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कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

Devanagarihipublished2,136 पृष्ठ

चौरासी लक्षका प्राकट्य

सर्वज्ञसागर

( १३९ )

सतगुरु वचन—चौपाई

सुनु धर्मनि मैं कहूँ समझायी । लक्ष चौरासी योनि बनायी ॥
माया चरित्र अब तोहिँ सुनाओ । एक एक कै सब भेद बताओ ॥
चारि कला स्वरूप धरि चारी । एक एक गति कहौँ विचारी ॥
एक स्वरूप सुरति लगि रही । तीन स्वरूप भिन्न घर सही ॥
एक कला गायत्री भयञ्ज । जब पिताखोजको ब्रह्म गयञ्ज ॥
सो गायत्री ब्रह्माको दीन्हा । दूसरी कला लक्ष्मी कीन्हा ॥
मध्यो समुद्र रतन कटि आया । लक्ष्मी तबही विष्णुने पाया ॥
तिसरी कला पार्वती कीन्हा । सोइ कला शम्भु कहँ दीन्हा ॥
यह चरित्र मायाको भाई । जाकी गति मति लखी न जाई ॥
तीन शक्तिको खेल अपारा । इनही रचयो सकल संसारा ॥

सारखी-माया परबल सबनमें, जो चाहे सो होय ॥

लख चौरासी इन रची, मरम न जाने कोय ॥

माया सृष्टि माया रची, जीव अनेक बनाइ ॥

उनते सब कहु होत है, कहै कबीर समझाइ ॥

इति श्रीसर्वज्ञसागरे सृष्टिखण्डवर्णनोनाम प्रथमस्तरंगः ।

अथ द्वितीयस्तरंगः

ज्ञानखण्ड वर्णन

धर्मदास वचन—चौपाई

धरमदास पूछे चितलायी । उत्पति भेद सकल हम पायी ॥
अब जिव कारज कहौ विचारा । जेहि करनीसो हंस उबारा ॥
सो विधि ज्ञान कहो समझायी । जाहि ज्ञान से लोकहि पायी ॥
जीव उबारन ज्ञान सुनाओ । हे सादेब ! मोहि नाहि दुराओ ॥

(१४०)

सवज्ञसागर

साखी-सत्यसार बतावहु जाते कारज होय ॥
चौदह कोटि ज्ञान जो, सो हम देखि विलोय ॥

सतगुरुवचन-चौपाई

सुनु सुकृत मोर प्राण अधारा । तुमसे कहौँ अब सकल पसारा ॥
ऋग्वेद भेद मूलको पाया । चारि सुखको मर्म लखाया ॥
प्रथमहिं चारि वेद है सारा । चारि धाम पर मुक्ति पसारा ॥
सेवक शब्द सुमिरन चित लावे । सब सुख पृथ्वी पर भुक्तावे ॥
कोइ सिद्ध कोइ पण्डित होई । कोइ रूप पावै पुनि सोई ॥
जौँ लगि दान पुण्यकी आशा । तब लगि है वैकुण्ठ निवासा ॥
कोइ विद्या कोइ वेदको पावै । फिरिकै देह संसार धरावै ॥
अब सुनु साम वेद विचारा । विष्णु ध्यान वैकुण्ठ सिधारा ॥

साखी-बीते पुण्य भोग सो कीन्हे, आइ धरे जग देह ॥

जब लग दान पुण्य का आशा, तब लग सुरपुर नेह ॥

चौपाई

तिखरी मुक्तिको सुनो विचारा । सब मुनि योगी शून्य सिधारा ॥
सायुज्य मुक्ति चौथी है भाई । अक्षर ध्यान मानिकपुर जाई ॥
पचई जीवन मुक्ति है भाई । जहाँ देह धरे विन रहै समाई ॥
कहि निज उत्तम पुरुष बतावा । परम धाम सब संतन गावा ॥
पुरुष भक्ति जाके घट आई । एक ब्रह्म राखे ठहराई ॥
परम धाम सोइ पहुँचे जायी । जिन परमात्मा चीन्हो भाई ॥

धर्मदास वचन-चौपाई

धर्मदास पूछे कर जोरी । एक भेद प्रभु कहौँ बहोरी ॥

सर्वज्ञसागर

(१४१)

काहे पर वह कहिये भामा । जहां जीव पावे विश्रामा ॥
करनी लोक मुक्तिको भेदा । तुमसे कहौ मैं सुन्यो निखेदा ॥
सो सब भेद अहौ मोहि साई । संशय सब विधि देहु मिटाई ॥

