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कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)

by कबीर साहेब

Source: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (origin)

Devanagarihipublished1,367 pages
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उपदेश दिया जिसे कि कोई २ पुरुष वेद कह कर भी बोलते हैं। जो भवके परितापोसे छूटना चाहते हैं जिन्हें कि, इन्द्रकी वो सुधर्मा सभा जहाँ कि सदा उर्वशी जैसी लोकोत्तर सुन्दरियोंके नाच रंग हुआ करते हैं, कोई अनुराग न पैदा करे किंतु दुःखका ही साधन प्रतीत हो ऐसे पुरुषोंके लिये परा विद्याका उपदेश दिया जिसे कि, स्वसंवेद भी करते हैं। निरंजनके राज्यके अनन्त ब्रह्माण्ड है एक एकमें अनन्त अनन्त लोक हैं प्रत्येक लोकमें अनन्तोंही हैं एक ही यह भूमण्डल सात महा-द्वीपोंमें विभक्त हो रहा है एक ही जम्बूद्वीपमें भीतर एशिया आदि कई महाद्वीप संभाले जा रहे हैं। सृष्टिके पुरुषोंको ज्ञानोपदेश करनेका मार्ग एशियाका भारत वर्ष ही रहा है, सत्य पुरुषके दिव्य सन्देश इसी पुण्यभूमिमें आये एवं यहीसे विश्वके मानव समाजको हितोपदेश मिला है। सृष्टिके आदिमें ऋषि महर्षियोंके द्वारा वेदके दिव्य प्रकाशसे संसार भरको सन्मार्ग दिखाया गया जो कि, महाभारतके समयसे पूर्वतक अक्षुण्ण बना रहा। द्वापरके अन्तमें श्रीकृष्ण द्वापायनने उसे पुनः परिष्कृत कर दिया।

यद्यपि धर्मराज युधिष्ठिरजीके वंशधर उनके सत्यधाम पधारनेपर बीस पीढ़ी तक एक छत्र शासन करते रहे हैं किंतु जनमेजयके शासनके बाद उनका शासन सूत्र ढीला होने लग गया था इस बातकी साक्षी भारतका इतिहास दे रहा है। ऋषि मुनियोंको प्यारी तपोभूमि इस भारत वर्षमें अनेक तरहके मनमाने मत फैल गये थे। मनमाने देवता कल्पित करके उनके नाम पर मनमाने कार्य किये जा रहे थे, मद्यपलोग मद्यके सैकड़ों समुद्रोंको सोख डालनेवाले रौख मद्यप देवताओंकी कल्पना करके गूलरकेसे रंगकी मद्यको बोटलोंपर बोटलें उड़ा रहे थे। निष्कुरुण मांसप्रिय मनुष्योंने मांसका बाजार गरम कर रखा था। परस्त्रीगामियोंने अपनी विचित्र आराधनाके नामपर रजकियों और चाण्डालिनीतकोंको अपनी सिद्धिका साधन प्रसिद्ध किया था।

ऐसे अत्याचारियोंके नम्र अत्याचारोंसे सत्य पुरुषके सच्चे भक्त सताये जा रहे थे, उसकी दिव्य सन्देशमयी परा अपरा दोनों वाणियोंका मूलोच्छेद हो रहा था, उनके प्रेमी पुराने लकीरके फकीर कहकर घृणाके गड़देके नीचे दबाये जा रहे थे, इनकी दर्द भरी आवाज सत्यपुरुषके कान पड़ी उसका हृदय स्वाभाविकी दयासे एकदम द्रवीभूत हुआ। क्योंकि वो सत्यपुरुष असावधान नहीं था सत्य मार्गके खोजनेवालोंको उस समय भी वो अपना मार्ग बता देना चाहता था उसके भेजे हुए पथ प्रवर्तक भी उसका पूरा आचरण करके दिखा देना चाहते थे कि, इस प्रकार चलने पर अब भी सत्यलोक दूर नहीं है। ये सत्य पुरुषके सत्यलोकके आये हुए पक्के तत्त्वके देहवाले उसीके हंस थे, यदि ये केवल उपदेशकाही कार्य रखते तो कलियुगकी कलुषित भावनाओंको अपने ओजस्वी वचनोंसे निःशेष कर डालते। पर पर्वतोंकी कन्दराओंमें प्राचीन वृक्षोंकी खोदरोंमें पवित्र वनों एवम् एकात्मके पुण्य स्थलोंमें सत्यलोकोंके हंसोंके कृत्य कर २ कर दिखा रहे थे।

जिन्होंने इनके लोकोत्तर चरित्रको जान पाया, जिन्होंने उनके जीवन चरित्रोंपर दृष्टि डाल कर उन्हें अपना आदर्श बनाया वे अधिकारी मुक्तिपथको अधिकृत करके इस असारसे बन्धनोंको तिनकेकी तरह तोड़कर साकेत लोक चले गये पर जिन्होंने उन्हें नहीं समझ पाया ऐसे पुरुषोंको उनसे कोई लाभ नहीं पहुँचा। जिन्हें उनसे लाभ पहुँचा ऐसे जीवोंकी संख्या उंगलियोंपर गिनी जा सकती थी।

उस समय उनका इतना अधिक प्रचार नहीं हुआ कि, सर्व साधारण उनसे लाभ उठासकें। यह देख जगदीशने अधिकारी बना २ कर उसीके अनुसार उपदेश देना प्रारंभ किया।

भगवान् बुद्ध देवने महावीर स्वामीको साथ लेकर अहिंसाके उच्च सिद्धान्तके जय घोषसे भूमण्डलको व्याप्त कर दिया। विक्रमार्केन वैदिक विकासको निष्कांटक बना दिया, श्रीशङ्करस्वामीने

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पूर्वमीमांसाआदिकी प्रतिद्वन्द्वितामें उत्तर मीमांसा स्थापित की, श्रीरामानुजाचार्य, निम्बादित्य आदि दिव्य आचार्य पुरुषोंने जीव, ब्रह्म और माया विषयके विज्ञानोंको सर्वसाधारणोंके सामने रखा।

किन्तु महाराजा अशोकके वंशधरोंको निर्बल हो जानेके पीछे भारतका वैदेशिक प्रचार शिथिलप्राय हो गया क्रमशः दूसरे देश भारतके दावेसे निकल गये।

