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मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)

Manusmriti with Kulluka Bhatta Tika & Hindi Translation

महर्षि मनु द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished649 पृष्ठ

' ऐतरेयब्राह्मणेऽस्ति काण्डमारण्यकाभिधम् ।

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भूमिका । ७
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अर्थात् जंगलही में पढ़ने पढ़ाने योग्य है इसलिये आरण्यक
कहा गया । यह ऐतरेयारण्यक के भाष्यारम्भ में लिखा है-
' ऐतरेयब्राह्मणेऽस्ति काण्डमारण्यकाभिधम् ।
अरण्य एव पाठ्यत्वादाराण्यकमितीर्यते ॥ '
और ब्राह्मण-भागके अन्तर्गत एक तापिनी नामक विभाग
है जिसमें विशेषतः उपासना की चर्चा की गई है ।

१ । ऋग्वेद के शाखाभेद ।

ऋग्वेद की इक्कीस शाखाएं थीं यह व्याकरण महाभाष्य
के पहले आह्निक में लिखा है । वेद का अध्ययन अध्यापन के
कारण जो पाठभेद होगया है वही शाखाभेद है । और वह
पाठभेद कालवश न्यूनाधिकरूप से वर्तमान होकर शाखाभेद का
प्रवर्त्तक हुआ। शौनक ऋषिकृत प्रातिशाख्य नामक ग्रन्थसे ऋग्वेद
की ये पांच शाखा ज्ञात होती हैं-शाकल, वाष्कल, आश्वलायन,
शाङ्खायन और माण्डूक । और विष्णुपुराण से शाकलों के
ये पांच शाखाभेद प्राप्त होते हैं-मुद्गल, गोकुल, वात्स्य,
शैशिर और शिशिर ।
शौनक का वचन-
'ऋञ्चां समूह ऋग्वेदस्तमभ्यस्य प्रयत्नतः ।
पठितः शाकलेनादौ चतुर्भिस्तदनन्तरम् ॥
शाङ्ख्याश्वलायनौ चैव माण्डूको वास्कलस्तथा ।
बह्वृचा ऋषयः सर्वे पञ्चैत एकवेदिनः ॥'
विष्णुपुराण का वचन-
'मुद्गलो गोकुलो वात्स्यः शैशिरः शिशिरस्तथा ।
पञ्चैते शाकलाः शिष्याः शाखाभेदप्रवर्त्तकाः ॥'

= मनुस्मृति ।
. इसी प्रकार ऐतरेयी, कौषीतकी, पैङ्गी आदि कितने एक
शाखाभेद ग्रन्थान्तरों से और प्राप्त होते हैं । ऋग्वेदकी शाकल-
संहिता और ऐतरेय तथा कौषीतक ये दो ब्राह्मणग्रन्थ उपलब्ध हैं।
२। यजुर्वेद के शाखाभेद ।
यजुर्वेद कृष्ण और शुक्लभेद से दो प्रकार का है जिसका
कारण आगे लिखा जायगा । यजुर्वेद की एकसौ एक शाखाएं
थीं यह व्याकरण महाभाष्य के पहले आह्निक में लिखा है ।
कृष्णयजुर्वेद के बारह शाखाभेद प्राप्त होते हैं—चरक,
आह्वरक, कठ, प्राच्य कठ, कापिष्ठलकठ, चारायणीय, वारतन्तवीय,
श्वेत, श्वेततर, औपमन्यव, पात्यण्डिनेय और मैत्रायणीय ।
और मैत्रायणियों के छः शाखाभेद उपलब्ध होते हैं—मानव,
वाराह, दुन्दुभ, छागलेय, हारिद्रवीय और श्यामायनीय । और
चरकविशेष तैत्तिरीयों के दो शाखाभेद प्राप्त होते हैं—
औखीय और खाण्डिकीय । खाण्डिकीयों के पांच शाखा-
भेद मिलते हैं—आपस्तम्बी, बौधायनी, सत्याषाढ़ी, हिरण्य-
केशी और शास्त्यायनी ।
कृष्णयजुर्वेद की कृष्ण-यजुःसंहिता, तैत्तिरीय-ब्राह्मण और
तैत्तिरीय-आरण्यक सांप्रत में प्रचलित हैं ।
शुक्लयजुर्वेद के पंद्रह शाखाभेद हैं—काण्व, माध्यंदिन,
जाबाल, बुधेय, शाकेय, तापनीय, कपोल, पौण्ड्र, वत्स,
आवारिक, परमावारिक, पाराशरीय, बैनेय, वैधेय, औधेय
और गालव । ये सब शाखा-प्रवर्तक वाजसनेय याज्ञवल्क्य के
शिष्य होने के कारण वाजसनेयी कहलाते हैं ।
१ वाजसनेरपत्यं वाजसनेयः=वौजसनिका संतान वाजसनेय ।