साखी-काहे पर सुमेरु है, काहेपर कैलास ॥

काहे ऊपर शून्य है, कहैं अक्षरको वास ॥

सतगुरु बचन-चौपाई

सुनुधर्मदासतोहिकहौंविचारा । यह भेद अगमगति भारा ॥
सोरह नाल पुरुष निरमायी । लोकनको थम्भन नाल रहायी॥
कदली नाल लोकते आई । सात शाख भइ ताकी भाई ॥
सुवरण रंग नाल है सोई । एकहि वर्ण नाल सब होई ॥
प्रथमहि गुप्त नाल है भाई । तहां परवत पुनि नाम धराई ॥
तापर परम धाम बनाया । तेहि में पुरुष तत्त्व रहाया ॥
दुसरी मंजुम नाल जो आवा । मानिक पर्वत नाम धरावा ॥
तेहि पर मानिक दीप बसाया । अक्षर पुरुष दीप सो पावा ॥
तिसरी सुरंग नाल है भाई । तापर झझरी दोष रहाई ॥
तहैंवा रहै निरंजन राई । तीन देव तिनही निर्माई ॥
चौथी नाल क्रांति रह सोई । ता ऊपर वैकुण्ठ जो होई ॥
पंच शिखर सुमेरु सँवारी । एकपै इन्द्र एक कुबेर भंडारी॥
यकपै ध्रुव एक पैयम विस्तारी । मध्यमें विष्णु सकल व्रतधारा॥
पांच ये नाल जो रचि राखा । ताकर नाम कैलास असभाखा॥
तहवों शंकरको है बासा । याग समाधिकी लावे आसा ॥
छठयें नाल उमंग ठहरायी । अघाचलही नाम सो पायी ॥
सतय त्रिकुटी ब्रह्म अस्थाना । तरंग नाल पारस है ठाना ॥
कलकी नालकी सातों साखा । सातों दस यहां लों राखा ॥

(१४२)

सर्वज्ञसागर

यही बनाव धरती में होई । अधर वस्तुको जाने सोई ॥
अधरही चौका चारि प्रकासा । चन्द्र सूरजको तहां निवासा ॥
प्रथम अधर अंकुरहि निशानी । पांच अण्ड कीन्हे उत्पानी ॥
दूसर अधर निकलंकी जाना । तिसरे रूप सुरति परवाना ॥
चौथे अविगति नाम धराया । पांचे सरवल्ली पुरुष कहाया ॥
चारी अंश अधर विस्तारा । धर अधर दोनोंसे न्यारा ॥

साखी-पांच तत्त्व तब ना हते, हते न हाट रु बाट ॥
लोक द्वीप तब ना हते, ना हते औघट घाट ॥

चौपाई

सुनो धर्मदास कहौ मैं तोही । जो कछु भेद पुछिहौ मोही ॥
सब अंशनके लोक बतावा । अंश वंश सब तोहि लखावा ॥
करनी करै सो लोकहि जायी । विनु करनी फिरिफिरि पछितायी ॥

साखी-सर्वज्ञसागर खोजहि, सब ग्रन्थनको सार ॥
कहैं कबीर निज मूलको, सत्य शब्द आधार ॥

इति श्रीसर्वज्ञसागरे ज्ञानखण्डवर्णनो नाम द्वितीयस्तरंगः ।

समाप्तोयं ग्रन्थः

उपसंहार-चौपाई

जेहि मानुष बुद्धि सब विधि आवै । अपनो कारज सोइ बनावै ॥
कपट कुटिलता काल नशायी । सत्य विचार रहै लौलाई ॥
जवनी भांति जिव कारज होई । लाज मिटाय करै दृढ सोई ॥
लोककाज कुलकानके मारे । भँवरि भँवरि भव रहैं विचारे ॥
जेहि यम फन्द छूटे सो करना । नाहकमें काहे पचि २ मरना ॥

सर्वज्ञसागर

( १४३ )

भली भांति सो लेहु विचारी । सकल अंचारज मतहिं सुधारी ॥
खरा खोट जो परखा नाही । अन्धा धोखे मूल नशाही ॥
प्रथम विचारहु औषध रोगा । केहिविधि शब्द हरे सब सोगा ॥
देखो शब्द प्रकाश विचारी । जाते सकल होय उजियारी ॥
गुरु एक सो कौन कहावे । जासो आवागमन नशावे ॥
सेवा अनेक करिय केहि केरा । विन जाने सब धुन्ध अन्धेरा ॥
गुरु मत मनमत करे विचारा । सो जिव निज करे निरुआरा ॥

