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कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)

by कबीर साहेब

Source: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (origin)

Devanagarihipublished1,367 pages
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सेवा किया करता था। एक दिवसकी बात है कि, सुलेमान सो गया था एक सौपने आकर सुलेमानके सिरपर अपना फण पसार दिया था। यह हाल उस मल्लाहकी बेटीने देख लिया। तब उसने जान लिया कि, यह हमारा नौकर कोई प्रतिष्ठित तथा बड़ी ममर्यादाका मनुष्य है। तब उसने अपने पितासे कहा कि, पिता ! मेरा विवाह इसके साथ कर दो। मल्लाहने कहा कि, हे बेटी ! यह तो हमारा सेवक है इसके साथ तू क्यों विवाह किया चाहती है ? अनेक मल्लाह हैं किसी अच्छे मल्लाहके पुत्रके साथ कर दूँगा। उस लड़कीने यह बात अस्वीकार की उसका विवाह सुलेमानके साथ हुआ, विवाह हो गया। तब उसदिनसे वह मल्लाह दो मछलियाँ दिया करता। एक सुलेमान और दूसरी अपनी पुत्रीको, वह मल्लाह भड़ भूजेका कामभी करता था। उसकी लड़की भाड़ झोंकती थी। सुलेमान भी झोंका करता था। एक दिवस ऐसी घटना हुई कि, उसने अपनी पुत्री तथा दामादको दो मछलियाँ दीं। जब उन्होंने मछलियोंको चौरा तो जो उस लड़कीके भागकी मछली थी उसके पेटसे सुलेमानकी वही अंगूठी निकल पड़ी सुलेमानने उस अंगूठीको पहचानकर अपनी उँगलीमें पहनली।

अब इधरका हाल सुनो कि, जब वह देव मुलेमानका स्वरूप धारण करके बादशाहत करने लगा, तो कुछ दिवसोंतक तो उसने राज्य किया। इसके पीछे शाही चाकरों तथा बेगमोंने उसकी आदतें सुलेमान बादशाहकी आदतों विरुद्ध पाईं, तो जान लिया कि, यह हमारा बादशाह नहीं है बरन जिसको हमने मारकूटकर निकाल दिया था वही सुलेमान बादशाह था, यह कोई देव वा धूर्त है जो सुलेमानका स्वरूप धारण कर सिंहासनारूढ़ हुआ है। सब कारबारी सुलेमान को दूँढ़ने लगे। जब उस दुष्ट देवने देखा कि, यह सब सुलेमानको दूँढ़ रहे हैं मेरी धूर्तताको सब जान गये हैं, तो सिंहासन छोड़कर भाग गया। अंगूठीको नदीमें डाल दी। नदीमें पड़ते उसी समय उस अंगूठीको एक मछली निगल गयी। सब कर्मचारी तो सुलेमानको दूँढ़ते रहे वह देव कहीं छिप रहा। उधर जब सुलेमानने वह अंगूठी पा उसे अपने हाथमें पहना तो उसी समय जिन तथा परियों उसकी चाकरी में आ उपस्थित हुईं। शाही सिंहासन आया, सुलेमान को बैठाया। सुलेमानने उस मल्लाहकी छोकड़ीको अपने साथ सिंहासनपर बैठाया, वह आकाशको उड़ा, उसकी राजधानीमें जा पहुँचा। जब सुलेमान अपनी राजधानीमें पहुँचा तो पहिलेकी तरह राज्य करने लगा।

घृणाकी दृष्टिसे देखनेका फल सुलेमान बादशाहका सिंहासन एक समय आकाशमें उड़ा जाता था, उस समय उसने मल्लाहकी लड़कीको कुरूपा

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देखकर अपने मनमें ख्याल किया कि, हे खुदा ! ऐसी कुरूपता के साथ कौन विवाह करना पसन्द करेगा । अतः वह लड़की सुलेमानकेही गले पड़ी उस लड़कीकेही हिस्सेकी मछलीके पेटसे वह अंगूठी निकली, जिससे सुलेमान पुनः अपने राजा सनपर आसीन हुआ था । सुलेमानने उस लड़कीके साथ विवाहभी किया, उसके साथ भाड़भी झोंका, इन बातोंको सुलेमानोंकी हदीसोंमें दृढ़ना चाहिये । इस जगह मुझको एक उदाहरण याद आया है कि—

जब रामचन्द्र बनमें फिरते हुए दण्डकारण्यमें आये तो शिवरी भीलनीके हाथके बैर खाकर लक्ष्मणजीसे भी कहा कि, तुम भी इनको खाओ । लक्ष्मणने कहा कि, महाराज ! मैं तो भीलनीके हाथ कान खाऊँगा, रामचन्द्र चुप होरहे । जब मेघनादने बाण मारा और लक्ष्मणजी अचेत होगये उनके जीवनकी कोई आशा नहीं रही । तब हनुमानजी सञ्जीवनी बूटी लाये वह लक्ष्मणके मुंहमें दी उसी बूटीसे लक्ष्मणके प्राण बचे । तब रामचन्द्रने कहा कि, हे लक्ष्मण ! जिससे तुम घृणा करते थे उसी बेरके बीजसे यह सञ्जीवनी बूटी हुई है जिससे तुम्हारे प्राण बचे हैं । इस कारण किसीको घृणाकी दृष्टिसे देखना और अपनेको अच्छा जानना परमेश्वरका कोप अपने ऊपर उपस्थित करना है । ईश्वरोंके लिये भक्तों का आदर ही उचित है ।

सुलेमान बादशाहकी प्रशंसा मुसलमानी पुस्तकोंमें बहुत लिखी हुई है । पुराने अहदनामसे भी प्रमाणित है कि, खुदाने सुलेमानको विज्ञान, पैगम्बरी और बादशाहत तीनों प्रदान करके कहा कि, तुम्हारे समान दूसरा न होगा । इस सुलेमानका हाल पढ़कर संसारकी बादशाही पैगम्बरी और हिकमत सभी तुच्छ और जान निकृष्ट पड़ती हैं ।

९—योहन्सानवी—सुलेमान नबीके पीछे योहन्ना नबी जिकरियाका पुत्र बड़ा प्रेमी हुआ है जब वह अपनी माताके गर्भमें आया तो (इञ्जीलके अनुसार) गर्भमेंही नूरैल्लाहीसे भरपूर होगया था । यह मनुष्य ईश्वरी भयसे सदैव रोया करता था । हजरत ईसाने निज मुखसे प्रशंसा की कि, जितने नबी पूर्वसे अब-तक पृथ्वीपर आये-योहन्नासे बढ़कर कोई नहीं है । मतीके (११) बाबकी (११) आयतको देखो कि, योहन्ना जब कैंदमें था तब मसीहके पास उसने अपने दो शिष्योंको भेजा । जिसमें जाने कि, आप वही मसीह है जिसकी कि हम आशा करते थे, या हम किसी अन्य मसीहकी प्रतीक्षा करें । तब ईसाने उन शिष्योंके द्वारा कहला भेजा कि, जो कुछ तुम देखते हो उससे जानो मेरी लीलाओंसे मुझको पहचानो । यह स्पष्ट रूपसे नहीं कहा कि, मैं वही मसीह हूँ और न

मनके पांच अहंकार

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योहन्नाको जान पड़ा कि यह वही मसीह है। योहन्ना उजाड़में रहा करता था। उसका भोजन मधु और टिंडी था। वह ऊँटोंके रोंएकी पोशाक पहनता था, खालकी कमरबन्द कमरमें बाँधता था।

१०-हजरत ईसा-फिर इस पश्चिम देशमें हजरत ईसा सबसे श्रेष्ठ पैगम्बर उत्पन्न हुए। आपके विषयमें योहन्नाने कहा है कि, मैं ईसूके जूतेका तस्मा खोलने योग्य भी नहीं, सब पैगम्बरोंसे इतना मसीह श्रेष्ठ हैं।

मरकतका (१) बाब (७) आयत देखो। उन हजरतको भी कभी कभी कुछ प्रकाश होकर अन्तर्धान हो जाता था, सुतरां मतीके (२१) बाबके (१८) आयतसे (२०) आयततक और मरकसके (११) बाबके (१२) से (१४) आयत तक लिखा है कि, प्रातःकाल जब वह बैठ-‘अँना से बाहर आया तब मसीहको भक लगी उसने दूसरे इञ्जीरका एक वृक्ष देखा जो पत्तोंसे लदा था। उसके नीचे मसीह दौड़कर गया कि, कदाचित् उसमें कुछ फंस पावें, परन्तु वहाँ पत्तोंके सिवा और कुछ नहीं पाया। क्योंकि, वह इञ्जीरके फलनेका समय नहीं था, निराश होकर उसने इञ्जीरके वृक्षको शाप दिया कि तेरा फल महाप्रलय तक कोई न खावेगा उसके शापसे वह वृक्ष वहीं सूख गया।

