कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)
Kabir Sagar (11 Parts Complete)
कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
पृष्ठ 440, कुल 2136 में से
संदर्भ में पढ़ें( १४४ )
सर्वज्ञसागर
साखी-रैन समानी भानुमें, भानु अकाशे माहिं ॥
अकाश समाना शब्दमें, शब्द रहा कछु नाहिं ॥
चौपाई
पांचो औषध करै विचारा । मोटा झीना जो व्यवहारा ॥
औषध अन्न जल पेट समाही । जाते क्षुधा औ प्यास नसाही ॥
बहुत प्रकार लादके रोगू । सो सब जाय भोजन संयोगू ॥
गन्ध कपाले पहुँचे जायी । गुण औगुण सब अंग समायी ॥
लेपै गुण सब ले पहुँचावै । गुण औगुण सबमाहिं समावै ॥
आंखिकी राह रूप गहि लेई । शीत उष्ण सब अंगमें देई ॥
शब्द औषधी कानके द्वारा । बूझ समय करे निरुआरा ॥
हर्ष विषाद यंत्र औ मन्त्रा । व्यापै सबै कोइ कोइ स्वतन्त्रा ॥
मर्म सबै द्वाराको बूझे । विना शब्द निर्णय नहिं सूझे ॥
स्पर्श रूप इत्यादिक चारी । सो सब मोट स्थूल अधिकारी ॥
पुनि अस्थूल सो थिर न रहारी । तैसहिं औषध ताहि समायी ॥
अंग अंगको देश है जैसा । अल्पे गहिये औषध जैसा ॥
शब्द अति झीना बूझविचारा । जाते होय सकल निरुआरा ॥
शब्द विना कोइ पार न पावै । विन गुरु कौन जो दाव लखावै ॥
सर्व देश सर्वज्ञ है सोई । तेहि विनु कारज सघे न काई ॥
साखी-शब्द विना श्रुति आंधरी, कहो कहाँको जाय ॥
द्वार न पावे शब्दका, फिरि फिरि भटका खाय ॥
गुरु गुरुमें भेद है, गुरु गुरुमें भाव ॥
गुरु सदा सो वंदिये, शब्द बनावे दाव ॥
फेर परा नहिं अंगमें, नहिं इंद्रिनकी माहिं ॥
फेरा परा कछु बूझमें, सो निरबारचो नाहिं ॥