इतिहास एवम् पुरातत्त्वकी खोज तो हमें यह बताती है कि, महाराजा अशोकका इतना बड़ा साम्राज्य था जितना कि अशोकके बादकी कोई भी शक्ति आजतक नहीं बनासकी है न बनानेकी आशाही है। आजकी बौद्धोंकी ६३ करोड़ोंकी संख्या भगवान् बुद्ध देवके सार्वजनीन हितोपदेशके बदलेकीही है इसका निर्माण सच्चे उपदेशके आधार परही हुआ है यह कहीं भी लिखा हुआ नहीं मिलता कि बौद्धोंने कभी भारतसे बाहर विदेशोंमें तलवारके बलपर बौद्ध धर्मका प्रचार किया था जैसा कि इसलामके प्रवर्तकोंने धर्मप्रचारके नामपर असहाय जीवोंका रक्त पानीसे भी सस्ता बहाया है। बौद्ध धर्मका सच्चा सिद्धान्त अहिंसा था जिसका कि प्रचार केवल विश्वके निरीह प्राणियोंको शान्ति देनेके लिये किया गया था। यही भारतके वीरोंकी विशेषता है कि, यहाँके धर्म प्रचार भी सुख शान्ति पूर्वक एवं सुख शान्तिके लिये हुए। उनका यह सिद्धान्त कभी भी नहीं हुआ कि, परमात्माने हम राजाओंको इसलिये पैदा किया है कि, हमारे मजहबके न माननेवालों काफिरोंको कत्ल कर दिया करे एवम् धर्माचार्योंको धर्मप्रचारके लिये भेजा है।

किन्तु उनका तो यही विचार रहा है कि, हमे परमात्माने प्रजाका रंजन करनेके लिये भेजा है कि, उसे किसी तरह भी दुखी न होने दें तथा भारतके धर्माचार्य दिव्य सन्देश सुनानेके लिये आते हैं सत्यपुरुषका सामयिक अनुशासन जनताके सामने रख देनेका उनका कार्य है यह लोगोंकी इच्छापर निर्भर रहा है कि माने वा न माने, न तो इस विषयमें उन्होंने कभी बल-प्रयोगको उत्तम समझा है न कभी ऐसी आज्ञाही दी है।

जब मैं सांप्रदायिकताके संकीर्ण दायरेकी ओर जाता हूँ तो मुझे यह कहनेके लिये अवश्य बाध्य होना पड़ता है कि, संकीर्णता तो किसीकी भी सर्वाशतः सच्ची नहीं कही जा सकती चाहे वो अपने संप्रदायकी हो चाहे दूसरोंकी हो पर पश्चिमके धर्माचार्योंके हृदयमें चाहे कुछ भी हो कुछ एकको छोड़कर अपने सिद्धान्तों के प्रचारमें हिंसाका आश्रय सबने लिया है यही पूर्व और पश्चिमकी विभिन्नता है।

उनका तलवारके बलका धर्म प्रचार उन्हींके देशोंमें नियमित रहा हो यह बात नहीं है किन्तु उनके अनुयायियोंने मानव सत्यताको सिखानेवाले सब धर्मोंके गुरु एवम् आपसकी फूटसे स्वतः विदीर्ण हुए शिथिलेन्द्रिय इस वृद्ध भारतवर्षको भी धर्मके नामपर रक्त रंजित किये बिना नहीं छोड़ा। भारतवर्षकी सीमाके देशोंके बलपूर्वक इसलाममें दीक्षितकर लेनेके पीछे भारतवर्षकी बारी आई, सम्राट पृथ्वीराजके बाद भारतवर्ष मुसलमानोंके ताबे आया।

मुसलमान शासकोंने धर्म के नामपर बड़े २ अत्याचार किये प्रतिदिन बेगुनाहोंका रक्त पानीकी तरह बहाया जाता था हिन्दू धर्म ग्रन्थोंसे पानी गरम हुआ करते थे, हजारों कुलललनाएँ बेश्याओंसे भी बुरी बना २ कर बिठा दी जाती थी विशेष क्या कहा जाय यदि उस कालमें रौरव नरक भी मूर्तिमान् होकर भारतकी दुर्दशा देख लेता तो वह भी इसकी दशापर दो चार आसूँ बहाये बिना न रहता। देशभरमें त्राहि २ मची हुई थी जिनके हाथमें शासन सूत्र था वे अपना विशुद्ध कर्तव्य भुलाकर धर्म देशमें फँसकर पैशाचिक अत्याचार कर रहे थे। अन्तमें निर्दोषोंका खून रंग लाया, सत्य-

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पुरुषका हृदय असहाय दुःखी भारतवासियोंकी कर्षणा से पूर्ण हो गया जले हृदयोंकी उन्हाँने निरंजनके शरीरसे भी अगाडी निकलकर सत्यलोकका द्वार जा खट खटाया।

कबीर साहिबको आज्ञा :—हुई कि, आप पुण्य भूमि भारतमें जाकर दुःखी जीवोंको दुःखसे मुक्त करो सच्चे सामान्य धर्मका उपदेश करो जो सबका एकसा है। हिन्दू मुसलमान दोनोंको उसके प्रकाशसे प्रकाशित कर दो जो कि, वे आपसके कलहको छोड़कर सच्ची शांतिको ग्रहण करलें। सभी कबीर साहेबके विषयमें मुक्त कण्ठसे स्वीकार करते हैं कि, कबीर साहिबका सामान्य धर्मका उपदेश था जो कि, सभी धर्मवालोंको एकसाही हितकारी हैं, उनकी युक्तियाँ भी सर्व धर्म विषयिणी थीं।

कबीर साहिबका प्रागट्य

संवत् १४५५ ज्येष्ठ शु० पूर्णिमा सोमवारके दिन काशीके लहर तालाबमें कबीर साहिबका प्राकट्य हुआ था, महापुरुषोंके जन्मोपर जो २ प्राकृतिक सुषुमाएँ दीखा करती हैं वे इनके जन्मपर भी कम नहीं थीं सभी प्राकृतिक दृश्य सन्त पुरुषोंको विशेषताएँ बताते हुए दीख रहे थे। उस समय जुलाहे नीमा नीरू नामक मुसलमान दम्पती आपको उस तालाबसे उठा लाए एवं पुत्रकी भावनासे ओत प्रोत होकर आपका लालन पालन करने लगे, आपने बाल्यकालमें वे लोकोत्तर चरित्र दिखाये जो कि, महापुरुषोंकी बाल लीलासे स्वाभावसेही चमका करते हैं। बड़े होनेपर तात्कालिक देहलीके बादशाह सिकन्दर लोधीको दिव्य सिद्धियाँ दिखाने एवम् अपने नामसे कमाल कमालीको जिन्दा कर देनेके बाद आप खूब चमके। आपकी सर्व धर्म विषयक युक्तियोंने अच्छा उच्च स्थान पाया जैसे मध्यस्थकी आवश्यकता थी वैसेही हुआ आपने यावत्स्थिति सांप्रदायिक द्वेष मिटानेकी सदा चेष्टा की। आपके सर्व श्रेष्ठ शिष्यश्री धर्मदासजी थे जिनके कि, वंशधर आजकी उनके पन्थकी गुरुआई कर रहे हैं तथा कमाल कमाली आदिके वंशधर भी आपके उपदेशोंका प्रचार कर रहे हैं। आज कबीर साहिबके पन्थके अनेकोंही ग्रन्थ हैं, जिनमेंसे अनेकोंको उच्च कोटिके हिन्दी दार्शनिक साहित्यमें संमाला जा सकता है पर ऐसा कोई भी ग्रन्थ नहीं था जिससे कि, दूसरे संप्रदायोंके आक्षेपसे कबीर पन्थकी रक्षा हो सके।

