ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य सहित)
Brahma Sutras with Shankara Bhashya - Gita Press
महर्षि बादरायण / आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस गोरखपुर · 1950 (उद्गम)
पृष्ठ 372, कुल 417 में से
संदर्भ में पढ़ेंसूत्र ५-८ ] अध्याय ४ ३५१
अण्व्यो मात्रा विनाशिन्यो दशार्धानां तु याः स्मृताः ।
ताभिः सार्धमिदं सर्वं संभवत्यनुपूर्वशः ॥ (मनु० १ । २७)
'पाँचों भूतोंकी जो विनाशशील पाँच सूक्ष्म तन्मात्राएँ ( रूप, रस, गन्ध,
स्पर्श और शब्द ) कही गयी हैं, उनके साथ यह सम्पूर्ण जगत् क्रमशः उत्पन्न
होता है ।'
सम्बन्ध-यहाँ यह जिज्ञासा होती है कि मरणकालकी गतिका जो वर्णन
किया गया है, यह साधारण मनुष्योंके विषयमें है या ब्रह्मलोकको प्राप्त होनेवाले
तत्त्ववेत्ताओंके विषयमें ? इसपर कहते हैं—
समाना चासृत्युपक्रमादमृतत्वं चानुपोष्य ॥ ४ । २ । ७ ॥
आसृत्युपक्रमात्=देवयानमार्गद्वारा ब्रह्मलोकमे जानेका क्रम आरम्भ होनेतक,
समाना=दोनोंकी गति समान; च=ही है, च=क्योंकि; अनुपोष्य=सूक्ष्म
शरीरको सुरक्षित रखकर ही; अमृतत्वम्=ब्रह्मलोकमे अमृतत्व लाभ करना
ब्रह्मविद्याका फल बताया गया है ।
व्याख्या-वाणी मनमे स्थित होती है, यहाँसे लेकर प्राण, मन और इन्द्रियों-
सहित जो जीवात्माके सूक्ष्म भूतसमुदायमे स्थित होनेतकका यानी स्थूल-शरीरसे
निकलकर ब्रह्मलोकमे जानेका जो मार्ग बताया गया है, उसका आरम्भ होनेसे पहले
साधारण मनुष्योंकी और ब्रह्मलोकमे जानेवाले ज्ञानी पुरुषकी गति एक समान ही
बतायी गयी है; क्योंकि सूक्ष्म शरीरके सुरक्षित रहते हुए ही इस लोकसे ब्रह्म-
लोकमे जाना होता है और वहाँ जाकर उसे अमृतस्वरूपकी प्राप्ति होती है ।
इसीलिये अलग-अलग वर्णन नहीं किया गया है ।
सम्बन्ध-उस प्रकरणके अन्तमें जो यह कहा गया है कि मन, इन्द्रियाँ
और जीवात्माके सहित वह तेज परमदेवतामें स्थित होता है तो यह स्थित
होना कैसा है; क्योंकि प्रकरण साधारण मनुष्योंका है, सभी समान भावसे
परमदेव परमात्माको प्राप्त हो जायँ, यह सम्भव नहीं ! इस जिज्ञासापर कहते हैं—
तदापीतेः संसारव्यपदेशात् ॥ ४ । २ । ८ ॥
संसारव्यपदेशात्=साधारण जीवोंका मरनेके बाद बार-बार जन्म ग्रहण
करनेका कथन होनेके कारण (यही सिद्ध होता है कि); तत्=उनका वह सूक्ष्म