समीक्षा—इससे तीन बातें प्रमाणित हुईं, पहले तो उन हजरत को फला और बिन फला वृक्ष मालूम नहीं था। दूसरे आपको इञ्जीरके फलनेका समय मालूम नहीं था। तीसरे उस वृक्षको व्यर्थही शाप दिया। क्योंकि उसका कुछ भी दोष नहीं था। हजरत मसीहमें वह प्रकाश था कि, जिससे आप अपने आवा-गमनको जानते थे सुतरां योहन्नाकी इञ्जीलका (९) बाब (५६-५८) आयत देखो आप आज्ञा करते हैं कि “तुम्हारा पिता इब्राहीम उत्सुक था कि, मेरा दिन देखे सुतरां उसने देखा और प्रसन्न हुआ” तब यहूदियोंने कहा कि, तेरी उम्र तो पचास बरस की भी नहीं? क्या तूने इबराहीमको देखा है। तब ईसाने कहा कि, मैं तुमसे सत्य सत्य कहता हूँ कि, इबराहीमके होनेके पहले मैं हूँ।

११ मुहम्मद मुस्तफा—जो अन्तिम पैगम्बर कहलाते हैं। मशकातके बाब किस्से अबिन सैयादके दूसरे फसिलमें आपका हाल इस प्रकार लिखा है, कि मुहम्मदसाहबने सुना कि, मदीनामें किसी यहूदिनके एक लड़का उत्पन्न हुआ है। उसकी एक आँख नहीं है, वह मादरजाद काना है। यह बात सुनकर आपको यह भय हुआ कि, कदाच यह लड़का मसीहहुज्जाल होगा। तात्पर्य यह कि, हजरत उमर सहित मुहम्मद साहब इस लड़केका वृत्तान्त जानने गये। उसको

वर।

मनकी विषय वासना

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भली प्रकार देखा। उसका हाल पूछा। हजरत उमरने मुहम्मद साहबसे निवेदन किया कि, यदि आप आज्ञा दें तो मैं इस बालकको मार डालूँ। आपने फरमाया कि, यदि यह लड़का मसोहुद्दज्जाल है तो इसका मारनेवाला मसीह है। बिना मरियमके पुत्र ईसाके इसका मारनेवाला और कोई नहीं। जबतक मुहम्मद जीवित रहेगा तबतक उससे डरा करते थे कि, कदाचित् यही मसोहुद्दज्जाल हो एवं बगावत कर बैठे। आपको जम्मभर उसका भय रहा मनकी धड़क कभी भी न गयी।

सफरुसआदतमें लिखा है कि, एक दिन एक यहूदी स्त्रीने आपका (मुहम्मद साहबका) निमन्त्रण किया और कबाबमें विषमिलाकर लाई, जब वह कबाब आपके सामने रखा तो आपने उसमेंसे आपके सभीप बैठे हुए एक अमीरको कुछ दिया। उसने खाया, उसने जान लिया कि, कबाबमें विष है। उसने पुकारकर कहा कि, हजरत आप इस कबाबको न खाइये इसमें विष है। यह बात सुनकर मुहम्मद साहबने अपना हाथ भोजनसे खींच लिया। वह अमीर जिसने कबाब खालिया उसी समय मर गया, परन्तु मुहम्मद साहबने जो तीन ग्रास खाये थे उसका प्रभाव हजरतके शरीरपर थोड़ाही हुआ, जिससे प्राण बच गये। आपने उस स्त्रीको बुलाकर पूछा कि, तूने ऐसा कार्य क्यों किया। उसने कहा कि, मैंने आपकी परीक्षाके लिये यह कार्य किया था कि, आप सच्चे पैगम्बर हैं या नहीं। अब मुझे जान पड़ा कि, आप सच्चे नबी हैं। इसमें कोई सन्देह नहीं। मुहम्मद साहबने उस स्त्रीका वध कराया। वह तीन ग्रास जो आपने खाये थे उसका उद्देग उस समयसे प्रतिवर्ष हुआ करता था जिस समयसे आपने उस कबाबको खाया था। उस समय आपको बड़ा कष्ट हुआ करता था, जब वह कबाब खानेका समय आता था तब आप बीमार हो जाया करते थे। तीन वर्षके पीछे उसी विषसे आपकी मृत्यु होगई।

हजरत अपने भीतरी प्रकाशसे कुछ नहीं जान सकते थे। कभी कोई कोई बात जान भी लेते थे। जैसे बिजलीका चमक पड़ना, अधिक तो जिबराईल द्वारा कर्माकर्मसे बिज होकर उसीके अनुसार काय्य किया करते थे।

बैजावी तथा मदारक इत्यादिमें लिखा है कि, जिबराईल हजरतके निकट खुदाका हुकुम लेकर आया करते थे उस समय, वही (खुदाके हुकम) की रक्षाके लिये सत्तर सहस्र फिरिश्ते जिबराईलके साथ आया करते थे। उन्हें डर था कि, कहीं शैतान अपनी बात उसमें न मिला दे अथवा स्वयम् जिबराईल उस वहीमें कुछ अधिक और न्यून न करदे या बदल न दे। तात्पर्य यह कि, स्वच्छ तथा

वासनाओंकी जननी

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निर्दोष वही खुदाके पेंगम्बर के पास स्वच्छ पहुँचे, इसीलिये खुदाकी ओरसे बड़ी चौकसी हुआ करती थी। हजरत इब्रअब्बासका कथन है कि, जिबराईल कभी खुदाके पेंगम्बरके पास वही न लाया। उसके साथ साठ सत्तर सहल चौकीदार फिरिश्ते वहीकी रक्षार्थ साथ नहीं थे।

कुरानमें मूर्तिपूजा—मौलवी अमादुद्दीन कृत तवारीख, मुहम्मदीमें लिखा है कि, मुहम्मद साहबके नबी होनेके पाँचवें वर्षका हाल है कि, जब मक्का-वालोंसे मुसलमानोंका बैर हो गया तब मुहम्मद साहबने मुसलमानों तथा काफिरोंके सामने यह बात सुनाई। बुतोंकी प्रशंसामें सूरत नजममें यह बात उत्तरी (जैसा कि, स्वर्गवासी मास्टर रामचन्द्र सितारे हिन्द दिहलबीने आजाज कुरानमें लिखा है )

أَقْرَرُ نَيْمًا لِلَّاتِ وَالْعُرْزِي وَمِنْهُ الثَّالِثَةُ الْأَحْرِي

कि, “तुम देखते हो लात असी और मनात बुतोंको” उसके उपरान्त फर मुहम्मद साहबने इसी आयतके साथ यह भी पढ़ा है।

وَالْقَدْرُ مَا خَلَيْتَ مِنْهُ إِلَّا اللَّهُ تَعَالَى

कि, “तीनों मूर्तियों परम श्रेष्ठ हैं। इनसे मुक्तिकी अभिलाषा की जाती है।” यह बात सुनकर सब मूर्तिपूजक मुसलमानोंके मित्र बन गये फिर जब मुहम्मद साहबने देखा कि, मुसलमानों तथा मूर्तिपूजकोंमें कुछ विभिन्नता नहीं रही तब खेद करने और सोचने लगे।

दूसरा कथन—तब आपने यह आयत सुनाई जो सुरे हजमें है :—

وَمَا ارْسَلْنَاكَ مِنْ قَبْلِكَ مِنْ رَسُولٍ وَلَا نَبِيٍّ إِلَّا أَوْفَاةً أَوْ أَمَنِيَّةً أَلَيْسَ الشَّيْطَانُ فِي الْأَمْنِيَّةِ فَهُوَ شَمُّ اللَّهِ مَا لَيْسَ الشَّيْطَانُ شَمًّا مَكْرَمُ اللَّهُ آيَاتِهِ

अर्थात् ऐ ! मुहम्मद तुझसे आगे जो रसूल तथा अम्बिया संसारमें आये उनकी यह दशा हुई कि, जब उन्होंने कुछ पढ़ना चाहा तो शैतानने उनके पढ़नेमें कुछ अपनी बात मिलादी अतः खुदा शैतानकी मिलाई हुई बातोंको काटता है अपनी बातको दृढ़ कर देता है।

तात्पर्य—यह कि, मैंने जो बुतोंकी प्रशंसामें वह बात कही मूर्तियोंकी

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प्रशंसा की वह वाक्य खुदाकी ओरसे नहीं था वरन् शैतानने वह बात मेरी जिह्वा-पर डालदी थी । उस वाक्यको कटा हुआ जानो क्योंकि, वह शैतानका वाक्य था । इस प्रकार शैतानी मिलावटके कारण कुरानकी बहुतसी आयतें कट गयी हैं । जिनका वृत्तान्त तफसीर मुआलि मुत्तनजीलमें लिखा है ।