कबीर पन्थकी इस कमीको इस कबीर मन्शूरने पूरा कर दिया इसके लेखक महात्मा परमानन्दजीने इसे इस प्रोक्तासे लिखा है कि, इससे कबीर दर्शनके सिद्धान्त साङ्गोपाङ्ग पुष्ट बहो जाते हैं।

कबीर मन्शूरके विषय

भी अति उत्तमतासे क्रमपूर्वक समाविष्ट किये गये हैं उनकी क्रमपंक्ति पूर्वके साथ सम्बन्ध रखती हुईही चली है। जिस तरह अन्य सांप्रदायिक ग्रन्थ अपने अपने सिद्धान्तोंके अनुसार सृष्टि रचनासे प्रारम्भ होते हैं उसी तरह इस ग्रन्थमें भी सबसे पहिले अपने ढंगका सृष्टि रचनाका निरूपण किया है, सतयुग त्रेता और द्वापरमें संसारकी आवश्यकताके अनुसार सत्य पुरुषके दिव्य सन्देश देश देशान्तरोंमें सुनाकर कबीर साहिबने सबको सुखी किया यह बात दूसरी अध्यायमें गंनकी गई है। तीसरी अध्यायमें कबीर साहिबके कलियुगके प्रादुर्भाव हैं सबसे पिछले सिकन्दर लोधीके समयके प्राकट्यकी कथा है। व्यक्तिभावसे लेकर श्रीरामानन्दाचार्यजीके शिष्य होने आदिके वृत्तान्त विस्तारपूर्वक लिखे गये हैं। अध्यायों चारसे लेकर १२ तक उनकी दिव्य सिद्धियोंके दिखानेका विशद वर्णन किया है कि, किस प्रकार अपने नामसे मुरदे कमाल कमालीतकोंको पुनः जीवित करके अश्वद्वालुजनोंपर भी अपना पूरा प्रभाव प्रगट कर दिया था। इसके साथही साथ-कबीर पन्थके संस्थापक धर्मदासजीके व्यालीस वंश एवम् कमाल कमाली आदि बारह पन्थोंका

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सामान्य परिचय, कबीर पन्थके धार्मिक नियम उनके भक्त एवम् पीर्वात्य और पाश्चात्य उपास्य देव ऋषि मुनि धर्माचार्य, यज्ञ पुस्तक एवम् उपासना आदिका साथही साथ विशद वर्णन किया है। अध्याय तेरहमें कबीर शब्दके अर्थ उनके विषयमें ऋषीयवरोंके वचन तथा अन्य प्रमाण दिये गये हैं। चौदह और पन्द्रह अध्यायमें कबीर साहबके लोमश आदि प्राचीनतम शिष्य, सत्ययुग त्रेता और द्वापरके हंस एवम् कलियुगके हंसोंका वर्णन विस्तारके साथ करते हुए कबीर पन्थसे भिन्न उन पन्थोंके प्रवर्तक शिष्योंका वर्णन किया है जिनके कि शिष्य आज कबीरसाहबको अपना आद्य आचार्य नहीं मानते। १६ वें अध्यायमें प्रकृतिजय और शरणागतके धर्म आदि अनेक उप-युक्त विषय वर्णित हैं। सत्रहवें अध्यायमें बन्धनके कारण मन कर्म आदिका विचार किया है। अठारहवें अध्यायमें पुनर्जन्मका वर्णन है जो पाश्चात्य अथवा चार किताबोंवाले पुनर्जन्मको आज हिन्दुओंकी तरह नहीं मानते उन्हें उन्हींके ही, धर्म ग्रन्थोंसे समझाया गया है कि, अपने श्रद्धेय ग्रन्थोंको विचार पूर्वक देखो। ये कारण पुनर्जन्म माननेके हैं। उन्नीसवीं अध्यायका जीव वैचित्र्य भी इसीका पोषक है उसमें अनेक तरहके संस्कारी जीवोंको केवल इसी लिये दिखाया है कि, पशु आदि योनियोंमेंसे भी पूर्व जन्मकी कर्त्तृकी फलसे कितना दिव्य ज्ञान दीख रहा है। बीसवें अध्यायमें कबीर साहबके दार्शनिक सिद्धान्तको सूक्ष्म रूपसे प्रतिपादन करनेवाले आदि मंगलको कह कर सार्वधार्मिक युक्तियों और धर्म ग्रन्थोंके प्रमाणोंसे जीवहत्या और मदिरा मांसका निषेध किया गया है तथा सब धर्मोंको बताया है। इक्कीसवीं अध्याय जीवके वर्णनमें ही पूरा हुआ है इसमें जीवके अच्छे बुरे स्वाभाविक उपकरण तथा औचित्य लानेके साधनोंके साथ सत्य-लोककी हंसा देहका भी वर्णन किया है इसके साथ मुक्ति होनेके अनेकों उपाय भी लिखे हैं। बाईसवीं अध्यायमें संसार भरके मजहबोंका विचार है। तेईसवीं अध्यायमें विविधोपदेशके गजल तथा चौबीसवीं अध्यायमें अनेकों विषयोंका प्रश्नोत्तरके रूपमें निर्णय किया है। इस तरह कबीर मन्शुरका यह परिष्कृत अनुवाद चौबीस अध्यायोंमें पूरा होता है। इसमें किसी भी मजहबका उपकारी कोई भी विषय बाकी नहीं रह जाता सभी आजाते हैं। उनके समन्वय करनेके बाद यह कबीर दर्शनको सोपपत्तिक पूरा करता है।

