मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)
Manusmriti with Kulluka Bhatta Tika & Hindi Translation
महर्षि मनु द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
पृष्ठ 16, कुल 649 में से
संदर्भ में पढ़ें१४ मनुस्मृति ।
द्रव्यादि सप्तपदार्थवादी दशाध्यायी कणाद मुनिकृत वैशे-
षिकशास्त्र । इन दोनों का साधारणनाम 'आन्वीक्षिकी' है ।
न्यायभाष्य के आरम्भ में वात्स्यायन मुनिने लिखा है कि—
'प्रदीपः सर्वविद्यानामुपायः सर्वकर्मणाम् ।
आश्रयः सर्वधर्माणां विद्योद्देशे प्रकीर्तितः ॥'
और भगवान् मनु ने भी बारहवें अध्याय के १०५-१०६
श्लोकों में उक्तविद्या की प्रशंसा की है ।
कपिल मुनिकृत षडध्यायी सांख्यशास्त्र और पतञ्जलि
मुनिकृत चतुष्पादी योगशास्त्र कहलाता है । सांख्ययोग की
महिमा श्वेताश्वतरोपनिषद् में यों कही है—
'नित्यो नित्यानां चेतनश्चेतनाना-
मेको बहूनां यो विदधाति कामान् ।
तत्कारणं सांख्ययोगाधिगम्यं
ज्ञात्वा देवं मुच्यते सर्वपाशैः ॥'
२ । मीमांसा । वेद के वाक्यार्थों का बोधक शास्त्र ।
मीमांसा दो प्रकार की । एक पूर्वमीमांसा दूसरी उत्तर-
मीमांसा (वेदान्त शास्त्र; वा वेदान्तदर्शन) पूर्वमीमांसा
जैमिनि मुनिकृत बारह अध्याय । उत्तरमीमांसा व्यास
मुनिकृत चार अध्याय । पहली में कर्म का दूसरी में ज्ञान
का विचार है । पाराशरोपपुराण में उक्त छहः दर्शनों में से
पूर्वमीमांसा और उत्तरमीमांसा की सर्वांश में प्रशंसा की
है । जैसा—
'अक्षपादप्रणीते च काणादे सांख्ययोगयोः ।
त्याज्यः श्रुतिविरुद्धोऽशः श्रुत्येकशरणैर्नृभिः ॥