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कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)

by कबीर साहेब

Source: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (origin)

Devanagarihipublished1,367 pages

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विपश्चित चारों और प्रबल सैन्य लेकर चढ़ गये समुद्र तक बराबर मारते चले गये । चारों और समस्त पृथिवीको आसमुद्र विजय कर लिया कहीं कोई बैरी न छोड़ा । पृथिवी पर तो कोई राजा उनका सामना करने योग्य नहीं रहा । तब चारों के मनमें घमण्ड उत्पन्न हुआ । उन्होंने चाहा कि, हम मायाकी सीमाको तोड़ दें । देखें मायाके पार क्या है ? इच्छा की कि, समुद्रमें गोता मारें । तब राजाके कर्म-चारियोंने मना किया, रोने लगे कि, आप समुद्रमें गोता न मारें । क्योंकि, मायाकी सीमाको कभी कोई पा नहीं सकता । परन्तु उन चारोंने किसीका कहना न मान समुद्रमें गोता लगाया । चारों समुद्रमें गोता मारकर चले तो समुद्री जीवोंने उनको खा लिया । सहस्रों योनिमें वे जन्म लेने लगे, परन्तु जिस योनिमें वे शरीर धरते वहाँही अग्नि देवता इन चारोंका सहायक होता । कितने जन्म धरते धरते अन्त उन चारों विपश्चितमेंसे एक विपश्चित हिरण हो गया । वह हिरण महाराजा रामचन्द्रजीके अजायब घरमें आया । रामचन्द्रके अधीन राजाओंमेंसे एकने उसको पकड़ा सुन्दर देखकर महाराजाको भेंट किया । उस समय वशिष्ठजी, राजा दशरथ रामचन्द्र, भरत और शत्रुहण आदि सब लोग उपस्थित थे । वशिष्ठजी अपनी कथा, सुना रहे थे । उस समय उदाहरणकी भांति राजा विपश्चितका वृत्तान्त आया । वशिष्ठजीने कहा कि, हे रामचन्द्र ! इन चारों विपश्चितमेंसे एक हिरण हो गया है वह इस समय आपके अजायबघरमें बँधा हुआ है । तब रामचन्द्र इत्यादि सब लोगों को इसके देखनेकी उत्सुकता हुई । वशिष्ठजीके चिन्ह देने के अनुसार वह हिरण महल में मँगाया गया । वशिष्ठजीके अपनी बातकी सत्यता प्रगट करनेको अग्नि देवताका ध्यान किया, अग्निदेव आकर अग्निस्तम्भमें सभाके बीच खड़े हो गये । जब वह अग्नि देवता सामने आ खड़ा हुआ तब पूर्व प्रेमने उस हिरणके मनमें ऐसी उत्तेजना प्रगट की कि, वह उछाल मारकर उस आगमें जा पड़ा । जब वह हिरण आगमें जा पड़ा तब उसकी देह पलट गयी और वह असली राजा विपश्चित हो गया अग्निदेवताकी दयासे अपने शिरपर राजसी मुकुट धरे बड़े प्रतापके साथ अग्निसे निकल आया, वशिष्ठ तथा राजा रामचन्द्रको प्रणाम करके सभामें बैठ गया । वशिष्ठजीने उसको उपदेश दिया वह जीवनन्मुक्त होगया । इसी प्रकार जो कोई जिस परमेश्वरको पूजता है वही उसका परमेश्वर है और चिरकालतक वही उसका सहायक रहता है इसमें कोई सन्देह नहीं है ।

अब जानना चाहिये कि, समस्त परमेश्वरोंके पूजन से इतना तो होता है कि, मानुषिक शरीर मिल जाता है । पर जीव आवागमनसे रहित नहीं होता । मनुष्यके शरीरमें आवे सत्यपुरुषकी भक्ति करे तो वास्तवमें आवागमनका सिल-सिला टूटे, नहीं तो पूर्ववत् चला जायगा, दूसरी कोई युक्ति नहीं होगी ।