समीक्षा—अब यहाँ प्रमाणित हुआ कि खुदा तथा खुदाके रसूल दोनों शैतानसे भयभीत रहा करते थे । खुदा सत्तर सहस्र चौकीदार आयतके साथ भेजा करता था । जिबराईलका भी कुछ विश्वास न था कि, वह अपनी ओरसे वहीमें कुछ मिला न दे इस चौकसी तथा सावधानीके होते रहने पर भी शैतानकी विजय होती है । वह वही तथा पैगम्बरोंकी जिह्वापर अपनी बात डाल देता है । उसकी मिलावटसे खुदा और रसूल दोनों डरा करते थे । तब बताइये कि, उनकी शक्ति तथा मुक्ति किस काम आई ।

विशेष—यहाँतक तो मैंने बहुतही संक्षेपमें सब नबियोंका हाल लिखा है एवं उनकी विद्याका वृत्तान्त प्रगट किया है । जो कोई उनकी जीवनी देखेगा वह अनेक बातोंसे विज्ञ हो जायगा कि, इन नबियोंको कैसा ज्ञान था किस प्रकारकी विद्यासे संसारवालोंको उपदेश दिया करते थे । जितने बड़े बड़े नबी बीते हैं वे येही हैं, उनके अतिरिक्त जितने नबी और बीचमें हुये हैं उनका विवरण व्यर्थ है । इन सब नबियोंको खुदाकी ओरसे बल तथा प्रकाश प्रदान किया जाता था । इसके द्वारा वे लोग मनुष्योंको उपदेश दिया करते थे । मृत्युके समय उनका सर्व प्रकाश विलुप्त हो जाता । वह दूसरी योनिमें चले जाते थे । परन्तु दूसरी देहमें पूर्वजन्मका परिश्रम कुछ सहायक होता शीघ्रही प्रकाशके अधिकारी हो जाते । किसीको मृत्युके समय प्रकाश पृथक् होता और किसीका प्रकाश उसी जीवनमें दूर हो जाता । सुतरां सावल नबी अपने जीवनमेंही बिना प्रकाशका हो गया था । एक स्त्री जिसका यार एक देव था उससे समाचार पूछता फिरा । उसमें तनिक भी ज्ञानकी ज्योति नहीं रही । देखो प्राचीन अहदनामा (१) समवाईलका (२८) बाब साविलका वृत्तान्त लिखा है । ऐसेही सब नबियोंको खुदाकी ओरसे उपदेश होता है तब विद्याका प्रदीप प्रकाशित होता है । फिर समय आनेपर बिना विद्या कभी हो जाते हैं योनि योनिमें आवागमन करते फिरते हैं जैसे घड़ीको फूक दी अथवा कलको हिला दिया जबतक उसका बल रहा तबतक चलती रही, ऐसे ही नबियोंका मन कभी प्रकाशित और कभी अन्धकारसे भर जाया करता है इसीका सार निम्न लिखित ग्रन्थलमें लिखते हैं ।

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गज्जल—नहीं एतबार' आदम' और फिरिश्तोंकी' जवानी का ।
कहौ दावा करे क्या कोई हककी' राजदानीका' ॥
शरीअत' और हकीकत' और तरीकत' मारफत' चारो ।
बपासे अहल दुनियाके हैं डण्डा निर्दबानीका ॥
रखी जो हाथ पर शय—हो, न पहचाने अगर कोई ।
तो क्योंकर नुकतःढाँ होवे तनासुख चारखानीका ॥
न जान भेद अपने घर न अपने जिस्मका आदम ।
तो णि र क्योंकर वह मुखविर हो कवायफ आसमानीका ॥
यहूदा और निसारा मुस्लमों हिन्दू झगडते हैं ।
न जाने अस्लको अपने सबब यह खींच तानीका ॥
लिखा सब हाल निबियोंका बगोशोहोश सुन लीजे ।
यही सूरत यही मूरत यही ढब गैबदानीका ॥
वह है नजदीकतर शह रंग(से)पहचाने कहो क्योंकर ।
कभी कोई न देखा जिलवः उस जल्ल शानीका ॥
थके सिध साधु सदहा, पीरो कुतुब ओ काजी ।
न मुखविर कोई खबरदारों से उसराजनेहानीका ।
भजन सुमिरन नमाजोजाप और पूजा नहीं कोई ।
नहीं कोई काम उस घरमें है कुरआँ वेद खानीका ॥
पड़ा खाता था गोता सद तलातम बह्व कुदरतमें ।
हुआ इसरार तब इजहार मुरशिद मेह्व ज्ञानीका ॥
नबी आदम और हौवा हिर्समें फसकर मरे सारे ।
यह मुहलिक साजो सामां सब है इस दुनियाय फानीका ॥
न जान और न दूँदे सब भटकते दर बदर फिरते ॥
सभी कहते कहानी किस्सा मुल्क जावेदानीका ॥
हिकायत आसमांकी कर शिकायत अपनी जोरोंकी ।
नहीं मोहरिम हुआ जिनहारा घरके चोर जानीका ॥
बजुज मल्लाह किश्ती दुनयवी दरिया न तर आज्जिज ।
तु क्योंकर पार पावे कुदरते दरिया सुभानीका ॥

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नबियों और उनके खुदापर एक दृष्टि

१२---इन नबियोंको तो क्या लद्दुझी विद्या होनी थी वरन् उनके खुदा-केभी लद्दुझी (सार्वज्ञय) विद्यामें सन्देह जान पड़ता है । क्योंकि खुदाने मूसाको आज्ञा दी मूसाने बनी इसराईलसे कहा । देखो तौरीतमें खुरुजका (१२) बाब (२१ से २३) आयत पर्यन्त लिखा है कि, मूसाने सब बनी इसराईलके प्रतिष्ठितोंको बुलाया, उनसे कहा कि, तुम अपने प्रत्येक घरोंसे एक बर्ग बकरा निकाल लाओ और उसे हलाल करो, जूफीअनाजकी एक एक मूछी लाओ और उस रक्तमें जो वासनमें है, गोता देकर ऊपरके चौखट और दोनों बाजू द्वारके उससे छापो । तुममेंसे कोई प्रातः कालतक द्वारके बाहर न जावे । क्योंकि, इधर खुदा जावेगा । जिसमें मिश्रियोंको मारेगा । जब वह चौखट तथा दोनों बाजू देखेगा खुदा द्वार परसे जावेगा मारनेवालेको न छोड़ेगा ऐसा न कि, तुम्हारे घरोंमें आकर तुम्हें मारें ।

फिर देखो उसी बाबके (१४ से १२) आयत पर्यन्त लिखा है कि, खुदा आज्ञा करता है कि आजकी रात में मिश्रदेशमें होकर जाऊंगा मनुष्य तथा पशुके जितने पहलौठे मिश्र देशमें हैं सबको मारूंगा । मिश्रके सब देवताओंको दण्ड दूंगा । साबित करूंगा कि मैं खुदा हूँ ।

उस रक्तका तुम्हारे घरों पर जहाँ जहाँ चिन्ह होगा मैं वह रक्त देखकर तुमको छोड़ दूंगा । जब मैं मिश्र देशस्थ मनुष्योंको मारूंगा तो तुम्हारे मारनेको तुम पर मरी न आवेगी ।

फिर देखो तौरीतमें उत्पत्तिका (६) बाब (५ से ८) आयत तक लिखा है कि, पृथिवी पर मनुष्योंका पाप बढ़ गया खुदाने देखा कि, मनुष्योंके विचार दिन दिन भ्रष्ट हो जाते हैं खुदा मनुष्यको पृथिवी पर भेज कर पछताया बड़ा ही दुःखी हुआ । खुदाने कहा मनुष्यको जैसे मैंने उत्पन्न किया है वैसेही मनुष्यको, पशुको कीड़े मकोड़े तथा आकाशके पक्षियों तकको पृथिवी परसे मिटा डालूंगा । क्योंकि मैं उनको बनाकर पछताता हूँ ।

मुसलमानोंकी हदीसोंमें जो लिखा है उसे मैं कबीर भानुप्रकाशमें लिख आया हूँ कि, जिस समय खुदाने आदमका पुतला बनाना चाहा कहा कि, मैं एक खलीफा बनाऊंगा मिट्टीसे आदमकी मूर्ति बनानेकी आज्ञा दी । उस समय फरिश्तोंने मना किया कि, ऐ खुदा ? तू मनुष्योंको न बना, वे उत्पन्न होकर पाप करेंगे । तू मनुष्यको कदापि न बना परंतु खुदा साहबने एकका विचार नहीं किया । अपने खुदाई धमपडमें उनको झिड़क दिया । तब फरिश्ते चुप रहे, अन्तमें