सारखी-विन देखे नहिं देशकी, बातें कहै सो क्रूर ॥
आपै खारी खात है, बेचत फिरे कपूर ॥

चौपाई

औषध पांच राह सब करई । औषध विना न कोई सहई ॥
शब्द स्पर्श रूप रस गन्धा । द्वारा पंच औषधिकी सन्धा ॥
सबहीं द्वार बूझ रहायी । बिन बूझे नहिं कोइ ठहरायी ॥
कोइ झीना कोइ मोटा द्वारा । तैसहिं तासु भिन्न व्यवहारा ॥
झीना शब्द है पवन स्वरूपा । तासो मोटा अनलको रूपा ॥
अनलहु ते जल मोटा होई । जलते मोटी पृथ्वी है सोई ॥
पुनि प्रकाश एकते एका । थिर होइ देखे करे विवेका ॥
पृथ्वी मोटी आँख प्रकाशी । तासे मध्यम दृष्टि प्रवेशी ॥
दृष्टीसे जल झीना होई । भीतर जो है दीसे सोई ॥
जलसो झीन तेज प्रकाशा । जामे परशे धरति अकाशा ॥
रूपसो अधिक शब्द उजियारा । दृष्टिमें आवे सब संसारा ॥
भूत भविष्य जो हो वर्तमाना । शब्द भीतरे सबै समाना ॥
बूझ शब्द में पेठे जायी । शब्दके भीतर अनल रहायी ॥
अनल मध्य होयके जल देखा । जलके भीतर पृथ्वी पेखा ॥

१ आचार्य, धर्मप्रवर्तक ।

( १४४ )

सर्वज्ञसागर

साखी-रैन समानी भानुमें, भानु अकाशे माहिं ॥
अकाश समाना शब्दमें, शब्द रहा कछु नाहिं ॥

चौपाई

पांचो औषध करै विचारा । मोटा झीना जो व्यवहारा ॥
औषध अन्न जल पेट समाही । जाते क्षुधा औ प्यास नसाही ॥
बहुत प्रकार लादके रोगू । सो सब जाय भोजन संयोगू ॥
गन्ध कपाले पहुँचे जायी । गुण औगुण सब अंग समायी ॥
लेपै गुण सब ले पहुँचावै । गुण औगुण सबमाहिं समावै ॥
आंखिकी राह रूप गहि लेई । शीत उष्ण सब अंगमें देई ॥
शब्द औषधी कानके द्वारा । बूझ समय करे निरुआरा ॥
हर्ष विषाद यंत्र औ मन्त्रा । व्यापै सबै कोइ कोइ स्वतन्त्रा ॥
मर्म सबै द्वाराको बूझे । विना शब्द निर्णय नहिं सूझे ॥
स्पर्श रूप इत्यादिक चारी । सो सब मोट स्थूल अधिकारी ॥
पुनि अस्थूल सो थिर न रहारी । तैसहिं औषध ताहि समायी ॥
अंग अंगको देश है जैसा । अल्पे गहिये औषध जैसा ॥
शब्द अति झीना बूझविचारा । जाते होय सकल निरुआरा ॥
शब्द विना कोइ पार न पावै । विन गुरु कौन जो दाव लखावै ॥
सर्व देश सर्वज्ञ है सोई । तेहि विनु कारज सघे न काई ॥

साखी-शब्द विना श्रुति आंधरी, कहो कहाँको जाय ॥
द्वार न पावे शब्दका, फिरि फिरि भटका खाय ॥
गुरु गुरुमें भेद है, गुरु गुरुमें भाव ॥
गुरु सदा सो वंदिये, शब्द बनावे दाव ॥
फेर परा नहिं अंगमें, नहिं इंद्रिनकी माहिं ॥
फेरा परा कछु बूझमें, सो निरबारचो नाहिं ॥

सर्वज्ञसागर

(१४५)

चौपाई

यहि संसार बहु वैद्य विराजे । नाना भाँति औषधी साजे ॥
साच एक झूठा बहुतेरा । विना साँच नहिं होय निवेरा ॥
एक असल पर नकल अनेका । अनेक नकल नहिं पावे एका ॥
बहुविधि ठग सब करे ठगाई । यमके फन्दा रहे अरुझाई ॥
बूझि समझिके औषध कीजै । मिथ्यामें जिव काहेको दीजै ॥