सृष्टि रचना — भी इस दर्शनकी अन्य दर्शनों की तरह भिन्न प्रकारकी ही है, कबीर साहबके हंस सत्य साकेत लोकवासी महाराजा विश्वनाथ सिंहजीदेव रीवां नरेशने आदि मंगलपर टीका की है, उसमें सृष्टि प्रकरण अत्यन्त सावधानीके साथ समझाया है कि, पहिले सत्यलोकवासी सत्यपुरुष भगवान् अकेलेही थे, वहाँके सब निवासी साहबके ही रूपके थे। उनके लोकका प्रकाश चैतन्याकाशमें पड़ रहा था यही समष्टि जीव है। इसपर साहबने दया की इसे शब्दसे चैतन्य करके अपनी ओर खींचनेकी इच्छा की। समष्टिजीवमें सुरति होगई इसके पीछे उसे अनेक होनेकी इच्छा हुई, क्रमशः मन, बुद्धि, चित्त, अहंकार और मैं ब्रह्म हूँ यह अनुभव हुआ। उसीसे जीव भी हो गया। जो इसे सारशब्दका उपदेश दिया गया था उसका इसने परा आद्या शक्ति, अक्षर, नारायण, संकर्षण और महाविष्णु अर्थ समझा—समष्टिजीवमें जो कारण रूपा इच्छा थी जिसने कि, इसे जगतमुख किया है। दूसरी इच्छा परा आद्या शक्ति है इसीको योगमाया भी कहते हैं इन दोनोंने ही अक्षर ब्रह्म किया है पर ये दोनों इच्छाएँ गुप्त हैं इन्हे कोई देख नहीं पाता। अनुभवगम्य ब्रह्म मैं हूँ यह बात समष्टि जीवके श्वाससे ही उत्पन्न होती है। आठों सिद्धियाँ भी उसीसे उत्पन्न हुई हैं।

आद्या शक्तिने संसारको बनाकर खड़ा कर दिया वही इसकी चोटी पर बैठकर इसे प्रकाशित कर रही है, अचिन्त्य रामके प्रेमसे ओम् का प्रादुर्भाव हुआ उसीसे चारों वेद उत्पन्न हो गये योगमायाने अक्षरको नींद दी। उस समय एक अण्ड पानीपर तैरने लगा। नींद बुलने के बाद आप

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उसमें प्रविष्ट हो गया इसी भगवान् के नाभिकमलसे ब्रह्मा उत्पन्न हुआ उसने ब्रह्माण्डकी जड़ बूट डालनेका प्रयत्न किया, नारायणने इसे ओम्का उपदेश दिया उसीसे वेद हुए इनका जगत्मुख अर्थ देखनेपर संसार बन गया। महाविष्णु या निरंजनसे ब्रह्मा विष्णु और महेश हुए। ब्रह्माण्डके प्राणी सुखके लिये प्रयत्न कर रहे हैं। पर सुखके साधनोंको बिना जाने सुख नहीं पा सकते। कबीर साहिब कहते हैं कि, फिर हमें जीवोंके उद्धारके लिये भेजा कि अपने उपदेशसे जीवोंको सुखी करो। यह आदिमंगल बीजकमें दिया हुआ है। हमने इसी ग्रन्थमें इसका अर्थ किया। इसकी तरह और भी इसी पन्थके ग्रन्थ कहते हैं।

दूसरे ग्रन्थों की—सृष्टि भी इससे ही मिलती जुलती हैं वे सत्य पुरुष से सहज, अंकुर, इच्छा, सोहम् अचिन्त्य और अक्षर पुत्र को प्रकट हुआ कहते हैं तथा आद्या भी इसी से हुई। सत्यपुरुष का छठा पुत्र अक्षर जब जलीय स्थलमें बैठता था उस समय योगमाया से उसे नींद आ गई। उस समय अक्षरके ध्यान एवम् सत्य पुरुष के शब्द से एक अण्ड बनकर पानी पर तैरने लगा। उसी से निरंजन की उत्पत्ति हुई।

अण्डसे निरंजन हुआ इस विषयमें तो श्रीविश्वनाथजीका मत भेद नहीं है किन्तु वे अक्षर को ही अण्डमें प्रविष्ट हुआ मानते हैं, इसने सत्य पुरुषके पुत्र कूर्मजीसे सृष्टि रचनाका सामान लिया। आद्या और इसकी जोट होगई इससे ही त्रिगुण ब्रह्मा विष्णु और महेश उत्पन्न हुए। आद्याने अपने अंशसे सुकुमारियां उत्पन्न कीं, जो कि, इन तीनोंकी पत्नियां बनी हैं। अक्षर पुरुषने वेद दिये निरंजनने पाये उससे ब्रह्माको दिये इसने इनका यथेष्ट प्रचार किया, वाकी सब रचना अन्य दर्शनों जैसीही है। इसी अध्यायके पन्चीसवें प्रकरणमें वेदके प्राकट्यको अन्य दार्शनिकोंके साथ मिलाया है तथा निरंजनको अग्निरूप सिद्ध किया है। दूसरे लोग तो सिकन्दर लोधीके समयमेंही कबीर साहिबका प्रादुर्भाव मानते हैं पर कबीर पन्थका ऐसा मन्तव्य नहीं है। वे कबीर साहिब तथा साहिबमें अभेद देखते हुए युग २ में कबीर साहिबका विभिन्न नामोंसे होना स्वीकार करते हैं एवम् सिकन्दर लोधी के समय के प्राकट्य को सबसे बाद का स्वीकार करते हैं।

जन्मके—विषयमें भक्तमालने तो कुछ लिखाही नहीं है। दूसरे २ उनके पन्थके ग्रन्थोंमें बहुत कुछ लिखा हुआ है उसमें बीजककी विश्वनाथी टीकाका मत भेद है। वे रामानन्दजी महाराजके दिव्य आशीर्वादसे एक सुपात्र विधवा ब्राह्मणीके गर्भसे प्रगट हुए बताते हैं पर काशीके लहर तालाबके किनारे नीमा नीरूको मिले। इस बातमें किसीका मतभेद नहीं है।

शेखतकीके कहनेसे सिकन्दरने आपके मारनेके अनेकों प्रयत्न किये पर किसी तरह भी उनके प्राण न लेसका वरन उनके अलौकिक चमत्कार देखकर धर्मन्धतासे निवृत्त होगया। इनके सामान्य धर्मके उपदेश तथा दोनोंकी समताके दिखानेसे सहृदयताका बीज बोया गया। इस बातमें किसीका भी मतभेद नहीं है। इस कबीर मन्थूरने इस बातको और भी आगे बढ़ाया है इसने वेदोंकी तरह हा मूसाको तोरत, दाऊदको जबूर, ईसाको इजील तथा मुहम्मद साहिबको कुरानका देना कहा है एवम् इनके ढंगकी सृष्टिकी उत्पत्ति भी दिखाई है। इतना ही नहीं किन्तु यह भी सिद्ध किया है कि, नाम भेद भले हों पर गुण कर्मके मिलापसे इस बातका पूरा निश्चय हो जाता है कि पौर्वात्य और पाश्चात्य दोनोंही एक विष्णुकीही उपासना करते हैं।

