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सर्वकोश
ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य सहित)

ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य सहित)

Brahma Sutras with Shankara Bhashya - Gita Press

महर्षि बादरायण / आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस गोरखपुर · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished417 पृष्ठ

पृष्ठ 161, कुल 417 में से

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पृष्ठ 161

१४० वेदान्त-दर्शन [ पाद २
च = तथा; रूपादिमत्त्वात् = परमाणुओको रूप, रस आदि गुणोवाला माना
गया है, इसलिये; विपर्ययः = उनमे नित्यताके विपरीत अनित्यताका दोष उपस्थित
होता है; दर्शनात् = क्योकि ऐसा ही देखा जाता है ।
व्याख्या—वैशेषिक मतमे परमाणु नित्य होनेके साथ-साथ रूप, रस आदि
गुणोंसे युक्त भी माने गये हैं । इससे उनमे नित्यताके विपरीत अनित्यताका दोष
उपस्थित होता है; रूपादि गुणोंसे युक्त होनेपर वे नित्य नहीं माने जा सकते;
क्योकि रूप आदि गुणवाली जो घट आदि वस्तुएँ हैं, उनकी अनित्यता प्रत्यक्ष
देखी जाती है । यदि उन परमाणुओको रूप, रस आदि गुणोसे रहित माने तो
उनके कार्यमे रूप आदि गुण नहीं होने चाहिये । इसके सिवा वैसा माननेपर
'रूपादिमन्तो नित्याश्च'—परमाणु रूपादि गुणोसे युक्त और नित्य है, इस प्रतिज्ञा-
की सिद्धि नहीं होती है । इस प्रकार अनुपपत्तियोसे भरा हुआ यह परमाणुवाद
कदापि सिद्ध नहीं होता ।
सम्बन्ध—प्रकारान्तरसे परमाणुवादको सदोष सिद्ध करते हैं—
उभयथा च दोषात् ॥ २ । २ । १६ ॥
उभयथा = परमाणुओको न्यूनाधिक गुणोसे युक्त मानें या गुणरहित मानें,
दोनो प्रकारसे; च = ही; दोषात् = दोष आता है, इसलिये (परमाणुवाद सिद्ध नहीं होता) ।
व्याख्या—पृथिवी आदि भूतोमेसे किसीमे अधिक और किसीमे कम गुण
देखे जाते हैं, इससे उनके आरम्भक परमाणुओमे भी न्यूनाधिक गुणोकी स्थिति
माननी होगी । ऐसी दशामे यदि उनको अधिक गुणोसे युक्त माना जाय तब तो
सभी कार्योमे उतने ही गुण होने चाहिये; क्योकि कारणके गुण कार्यमे समान
जातीय गुणान्तर प्रकट करते हैं । उस दशामें जलमे भी गन्ध और तेजमें भी
गन्ध एवं रस प्रकट होनेका दोष प्राप्त होगा । अधिक गुणवाली पृथिवीमे स्थूलता-
नामक गुण देखा जाता है, यही गुण कारणभूत परमाणुमे मानना पड़ेगा । यदि
ऐसा मानें कि उनमें न्यूनतम अर्थात् एक-एक गुण ही है तब तो सभी स्थूल
भूतोंमे एक-एक गुण ही प्रकट होना चाहिये । उस अवस्थामे तेजमे स्पर्श नहीं
होगा, जलमे रूप और स्पर्श नहीं रहेंगे तथा पृथिवीमे रस, रूप एवं स्पर्शका
अभाव होगा; क्योकि उनके परमाणुओमें एकसे अधिक गुणका अभाव है । यदि
उनमें सर्वथा गुणोका अभाव मान लें तो उनके कार्योंमे जो गुण प्रकट होते