सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य सहित)

ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य सहित)

Brahma Sutras with Shankara Bhashya - Gita Press

महर्षि बादरायण / आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस गोरखपुर · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished417 पृष्ठ

पृष्ठ 165, कुल 417 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 165

१४४ वेदान्त-दर्शन [ पाद २
ये अविद्या आदि उत्तरोत्तरकी उत्पत्तिमात्रमे ही निमित्त माने गये हैं ( समुदाय
या संघातमे नहीं; अतः इनसे भी समुदायकी सिद्धि नहीं हो सकती ) ।
व्याख्या—बौद्धशास्त्रमें विज्ञानसंततिके कुछ हेतु माने गये हैं, उनके नाम
इस प्रकार हैं—अविद्या, संस्कार, विज्ञान, नाम, रूप, षडायतन, स्पर्श, वेदना,
तृष्णा, उपादान, भव, जाति, जरा, मरण, शोक, परिदेवना, दुःख तथा दुर्मनस्ता
आदि। क्षणिक वस्तुओमे नित्यता और स्थिरता आदिका जो भ्रम है, वही
'अविद्या' कहलाता है। यह अविद्या विषयोमे रागादिरूप 'संस्कार' उत्पन्न करनेमे कारण
बनती है। वह संस्कार गर्भस्थ शिशुमे आलय 'विज्ञान' उत्पन्न करता है। उस
आलय-विज्ञानसे पृथिवी आदि चार भूत होते है, जो शरीर एवं समुदायके कारण है।
वही नामका आश्रय होनेसे 'नाम' भी कहा गया है। वह नाम ही श्याम-गौर आदि
रूपवाले शरीरका उत्पादक होता है। गर्भस्थ शरीरकी जो कलल-बुद्बुद आदि अवस्थाएँ
हैं, उन्हींको नाम तथा 'रूप' शब्दका वाच्य कहा गया है। पृथिवी आदि चार भूत,
नाम, रूप, शरीर, विज्ञान और धातु—ये छः जिनके आश्रय है, उन इन्द्रियोंके
समूहको 'षडायतन' कहा गया है। नाम, रूप तथा इन्द्रियोके परस्पर सम्बन्धका
नाम 'स्पर्श' है। उससे सुख आदिकी 'वेदना' ( अनुभूति ) होती है। उससे
क्रमशः तृष्णा, उपादान, भव, जाति, जरावस्था, मृत्यु, शोक, परिदेवना तथा दुर्मनस्ता
( मनकी उद्विग्नता ) आदि भी इसी प्रकार उत्पन्न होते हैं। तत्पश्चात् पुनः
अविद्या आदिके क्रमसे पूर्वोक्त सभी बाते प्रकट होती रहती है। ये घटीयन्त्र
( रहट ) की भाँति निरन्तर चक्कर लगाते हैं, अतः यदि इस मान्यताको लेकर
कहा जाय कि इन्हींसे समुदायकी भी सिद्धि हो जाती है तो यह ठीक नहीं है;
क्योकि पूर्वोक्त अविद्या आदिमेसे जो पूर्ववर्ती है, वह बादमे कहे हुए
संस्कार आदिकी उत्पत्तिमात्रमे कारण होता है, संघातकी उत्पत्तिमे नहीं; अतः
उसकी सिद्धि असम्भव है।
सम्बन्ध—पूर्वसूत्रमें यह बात बतायी गयी कि अविद्या आदि हेतु संस्कार
आदिकी उत्पत्तिमात्रमें ही निमित्त माने गये है, अतः उनसे संघात ( समुदाय )
की सिद्धि नहीं हो सकती। अब यह सिद्ध करते हैं कि वे अविद्या आदि हेतु
संस्कार आदि भावोंकी उत्पत्तिमे भी निमित्त नही हो सकते—
उत्तरोत्पादे च पूर्वनिरोधात् ॥ २ । २ । २० ॥