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सर्वकोश
कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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( १४६ )

सर्वज्ञसागर

टहल करे टहलू कहलावे । तासो पद सेवा बनि आवै ॥
सोइ सेवक जो सेवा करई । विना विचार बूझ न परई ॥
अपने अपने गुरुमत माने । और सब मन मत अनुमाने ॥
विलु निर्णय सो द्रन्द न जाई । पचि पचि मरहिं करहिं लडाई ॥
जहैं झगडा तहैं गुरुमत नाही । जहैं गुरुमत तहैं द्रन्द नसाहीं ॥

सार्वी-पक्षा पक्षके कारणे, सब जग रहा भुलान ॥
निपक्ष होइके हरि भजे, सोई संत सुजान ॥

शब्द शब्द बहु अंतरा, सार शब्द मथि लीजे ॥
कहैं कबीर जहैं सार शब्द नहीं, धृग जीवन सो जीजे ॥

चौपाई

खरा खोट परखहु बहु भांती । तबहीं होय जीव कुशलाती ॥
जेहि गुरु ज्ञान न छूटत केरा । बहुत अनुमान सो भ्रम बौढेरा ॥
भवसागर दुस्तर कठिनाई । नौका नाम तहैं सत्य दिढाई ॥
बूढ़े भवकी धार न सूझे । सुए सुक्ति ऐसी दृढ़ बूझे ॥
जहैंसे उपजे तहां समाना । कसर विकार मूल नहि जाना ॥
भरमैं आप जीव भरमावे । नाटक चाटक सुयश बढावे ॥
करामात करतूत बखाने । नास्तिक ज्ञान सोइ सत्यकै माने ॥
ऋद्धि सिद्धि सब जात नसाई । नास्ति ज्ञान नाही कुशलाई ॥
त्यर्थ ऐश्वर्य नास्तिन माहीं । जाके पीछे जिव बौराहीं ॥
आपु गये यजमानहु खोये । भांति भांति फन्दा अरुझोये ॥
रोगी वैद्य दोनों एक ठाऊँ । औषध कही कल्पनाके गाऊँ ॥
जेहि कारण नर साई जो देई । सो सौदा जँचि काहे न लेई ॥
ठग भरमावे बहु विधि लूटे । यम धन्धासे कबहुँ न छूटे ॥
मोटि अविद्या छुड़ावन लागे । झीनी महा अविद्या पागे ॥
झनी माटे दोउ कष्ट से रूपा । कारण नास्ति परे त्यहि कृपा ॥