बलि दान में भी — सबका एक मत दिखाया है वेद और तोरत आदिमें उनके धर्मका आधार दिखाकर सर्व देशी सिद्धान्तसे इनका निःशेषही दिखाया है साथही कबीरजीका भी मत दिखा दिया है। सबके मत मतान्तरोंसे यह सिद्ध करके दिखा दिया है कि बलि और कूर्मानीकी आज्ञा असली परमात्माकी तरफसे नहीं है किन्तु भावनाके बनाये हुए ईश्वरकी ओरसे हैं यह अच्छी तरहसे समझा दिया है।

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मुख्य उद्देश— तो यह था कि, हिन्दू मुसलमान आदि आपसके भेद भावोंको छोड़कर एक होजाय, एक दूसरेके धार्मिक भावोंका आदर करे व्यर्थ के पाषण्डसे निवृत्त होकर सच्चे धर्म ग्रहण करें एक दूसरेके वास्तविक तत्त्वको देखें मुख्यतः वे जीवहत्यासे बड़े दुखी थे यही कारण है उनके मुहसे ऐसे शब्द निकल जाते थे कि—“उनकी बहिष्कृत कहाँसे होइहै सांझहि मुरगी मारे” कि, जो दिन भर रोजा आदि रखकर रातको मुरगी मारते हैं उनकी बहिष्कृत कहाँसे हो सकेगी, इसी तरह देवी आदिके नामपर बलि करनेवाले हिन्दुओंसे कहा है कि—“सन्तो पांडे निपुण कसाई” है महात्माओं ! यह पांडे तो चतुर कसाई दीख रहा है। इस एकताको इस ग्रन्थने और भी आगे बढ़ाया है जो बातें आजतक विशेष समन्वयके साथ नहीं कही गई थी इसने वे भी दिखायी हैं।

आजतक किसी भी कबीर पन्थी ग्रन्थने इतनी सत्यता नहीं दिखाई थी, जो कि इसने दिखाई है। कलमेंका अर्थ करती बार बताया है कि, जब उस परमात्माको कृपालु और दयालु कहा जाता है तो फिर जीवहत्याकी उसकी आज्ञा नहीं हो सकती। इसी बातका हिन्दुओंकी ओर भी इशारा किया है कि जीववध मनोवृत्ति या वृणित स्वार्थोंसे है ईश्वरार्थ नहीं। इसी विषय पर पश्चिमकी चारों पुस्तकोंके मत दिखाये हैं तथा कुरानमें गौहत्याकी आज्ञाका अभाव दिखाते हुए गऊके शापसे याकूबकी दुर्दशाका वर्णन किया है।

मूर्तिपूजा— भी श्रद्धा विश्वासकी महत्ता समझाते हुए दिखाई है कि, भक्त मीराबाई भगवान् कृष्णको भोग लगाकर विषभी पीगई थी पर उसका उसपर कुछ असर न हुआ। इस विषयमें और भी कई प्रभावोत्पादक उदाहरण दिये हैं। इसी तरह अरबकी भी १ लात, २ मनात और गुरी नामक तीन कुर्शजातिकी प्रतिष्ठित देवियोंका उदाहरण दिया है कि, मुहम्मद साहिबने जब इनको तोड़ा तो मन्दिरमेंसे काली २ मूर्तियाँ स्त्रियोंका रूप धारण कर रोती हुई बाहिर निकलीं, इससे सिद्ध होता है कि, मुहम्मद साहिबके पूर्वज भी मूर्तिपूजा किया करते थे, मूर्तियाँ देखनेको ही जड़ती दीखती हैं वास्तवमें नहीं हैं, नहीं तो अरबकी देवीकी मूर्तियाँ स्त्री होकर रोती हुई क्यों निकलतीं। यही नहीं किन्तु इस ग्रन्थने उन आयतोंका उल्लेख भी कर डाला है जिनसे कि मूर्तिपूजा सिद्ध होती है इस प्रकार इसने इस विषयमें भी पूर्वात्य और पाश्चात्यों तथा हिन्दू और मुसलमानोंका एकसा मन्तव्य दिखाया है इस तरह यह पुस्तक कबीर पन्थी हिन्दू तथा मुसलमान सबके लिये समानही हितकारी है।

**जड़ोंकी बातचीत—**के पौराणिक प्रकरणोंको देखकर लोग उनकी सत्यताके सन्देहमें डूबा करते थे ऐसेही लोगोंके लिये कबीर मन्शूरने पश्चिमकी चारों किताबोंमें भी ऐसी ही बातें दिखाई है कि, आदमके पुतला बनानेके लिये मिट्टीलेती बार भूमि रोई कि मनुष्य बनकर बड़े पाप करेंगे तथा मुझपर बड़े पाप होंगे। वह जड़ भूमिका रोना पुरानोंकी तरह इसलामी पुस्तकोंमें भी देखा जाता है इसी तरह प्यालोंका आशीर्वाद भी है।

कबीर साहिबने अपने समयमें यह आवाज उठाई थी कि सबका परमात्मा एक है उनके बीजकमें एक शब्द है कि, “दो जगदीश कहाँसे आयें” दो ईश्वर कहाँसे आगये ? वो सबके लिये एक है। कबीर मन्शूरने कितनी ही जगह विस्तारके साथ सिद्ध किया है कि परमात्माको मानने वालोंका परमात्मा एक है उसके यहाँ हिन्दू मुसलमान आदिका भेद भाव नहीं है सभी उसके पुत्र हैं उसकी दृष्टिमें उसकी किसी भी सन्तानको सतानेवाला अच्छा नहीं है।

हिंसा और मछमांसके निषेध— पर चार वेद और बड़े २ सकल ऋषि महर्षि आचार्य और कबीर साहिबका मत उद्भूत किया है कि ये सब इन कर्मोंको कुकर्म तथा नरक देनेवाले मानते हैं ये सर्वतः हेय नारकीय कर्म किसी भी मतमें ग्राह्य नहीं है यहाँ तक कि ४० दिनके

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बाद इनका सेवन करनेवाला मुसलमान भी काफिर होजाता है। यह कुरान आदिसे सिद्ध कर दिया है एवम् हत्याका बराबर बदला देना पड़ेगा यह मजहबी ग्रन्थोंसे सिद्धकर दिया है।