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खुदाने जिबराईलको आज्ञा दी कि, तू पृथिवीसे मिट्टी ले आ । मैं मनुष्यका पुतला बनाऊंगा जिबराईल खुदाकी आज्ञानुसार पृथिवी पर आ मिट्टी लेने लगा । पृथिवी फूट फूटकर रोई पुकारकर कहा कि, ऐ जिबराईल ! तू मिट्टी न ले क्योंकि, खुदा इस मिट्टीसे आदमका पुतला बनावेगा । मनुष्य उत्पन्न होकर मुझपर पाप करेंगे । इन पापियोंके कारण मुझको बहुतही कष्ट होगा । पृथ्वीके गिड़गिड़ानेपर हजरत जिबराईलको दया आगयी वे पलट गये मिट्टीकी मुठी नहीं ली । इसके पीछे खुदाने मेकाईलको मिट्टी लाने भेजा, मेकाईलसे भी पृथ्वी बहुत गिड़गिड़ाई । तब उसके मनमें भी दया आ गई वह भी बिना मिट्टी लिये ही पलट गया । फिर अन्तमें इजराईलको भेजा । इजराईल पृथ्वी-पर आकर मिट्टी लेने लगा तो पृथ्वी रोई । मिट्टी न लेनेके लिये गिड़गिड़ाई । इजराईलने कहा कि, मैं मिट्टी लेकर तेरी दोहाई तिहाई सुनूंगा । अन्तको इजराईलने बलपूर्वक मिट्टी ली, पृथिवी रोती चिल्लाती रह गयी । कुछ न ध्यान दिया । वह मिट्टी लाकर खुदाके सामने रखी । इजराईलसे कहा कि, ऐ इजराईल ! तेरे मनमें बहुत थोड़ी दया है । तू पाषाण हृदय है क्योंकि तूने पृथिवीकी पुकार नहीं सुनी । जब पृथिवीपर मनुष्य उत्पन्न होंगे तब उनकी आत्मा निकालनेके लिये तू पृथ्वीपर जाया करेगा । अतः यह इजराईल फिरिश्ता मनुष्यके उत्पन्न होने तथा मरनेका कारण हुआ । खुदाने उस मिट्टीको गूँधकर मनुष्यका पुतला बनाया । मनुष्य पृथिवीपर बहुतायतसे होकर पाप करने लगे । उनके पापोंसे खुदा बड़ाही रुष्ट हुआ । अपने कियेपर पछताया । बाढ़ लाकर उनको नष्ट करना पड़ा । जैसा खुदा साहबने स्वेच्छा पूर्वक कार्य किया । फिरिश्तों तथा पृथिवीका कहना न माना और रोना चिल्लाना नहीं सुना वैसेही अपने कियेका फल भी पाया ।

अब यहाँ पर विचारना चाहिये कि, कोई नबीतो खुदासे बातें करता था कोई स्वप्नमें वार्तालाप किया करता था । भौति भौतिके स्वरूपमें खुदा उनको दिखाई देता था । यहाँतक कि, स्त्रियों और लड़के लड़कियों पैगम्बरी किया करते । जब चाहते तब खुदासे वार्तालाप कर लेते थे । जो चाहते सो पूछ लेते, सुतरां इसहाककी स्त्री रबकाको जब गर्भ हुआ जब उसके पेटमें दो पुत्र आपसमें झगड़ते थे तब वह खुदासे पूछने गयी कि, ऐसा क्यों है ? तब खुदाने कहा कि, तेरे पेटमें जो दो पुत्र हैं उनमेंसे बड़ेकी अपेक्षा छोटा बड़ाई तथा श्रेष्ठता पावेगा ।

स्त्रियों तथा पुरुषोंसे खुदा इस प्रकार वार्तालाप किया करता था । परन्तु

कर्म

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किसीने इस खुदाको कभी न पहचाना और न कभी किसीको खुदाके पहचानकी विद्या प्राप्त हुई खुदाकी खुदाईको तो सब मानते हैं पर उसका पता ठिकाना किसीको नहीं मालूम हुआ कि, सच्चा खुदा कौन है ?

मूसाकी दूसरी पुस्तक खुर्रुजमें लिखा है देखो (२४) बाबके (९) और (१०) आयतमें मूसा, हारूँ और नदब इत्यादि बनी इसराईलके प्रतिष्ठित लोग पर्वतपर गये । इसराईल ने खुदाको देखा । उसके पांवके तलेकी नीलम पत्थर जैसी गचकरी थी । उसका स्वच्छ शरीर आकाशके रङ्गका था । बनी इसराईलके अमीरोंपर उसने अपना हाथ न रखबा । उन्होंने खुदाको देखा और खाया पीया यह खुदा कौन है ? इसकी तो उन्हें पहिचान भी नहीं है । मनुष्योंमें दो शक्तियाँ हैं । एकका नाम विक्षेप तथा दूसरीको आवरण शक्ति कहते हैं । इन्ही दोनोंमें खुदा और बन्दे फँसे हुये हैं । विक्षेपशक्ति तो वह है जो कभी होती और फिर अन्तर्धान हो जाती है । जब विक्षेपशक्तिवाला तुरियातीतकी श्रेणीको प्राप्त कर लेता है तब समस्त संसारका रचयिता होजाता है । आवरण शक्तिवाले समस्त निर्बोध जीव हैं । मनुष्य तथा पशु सभी इस आवरण शक्तिसे घिरे हुये हैं, जो कोई विक्षेप और आवरण दोनोंको पार करके पद पाता है सो परमधामको जाता है । ब्रह्मा, विष्णु, शिव इत्यादि सब उसके सेवक बन जाते हैं । जबतक आवरण तथा विक्षेप दोनों श्रेणियोंको न जाने तबतक मनुष्यताकी श्रेणी प्राप्त नहीं कर सकता विक्षेप शक्ति तथा आवरण शक्तिके भीतर सब फँस रहे हैं । क्या ? अन्तर्धामी खुदा और समस्त संसारकी शरण देनेवाला इस प्रकार आज्ञा देगा ? कि, मेमनोंके रक्तका छापा अपने द्वारोंपर लगाओ । क्या अन्यान्य रङ्गके छापे नहीं लगाये जासकते थे ? क्या वह बिना छापेके चिन्हके मिश्रियोंको मार नहीं सकता था ? इतने जीवोंका रक्तपात करने करानेकी क्या आवश्यकता थी ? जिस खुदाने फिरऊनके मनको कड़ा किया था वह नरम करनेका सामर्थ्य भी रखता था । मनुष्योंसे पाप करने करानेका क्या मतलब ? क्या यही मतलब कि, मनुष्य पाप करते जावें और बन्धनमें फँसे रहें । मैं यदि मनुष्य हूँ तो निर्दोष मेमनोंका रक्तपात क्यों करूँ, अपने हाथोंको पापोंसे कलुषित क्यों करूँ, जिसने फिरऊनका मन पत्थर की तरह किया था वही नरम करे या न करे । झूठ और सच कहनेवाली की गरदन पर (परन्तु मनुष्यका क्या करे विवश होकर गति करता है और कालपुरुषके फन्देमें पड़ा है । यदि रक्तके ही चिन्हसे खुदाको यहूदी तथा मिश्रीकी पहचान होती थी तो यदि मिश्रियोंका समाचार मिलता तो वे भी अपनी चौखटों पर रक्त का छापा लगाकर खुदाको धोखा देते । मेरी बातें कोई ज्ञानी साधू विचारमान संमझेगा सबकी समझमें नहीं आ सकती ।

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x जीवयोगिनि

२ स्वसंबेदका यह कथन है कि, सर्वजीव चौरासी लाख योगिनमें मारे मारे फिरते हैं। जैसे जिसके कर्म होते हैं उसीके अनुसार उसको सुख दुख मिलता है। सब जीवोंको स्वरूप तथा स्वभाव उनके पूर्वजन्मके कर्मानुसार होता है जबतक मुक्ति नहीं होती तबतक सब जीवोंका आवागमन ही हुआ करता है। कोई जीव चौरासी योगिनमें फिरनेसे बिना पारख गुरुके छूट नहीं सकता।

