नियम नहीं है ।
व्याख्या—जिस प्रकार इस जीवात्माको सुख-दुःख आदि भोगोंकी प्राप्ति होती
है, उसमें यह निश्चित नियम नहीं है कि उसे अनुकूल-ही-अनुकूल भोग प्राप्त हो,
प्रतिकूल न हो; इसी प्रकार कर्म करनेमें भी यह नियम नहीं है कि वह अपने
हितकारक ही कर्म करे, अहितकारक न करे । यदि कहो कि फलभोगमें तो जीव
प्रारब्धके कारण स्वतन्त्र नहीं है, उसके प्रारब्धानुसार परमेश्वरके विधानसे जैसे
भोगोंका मिलना उचित होता है, वैसे भोग मिलते हैं; परन्तु नये कर्मोंके करनेमें
तो वह स्वतन्त्र है, फिर अहितकर कर्ममें प्रवृत्त होना कैसे उचित है, तो इसका
उत्तर यह है कि वह जिस प्रकार फल भोगनेमें प्रारब्धके अधीन है, वैसे ही नये
कर्म करनेमें अनादिकालसे सञ्चित कर्मोंके अनुसार जो जीवात्माका स्वभाव बना हुआ
है, उसके अधीन है; इसलिये यह सर्वथा हितमें ही प्रयुक्त हो, ऐसा नियम नहीं
हो सकता । अतः कोई विरोध नहीं है । भगवान्‌का आश्रय लेकर यदि यह अपने
स्वभावको सुधारनेमें लग जाय तो उसका सुधार कर सकता है । उसका पूर्णतया
सुधार हो जानेपर अहितकारक कर्मोंमें होनेवाली प्रवृत्ति बंद हो सकती है ।
सम्बन्ध—उपर्युक्त कथनकी पुष्टिके लिये दूसरा हेतु प्रस्तुत करते हैं—
शक्तिविपर्ययात् ॥ २ । ३ । ३८ ॥
शक्तिविपर्ययात्=शक्तिका विपर्यय होनेके कारण भी ( उसके द्वारा सर्वथा
हिताचरण होनेका नियम नहीं हो सकता ) ।
व्याख्या—जीवात्माका जो कर्त्तापन है, वह स्वरूपसे नहीं है; किन्तु अनादि
कर्मसंस्कार तथा इन्द्रियों और शरीर आदिके सम्बन्धसे है यह बात पहले बता आये हैं।
इसलिये वह नियमितरूपसे अपने हितका आचरण नहीं कर सकता; क्योंकि प्रत्येक काम
करनेमें सहकारी कारणोंकी और बाह्य सामग्रीकी आवश्यकता होती है; उन सबकी
उपलब्धिमें यह सर्वथा परतन्त्र है। एवं अन्तःकरणकी, इन्द्रियोंकी और शरीरकी शक्ति
भी कभी अनुकूल हो जाती है और कभी प्रतिकूल हो जाती है । इस प्रकार