भूमिका । ६
शुक्लयजुर्वेद की माध्यंदिनीय-संहिता और शतपथ ब्राह्मण,
प्रसिद्ध है। संहितान्तर्गत ईशावास्य, ब्राह्मणान्तर्गत बृहदारण्यक
ये दो उपनिषद् प्रसिद्ध हैं । भगवान् याज्ञवल्क्य ने अपनी
स्मृति के प्रायश्चित्ताध्याय में लिखा है कि मैंने जो सूर्य से
आरण्यक पाया वह आत्मज्ञानार्थ विचारने योग्य है ।
‘ज्ञेयं चारण्यकमहं यदादित्यादवाप्तवान्’ ( ११० श्लो० )
यजुर्वेद के शुक्लत्व में यह कारण है-
व्यास के शिष्य वैशंपायन ने याज्ञवल्क्य आदि अपने
शिष्यों को यजुर्वेद पढ़ाया । एक समय किसी कारण से क्रुद्ध
हो वैशंपायन ने याज्ञवल्क्य से कहा कि तुम हमारे से जो पढ़ा
है उसको वापस करदो । तब याज्ञवल्क्य ने पढ़ी हुई विद्याको
योगबल से मूर्तिमती बनाकर उगल दिया । उगली हुई
अङ्गार के समान ) यजुर्विद्या को वैशंपायन की आज्ञा से
अन्य शिष्यगण तित्तिर बनकर चुनलिया । तबसे ये यजु-
र्मन्त्र उगल देनेके कारण कृष्णयजु और उनको चुननेवाले
शिष्यगण तैत्तिरीय कहाये । वाद विद्यावियोग से दुःखित
याज्ञवल्क्य ने सूर्य की आराधना से जो दूसरे यजुर्मन्त्र पाये
उनकी शुक्लयजुः संज्ञा पड़ी । योगीश्वर-याज्ञवल्क्य ने शुक्ल-
यजुर्वेद को उक्त कण्व, मध्यंदिन आदि पंद्रह शिष्यों को पढ़ाया ।
३ । सामवेद के शाखाभेद ।
सामवेद की हज़ार शाखा थीं यह व्याकरण-महाभाष्यमें
लिखा है । उनमें से ये शाखाभेद ज्ञात हैं-राणायनीय,
१ योग की शक्ति जानने के लिये पातञ्जलदर्शन का विभूतिपाद देखो ।
२ यह वृत्त शुक्लयजुर्वेद के भाष्यारम्भ में लिखा है ।