चौरासी लाख योगिका वृत्तान्त—जैसा कि, कबीर साहबने अनुराग सागर ग्रन्थमें कहा बैसाही लिखता हैं। जलके जीवोंकी योगि नौलाख हैं पक्षियोंकी चौदह लाख योगि हैं, सताईसलाख अनेक प्रकारके जीव कीड़े मकोड़े इत्यादि हैं। तीस लाख स्थावर हैं। मनुष्योंकी चारलाख प्रकारकी योगि हैं। यह चौरासी लाख योगि हुई। इन सबमें—केवल मनुष्य देहसे मुक्ति होती है, किसी दूसरी योगि से कदापि छूटकारा नहीं पा सकता क्योंकि, दूसरी देहके तत्त्वोंमें विभिन्नता और कमी होती है। इस कारण उनकी अल्प विद्या होती है। उनका हाल यों है कि, एक तत्त्व जलसे सब स्थावर हैं और दो तत्त्वोंसे उखमज अर्थात् मक्खी और मच्छड़ इत्यादि हैं, तीन तत्त्वोंसे अण्डज अर्थात् अण्डा देनेवाले सब जीव हैं, चार तत्त्वसे पिण्डज अर्थात् बच्चा देनेवाले जीव हैं। इस कारण मनुष्योंको सबसे अधिक ज्ञान होता है इसी देहसे भक्ति और मुक्ति हो सकती है। जल तत्त्वसे स्थावर अर्थात् पेड़ इत्यादि हैं। अण्डजखानके समस्त जीव, वायु अग्नि जल इन तीन तत्त्वोंसे हैं। और उखमजमें वायु और अग्नि ये दो तत्त्व हैं, पिण्डजमें वायु अग्नि जल मिट्टी ये चार तत्त्व हैं, जो मनुष्यकी देह है वह पूर्णतया पांच तत्त्वसे है। स्त्री पुरुषमें तत्व समान है पर बुद्धिकी विभिन्नता है। यह जीव चारों खानिनमें फिरते फिरते मनुष्य की देह पाता है। पूरे पाँच तत्व और तीन गुणोंसे मनुष्यकी देह है। पूर्वजन्मके चिन्ह उसके साथ होते हैं, उसके वेही रङ्ग ढङ्ग परिलक्षित होते हैं।

१ अण्डजसे मनुष्य होनेके चिन्ह—जो जीव अण्डजखानिसे मनुष्यदेह पाता है

x अनुराग सागर पृ० ४८ में लिखा है कि कहैं कबीर मुनो धर्मनि वानी, तुमसे अब योगि भाव बखानी ॥ भिन्न २ के कहैं समुझाई। तुमसे संत न कछु दुराई ॥ नौ लाख जलके जीव बखाना। चतुर्दश पंछी परवाना ॥ क्रुम कीट सताइस लाखा। तीस लाख जग स्थावर भाषा ॥ चतुर्लक्ष मानुष परमाना ॥ मानुष देह; परमपद जाना ॥ और योगि गहि परमपद पावे। तत्वहीन वह भटका खावे ॥ १ अनुराग सागर ४९ पृ० में कहा है कि—चारि खानि जीवनके आहीं ॥ तत्वमेद आहि पुनि ताहीं ॥ सो, अब तुमसो कहों, बखानी। एक तत्व अस्थावर जानी ॥ उखमजें दोय तत्व परमाना। अण्डज तीन तत्व गुण जाना ॥ पिण्डज चार तत्वतेहि कहिये। पांच तत्व मानुष तन लहिये ॥ ताते हो ज्ञान अधिकारा। नरकी देह भक्ति अति प्यारा ॥

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उसके चिन्ह ये हैं । उस मनुष्यमें आलस्य, नौंद, चोरी, चुगली, निन्दा इत्यादिके दोष रहते हैं । घर घरमें आग लगाता है, उसमें विषय वासनाकी कामना अधिकता से पाई जाती है । देवी देवता भूतप्रेतादिकी पूजा किया करता है । कभी रोता है कभी मङ्गल गाता है दूसरेको दान पुण्य करता देखकर दुःखी होता है । सत्यगुरु को नहीं पहचानता । वेदशास्त्रोंको नहीं जानता । दूसरोंको तुच्छ तथा अपनेको बुद्धिमान समझता है । कभी नहाता नहीं कपड़े मैले रखता है । उसकी आँखोंमें कीचड़ भरा रहता है मुंहसे लार टपका करती है । जूवा चौसर आदि खेलोंमें संलग्न रहता है इसका सिर कुबड़ा तथा पैर लम्बे होते हैं ।

२-ऊशमजसे मनुष्य होनेके चिन्ह — जो कोई उषमजखानिसे मानुषिक शरीरमें आता है उसके यह चिन्ह हैं कि, वह खूब आखेट करता है । आखेट करने तथा जीववधसे बहुत हर्षित होता है । माँसको पका पकापर भक्षण किया करता है । वह गुरुको कुछ नहीं मानता । अपने गुरुसे अपनेको अच्छा जानता है । गुरु तथा नामकी निन्दा करता है, सभामें मिथ्या भाषण करता है बहुत बातें करता है । टेढ़ी पगड़ी बाँधता है उस पगड़ीका किनारा दामन तक लटकता रखता है उसके मनमें तनिक भी दया धर्म नहीं होता जिस किसीको दान पुण्य करते देखता है उसकी हँसी करता है । बड़ी चटक मटकके साथ गली कूचोंमें फिरा करता है । गुप्तमें तो पाषाण हृदय और निर्दयी है परन्तु प्रगटमें वह बहुत आवभगत किया करता है । प्रत्यक्षमें वह दयालु जान पड़ता है परन्तु यथार्थमें वह भयानक शैतान है । उसके दाँत लम्बे होते हैं उसका चेहरा भयानक होता है उसकी आँखे उभरी हुई होती हैं ।

३-उद्गिरजसे मनुष्य होनेके चिन्ह—जो अचलखानिमेंसे मनुष्य देहमें आता है उसके चिन्ह ये हैं कि, उसकी बुद्धि पारे की तरह चञ्चल रहती है । एक काम करनेको प्रस्तुत हो जाता है आगे शीघ्रही उससे फिर जाता है, खूब सज धजके पगड़ी बाँधता है, बादशाही दरबारमें नौकरी करता है । घोड़े पर खूब सवार होता है तलवार तथा कटार आदि कमरसे लगाता है, समय पाकर इशारेसे पराई स्त्रीको बुलाता है । व्यभिचारके लिये छिपकर पराये मकानमें जाता है । उसको तनिक भी लज्जा नहीं आती । एकक्षणमें तो प्रार्थना करता है दूसरे क्षण अपने परमेश्वरोंको भूल जाता है । एक क्षणमें तो वीर हो जाता है दूसरे क्षण नामर्द तथा डरपोक होकर भाग जाता है । एक क्षणमें सुकर्म तथा दूसरे क्षणमें कुकर्म करने लगता है भोजन करनेके समय अपना शिर खुजलाता जाता है । अपनी भुजा तथा जाँघ मलता जाता है भोजन करके सो जाता है । सोते हुये जो कोई उसको जगाने आवे तो उसको मारने दौड़ता है उसकी आँखें लाल होती हैं ।

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पिंडसे मनुष्य होनेके चिन्ह—जो कोई पिण्डज खानिसे मनुष्य तन पाता है उसके चिन्ह ये हैं, वह वैरागी वासनाओंसे पृथक् होता है। वेदके अनुसार दान पुण्य करता है। योग समाधि लगाता है अपने गुरुसे अत्यन्त प्रेम तथा आधीनता करता है। उसके चरणोंसे लगा रहता है। वेद पुराण पढ़ता है बहुत धर्मचर्चा करता है। समाजमें उसकी बातें बुद्धि सहित होती हैं। राजभोग तथा स्त्रीसे प्रसन्न रहता है। बड़ा वीर तथा सामर्थी होता है। उसका स्वरूप और आकार कान्तिमय होता है। उसके हाथमें सदैव तलवार रहती है। जहां कहीं मूर्ति देखता है नमस्कार करता है।

यहांतक मैंने चारिखानिका विवरण किया फिर कबीर साहब कहते हैं कि, जो मनुष्य देह पाकर अल्पकालमें मर जाता है अपनी पूरी आयु पर्यन्त नहीं पहुँचता उसकी दशा दूसरी देहमें ऐसी होती है कि, वह मनुष्यकी देह छोड़कर पुनः मनुष्यकी देह पाता है। वह पुरुष बड़ा बीर तथा प्रतिष्ठित होता है। जैसे शेरके सामनेसे भेड़ोंकी भीड़ भाग जाती है उसी प्रकार वैरियोंकी सैन्य उसके सामनेसे भागती और तितर बितर होती है, वह विषयवासना तथा शारीरिक कामनाओं को पसन्द नहीं करता। उसके समीप दुर्बुद्धिता तथा मूर्खता नहीं जाती। उसको सत्य शब्दका विश्वास होता है। वह किसीकी निन्दा नहीं करता। नम्रता तथा बिनीततासे गुरुकी सेवा करता रहता है।

