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मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)

मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)

Manusmriti with Kulluka Bhatta Tika & Hindi Translation

महर्षि मनु द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished649 पृष्ठ

पृष्ठ 10, कुल 649 में से

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पृष्ठ 10

= मनुस्मृति ।
. इसी प्रकार ऐतरेयी, कौषीतकी, पैङ्गी आदि कितने एक
शाखाभेद ग्रन्थान्तरों से और प्राप्त होते हैं । ऋग्वेदकी शाकल-
संहिता और ऐतरेय तथा कौषीतक ये दो ब्राह्मणग्रन्थ उपलब्ध हैं।
२। यजुर्वेद के शाखाभेद ।
यजुर्वेद कृष्ण और शुक्लभेद से दो प्रकार का है जिसका
कारण आगे लिखा जायगा । यजुर्वेद की एकसौ एक शाखाएं
थीं यह व्याकरण महाभाष्य के पहले आह्निक में लिखा है ।
कृष्णयजुर्वेद के बारह शाखाभेद प्राप्त होते हैं—चरक,
आह्वरक, कठ, प्राच्य कठ, कापिष्ठलकठ, चारायणीय, वारतन्तवीय,
श्वेत, श्वेततर, औपमन्यव, पात्यण्डिनेय और मैत्रायणीय ।
और मैत्रायणियों के छः शाखाभेद उपलब्ध होते हैं—मानव,
वाराह, दुन्दुभ, छागलेय, हारिद्रवीय और श्यामायनीय । और
चरकविशेष तैत्तिरीयों के दो शाखाभेद प्राप्त होते हैं—
औखीय और खाण्डिकीय । खाण्डिकीयों के पांच शाखा-
भेद मिलते हैं—आपस्तम्बी, बौधायनी, सत्याषाढ़ी, हिरण्य-
केशी और शास्त्यायनी ।
कृष्णयजुर्वेद की कृष्ण-यजुःसंहिता, तैत्तिरीय-ब्राह्मण और
तैत्तिरीय-आरण्यक सांप्रत में प्रचलित हैं ।
शुक्लयजुर्वेद के पंद्रह शाखाभेद हैं—काण्व, माध्यंदिन,
जाबाल, बुधेय, शाकेय, तापनीय, कपोल, पौण्ड्र, वत्स,
आवारिक, परमावारिक, पाराशरीय, बैनेय, वैधेय, औधेय
और गालव । ये सब शाखा-प्रवर्तक वाजसनेय याज्ञवल्क्य के
शिष्य होने के कारण वाजसनेयी कहलाते हैं ।
१ वाजसनेरपत्यं वाजसनेयः=वौजसनिका संतान वाजसनेय ।