१० मनुस्मृति ।
शाख्यमुग्र, कापोल, महाकापोल, लाङ्गलिक, शार्दूल और
कौथुम। कौथुमों के ये शाखाभेद हैं-आसुरायण, वातायन,
प्राञ्ज, बैनधृत, प्राचीनयोग्य और नैतेय ।
छन्द, आरण्य, माहानाम्न और उत्तर-ये चार आर्चिक
ग्रन्थ । स्तोभग्रन्थ एक । गेय, आरण्य, ऊह और ऊह्य
ये चार प्रधान ग्रन्थ । माहानाम्न, भारण्ड, तवश्यायनीय
और गायत्र-ये चार परिशिष्टग्रन्थ । इस प्रकार आठ ग्रन्थ
गान के और छन्द आदि पांच ग्रन्थ पहले के मिलकर तेरह
ग्रन्थ संहिता नाम से कहेजाते हैं।
ताण्ड्य, षड्विंश, सामविधान, आर्षेय, देवताध्याय,
उपनिषद्, संहितोपनिषद् और वंश, ये आठ ब्राह्मण ग्रन्थ
हैं। इनका साधारण नाम छान्दोग्य ब्राह्मण है।
४ । अथर्ववेद के शाखाभेद ।
अथर्ववेद की नौ शाखा थीं यह व्याकरण-महाभाष्य में
लिखा है। वे ये हैं-पैप्पलाद, शौनकीय, दामोद, तोतायन,
जायन, ब्रह्मपलाश, कुनखी, देवदर्शी और चारणविद्य ।
अथर्ववेद की शौनकसंहिता और गोपथब्राह्मण प्रसिद्ध हैं।
वेदों के षडङ्ग ।
वेदों के शिक्षाआदि छः अङ्ग हैं। जैसे अङ्ग अङ्गी के उपकारक
होते हैं इसी प्रकार वेद के शिक्षा आदि उपकारक होने से
अङ्ग कहलाते हैं।
१ । शिक्षा ।
सर्वसाधारण पाणिनीय-शिक्षा है । और याज्ञवल्क्य

भूमिका । ११
शिक्षा, कात्यायन शिक्षा, वशिष्ठ शिक्षा आदि अनेक शिक्षा-
ग्रन्थ हैं ।
२ । कल्प ।
वेदोक्त कर्मों का यथावत् कल्पना जिसमें हो वह कल्प
कहलाता है । कल्प दो प्रकार का है-एक श्रौतकल्प, दूसरा
स्मार्तकल्प । ये दोनों ग्रन्थ वेदभेद अथवा शाखाभेद से
भिन्न भिन्न हैं । श्रौतकल्प श्रौतसूत्र नाम से और स्मार्तकल्प
स्मार्तसूत्र नाम से अथवा गृह्यसूत्र नाम से कहा जाता है ।
३ । व्याकरण ।
वार्तिककार-कात्यायन और भाष्यकार पतञ्जलि द्वारा
उन्नत पाणिनीय ( पाणिनिप्रोक्त अष्टाध्यायी ) व्याकरण ।
और वैदिक शब्दानुशासन के उपयोगी प्रातिशाख्य
ग्रन्थ ।
४ । निरुक्त ।
वेदार्थ के ज्ञान में अत्यन्त उपकारी यास्कमुनि कृत-
निरुक्त । जिसके नैघण्टुक, नैगम और दैवत संज्ञक तीन
काण्ड हैं ।
'आद्यं नैघण्टुकं काण्डं द्वितीयं नैगमं तथा ।
तृतीयं दैवतं चेति समाम्नायस्त्रिधा मतः ॥'
५ । छन्द ।
पिङ्गल-मुनिप्रणीत छन्द, जो वैदिक तथा लौकिक भेदसे
दो प्रकार का है ।