अन्य योनियोंमें पूर्वकी मनुष्य योनिके चिन्ह—इसी प्रकार चारखानि और चौरासी लाख योनिके जीव बनते हैं। जैसे चारों खानिके जीव मनुष्यका शरीर पाते हैं उसी प्रकार स्वकर्मानुसार मनुष्यका शरीर छोड़कर जब चौरासी योनीमें जाते हैं तब उनके पूर्वजन्मके चिन्ह उनके साथ होते हैं। उसका वृत्तान्त बहुत बड़ा है। चारों खानिके जीव सब बराबर हैं केवल तत्त्वोंके भेदसे बुद्धि स्वरूप और स्वभावमें भिन्नता होरही है, इसी प्रकार चारों खानि बनाकर चारों खानिमें स्वयम् निरञ्जन समा रहा है। कम्मोंके जालमें सब जीवोंको फँसा लिया है। उन सुकम्मों तथा दुष्कम्मोंके सब चिन्ह सब जीवोंके शरीरपर स्वयम् निरञ्जनने बनाये हैं। जिसने जैसा कार्य किया है उसके शरीरमें वैसेही चिन्ह प्रगट होते हैं। चारों खानिके सर्व जीव समान हैं। चारों खानिमें फिरते फिरते जब मनुष्यके शरीरमें आते हैं तब उनके कम्मोंके चिन्ह भली भांति प्रगट और स्पष्ट हो जाते हैं। इस मनुष्यहीके शरीरमें उनका पूरा हिसाब किताब होता है। यह आत्मा जिस शरीरमें होती है तब वहां वैसेही कार्योंको स्वीकार करती है। वही कार्यों करने लगती है गिरह बाज कबूतरके बच्चे आपही गिरहबाज होते हैं। लोटन कबूतरके

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बच्चे लोटन होते हैं । परन्तु मनुष्यका बच्चा सदैव शिक्षा तथा गुरुके पथ दिखाने के आधीन रहता है । गुरु बिना इसका कोई ठीक नहीं होता । न कोई बुद्धि आती है इसी कारण किसीको पूर्णता नहीं है । परन्तु जो श्रेष्ठता तथा निपुणता मनुष्यको होती है वह और किसीको नहीं होती । यही मनुष्य देवताओंसे श्रेष्ठ तथा सर्व जीवोंसे अधमभी है । यदि मनुष्य गुरुद्वारा अच्छा काम न करे तो यह तुच्छसे तुच्छ और नीचसेभी नीच होजाता है ।

३-वैदिकी धर्म स्वसंवेदसेही बने हैं । चारों स्वसंवेदकी भीतरी बातें हैं । इस कारण वेद आवागमनके विषयमें स्वसंवेदसे समानता रखते हैं । सर्व ज्ञानी साधु आवागमनकी साक्षी देते हैं ।

कलञ्जनके पर्वतपरके सात शिकारी, दस हिरन मानसरोवर तालाबका एक हंस और सिंहलद्दीपका एक चकवीने गुरुक्षेत्रमें ब्राह्मणका जन्म पा वेद पढ़कर ज्ञान प्राप्त किया था ।

वशिष्ठ पुराणमें लिखा है कि, एक मनुष्यने चाहा कि, मैं बड़ी तपस्या करके अपना इतना बड़ा शरीर करूँ कि, मायासे पार जाकर ब्रह्मसे मिल जाऊँ । वह कठिन तपस्या करके अपना शरीर बढ़ाने लगा । उसकी देह बहुत बड़ी हो गयी पृथ्वीसे लेकर ऊपर इन्द्र लोक इत्यादिसे उस पार ऊँची चली गयी । उसका शरीर जब बहुत बड़ा हुआ । उसने देखा कि, मैं तो अब बहुत बड़ा हुआ तो उसने सत्यब्रह्मका ध्यान किया तब उसकी देह छूट गयी, वह मर गया । वह मरकर मच्छड़ हो गया क्योंकि, मरते समय उसका ध्यान मच्छड़की ओर था । वह मच्छड़ घासोंमें रहने लगा पश्चात् उसको एक हिरनकी लात लगी । मरनेके समय उस मच्छड़का ध्यान उस हिरनकी ओर होनेसे वह मच्छर मरकर हिरन होगया । उस हिरनको एक शिकारीने मारा । मरनेके समय उस हिरनका ध्यान शिकारीकी ओर हुआ । तब वह हिरन मरकर शिकारी होगया । वह शिकारी शिकार खेलने के लिये जङ्गलमें फिरने लगा । फिरते फिरते एक ऋषीश्वरसे मुलाकात होगई, तब उस ऋषिने उस शिकारीको शिक्षा दी जिस उपदेशसे वह पुनः तपस्या करके जीवन्मुक्त होगया ।

एक मकोड़ेकी आधी पिछली देह कट गयी थी आधी अगली साबित थी । वह अपनी आधी देहको घसीटे लिये जाता था । उसको देखकर एक मनुष्यने अपने गुरुसे पूछा कि, हे महाराज ! इस चीँटाने भी कभी मनुष्य शरीर पाया होगा । गुरुने कहा कि, मनुष्य होनेका तो क्या हिसाब, यह चिउँटा चौदह बार इन्द्र हो चुका है ।

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उस गुरुको तीनों कालोंका ज्ञान था । इसी प्रकार अपने कर्मनुसार यह जीव सहस्रों बार ब्रह्मा और शिव हो जाता है, करोड़ों बार वरुण कुबेर और इन्द्र आदिका पद प्राप्त करता है । यह अपने उच्च पदसे गिरकर मध्य और कनिष्ठ पदमें आता है । कनिष्ठसे मध्य और मध्यसे ऊँचे पदमें जा पहुँचता है । इसी प्रकार उसका आवागमन बराबर चला जाता है ।

अब यहाँ पर विचारना उचित है कि, यदि जप तप तथा योगादिकसे मनुष्य छूट सकते तो सब जीवन्मुक्त होजाते । गर्भमें काहेको आते ? जन्म मरण का दुःख क्यों भरते ! यह मनुष्य दुर्बुद्धिता तथा अज्ञानता सहित तपस्या करता है इस कारण इसका कार्य पूरा नहीं होता । जैसा कि उस मनुष्यने इच्छा की कि, मैं अपना शरीर इतना बड़ा करूँ कि, मायासे पार होकर ब्रह्मसे संयुक्त हो जाऊँ । उस मनुष्यमें तनिक भी ज्ञान नहीं था कि, काया अर्थात् देह तो आपही माया है । जब ब्रह्मसे मिलना चाहता है तब देह कहाँ ? जब देह तब ब्रह्म कहाँ ? जब मैं हूँ तब तू नहीं, जब तू है तो मैं कहाँ ? जहाँ शुद्ध ब्रह्म है वहाँ माया कहाँ ? जब माया प्रगट होगी तो ब्रह्म पर अवश्यही परदा डालेगी । इसी प्रकार सब तपस्वी और ऋषि मुनिगण बे सोचे समझे तपस्या करते आये आवागमनका सम्बन्ध नहीं टूटा । उनके मनमें तनिक भी चिन्ता नहीं कि, जो कुछ कहने सुननेमें आता है वो सब माया है । सब कर्मोंके धागेमें बँधे पड़े हैं । इसी विषय पर भर्तृहरि जीका श्लोक लिखता हूँ —

श्लोक—ब्रह्मा येन कुलालवन्त्रियमितो ब्रह्माण्डभाण्डोदरे
विष्णुर्येन दशावतारगहने क्षिप्ता महासंकटे ।
रुद्रो येन कपालपाणिपुटके भिक्षाटनं कारितः
सूर्यो भ्राम्यति नित्यमेव गगने तस्मै नमः कर्मणे ॥

अर्थ—जिस कर्ममें ब्रह्माकी ब्रह्माण्डभाण्डके उत्पन्न करनेके लिये कुम्हारके समान नियुक्त कर दिया, विष्णुको दश औतार लेनेको बड़े उसके साथ संयुक्त किया, रुद्रको मनुष्यकी खोपड़ीमें भीख मँगवाई जिसकी आज्ञासे सूर्य सदैव आकाश में फिरा करता है उसी कर्मको मैं साष्टाङ्ग नमस्कार करता हूँ ।

इसी प्रकार सर्व ईश्वर तथा ईश्वरभक्त कर्महीको पुजाते आये हैं, वेद सब किताब कर्महीको बताते आये हैं, कर्मसे ही मुक्ति समझली गई है, जहाँ तक कर्म है वहाँ तक कर्ता है भक्तोंकी आराधना तथा दुष्टोंके उत्पातके वश हो अवतार धारण करते हैं अपने कर्मको भोगने तथा दूसरेके कर्मोंको भुगानेके परवस

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सब जीव तथा ईश्वर है पर भक्त कम्मोंके वश नहीं भक्तोंकी तो बात निराली है, कबीर साहबने कहा है कि —

विरह भुयझूम तन डस्यो, मंतर लगे न कोय ।

राम बियोगी ना जिये, जिये तो बौरा होय ॥

सो वह मनुष्य जिसने कुछ बात जानली उसको इस संसारके लोग पागल कहा करते हैं । भर्तृहरि योगी जो ब्रह्मा विष्णु और शिव इत्यादिको कम्मोंके बन्धनमें बताता है वह स्वयम् कम्मोंके बन्धनसे छूटनेकी युक्ति नहीं जानता । सब योगी कम्मोंके बन्धनमें ही फँसे हुए हैं ।

