ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य सहित)
Brahma Sutras with Shankara Bhashya - Gita Press
महर्षि बादरायण / आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस गोरखपुर · 1950 (उद्गम)
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है और फिर उसका फल-भोग करवाता है, यह माननेसे ईश्वरमें विषमता और
निर्दयताका दोष आयेगा, उसका निराकरण कैसे होगा, इसपर कहते हैं—
कृतप्रयत्नापेक्षस्तु विहितप्रतिषिद्धावैयर्थ्या-
दिभ्यः ॥ २ । ३ । ४२ ॥
तु=किन्तु; कृतप्रयत्नापेक्षः=ईश्वर जीवके पूर्वकृत कर्म-संस्कारोंकी अपेक्षा
रखते हुए ही उसको नवीन कर्मोंमें नियुक्त करता है, इसलिये तथा; विहितप्रति-
षिद्धावैयर्थ्यादिभ्यः=विधि-निषेध शास्त्रकी सार्थकता आदि हेतुओसे भी ईश्वर
सर्वथा निर्दोष है ।
व्याख्या—ईश्वरद्वारा जो जीवात्माको नवीन कर्म करनेकी शक्ति देकर उसे
नवीन कर्मोंमें नियुक्त किया जाता है, वह उस जीवात्माके जन्म-जन्मान्तरमे
सञ्चित किये हुए कर्म-संस्कारसे उत्पन्न स्वभावकी अपेक्षासे ही किया जाता है,
बिना अपेक्षाके नहीं । इसलिये ईश्वर सर्वथा निर्दोष है तथा ऐसा करनेसे ही
शास्त्रोंमें अच्छे काम करनेके लिये कहे हुए विधि-वाक्योंकी और पापाचरण न
करनेके लिये कहे हुए निषेध-वाक्योंकी सार्थकता सिद्ध होती है । तथा ईश्वरने
जीवको अपने स्वभावका सुधार करनेके लिये जो स्वतन्त्रता प्रदान की है, वह भी
सार्थक होती है । इसलिये ईश्वरका यह कर्म न्याय ही है । इसी भावको स्पष्ट
करनेके लिये गीतामे भगवान्ने कहा है कि—
स्वभावजेन कौन्तेय निबद्धः स्वेन कर्मणा ।
कर्तुं नेच्छसि यन्मोहात्करिष्यस्यवशोऽपि तत् ॥
'हे कुन्तीपुत्र ! अपने जन्म-जन्मान्तरके कर्मसंस्काररूप स्वभावजनित
कर्मोंद्वारा बँधा हुआ तू जिस कामको नहीं करना चाहता उसे भी परवश हुआ
अवश्य करेगा ।' ( गी० १८ । ६० )
इसके बाद ही यह भी कहा है कि 'सबके हृदयमे स्थित परमेश्वर सबसे
चेष्टा कराता है ।' इससे भी यही सिद्ध होता है कि परब्रह्म परमेश्वर जीवोद्वारा
जन्म-जन्मान्तरमें किये हुए कर्मोंकी अपेक्षासे ही उनको कर्म करनेकी शक्ति
आदि प्रदान करके स्वाभाविक स्वधर्मरूप नवीन कर्मोंमें नियुक्त करते हैं । इसलिये
ईश्वर सर्वथा निर्दोष हैं ।
सम्बन्ध—पूर्वप्रकरणमें यह सिद्ध किया गया कि जीवात्मा कर्ता है और