१२ मनुस्मृति ।
६ । ज्योतिष ।
ज्योतिष, सूर्य आदि देवता तथा ऋषियों का बनाया
हुआ। जिसके सिद्धान्त, संहिता और होरा नामक तीन
विशाल स्कन्ध हैं। ज्योतिःशास्त्र के कर्त्ताओं के नाम कश्यप ने
अपनी संहिता में यों लिखे हैं—
'सूर्यः पितामहो व्यासो वशिष्ठोऽत्रिः पराशरः ।
कश्यपो नारदो गर्गो मरीचिर्मनुरङ्गिराः ॥
लोमशः ( रोमशः ) पुलिशश्चैव च्यवनो यवनो भृगुः ।
शौनकोऽष्टादशैवैते ज्योतिःशास्त्रप्रवर्त्तकाः ॥'
अङ्गों की कल्पना ।
वेद और वेदाङ्गों का जिस क्रम से उल्लेख किया गया है
वह अथर्ववेदीय-मुण्डकोपनिषद् के अनुसार है। और रूपक
के अनुसार शब्दब्रह्म-वेद को पुरुषकल्पना करके उसके
उपकारक शिक्षा आदि छः अङ्ग नासिका आदि अवयव (अङ्ग)
कल्पना किये गये हैं। जैसा—
'छन्दः पादौ तु वेदस्य हस्तौ कल्पोऽथ पठ्यते ।
ज्योतिषामयनं चक्षुर्निरुक्तं श्रोत्रमुच्यते ॥
शिक्षाघ्राणं तु वेदस्य मुखं व्याकरणं स्मृतम् ॥'
शिक्षा आदि छः अङ्गों की वेदोपकारकता सूर्यसिद्धान्त-
समीक्षा¹ में यों दिखलाई है—
'स च यथा शिक्षया शिक्ष्यते स्वरवर्णाद्युच्चारणप्रक्रियया
समुपदिश्यते, व्याकरणेन व्याक्रियते तत्तच्छब्दार्थान्वाख्यानेन
व्युत्पाद्यते, निरुक्तेन निरुच्यते पदपदार्थनिर्धारणेन निरूप्यते,
छन्दसां छाद्यते त्रयीत्वव्यपदेशबीजेन पद्यगद्यगानरूपेण ऋग्यजुः-
१-यह ग्रन्थ उक्त द्विवेदी जी का बनाया है।

भूमिका । १३
सामबन्धेन बध्यते, कल्पेन कल्प्यते कर्मकाण्डानुपूर्व्या संपाद्यते,
तथैव ज्योतिषेण द्योत्यते प्रकृतिविकृत्युभयानुभयात्मनां यज्ञाना-
मनुष्ठानकालादेशेन प्रकाश्यते । '
वेदों के चार उपाङ्ग ।
वेद, वेदाङ्ग के समान वेदों के उपाङ्ग की नियत गणना
नहीं है उसका क्रम भिन्न भिन्न प्राप्त होता है । याज्ञवल्क्योक्त
क्रम पहले लिखा जा चुका है और यह दूसरा क्रम है—
‘अथ चत्वार्युपाङ्गानि वेदानां संप्रचक्षते ।
धर्मशास्त्रं पुराणं च मीमांसान्यायविस्तरः ॥’
ऐसी दशा में नाम क्रम की एकता नहीं हो सकती और
यहांपर मीमांसा से पूर्व तथा उत्तरमीमांसा का ग्रहण किया
जाता है न्याय से वैशेषिक का ग्रहण हो सकैगा; परंतु सांख्य
और योग का भी ग्रहण करना उचित है क्योंकि वह भी
न्याय आदि के समान आस्तिक-दर्शन हैं तो पुराण से सांख्य-
योग का ग्रहण हो सकेगा । अथवा वैशेषिक-न्याय, सांख्य-
योग, पूर्वमीमांसा-उत्तरमीमांसा, यह दार्शनिक विभाग स्वतन्त्र
है और यही षट्शास्त्र के नाम से प्रसिद्ध है ।
षट्शास्त्रों का संग्राहक श्लोक ।
‘न्यायवैशेषिके पूर्वं सांख्ययोगौ ततः परम् ।
मीमांसाद्वितयं पश्चादित्याहुर्दर्शनानि षट् ॥’
१। न्यायविस्तर । प्रमाणों से अर्थपरीक्षा के लिये शास्त्र ।
वह दो प्रकार का । एक न्याय दूसरा वैशेषिक । प्रमाणादि
षोडश-पदार्थवादी पञ्चाध्यायी गौतम मुनिकृत न्यायशास्त्र ।