पुनर्जन्म पर भारतीय दर्शन

४—न्याय शास्त्रका यही न्याय है कि, आवागमन ठीक है वैशेषिक भी इसीके पक्षमें ।

५—मीमांसा और पातञ्जलि सांख्यसे भी उससे सहमत हैं ।

६—सांख्य तथा बुद्ध धर्म भी यही कहता है कि, जीवोंका आवागमन है ।

७—जैन धर्म समानता रखता है और सर्व भारतके ज्ञानियों और विद्वानों की पुनर्जन्मके विषयमें एकता है । सभी पुनर्जन्मको मानते हैं जितने भी पूर्वके दार्शनिक हैं सभी पुनर्जन्मके पक्षपाती हैं ।

८ आवागमनपर तौरीत—मूसाकी पहली पुस्तकसे आदमकी उत्पत्ति तथा आवागमनका स्वरूप दिखाता हैं । यदि आदम पैगम्बर पूर्वजन्मके कम्मोंसे दुखी न होता तो उसकी वैसी अवस्था भी कभी न होती जैसी कि, अवस्थामें वह अदन की बाटिकामें फँसाया । उसके पूर्वजन्ममें कम्मोंकी गन्दगीने उसको इस अवस्थामें डाल दिया । यदि आदम कम्मोंसे पृथक् होता तो उसमें किसी प्रकारकी इच्छा न होती । वह तो अवश्य ही अपने पूर्वजन्मोंके कम्मोंसे घिरा हुआ था । वह अपने यथार्थसे पूर्ण तथा अनभिज्ञ था वह कुछ नहीं जानता था कि, मैं क्या था अब क्या हूँ? उसका पुनर्जन्म मैं स्पष्ट सिद्ध करता हूँ । उसके पुनर्जन्मसे सर्व मनुष्योंका पुनर्जन्म प्रगट होगा, यह खुदाका बेटा आदम जब उत्पन्न हुआ तब उसकी अवस्था मनुष्यों के बच्चेकोसी थी । उसका मन वासनाओंसे भरा हुआ था, मुझे खूब खाना पीना तथा सैर कौतुककी वस्तुएँ प्राप्त हों । उसकी इच्छानुसार खुदाने अदनके बगीचेको बनाया । आदममें मनुष्योंके बच्चोंके सब चिन्ह दिखाई देते थे तनिक भी विभिन्नता नहीं थी । जैसे अनजाने दूध पीते बच्चे होते हैं वैसाही वह भी था । तौरीत कुरान और हदीसोंमें उसका समस्त वृत्तान्त देखलो । उसके पिता खुदाने उसके भोगके सब सामान एकत्रित कर दिये, उसके लिये विश्रामके सब आयोजन तो

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थे पर वह स्त्रीके लिये चिन्तित था। तब उसके पिताने उसे एक जोरू भी ला दी, वे दोनों प्रसन्नतापूर्वक रहने लगे। वे दोनों मूर्खताके तिमिरमें फँसे हुये थे, वे दोनों अज्ञानतावश निर्दोष तथा भोले भाले कहलाते थे। पिताको चिन्ता हुई की, मेरी सन्तान मूर्ख न रह जावे, इनको विद्या सिखाना आवश्यक है जिसमें वे जाने कि, वे किस लिये उत्पन्न किये गये हैं? ऐसा न हो कि, वे सदैव मूर्खावस्थामें ही पड़े रहें। इस कारण उसने एक विवेकका वृक्ष लगाया कि, उसके खानेसे कर्तव्याकर्तव्यका ज्ञान हो जावेगा और भला बुरा जाना जावेगा, इसके पीछे उसके पिताने शैतान गुरुको शिक्षार्थ भेजा, जिस फलके खानेको खुदाने मना किया था उसे उसने उभाड़ कर फलको उन दोनोंको खिला दिया। जैसे प्रत्येक मनुष्यको इसीकी चिन्ता होती है कि, किसी प्रकार मैं उभार कर अपने शिष्योंको विद्या तथा सभ्यता सीखने पर प्रस्तुत करूं, इसी प्रकार शैतानने फुसलाकर उन्हें फल खिलाया, जिससे आदमको विद्या हुई, वे वैकुण्ठसे निकाले गये। क्यों कि, वे सर्व पदार्थ मूर्खोंके लिये हैं जबतक मनुष्यमें मूर्खता है तब तक नरक तथा वैकुण्ठमें ही फँसा रहता है, जब जीवको विद्या होती है तब नरक तथा वैकुण्ठके दुःख सुखको मिथ्या तथा क्षणभंगुर जानता है। जब नरक तथा वैकुण्ठको तुच्छ समझकर भजनमें लगता है तब उसके मनसे सभी वासनाएं पृथक् हो जाती हैं, उनके पृथक् होनेसे सर्वज्ञताके योग्य होजाता है। महाप्रलयमें सब जीव निरञ्जनमें समा जाते हैं, ब्रह्मा तथा कीड़े मकोड़े आदि सभी अपने कम्मोंके साथ निर्जीवके समान निरञ्जनमें रहते हैं। उत्पत्तिके समय पूर्वके कम्मोंके अनुसार फिरसे शरीर धारण करते हैं। संसारमें प्रत्येक अपनी भलाई बुराईके अनुसार स्वरूप पाते हुए उसीके अनुसार दुःख सुख भोगते हैं। मनुष्यके बच्चोंके सब रङ्ग ढङ्ग आदममें प्रगट थे। इससे यही परिणाम निकला कि, आदम अनगिनती बार पहले भी जन्म ले चुका था, वही अब आदम हुआ, भविष्यमें भी अनेक बार जन्म धरेगा। यद्यपि आदम खुदाके सामर्थ्यसे उत्पन्न हुआ था तो भी अपने पूर्वजन्मोंके कार्यको प्रगट करता था। यह सम्भव नहीं कि, पवित्र आत्मा जब सशरीर हो तब दुःख सुखके बन्धनमें फँसे। यदि वह आत्मा अपने पूर्वजन्मोंके कम्मोंसे अशुद्ध न होती तो यह अवस्था कदापि न होती, इस कारण जानना चाहिये कि, अनगिनती जन्मोंसे यह जीव बराबर आवागमन करता चला आता है और भविष्यमें भी करता जावेगा। जब तक उसको शुभ और अशुभका सम्बन्ध न टूटे तबतक पिता तथा पुत्रका कर्तव्य है, तहां तक तो खुदाने आदमको सिखलाया परन्तु गुरु बिना ज्ञान नहीं होता, इस कारण अबलीस (शैतान) को भेजा, जिसमें उसके द्वारा ज्ञान पावे। यदि हजरत अबलीसकी दया न होती तो

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हजरत आदम पाशविक अवस्थासे कभी पृथक् न होते । केवल शैतान गुरुकी दयासे आदमको पैगम्बरी मिली, आजतक सब विद्याओंके सीखनेका उद्योग करते हैं । यदि अबलीस गुरु न होता तो सब आदम और सारे आदमजाद निकम्मे होते । अतः उस गुरुको हमें धन्यवाद देना उचित है । जिसने हमको सभी आनन्दोंको दिया और अचेतनासे पृथक् करके परिभ्रम और भजनमें लगा दिया हम विद्या प्राप्त करके कथन करने लगे कि —

बर सरे दारम कुलाहे चरा तर्क ।

तर्क दुनियाँ तर्क उकबा तर्क मौला तर्क तर्क ॥

तात्पर्य—मनुष्य कहता है मैं अपने शिर पर चार तर्क (त्यागोंकी) टोपी धारण करता हूँ । मुझको संसारमें ही खुदाने वैकुण्ठका आनन्द दिया था । जबसे मुझको कर्तव्याकर्तव्यका ज्ञान न हुआ तबसे जिनको छोड़ना यद्यपि कठिन था, ऐसे संसारिक आनन्द परित्याग कर दिये । जब संसारको छोड़ा तब दूसरे लोकको ढँढ़ने लगा, परलोकके सर्व आनन्द प्राप्त हो चुके तब बुद्धि तथा सोचसे परलोक के भी सर्व पदार्थ अस्थाई तथा तुच्छ प्रतीत होने लगे, उनको भी देख भाल कर छोड़ दिया । दो तर्क हो चुकी । फिर मौलाको ढूँढ़ने लगा । मौलाकी खोजमें जब अपना प्राण अर्पण कर चुका खुदामें लीन हो गया तब खुदासे मिला । अब तो बूंद तथा नदीमें कोई विभिन्नताही नहीं रह गई दोनोंही एक हो गये । फिर तो आपही आप रह गया फिर कौन मैं हूँ, जो कुछ संसारमें होता है सो सब कुछ मैं करता हूँ और मैं भोगता हूँ, किसीका तर्क करूँ ? तर्कहीका तर्क हो गया अथवा दूसरा इसका यह भी अर्थ है कि, हे मनुष्य ! तू संसार, स्वर्ग और विज्ञताके अभिमानको छोड़ दे एवं इस अभिमानको भी छोड़ दे कि मैंने सब छोड़ दिया ।

