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सर्वकोश
मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)

मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)

Manusmriti with Kulluka Bhatta Tika & Hindi Translation

महर्षि मनु द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished649 पृष्ठ

पृष्ठ 17, कुल 649 में से

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पृष्ठ 17

भूमिका । १५

जैमिनीये च वैयासे विरुद्धांशो न कश्चन ।
श्रुत्या वेदार्थविज्ञाने श्रुतिपारं गतौ हि तौ॥'
उत्तरमीमांसा और अद्वैतवाद ।
उत्तरमीमांसा के द्वैत, विशिष्टाद्वैत, शुद्धाद्वैत और द्वैताद्वैत
वाद का आलम्बन करके चार प्रकार के भाष्य बनाडाले
गये हैं। इन्हीं के बनानेवाले चतुःप्रस्थानी वैष्णव कहलाये
जिससे आज चार संप्रदाय परस्पर विरुद्ध चल रहे हैं। इन
संप्रदायों में विशिष्टाद्वैत-संप्रदाय सब से प्राचीन मालूम होता
है जिसका स्थापनकाल विक्रमकी बारहवीं शताब्दी है । संप्र-
दायों के विषय में यह श्लोक प्रसिद्ध है—
'रामानुजं श्रीः स्वीचक्रे मध्वाचार्यं चतुर्मुखः ।
श्रीविष्णुस्वामिनं रुद्रो निम्बादित्यं चतुःसनः ॥'
उक्त द्वैत आदि चार वादों के अनुसारी उत्तरमीमांसा के
भाष्य वेदादिविरुद्ध हैं अर्थात् अपने अपने संप्रदाय की पुष्टि के
लिये श्रुति-स्मृतियों के आशयों को पलट कर वे सब भाष्य
बनाये गये हैं ।
वेद-तथा वेदव्याससम्मत अर्थ को प्रकाश करनेवाला उत्तर-
मीमांसा का 'शारीरक' नामक भाष्य है, जिसके बनाने
वाले वेदव्यास के वचनानुसारी और वेदव्यास ही के शिष्य
परम्परा में परिगणित आचार्य-श्री ६ शङ्कर स्वामी हैं।
वेदव्यास ने कूर्मपुराण के तीसवें अध्याय में कहा है—
'कलौ रुद्रो महादेवो लोकानामीश्वरः परः ।
करिष्यत्यवतारं स्वं शङ्करो नीललोहितः ॥
श्रौतस्मार्तप्रतिष्ठार्थं भक्तानां हितकाम्यया ।