१४ मनुस्मृति ।

द्रव्यादि सप्तपदार्थवादी दशाध्यायी कणाद मुनिकृत वैशे-
षिकशास्त्र । इन दोनों का साधारणनाम 'आन्वीक्षिकी' है ।
न्यायभाष्य के आरम्भ में वात्स्यायन मुनिने लिखा है कि—
'प्रदीपः सर्वविद्यानामुपायः सर्वकर्मणाम् ।
आश्रयः सर्वधर्माणां विद्योद्देशे प्रकीर्तितः ॥'
और भगवान् मनु ने भी बारहवें अध्याय के १०५-१०६
श्लोकों में उक्तविद्या की प्रशंसा की है ।
कपिल मुनिकृत षडध्यायी सांख्यशास्त्र और पतञ्जलि
मुनिकृत चतुष्पादी योगशास्त्र कहलाता है । सांख्ययोग की
महिमा श्वेताश्वतरोपनिषद् में यों कही है—
'नित्यो नित्यानां चेतनश्चेतनाना-
मेको बहूनां यो विदधाति कामान् ।
तत्कारणं सांख्ययोगाधिगम्यं
ज्ञात्वा देवं मुच्यते सर्वपाशैः ॥'
२ । मीमांसा । वेद के वाक्यार्थों का बोधक शास्त्र ।
मीमांसा दो प्रकार की । एक पूर्वमीमांसा दूसरी उत्तर-
मीमांसा (वेदान्त शास्त्र; वा वेदान्तदर्शन) पूर्वमीमांसा
जैमिनि मुनिकृत बारह अध्याय । उत्तरमीमांसा व्यास
मुनिकृत चार अध्याय । पहली में कर्म का दूसरी में ज्ञान
का विचार है । पाराशरोपपुराण में उक्त छहः दर्शनों में से
पूर्वमीमांसा और उत्तरमीमांसा की सर्वांश में प्रशंसा की
है । जैसा—
'अक्षपादप्रणीते च काणादे सांख्ययोगयोः ।
त्याज्यः श्रुतिविरुद्धोऽशः श्रुत्येकशरणैर्नृभिः ॥

भूमिका । १५

जैमिनीये च वैयासे विरुद्धांशो न कश्चन ।
श्रुत्या वेदार्थविज्ञाने श्रुतिपारं गतौ हि तौ॥'
उत्तरमीमांसा और अद्वैतवाद ।
उत्तरमीमांसा के द्वैत, विशिष्टाद्वैत, शुद्धाद्वैत और द्वैताद्वैत
वाद का आलम्बन करके चार प्रकार के भाष्य बनाडाले
गये हैं। इन्हीं के बनानेवाले चतुःप्रस्थानी वैष्णव कहलाये
जिससे आज चार संप्रदाय परस्पर विरुद्ध चल रहे हैं। इन
संप्रदायों में विशिष्टाद्वैत-संप्रदाय सब से प्राचीन मालूम होता
है जिसका स्थापनकाल विक्रमकी बारहवीं शताब्दी है । संप्र-
दायों के विषय में यह श्लोक प्रसिद्ध है—
'रामानुजं श्रीः स्वीचक्रे मध्वाचार्यं चतुर्मुखः ।
श्रीविष्णुस्वामिनं रुद्रो निम्बादित्यं चतुःसनः ॥'
उक्त द्वैत आदि चार वादों के अनुसारी उत्तरमीमांसा के
भाष्य वेदादिविरुद्ध हैं अर्थात् अपने अपने संप्रदाय की पुष्टि के
लिये श्रुति-स्मृतियों के आशयों को पलट कर वे सब भाष्य
बनाये गये हैं ।
वेद-तथा वेदव्याससम्मत अर्थ को प्रकाश करनेवाला उत्तर-
मीमांसा का 'शारीरक' नामक भाष्य है, जिसके बनाने
वाले वेदव्यास के वचनानुसारी और वेदव्यास ही के शिष्य
परम्परा में परिगणित आचार्य-श्री ६ शङ्कर स्वामी हैं।
वेदव्यास ने कूर्मपुराण के तीसवें अध्याय में कहा है—
'कलौ रुद्रो महादेवो लोकानामीश्वरः परः ।
करिष्यत्यवतारं स्वं शङ्करो नीललोहितः ॥
श्रौतस्मार्तप्रतिष्ठार्थं भक्तानां हितकाम्यया ।