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मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)

Manusmriti with Kulluka Bhatta Tika & Hindi Translation

महर्षि मनु द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished649 पृष्ठ

अथवा स्वार्थपरायणता से नानाविध कर्मकाण्डकी पद्धतियां

४८ मनुस्मृति ।
अथवा स्वार्थपरायणता से नानाविध कर्मकाण्डकी पद्धतियां
जगमगाहट करने लगीं तबसे गरीबों का धनाभाव से अमीरों
का अवज्ञा से प्रायः बहुत कर्म छूटगया।
चातुर्वर्ण्यशिक्षा में कहा है कि—
'सांस्कारिकं कर्म विधातुकामाः
पृच्छन्ति यत्तत् सुनिरूप्य लेख्यम् ।
न वा जिघृक्षाससंश्रयेण
नानाविधं वस्तु विमोहनाय ॥
निक्षिप्यतां दृष्टिरितस्ततो वा
विमृश्यतां वा मनसा निकामम् ।
अपव्ययाद् भारतभूतलेऽस्मिन्
संस्कार एष ( शाखी ) प्रलयं नु यातः ॥
भूरिक्रियाक्लप्तिनिरूपितश्री-
रास्तां स सोमादिविशेषयागः ।
न स्मर्यते क्वापि स जातियोगी
संस्कारशाखी बहुवित्तसाध्यः ॥'
इत्यादि ।
कल्पसूत्रों का अन्यान्य स्मृतियों से उपबृंहण (फैलाव)
हो। पर उसका यह प्रयोजन नहीं है कि कल्पसूत्रही एक कोने
में कर दिये जायँ। हां, यह जरूर है; जैसे गृह्यस्मृति और ज्योतिष
के संहिताभाग में संस्कार के लिये कालशुद्धि लिखी है तो
गृह्यस्मृतिका अनुरोध करके ज्यौतिषिक कालशुद्धि लेनी चाहिये।
अतएव कितने ही कर्म सिंहस्थ-मकरस्थ गुरु आदि दुष्टकाल
में भी किये जाते हैं उसमें यह दिग्दर्शन है—

'अधार्यकन्यकोद्वाहोऽधार्यपुत्रोपनयनम् ।
गयागोदावरीयात्रो सिंहस्थेऽपि न दुष्यति ॥'
धर्माधिकारि नन्द पण्डित ।
यही दुर्दशा शान्तिक-पौष्टिक आदि की है। जहां पर
शान्तिक कर्म का विधान नहीं है वहां पर भी वह एक
विशालस्वरूप धारण करके यजमान को बाधित कर
डालता है। जैसे उपनयन-विवाह आदि में । उस कर्म को
'ग्रहशान्ति' वा 'ग्रहयज्ञ' कहा करते हैं, उसका उल्लेख
'याज्ञवल्क्यस्मृति' में इस प्रकार है-
'श्रीकामः शान्तिकामो वा ग्रहयज्ञं समाचरेत् ।
वृष्ट्यायुः पुष्टिकामो वा तथैवाभिचरन्नपि ॥ २६५ ॥'
और इसकी इतिकर्त्तव्यता (विधि) भी वहीं लिखी है,
परंतु प्रचलित ग्रहशान्ति की पद्धति बहुत बढ़ाई गई है और
अनेक प्रकार की प्राप्त होती है। किसको क्या कहा जाय ?
यही दशा संस्कारभास्कर आदि की है।
पुनर्विवाह । जैसे उपनीत त्रैवर्णिक का अनेक कारणों
से फिर 'उपनयन' संस्कार करना प्राप्त होता है वैसा विवा-
हिता त्रैवर्णिक स्त्रीका फिर 'विवाह' करना नहीं प्राप्त होता।
अतएव पुनर्विवाह का विधान् किसी 'गृह्यस्मृति' में नहीं
किया है। और मनु ने आठवें तथा नवें अध्याय में "पाणि-
ग्रहणिका मन्त्राः कन्यास्वेव प्रतिष्ठिताः ॥२२६॥" "पाणिग्रहणिका
१ यह पुस्तक राजपूताना प्रान्त में बहुधा व्याप्त है ।
२ इस विषय का पूर्ण विचार 'विधवोद्वाहशङ्कासमाधि' नामक ग्रन्थ में
किया है। यहां तो दिग्दर्शनमात्र है ।

