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सर्वकोश
ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य सहित)

ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य सहित)

Brahma Sutras with Shankara Bhashya - Gita Press

महर्षि बादरायण / आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस गोरखपुर · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished417 पृष्ठ

पृष्ठ 318, कुल 417 में से

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पृष्ठ 318

सूत्र ५६-५९ ] अध्याय ३ २९७
अङ्गकी उपासना करते हो।' साथ ही उन्होंने उस एकाङ्ग उपासनाका
साधारण फल बताया और उन सबको भय दिखाते हुए कहा, 'यदि
तुम मेरे पास न आते तो तुम्हारा सिर गिर जाता, तुम अंधे हो जाते'-इत्यादि
(छा० उ० ५ । ११ से १७ तक) । तदनन्तर (अठारहवे खण्डमे) यह बताया
कि 'तुमलोग उस वैश्वानर परमात्माके एक-एक अङ्गकी उपासना करते हो, जो
इस बातको समझकर आत्मारूपसे इसकी उपासना करता है, वह समस्त लोकमें, समस्त
प्राणियोमे और समस्त आत्माओमे अन्न भक्षण करनेवाला हो जाता है।' (छा० उ०
५ । १८ । १) इस प्रकार वहाँ पूर्ण उपासनाका अधिक फल बताया गया
है। इसलिये यही सिद्ध होता है कि एक-एक अङ्गकी उपासनाकी अपेक्षा पूर्ण
उपासना श्रेष्ठ है। अतः पूर्ण उपासनाका ही अनुष्ठान करना चाहिये।
सम्बन्ध-नाना प्रकारसे बतायी हुई ब्रह्मविद्या भिन्न-भिन्न हे कि एक ही है ?
इस जिज्ञासापर कहते हैं-
नाना शब्दादिभेदात् ॥ ३ । ३ । ५८ ॥
शब्दादिभेदात्=शब्द आदिका भेद होनेके कारण; नाना=सब विद्याएँ
अलग-अलग हैं।
व्याख्या-सद्-विद्या, भूमविद्या, दहरविद्या, उपकोसलविद्या, शाण्डिल्यविद्या,
वैश्वानरविद्या, आनन्दमयविद्या, अक्षरविद्या इत्यादि भिन्न-भिन्न नाम और विधि-
विधानवाली इन विद्याओमे नाम और प्रकार आदिका भेद है। किसी अधिकारीके
लिये एक विद्या उपयुक्त होती है, तो अन्यके लिये दूसरी ही उपयुक्त होती है; इसलिये
सबका फल एक ब्रह्मकी प्राप्ति होनेपर भी विद्या एक नहीं है, भिन्न-भिन्न हैं।
सम्बन्ध-इन सबके समुच्चयका विधान है या विकल्पका अर्थात् इन सबको
मिलाकर अनुष्ठान करना चाहिये या एक-एकका अलग-अलग ? इस जिज्ञासापर
कहते हैं-
विकल्पोऽविशिष्टफलत्वात् ॥ ३ । ३ । ५९ ॥
अविशिष्टफलत्वात्=सब विद्याओंका एक ही फल है, फलमें भेद नहीं
है, इसलिये; विकल्पः=अलग-अलग अनुष्ठान करना ही उचित है।
व्याख्या-जिस प्रकार स्वर्गादिकी प्राप्तिके साधनभूत जो भिन्न-भिन्न यज्ञ-याग
आदि बताये गये हैं, उनमेंसे जिन-जिनका फल एक है, उनका समुच्चय नहीं होता।
यजमान अपने इच्छानुसार उनमेसे किसी भी एक यज्ञका अनुष्ठान कर सकता है।