९ तौरीतमें उत्पत्तिका—(२५) बाब (२१ से २६) आयत तक देखो । इसहाकने अपनी स्त्री रबकाके लिये प्रार्थना की कि, उसके पुत्र उत्पन्न हो क्योंकि, वह बाँझ थी । खुदाने उसकी प्रार्थना स्वीकार की, उसकी स्त्री गर्भिणी हुई उसके पेटमेंके दो पुत्र आपसमें लड़ने लगे । तब वह खुदासे पूछने गई कि, यदि यों है तो ऐसा क्यों है ! खुदाने उससे कहा कि, तेरे पेटसे दो बहुत बड़ी जातियां उत्पन्न होंगी बड़ा पुत्र छोटेकी सेवा करेगा ।

समीक्षा—वे दोनों लड़के माताके गर्भसेही लड़ते झगड़ते चले आये । वही वैर दोनोंमें प्रगट हुआ । यदि उनके पूर्व जन्मका वैर उनको ढाँवाडोल न करता तो वे आपसमें क्यों लड़ते ? केवल प्रारब्धिने उनको उसी तराजू पर धरकर तौला । जैसा कि, उनके पूर्वजन्मोंके कर्मोंने इनको गति दी थी पूर्वजन्मके कर्मानुसार इस अवस्थाका स्वरूप प्रगट हुआ इससे आवागमन स्पष्टरूपसे प्रमाणित हो गया ।

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१०-देखो ! (१०४) जंवर (२९ से ३०) आयत पर्यन्त लिखा है कि तू अपना मुँह छिपाता है वे हैरान होते हैं। तू उनका दम फेर लेता है तब वे मर जाते हैं, अपनी मिट्टीमें मिल जाते हैं। तू अपना दम भेजता है तब वे फिर उत्पन्न होते हैं तू पृथिवीको फिरसे सुसज्जित करता है।

तात्पर्य-तू अपना मुँह छिपाता है-आत्मा जो प्रकाशरूप है जब उस पर परदा पड़जाता है तब अन्धकारमें पड़कर वे हैरान होते हैं, सब जीव दुःखित होते हैं कहीं राह नहीं मिलती। तू उनका, दम फेर लेता है उससे वे मर भी जाते हैं तब तू उनके आत्माकी शरीरसे अलग करता है तो वे सब शरीर मर जाते हैं, अपनी मिट्टीमेंसे उत्पन्न होकर फिर मिट्टीमें ही मिल जाते हैं, तू अपना स्वास भेजता है प्रकाशरूप आत्माही अपने स्वासरूप जीवको भेजता है क्योंकि, सब कुछ आत्मासेही हुआ है। पांच तत्त्व तीन गुण तथा चौदह इन्द्री इसीसे हैं, आत्मा जब स्वास भेजता है तब वे जीव पुनः उत्पन्न होते हैं यही आवागमन सदा प्रचलित रहता है।

११-(१२१) जंवरमें (७ से १८) आयत तक देखो। खुदा प्रत्येक कुकर्म से तुझको बचावेगा। खुदा तेरे आनेजानेमें उस समयसे लेकर सर्वदा तेरा रक्षक रहेगा।

तात्पर्य-आने जानेसे तना सुखका तात्पर्य है चिरकालतक आने जानेका तात्पर्य आवागमनके अतिरिक्त दूसरी बात नहीं ठहर सकती। जबकि, मनुष्यके आयुकी सीमा है तो सर्वदा इसका आना जाना तनासुख के अतिरिक्त और कुछ ठहरही नहीं सकता। जिस खुदाकी वन्दना जो कोई करता है वह देवता पूर्वके प्रेमके कारण सर्वदा यथाशक्ति अपने पूजनेवालेकी सहायता किया करता है। जिस योनिमें वह जाता है वहाँही रक्षक होता है।

राजा विपश्चितका उदाहरण-वसिष्ठपुराणमें इस प्रकार एक कहानी लिखी है कि, विपश्चित नामक एक बड़ा राजा था। वह राजा अग्नि देवताकी पूजा किया करता था। एकबार ऐसा हुआ कि, चारों ओरसे उसके बैरी चढ़ आये उनकी सैन्य चारों ओर से उन्हें देखकर घबरायी। आगका एक कुण्ड बनाया और भली भाँति अग्नि प्रज्वलित करके उसमें अपना शिर तथा शरीर पृथक् पृथक् करके डाल दिया। जब उसने अपना शिर और शरीर अग्निदेवताको हवन दिया तो वो दयालु हुआ, उस एक विपश्चितके चार विपश्चित होकर उस अग्निकुण्डमें से बाहर निकल पड़े, वे चारों बड़े बलिष्ठ साहसी तथा प्रतापशाली थे। उनके तेज के सामने किसी बैरीको ठहरनेका साहस नहीं हुआ। जैसे कि, शेरके सामनेसे भेड़ोंका गोल भागता है उसी प्रकार उसके सामने कोई बैरी न ठहरा। वे चारों

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विपश्चित चारों और प्रबल सैन्य लेकर चढ़ गये समुद्र तक बराबर मारते चले गये । चारों और समस्त पृथिवीको आसमुद्र विजय कर लिया कहीं कोई बैरी न छोड़ा । पृथिवी पर तो कोई राजा उनका सामना करने योग्य नहीं रहा । तब चारों के मनमें घमण्ड उत्पन्न हुआ । उन्होंने चाहा कि, हम मायाकी सीमाको तोड़ दें । देखें मायाके पार क्या है ? इच्छा की कि, समुद्रमें गोता मारें । तब राजाके कर्म-चारियोंने मना किया, रोने लगे कि, आप समुद्रमें गोता न मारें । क्योंकि, मायाकी सीमाको कभी कोई पा नहीं सकता । परन्तु उन चारोंने किसीका कहना न मान समुद्रमें गोता लगाया । चारों समुद्रमें गोता मारकर चले तो समुद्री जीवोंने उनको खा लिया । सहस्रों योनिमें वे जन्म लेने लगे, परन्तु जिस योनिमें वे शरीर धरते वहाँही अग्नि देवता इन चारोंका सहायक होता । कितने जन्म धरते धरते अन्त उन चारों विपश्चितमेंसे एक विपश्चित हिरण हो गया । वह हिरण महाराजा रामचन्द्रजीके अजायब घरमें आया । रामचन्द्रके अधीन राजाओंमेंसे एकने उसको पकड़ा सुन्दर देखकर महाराजाको भेंट किया । उस समय वशिष्ठजी, राजा दशरथ रामचन्द्र, भरत और शत्रुहण आदि सब लोग उपस्थित थे । वशिष्ठजी अपनी कथा, सुना रहे थे । उस समय उदाहरणकी भांति राजा विपश्चितका वृत्तान्त आया । वशिष्ठजीने कहा कि, हे रामचन्द्र ! इन चारों विपश्चितमेंसे एक हिरण हो गया है वह इस समय आपके अजायबघरमें बँधा हुआ है । तब रामचन्द्र इत्यादि सब लोगों को इसके देखनेकी उत्सुकता हुई । वशिष्ठजीके चिन्ह देने के अनुसार वह हिरण महल में मँगाया गया । वशिष्ठजीके अपनी बातकी सत्यता प्रगट करनेको अग्नि देवताका ध्यान किया, अग्निदेव आकर अग्निस्तम्भमें सभाके बीच खड़े हो गये । जब वह अग्नि देवता सामने आ खड़ा हुआ तब पूर्व प्रेमने उस हिरणके मनमें ऐसी उत्तेजना प्रगट की कि, वह उछाल मारकर उस आगमें जा पड़ा । जब वह हिरण आगमें जा पड़ा तब उसकी देह पलट गयी और वह असली राजा विपश्चित हो गया अग्निदेवताकी दयासे अपने शिरपर राजसी मुकुट धरे बड़े प्रतापके साथ अग्निसे निकल आया, वशिष्ठ तथा राजा रामचन्द्रको प्रणाम करके सभामें बैठ गया । वशिष्ठजीने उसको उपदेश दिया वह जीवनन्मुक्त होगया । इसी प्रकार जो कोई जिस परमेश्वरको पूजता है वही उसका परमेश्वर है और चिरकालतक वही उसका सहायक रहता है इसमें कोई सन्देह नहीं है ।

अब जानना चाहिये कि, समस्त परमेश्वरोंके पूजन से इतना तो होता है कि, मानुषिक शरीर मिल जाता है । पर जीव आवागमनसे रहित नहीं होता । मनुष्यके शरीरमें आवे सत्यपुरुषकी भक्ति करे तो वास्तवमें आवागमनका सिल-सिला टूटे, नहीं तो पूर्ववत् चला जायगा, दूसरी कोई युक्ति नहीं होगी ।