ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य सहित)
Brahma Sutras with Shankara Bhashya - Gita Press
महर्षि बादरायण / आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस गोरखपुर · 1950 (उद्गम)
पृष्ठ 126, कुल 417 में से
संदर्भ में पढ़ेंसूत्र ३-६ ] अध्याय २ १०५
सम्बन्ध—यदि कहो, अचेतन कहे जानेवाले आकाश आदि तत्त्वोंका भी श्रुतिमें
चेतनकी भाँति वर्णन मिलता है। जैसे—'तत्तेज ऐक्षत' (छा० उ० ६।२।
३)—'उस तेजने विचार किया।' 'ता आप ऐक्षन्त' (छा० उ० ६।२।
४) 'उस जलने विचार किया।' इत्यादि। तथा पुराणोंमें नदी, समुद्र, पर्वत
आदिका भी चेतन-जैसा वर्णन किया गया है। इस प्रकार चेतन होनेके कारण
यह जगत् चेतन परमात्मासे विलक्षण नहीं है; इसलिये चेतन परमात्माको इसका
कारण माननेमें कोई आपत्ति नहीं है, तो इसका उत्तर इस प्रकार दिया जाता है—
अभिमानिव्यपदेशस्तु विशेषानुगतिभ्याम् ॥ २ । १ । ५ ॥
तु=किन्तु; (वहाँ तो) अभिमानिव्यपदेशः=उन-उन तत्त्वोंके अभिमानी
देवताओंका वर्णन है; (यह बात) विशेषानुगतिभ्याम्=विशेष शब्दोंके प्रयोग-
से तथा उन तत्त्वोंमे देवताओंके प्रवेशका वर्णन होनेसे (सिद्ध होती है)।
व्याख्या—श्रुतिमें जो 'तेज, जल आदिने विचार किया' इत्यादि
रूपसे जड तत्त्वोंमें चेतनके व्यवहारका कथन है, वह तो उन तत्त्वोंके
अभिमानी देवताओंको लक्ष्य करके है। यह बात उन-उन स्थलोंमें प्रयुक्त
हुए विशेष शब्दोंसे सिद्ध होती है। जैसे तेज, जल और अन्न—इन
तीनोंकी उत्पत्तिका वर्णन करनेके बाद इन्हें 'देवता' कहा गया है
(छा० उ० ६।३।२)। तथा ऐतरेयोपनिषद् (१।२।४) मे 'अग्नि
वाणी बनकर मुखमें प्रविष्ट हुआ, वायु प्राण बनकर नासिकामें प्रविष्ट हुआ।'
इस प्रकार उनकी अनुगतिका उल्लेख होनेसे भी उनके अभिमानी देवताओंका
ही वर्णन सिद्ध होता है। इसलिये ब्रह्मको जगत्का उपादान कारण बताना युक्ति-
संगत नहीं है, क्योंकि आकाश आदि जड तत्त्व भी इस जगत्मे उपलब्ध होते
हैं, जो कि चेतन ब्रह्मके धर्मोंसे सर्वथा विपरीत लक्षणोंवाले हैं।
सम्बन्ध—ऊपर उठायी हुई शङ्काका ग्रन्थकार उत्तर देते हैं—
दृश्यते तु ॥ २ । १ । ६ ॥
तु=किन्तु; दृश्यते=श्रुतिमे उपादानसे विलक्षण वस्तुकी उत्पत्तिका वर्णन
भी देखा जाता है (अतः ब्रह्मको जगत्का उपादान कारण मानना अनुचित
नहीं है)।