पुनर्जन्म और जीवोंके प्रकरणोंमें अनेकोंही आश्चर्य भरी बात आई हैं कि, जौनपुरके ताखा ग्राममें एक कायस्थके घर साँप बाबा घासीरामका जन्म हुआ एवम् आजीवन वे घरमें मनुष्योंकी तरह सर्प होकर ही रहे तथा उनके भाई तथा भाईके बेटोंने उन्हें अपना बड़ा माना और उनके अन्त्यष्टि संस्कार मनुष्योंकेसे हुए। पूर्वके संस्कारी अनेक पशुओंमें भी मानुषी भाषा तथा विचित्र ज्ञान होता है इस बातको अनेकों उदाहरणोंसे पुष्ट किया है।

यही क्यों? प्रत्येक विषयमें मनुष्य और ज्ञानवान् संस्कारी पशुओंकी भी समतासी ही दर्शा दी है जिनके ध्यान पूर्वक देखनेसे हृदयमें यह बात अच्छी तरह आजाती है कि, मनुष्य मनुष्यही एक जैसे नहीं पशु और मनुष्य भी एक जैसे हैं केवल अज्ञानके आवरणनेही उन्हें पशु बना रखा है वास्तवमें आत्मा एक है। उसने कहीं पशुका एवम् कहीं नरका चोला पहिन रखा है सबमें सत्य पुरुषका भजन हो सकता है जिन्हें बोध हैं वे सब अपनी २ भाषामें उसी मालिकका नाम जपा करते हैं।

प्रत्येक विषयके भावोंके आधार पर जगह २ ललित गजल आदि दे रखे हैं जिनसे वो विषय शीघ्रही हृदयगम हो जाता है इसके साथही साथ किसी शास्त्र वेद या पश्चिमकी पुस्तकको नहीं छोड़ा है जिनका कि कबीर पन्थी ग्रन्थोंके विषयोंके साथ मुकाबिला न किया हो। स्थल २ पर योग-सांख्य न्याय वैशेषिक और वेदान्त, कुरान बाइबिल जवूर और तोरैत आदिके प्रमाण दिये हैं जिनसे सबका समन्वय सहजही में हो जाता है। मार्मिक विषयोंका विवेचन कठिन होता हुआ भी लेखन शैलीसे इतना सरल बन गया है कि कोई भी समझ ले इतने पर भी विषयानुकूल किस्सों कहानियोंकी रोचकताने सोनेमें सुगन्धि करदी है।

पन्थ — अनेक हैं उनमें नारायणदासजी, यागीदासजी, सूरतगोपालजी, टकसारी, भगवान् दासजी, सत्यनामी, कमाली, राम कबीर, प्रेम धाम जीवा और गरीबदास इन बारहोंके बारहों पन्थ कबीर पन्थके अब भी अन्तर्गतही हैं आपसकी कसम कसीमें कहीं इनकी प्रशंसा तथा कहीं कुछ और ही लिखा है। नानक साहजी, दादुरामजी, शिवनारायणजी, पापदासजी, राधास्वामी तथा घीसाजीके पन्थोंको कबीर पन्थसे निकला हुआ माना है एवम् सिक्ख ग्रन्थके संस्थापक श्रीनानक देवजीको कबीर साहिबका शिष्य सिद्ध करनेके लिये अनेकोंही प्रमाण दिये हैं। राधास्वामी मतको भी कबीर साहिबके ग्रन्थोंपर अवलंबितही सिद्ध किया है तथा यह भी इसके साथ कहा है कि इन पंथोंके शिष्य आज साहिबको महापुरुष मानते हुए भी अपने पंथके आचार्योंको उनका शिष्य नहीं मानते।

स्वामी रामानन्दीजी साहिबके उन्हीं हंसोंमें थे जो कि युगारंभसे सत्य चर्या चलकर दिखा रहे थे अपने अनेकोंही व्यक्तियोंको सत्य पुरुषकी भक्तिका उपदेश दिया उन सबमें कबीर साहिबके मतका सबसे अधिक प्रचार हुआ। इसका एक यही कारण था कि ये स्वयम् उसी चर्यापर चलते हुए समान धर्मोंका उपदेश देते थे।

स्वामीजी अनन्य वैष्णव थे। साहिब स्वयम् वैष्णवोंके वानेमें रहा करते थे। कबीर मन्थूरमें स्वामीपरमानन्दीजीने इसे सतोषुणी एवम् मोक्षका दाता कहा है।

जन्म स्थान—का कहीं भी खुला उल्लेख नहीं किया है फिर भी स्वाभीजीके जन्म स्थान तथा रहन सहनपर यथेष्ट प्रकाश पड़ता है स्वामी परमानन्दीजीने बाबा घासीरामजीके विवरणमें लिखा है कि, जौनपुरसे बारह कोश तथा मेरी जन्मभूमिसे पाँच कोश ताखा नामका गाम

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है एवम् बाजीगरके विवरणमें लिखा है कि, मैं मेरे जन्म स्थान आजमगढ़में था वह मेरे विद्यो-पार्जनका समय था। जौनपुर और आजमगढ़ ये दो अवधके भिन्न २ जिले हैं जौनपुरसे १२ तथा अपनेसे पाँच कोश कहनेसे इनका जन्म स्थान इन दोनोंके बीच ताखा ग्रामसे पाँचकोशकी दूरीपर सिद्ध होता है। अवधवाला अवधको भी अपनी जन्म भूमि कह सकता है। इनकी शिक्षा आजमगढ़में हुई थी। सहपाठीके तहसीलदार होनेसे इनकी भी अंग्रेजीकी उच्च कोटिकी शिक्षा प्रतीत होती है। मोरके प्रकरणको देखकर इनकी एकात्म प्रियता तथा अनेक जगहोंके हाल लिखनेसे विदित होता है कि, इन्होंने खूब पर्यटन किया था तथा सेवके गायब होनेकी बातसे पता चलता है कि, धोखेसे उन्हें कबीर साहिबने दर्शन और फल भी दिया था। फीरोजपुरमें साधु होनेके पीछे आ विराजे इतनी बातका उनके ग्रन्थसे पता चल जाता है।