५० मनुस्मृति ।
मन्त्रा नियतं दारलक्षणम् ॥ २२७ ॥ ” “ नोद्वाहिकेषु मन्त्रेषु
नियोगः कीर्त्यते क्वचित् ॥ ६५ ॥ ” इत्यादि वाक्यों से पुन-
र्विवाह का निषेध किया है। और शास्त्रीय युक्ति भी है कि
जब एक बार कन्याद्रव्य का दान वरको करदिया गया, तब
दाता का पुनः कन्याद्रव्य में अधिकार न रहा, और अधिकारी
वर मृत हो गया तथा अन्यद्रव्य के समान अधिकारी के संवं-
धियों का अधिकार नहीं प्राप्त होता, उस दशा में ‘विधवा’
को देनेलेनेवाला चोर के सिवाय और कौन हो सकता है ?
और-
‘नष्टे मृते प्रव्रजिते क्लीवे च पतितेऽपतौ ।
पञ्चस्वापत्सु नारीणां पतिरन्यो विधीयते॥' (४अ. ३०श्लो.)
इस पराशरस्मृति वचन से जो पुनर्विवाह की सिद्धि
करते हैं उनकी बड़ी भूल है; क्योंकि प्रथम तो वैवाहिक श्रुति
(मन्त्र) के साथ उक्त स्मृति का विरोध होता है, जिस के बारे
में भगवान् मनु ने लिखा है कि 'पाणिग्रहणिका मन्त्राः कन्या-
स्वेव प्रतिष्ठिताः' (८ अ. २२६ श्लो. )। दूसरे, गृह्यस्मृतियों
में पुनर्विवाह विधिके न होने से उक्त स्मृति का गृह्यस्मृतियों के
साथ विरोध स्पष्ट है। तीसरे, पतिके पतित होने पर ‘आशुद्धेः
संप्रतीक्ष्यो हि महापातकदूषितः' (आ. ७७ श्लो. ) इस
याज्ञवल्क्य-स्मृति के अनुसार पत्यन्तर की प्राप्ति नहीं होती,
किंतु प्रायश्चित्त करने बाद वही पति व्यवहार्य होता है। अत-
एव यह कहा जा सकता है कि उक्त, स्मृति-वाक्य स्वतन्त्ररूप
१ पति स्त्रीका दाता किसी अवस्था में होता है। जैसे राजा हरिश्चन्द्र...।
२ 'अर्यमणं तु देवं कन्या अग्निमयक्षत' इत्यादि मन्त्र और प्रस्तुतविचार विद्यासुधाकर में स्पष्ट है।

भूमिका । ५१
से 'पुनर्विवाह' अथवा 'नियोग' का विधायक नहीं
हो सकता, किंतु व्यवस्था की अपेक्षा रखता है। जैसा—
वाग्दान के बाद पाणिग्रहण के पहले अपति, अर्थात् पतिभिन्न
पति सदृश वर; यदि लापता हो जाय, वा मर जाय, वा संन्यासी
हो जाय, वा नपुंसक हो जाय, वा महापातक से दूषित हो जाय
इन पांच आपत्तियों में 'च' कार से यदि विकर्मा, वा विरुद्ध-
धर्मा, वा समान गोत्र, वा समान प्रवर ज्ञात होय तो कन्या
दूसरे वर को दी जाय। यही आशय धर्माधिकारि नन्द पण्डित
ने विद्वन्मनोहरा में दिखलाया है ।
नियोगकर्म । यह इन्द्रियदौर्बल्य के कारण कलि में सर्वथा
असंभव है। इसीलिये वृहस्पति ने कहा है—
'उक्ता नियोगा मुनिना निषिद्धाः स्वयमेव तु ।
युगक्रमादशक्योऽयं कर्तुमन्यैर्विधानतः ॥'
इत्यादि ।
और मनु ने भी कहा है—
'अयं द्विजैर्हि विद्वद्भिः पशुधर्मो विगर्हितः ।'
( ९ अ. ६६ श्लो. )
नियोग कर्म तो दूर रहा, इस समय भी पुनर्विवाह त्रैवर्णिक-
कातिरिक्त शूद्र जाति में हीनदृष्टि से व्यवहार्य है। भले ही
त्रैवर्णिक-महाशय उसकी कोशिश में रहें। और "अक्षमाला
वशिष्ठेन—' ९ । २३ 'अजीगर्तः सुतं हन्तुं—' १० । १०५
१ 'अपति' ऐसा छेद करने से 'उत्पत्स्यमानपतित्ववान्' ऐसी व्याख्या
की आवश्यकता नहीं है और नञ्समास होने से 'अपतौ' की साधुता भी
हो जाती है।
२ देखिये भारत में धृतराष्ट्र, पाण्डु तथा पाण्डवों की उत्पत्ति के
प्रकरण ।

