ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य सहित)
Brahma Sutras with Shankara Bhashya - Gita Press
महर्षि बादरायण / आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस गोरखपुर · 1950 (उद्गम)
सूत्र ३-६ ] अध्याय २ १०५
सूत्र ३-६ ] अध्याय २ १०५
सम्बन्ध—यदि कहो, अचेतन कहे जानेवाले आकाश आदि तत्त्वोंका भी श्रुतिमें
चेतनकी भाँति वर्णन मिलता है। जैसे—'तत्तेज ऐक्षत' (छा० उ० ६।२।
३)—'उस तेजने विचार किया।' 'ता आप ऐक्षन्त' (छा० उ० ६।२।
४) 'उस जलने विचार किया।' इत्यादि। तथा पुराणोंमें नदी, समुद्र, पर्वत
आदिका भी चेतन-जैसा वर्णन किया गया है। इस प्रकार चेतन होनेके कारण
यह जगत् चेतन परमात्मासे विलक्षण नहीं है; इसलिये चेतन परमात्माको इसका
कारण माननेमें कोई आपत्ति नहीं है, तो इसका उत्तर इस प्रकार दिया जाता है—
अभिमानिव्यपदेशस्तु विशेषानुगतिभ्याम् ॥ २ । १ । ५ ॥
तु=किन्तु; (वहाँ तो) अभिमानिव्यपदेशः=उन-उन तत्त्वोंके अभिमानी
देवताओंका वर्णन है; (यह बात) विशेषानुगतिभ्याम्=विशेष शब्दोंके प्रयोग-
से तथा उन तत्त्वोंमे देवताओंके प्रवेशका वर्णन होनेसे (सिद्ध होती है)।
व्याख्या—श्रुतिमें जो 'तेज, जल आदिने विचार किया' इत्यादि
रूपसे जड तत्त्वोंमें चेतनके व्यवहारका कथन है, वह तो उन तत्त्वोंके
अभिमानी देवताओंको लक्ष्य करके है। यह बात उन-उन स्थलोंमें प्रयुक्त
हुए विशेष शब्दोंसे सिद्ध होती है। जैसे तेज, जल और अन्न—इन
तीनोंकी उत्पत्तिका वर्णन करनेके बाद इन्हें 'देवता' कहा गया है
(छा० उ० ६।३।२)। तथा ऐतरेयोपनिषद् (१।२।४) मे 'अग्नि
वाणी बनकर मुखमें प्रविष्ट हुआ, वायु प्राण बनकर नासिकामें प्रविष्ट हुआ।'
इस प्रकार उनकी अनुगतिका उल्लेख होनेसे भी उनके अभिमानी देवताओंका
ही वर्णन सिद्ध होता है। इसलिये ब्रह्मको जगत्का उपादान कारण बताना युक्ति-
संगत नहीं है, क्योंकि आकाश आदि जड तत्त्व भी इस जगत्मे उपलब्ध होते
हैं, जो कि चेतन ब्रह्मके धर्मोंसे सर्वथा विपरीत लक्षणोंवाले हैं।
सम्बन्ध—ऊपर उठायी हुई शङ्काका ग्रन्थकार उत्तर देते हैं—
दृश्यते तु ॥ २ । १ । ६ ॥
तु=किन्तु; दृश्यते=श्रुतिमे उपादानसे विलक्षण वस्तुकी उत्पत्तिका वर्णन
भी देखा जाता है (अतः ब्रह्मको जगत्का उपादान कारण मानना अनुचित
नहीं है)।
१०६ वेदान्त-दर्शन [ पाद १
व्याख्या—यह कहना ठीक नहीं है कि उपादानसे उत्पन्न होनेवाला कार्य
उससे विलक्षण नहीं हो सकता; क्योकि मनुष्य आदि चेतन व्यक्तियोसे नख-लोम
आदि जड वस्तुओकी उत्पत्तिका वर्णन वेदमे देखा जाता है । जैसे, 'यथा सतः
पुरुषात् केशलोमानि तथाक्षरात् संभवतीह विश्वम् ।' ( मु० उ० १ । १ । ७ )
अर्थात् 'जैसे जीवित मनुष्यसे केश और रोएँ उत्पन्न होते हैं, उसी प्रकार
अविनाशी परब्रह्मसे यह सब जगत् उत्पन्न होता है।' सजीव चेतन पुरुषसे जड
नख-लोम आदिकी उत्पत्ति उससे सर्वथा विलक्षण ही तो .है । अतः ब्रह्मको
जगत्का कारण मानना युक्तिसंगत तथा श्रुति-स्मृतियोंसे अनुमोदित है । इसमें
कोई विरोध नहीं है ।
सम्बन्ध—इसी विषयमे दूसरी शङ्का उपस्थित करके उसका निराकरण
करते हैं—
असदिति चेन्न प्रतिषेधमात्रत्वात् ॥ २ । १ । ७ ॥
चेत्=यदि कहो; ( ऐसा माननेसे ) असत्=असत्कार्यवाद अर्थात्
जिसकी सत्ता नहीं है, ऐसी वस्तुकी उत्पत्तिका प्रसङ्ग उपस्थित होगा; इति
न=तो ऐसी बात नहीं है; प्रतिषेधमात्रत्वात्=क्योंकि वहाँ 'असत्' शब्द प्रतिषेध-
मात्रका अर्थात् सर्वथा अभावका बोधक है ।
व्याख्या—यदि कहो 'अवयवरहित चेतन ब्रह्मसे सावयव जड-वर्गकी उत्पत्ति
माननेपर जो वस्तु पहले नहीं थी, उसकी उत्पत्ति माननेका दोष उपस्थित होगा,
जो कि श्रुति-प्रमाणके विरुद्ध है, क्योंकि वेदमें असत्से सत्की उत्पत्तिको
असंभव बताया गया है।' तो ऐसी बात नहीं है; क्योंकि वहाँ वेदमे कारणसे विलक्षण
कार्यकी उत्पत्तिका निषेध नहीं है; अपितु 'असत्'शब्दवाच्य अभावसे भावकी उत्पत्तिको
असंभव कहा गया है । वेदान्त शास्त्रमें अभावसे भावकी उत्पत्ति नहीं मानी गयी
है; किन्तु सत्स्वरूप सर्वशक्तिमान् परब्रह्म परमात्मामे जो जडचेतनात्मक जगत
शक्तिरूपसे विद्यमान होते हुए भी अप्रकट रहता .है, उसीका उसके सङ्कल्पसे
प्रकट होना उत्पत्ति है । इसलिये परब्रह्मसे जगत्की उत्पत्ति मानना असत्से
सत्की उत्पत्ति मानना नहीं है ।
सम्बन्ध—इसपर पुनः पूर्वपक्षकी ओरसे शङ्का उपस्थित की जाती है—
अपीतौ तद्वत्प्रसङ्गादसमञ्जसम् ॥ २ । १ । ८ ॥