मसला

गुरु कीजिये जानिके, पानी पीजै छानिके ॥

चौपाई

वेद पुराण किताब कुराना । दोहा साखी शब्द परमाना ॥
अनन्त भाँतिका शब्द पसारा । विनु जाने नहिं होय सुधारा ॥
सो सब औषध बहु विधि जाचे । यम फन्दासे तबही बांचे ॥
पक्ष वाणीको मन मत कहिये । जाते द्रन्द सबै घर लहिये ॥
निर्णय वाणी गुरु मत होई । पक्षा पक्ष जाते सब खोई ॥
जब निर्णयकी वाणी आवै । झूठा खोटा आपु लजावै ॥
निर्णय सो सबके हितकारी । जेहि परसे जिव होय सुखारी ॥
सार शब्द निर्णयको नामा । जाते होय जीवको कामा ॥
गुरु एक जो निर्णय करई । झगरा कबहुँ परे न परई ॥
जो कोइ निर्णय आश्रित भयऊ । सेवा करि निज कारज कियऊ ॥
सो सब सेवा शिष्य कहावै । मन मत सो जो और बतावै ॥
जग बुद्धि कहे मम गुरु एका । जेहि तेहि सेवा करे अनेका ॥
पुनि जाको इन गुरु ठहराई । ताको दूसर गुरु सहाई ॥
तेहिकी सेवा करे लौ लाई । सो सेवा पद कैसे कहाई ॥

( १४६ )

सर्वज्ञसागर

टहल करे टहलू कहलावे । तासो पद सेवा बनि आवै ॥
सोइ सेवक जो सेवा करई । विना विचार बूझ न परई ॥
अपने अपने गुरुमत माने । और सब मन मत अनुमाने ॥
विलु निर्णय सो द्रन्द न जाई । पचि पचि मरहिं करहिं लडाई ॥
जहैं झगडा तहैं गुरुमत नाही । जहैं गुरुमत तहैं द्रन्द नसाहीं ॥

सार्वी-पक्षा पक्षके कारणे, सब जग रहा भुलान ॥
निपक्ष होइके हरि भजे, सोई संत सुजान ॥

शब्द शब्द बहु अंतरा, सार शब्द मथि लीजे ॥
कहैं कबीर जहैं सार शब्द नहीं, धृग जीवन सो जीजे ॥

चौपाई

खरा खोट परखहु बहु भांती । तबहीं होय जीव कुशलाती ॥
जेहि गुरु ज्ञान न छूटत केरा । बहुत अनुमान सो भ्रम बौढेरा ॥
भवसागर दुस्तर कठिनाई । नौका नाम तहैं सत्य दिढाई ॥
बूढ़े भवकी धार न सूझे । सुए सुक्ति ऐसी दृढ़ बूझे ॥
जहैंसे उपजे तहां समाना । कसर विकार मूल नहि जाना ॥
भरमैं आप जीव भरमावे । नाटक चाटक सुयश बढावे ॥
करामात करतूत बखाने । नास्तिक ज्ञान सोइ सत्यकै माने ॥
ऋद्धि सिद्धि सब जात नसाई । नास्ति ज्ञान नाही कुशलाई ॥
त्यर्थ ऐश्वर्य नास्तिन माहीं । जाके पीछे जिव बौराहीं ॥
आपु गये यजमानहु खोये । भांति भांति फन्दा अरुझोये ॥
रोगी वैद्य दोनों एक ठाऊँ । औषध कही कल्पनाके गाऊँ ॥
जेहि कारण नर साई जो देई । सो सौदा जँचि काहे न लेई ॥
ठग भरमावे बहु विधि लूटे । यम धन्धासे कबहुँ न छूटे ॥
मोटि अविद्या छुड़ावन लागे । झीनी महा अविद्या पागे ॥
झनी माटे दोउ कष्ट से रूपा । कारण नास्ति परे त्यहि कृपा ॥

सर्वज्ञसागर

(१४७)

पूरा धनी पूरा सो सौदा । परखत मेंटे कालको फन्द । ॥
संधि लखावहि कारण रोग । मेंटहिंसब विधि संधिकसोग । ॥
नहि सन्देह न यमके त्रासा । सदा मुखारी परख विलासा ॥
धन्य सोबूझि समुझि पग धरई । अँधरन भटक भटक भवपरई ॥

साखी-बलिहारी तेहि पुरुषकी, पर चित परखनहार ॥
सार्ई दीन्हों खांडको, खारी बूझ गवॉर ॥
करु बन्दगी विवेक की, भेष धरे सब कोय ॥
सो बन्दगी वहि जानदे, जहँ शब्द विवेक न होय ॥
मानुष देही पाइके, चूके अबकी घात ॥
जाइ परे भवचक्रमें, सहे घनेरी लात ॥

इति । मानुष विचारसे.

इति तृतीयखण्ड समाप्त