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सर्वकोश
कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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पृष्ठ 435

सर्वज्ञसागर

( १३९ )

सतगुरु वचन—चौपाई

सुनु धर्मनि मैं कहूँ समझायी । लक्ष चौरासी योनि बनायी ॥
माया चरित्र अब तोहिँ सुनाओ । एक एक कै सब भेद बताओ ॥
चारि कला स्वरूप धरि चारी । एक एक गति कहौँ विचारी ॥
एक स्वरूप सुरति लगि रही । तीन स्वरूप भिन्न घर सही ॥
एक कला गायत्री भयञ्ज । जब पिताखोजको ब्रह्म गयञ्ज ॥
सो गायत्री ब्रह्माको दीन्हा । दूसरी कला लक्ष्मी कीन्हा ॥
मध्यो समुद्र रतन कटि आया । लक्ष्मी तबही विष्णुने पाया ॥
तिसरी कला पार्वती कीन्हा । सोइ कला शम्भु कहँ दीन्हा ॥
यह चरित्र मायाको भाई । जाकी गति मति लखी न जाई ॥
तीन शक्तिको खेल अपारा । इनही रचयो सकल संसारा ॥

सारखी-माया परबल सबनमें, जो चाहे सो होय ॥

लख चौरासी इन रची, मरम न जाने कोय ॥

माया सृष्टि माया रची, जीव अनेक बनाइ ॥

उनते सब कहु होत है, कहै कबीर समझाइ ॥

इति श्रीसर्वज्ञसागरे सृष्टिखण्डवर्णनोनाम प्रथमस्तरंगः ।

अथ द्वितीयस्तरंगः

ज्ञानखण्ड वर्णन

धर्मदास वचन—चौपाई

धरमदास पूछे चितलायी । उत्पति भेद सकल हम पायी ॥
अब जिव कारज कहौ विचारा । जेहि करनीसो हंस उबारा ॥
सो विधि ज्ञान कहो समझायी । जाहि ज्ञान से लोकहि पायी ॥
जीव उबारन ज्ञान सुनाओ । हे सादेब ! मोहि नाहि दुराओ ॥