५२ मनुस्मृति ।
'श्वमांसमिच्छन्–' १० । १०६ 'भरद्वाजः–' १० । १०७
'विश्वामित्रः–' १० । १०८ ।" इत्यादि मनूक्तवृत्तान्त; तथा
तारा, मन्दोदरी, द्रौपदी आदि के कतिपय वृत्तान्त वर्तमान
काल में कथमपि दृष्टान्त बनकर विधेय नहीं होसकते।
यज्ञ और पशु । 'कलिवर्ज्य' के अनुसार अग्निहोत्र
संन्यास आदि कतिपय कर्म कलि में वर्जित हैं तो भी उनका
विधान (प्रतिप्रसववाक्य) प्राप्त होता है—
'यावद्वर्णविभागोऽस्ति यावद्वेदः प्रवर्तते ।
संन्यासं चाग्निहोत्रं च तावत्कुर्यात्कलौयुगे ॥'
अर्थात् जब तक वेद और वर्णविभाग चल रहा है तब
तक अग्निहोत्र और संन्यास का भी चलाना इष्ट है । 'च'
कार से यथासंभव कर्मान्तर और आश्रमान्तर का ग्रहण करना
योग्य है । अतएव यथा कथंचिद् ब्रह्मचर्य, चातुर्मास्य, सोमयाग
आदि कतिपय कर्म कहीं कहीं शिष्टजनों में दिखाई पड़ते हैं
(अकरणान्मन्दकरणं श्रेयः) ।
और जो यह व्यासवचन है—
'चत्वार्यब्दसहस्राणि चत्वार्यब्दशतानि च ।
कलेर्यदा गमिष्यन्ति तदा त्रेतापरिग्रहः ।
संन्यासश्च न कर्तव्यो ब्राह्मणेन विजानता ॥'
कलि के चार हज़ार चार सौ वर्ष व्यतीत होने बाद सुज्ञ
ब्राह्मण, अग्निहोत्र और संन्यास का ग्रहण न करें । यह
निषेध भी वर्तमानकालिक वर्णाश्रमव्यवहार को सूक्ष्मदृष्टि से
देखने से समुचित ज्ञात होता है ।
और जो यज्ञ में 'पशु' के संज्ञपने को भ्रान्तिमूलक सिद्ध
१ संज्ञपन=आलम्भ, यह 'संज्ञप॑यान्वगग्नित्येव ब्रूयात् ६।५।२१' इस
कात्यायन श्रौतसूत्र के अनुसार भाष्य है ।