इनके दिलमें पन्थका सन्धा प्रेम था यही कारण है कि, इनका संग्रह संप्रदायके समर्थनसे सब तरह पुष्ट था। इन्होंने किसी भी धर्माचारोकी स्वतः विवेचना नहीं की है किन्तु दोनों तरहकी आलोचनाओंका संग्रहकर दिया है। इन्होंने सब धर्मोंके तत्त्वोंमें शरणागतिकोही मुख्य बताया है तथा अखिल धर्मोंके व्यक्तियोंको इसीको अपना लेनेका उपदेश दिया है। यद्यपि इन्हें खण्डनकी ओर विशेष प्रेम नहीं था पर विचार स्वातंत्र्यमें इन्हें किसी बातके कहनेमें कोई भयभी प्रतीत नहीं हुआ है, यदि सिद्धान्तकी दृष्टिसे देखा जाय तो।

खण्डन—भी उसी तरह प्रयोजनीय है जैसे कि, मण्डन है। सत् सिद्धान्तका प्रतिपादन बिना असत्यके खण्डन किये नहीं हो सकता। इसकी दो युक्तियाँ हैं। एक तो यह है कि, सबके ऐसे सत् सिद्धान्तोंको संमेलन पूर्वक सबके सामने रखना जिससे उसके प्रतिहन्दी असत् सिद्धान्त आपही खण्डित हो जायें। दूसरी रीति स्वयम् मुखसे कह कर करनेकी है जैसा की, आज कलके व्यक्ति प्रयोगमें लाते हैं। इस ग्रन्थमें दोनोंही शैलियोंका प्रयोग किया है। पूर्वीय और पश्चिमीय माने हुए सिद्धान्तोंको उन्हींके धर्म ग्रन्थों से खण्डित किया गया है तथा सत् सिद्धान्तोंके कबीर साहिबके वचनोंके साथ सबके सामने रखा है।

इस कार्यमें कहीं २ ग्रन्थ लेखकने जहाँ दूसरेके किये खण्डन जैसेके जैसे उद्भूत किये हैं वे उस लेखकोंके विमर्शीविमर्शोंको लेकरही आये हैं अतः उनके अविमर्शके कार्यों इस ग्रन्थमें भी वैसेही रह गये थे जो कि इसकी सार्वजनीकतामें कुछ दूसराही रूप करते थे। अनुवादकी दृष्टिमें जहाँ ऐसी बातें आई हैं उनसे ग्रन्थको जितना भी हो सका है निर्मुक्त करनेकी चेष्टा की है तथा विषम विषयोंपर टिप्पणी देकर जितनाभी हो सका है इसे सरल बनानेका भी प्रयत्न है।

प्रमाण तो—इस ग्रन्थमें प्रायः सभी सम्प्रदायोंके धर्म ग्रन्थोंके आये हैं जिनके कि नाम हम यहीं दिखाते हैं—चारों वेद छःओं दर्शन, मुण्डकोपनिषद्, माण्डूक, भारत, गीता, मनुआदिक स्मृतियाँ, श्रीमद्भागवत, देवी भागवत, कालिका पुराण, वसिष्ठ पुराण, शिवतंत्र और योग साधनाके ग्रन्थ इत्यादिकोंके तो हिन्दू धर्मशास्त्रोंके प्रमाण आये हैं। ईसाकी इजील, मूसाकी तोरैत, दाऊदकी जबूर तथा मुहम्मद साबहकी कुरानके भी अनेकों प्रमाण आये हैं इसके सिवा नबियोंकी पुस्तक तथा और भी कई इस्लामकी पुस्तकोंका उद्धरण दिया है। इसके सिवा सेखशादी आदि और भी अनेकों महत्त्वपूर्णोंके वचन उद्भूत किये हैं।

कबीर पन्थके ग्रन्थ—बीजक कबीर कसोटी, अनुराग सागर, अम्बुसागर, ज्ञान सागर, कमाल बोध, कबीर चरित्र बोध, श्वास गुंजार, कबीरवानी, कर्मबोध, जैनधर्म बोध, जीवधर्मबोध, अमर-सिंह बोध, वीरसिंहबोध, जगजीवन बोध, गरुडबोध, -हनुमान बोध, मुहम्मद बोध, सुलतानबोध

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निरंजनबोध, आगम निगम बोध, ज्ञानप्रकाश, सन्तोष बोध, ज्ञानबोध आदि सभी कबीर पन्थके ग्रन्थोंके प्रमाण आये हैं तथा इनके सारासारकी विवेचना भी की गई है। इन्हीं ग्रन्थोंके आधार-पर वीरसिंह बबेले आदि अनन्य शिष्योंके भी जीवन लिखे हैं। तारीख आईनानुमा, इंडियन इम्पायर, नानक साहिबकी जन्म साखी, सारवचन, सैर आलम् फिजा, एवम् और भी कई एक इतिहास और जीवों संबंधी पाश्चात्य विद्वानोंकी पुस्तकोंका संग्रह है। इसके अनुवाद तथा संशोधन एवम् परिष्कारके समय और भी बहुतसे ग्रन्थोंकी अवश्यकता पड़ी थी। यह ग्रन्थ पौने दो साल पहले छपना शुरू हुआ था। कितनेही दिनोंतक अनवरत परिश्रम करनेपर प्रकाशित हुआ है। इसका सारा श्रेय विश्व विख्यात श्रीवेंकटेश्वर प्रेसके सत्त्वाधिकारी एवम् खेमराज श्रीकृष्णदास नामके प्रसिद्ध फर्मके मालिक सनातन धर्म भूषण राय साहेब श्रीरंगनाथजी श्रीनिवासजी को ही है जिनकी प्रेरणासे इसका प्रकाशन हुआ। यही क्यों? आपने बहुतसा धन व्यय करके कबीर पन्थके बड़े २ ग्रन्थोंका संग्रह कर संशुद्ध कराकर प्रकाशित किया है।

इस ग्रन्थमें जिन कबीर पन्थी ग्रन्थोंका प्रमाण दिया गया है वे सब श्रीवेंकटेश्वर प्रेसमें प्रकाशित हैं। उनके सिवा और भी अनेकों ग्रंथ इस प्रेससे प्रकाशित हैं। यदि थोड़े शब्दोंमें कहें तो यह कह सकते कि, सनातन धर्मके ग्रन्थोंकी तरह कबीर पन्थके सांप्रदायिक सभी ग्रन्थोंके सौभाग्य प्राप्त करनेका श्रेय भी कबीर साहिबने आपको ही सौंपा है। इस पन्थका कोई भी ऐसा प्राचीन प्रतिष्ठित ग्रन्थ नहीं है जिसको कि खोज करके आपने प्रकाशित न किया हो। प्रायः सभी आपकी प्रेरणासे श्रीवेंकटेश्वर प्रेससे प्रकाशित हुए हैं। इस ग्रन्थ पर कबीर पन्थका अविचल अनुराग देखकर आपने “कबीराश्रमाचार्य परमार्थी वैद्य भारत पथिक स्वामी श्री युगलानन्द विहारीजी” से परिष्कृत हिन्दी अनुवाद कराकर प्रकाशित करना चाह्ता पर स्वामी पन्थकी अन्य सेवाओंमें व्यग्र रहनेके कारण दोसी बहत्तर पूछ तकही संपादन कर सके। इसके बाद मुझे प्रेरणा हुई। यह उक्त श्रीमानोंकी प्रेरणाकाही फल है जो इस ग्रन्थको इस रूपमें जनताके सामने रख रहा हूँ।