' भूमिका । ' ५३
करते हैं, वा उसको सामान्यतः युगान्तरीय-धर्म बतलाते हैं,
वा उसको पिष्टपशुसाध्य कहते हैं, वे सब भ्रान्त अथवा
स्वार्थान्ध हैं। जब ' पशुसंज्ञपन ' की चर्चा एक स्थल में
नहीं हज़ार स्थलों में है, वेद से लेकर पुराणतक संज्ञपन छिपा नहीं
है, वेदद्रोही उसपर 'पशुश्चेन्निहतः स्वर्गं ज्योतिष्टोमे गमिष्यति ।
स्वपिता यजमानेन तत्र कस्मान्न हन्यते ॥' इत्यादि मज़ाक
करते आये हैं, तब क्या संज्ञपन हमारे छिपाने से छिप सकता
है ? कथमपि नहीं, और सच्ची बात छिपाकर पापभागी क्यों
बना जाय ? जैसे 'अश्वालम्भ' 'अश्वमेध' शब्द का 'अश्व-
संज्ञपन' अर्थ छोड़कर 'अश्वस्पर्शन' वा 'अश्वसंगम' अर्थ करते
हैं सो सरासर झूठा है। क्योंकि इस कपोलकल्पित अर्थ के
अभिप्राय से उक्त शब्द का प्रयोग कहीं न मिलेगा ....इत्यादि ।
ऐसी दशा में संज्ञपन भ्रान्तिमूलक क्योंकर सिद्ध हो सकता
है ? और इस बारे में श्रीभाष्याचार्य-श्रीरामानुजाचार्य ने
तथा वेदान्तपारिजातसौरभाचार्य श्रीनिम्बार्काचार्य के
शिष्य-वेदान्तकौस्तुभाचार्य श्रीश्रीनिवासाचार्य ने यह श्रुति
लिखी है—
'न वा उ एतन् म्रियसे न रिष्यसि देवान् इदेषि पथिभिः
सुगेभिः। यत्र यन्ति सुकृतो नापि दुष्कृतस्तत्रत्वा देवः सविता
दधातु ॥'

१-२ ' अश्वः आलभ्यते वध्यतेऽत्र । अश्वः मेध्यते वध्यतेऽत्र ' यों ये
योगरूढ़ शब्द हैं, केवल यौगिक नहीं हैं । देखिये, वाल्मीकीय रामायण बाल-
काण्ड १४ सर्ग ।

५४ मनुस्मृति ।
और पूर्णप्रज्ञ दर्शनाचार्य श्रीमध्वाचार्य ने यह वाराह-
पुराण का वाक्य लिखा है—
' हिंसा त्ववैदिकी या तु तयाऽनर्थो ध्रुवं भवेत् ।
वेदोक्तया हिंसया तु नैवानर्थः कथंचन ॥'
यह विचार ' अशुद्धमिति चेन्न, शब्दात् ३ । १ । २५ ।'
इस ब्रह्मसूत्र के भाष्य में किया है। इस व्यवस्था से
' ओषधयः पशवः- ' ४ । ४० यह मनुवचन भी सहानुभूति
रखता है।
और जो सांख्यकारिका में आनुश्रविक-कर्म ( त्रेताग्नि-
साध्य अनुष्ठान ) को अविशुद्धि, क्षय, अतिशय, इन तीन
दोषों से ग्रस्त बतलाया है उसमें कर्मसाध्य स्वर्ग को अनि-
त्यता से क्षयवान्, और कर्मफल को न्यूनाधिकभाव से
अतिशयवान् बतलाना न्यायसिद्ध है; परंतु कर्म में एकान्ततः
अविशुद्धि बतलाना न्यायविरुद्ध है और उपजीव्य ( सांख्य-
दर्शन ) से बहिर्भूत है; क्योंकि किसी सांख्यसूत्र से उक्तकर्म
की अविशुद्धि नहीं सिद्ध होती प्रत्युत ' अशुद्धमिति चेन्न,
शब्दात् ' इस ब्रह्मसूत्र के साथ विरोध खड़ा होता है और इसी
सूत्र के शारीरकभाष्य में आचार्य श्री ६ शंकर स्वामी ने
' न हिंस्यात् सर्वाभूतानि' इस शास्त्र को उत्सर्ग और 'अग्नी-
षोमीयं पशुमालभेत ' इस शास्त्र को अपवाद व्यवस्थित किया
है। और ' अग्निहोत्रादि तु तत्कार्यायैव तद्दर्शनात् ४।१। १३,
इस ब्रह्मसूत्र से आनुश्रविक-कर्म विशेष का ज्ञान में उपयोग
बतलाया है । ऐसी स्थिति में 'अविशुद्धिः=सोमादियागस्य
पशुबीजादिवधसाधनता ' यह लेख कारिकार्पक्ष-रक्षणार्थ