जब मैं सन्त महात्मा सत्य पुरुष पुरुषोत्तमके सच्चे प्यारे महाभागवतोंकी दिव्य तात्पर्य-मयी भव्यवाणियोंकी ओर ध्यान देता हूँ तो अपने अन्दर उनके जाननेकी कोई भी विशेषता नहीं पाता। यह उन्हींका दिया उत्साह एवम् उन्हींसे प्राप्त हुई धारणाका फल है जो उनके वचनोंपर विशेष विचार करता हुआ उनकेही अनुसार यह कर सका हूँ इसमें मेरी स्वयम् अपने आपकी कोई भी विशेषता नहीं है।

मानव जन्म गलतियोंके कारण है मनुष्यका हृदय गलतियोंसे भरा पड़ा है। जीवके सब साधन दोषसे ग्रसे हुए हैं। फिर इसके कामही निर्दोष हों यह आशा कभी नहीं की जा सकती पर एक निःपक्षपातिनी शुद्ध सनातनी, कबीर साहिब पर हुई श्रद्धाकी कृति समझ दोषोंको क्षमा करते हुए इसके सार पदार्थका ग्रहण करेंगे यही कबीर पन्थी भारतके सभी सांप्रदायी लोगोंसे सतत अभिलाषा करता हूँ।

आपका विनीत;
सर्वतन्त्र स्वतंत्र रिचर्स स्कालर,
पं. माधवाचार्य.

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कबीरमन्शूर - विषयानुक्रमणिका

<!-- image: ★ --> <table border="1" style="width: 100%; border-collapse: collapse;"> <thead> <tr> <th style="text-align: center;">विषय.</th> <th style="text-align: center;">पृष्ठ.</th> <th style="text-align: center;">विषय.</th> <th style="text-align: center;">पृष्ठ.</th> </tr> </thead> <tbody> <tr> <td>प्रारंभिक उपोद्घात</td> <td style="text-align: center;">३१</td> <td>चार गुरुओंका वर्णन, स्वसंवेदका वर्णन</td> <td style="text-align: center;">६०</td> </tr> <tr> <td>ग्रन्थकर्ताकी विज्ञप्ति</td> <td style="text-align: center;">३२</td> <td>वेद रक्षक, वेद व्यास</td> <td style="text-align: center;">६१</td> </tr> <tr> <td>स्वामी परमानन्दजीकी रचना</td> <td style="text-align: center;">३२</td> <td>कबीर साहबकी चार वाणी और चारों</td> <td></td> </tr> <tr> <td>कबीर मानु प्रकाशकी रचनाका समय</td> <td style="text-align: center;">३२</td> <td>वेदोंका वर्णन</td> <td style="text-align: center;">६२</td> </tr> <tr> <td>कबीर मन्शूर (छोटा)</td> <td style="text-align: center;">३३</td> <td>चार ज्ञान, वेदके विषयमें, कुण्डलिनी</td> <td style="text-align: center;">६२</td> </tr> <tr> <td>तालीम कबीर कलियुग</td> <td style="text-align: center;">३४</td> <td>वेद तब और अब</td> <td style="text-align: center;">६४</td> </tr> <tr> <td>बड़ा कबीर मन्शूर</td> <td style="text-align: center;">३५</td> <td>वेद मंत्रोंकी शक्तिका वर्णन</td> <td style="text-align: center;">६६</td> </tr> <tr> <td>तारीख खातमा</td> <td style="text-align: center;">३८</td> <td>वेद मंत्रकी शक्तिपर दृष्टान्त</td> <td style="text-align: center;">६६</td> </tr> <tr> <td>मंगलाचरण</td> <td style="text-align: center;">४१</td> <td>वेदकी श्रेष्ठतामें दूसरा दृष्टान्त</td> <td style="text-align: center;">६७</td> </tr> <tr> <td>प्रथमावृत्तिका मंगलाचरण</td> <td style="text-align: center;">४५</td> <td>स्वसंवेदकी शुद्धता</td> <td style="text-align: center;">६८</td> </tr> <tr> <td>१ अध्याय, सृष्टि रचना</td> <td style="text-align: center;">४६</td> <td>संसारके सब धर्मोंका मूल वेद</td> <td style="text-align: center;">"</td> </tr> <tr> <td>सत्यपुरुषका वर्णन</td> <td style="text-align: center;">"</td> <td>अनुवादकका भ्रमविमोचनी विवेचन</td> <td style="text-align: center;">६९</td> </tr> <tr> <td>सत्यपुरुषके प्रतिनिधि</td> <td style="text-align: center;">४७</td> <td>श्रीमद्भगवद्गीता अ. ३ श्लो. ४५ विवेचन</td> <td style="text-align: center;">७२</td> </tr> <tr> <td>स्वसंवेदके प्राकट्यका वृत्तान्त</td> <td style="text-align: center;">४८</td> <td>दूसरी व्याख्या</td> <td style="text-align: center;">७६</td> </tr> <tr> <td>ब्रह्मसृष्टिका वर्णन</td> <td style="text-align: center;">४९</td> <td>लोकमान्य तिलक</td> <td style="text-align: center;">७६</td> </tr> <tr> <td>कालपुरुषके प्राकट्यका वर्णन</td> <td style="text-align: center;">४९</td> <td>वेदके प्राकट्यपर मतभेद</td> <td style="text-align: center;">७८</td> </tr> <tr> <td>कालपुरुषके तप करके तीनों लोकोंके</td> <td></td> <td>ब्रह्मासे ऋषिमुनियोंकी श्रेष्ठता</td> <td style="text-align: center;">८०</td> </tr> <tr> <td>राज्य पानेका वर्णन</td> <td style="text-align: center;">५१</td> <td>वेद और किताबोंके मूलका वर्णन</td> <td style="text-align: center;">८१</td> </tr> <tr> <td>निरंजनका कूर्मके पास जाकर तीनों लोकोंकी</td> <td></td> <td>वेदोंकी आज्ञा माननीय है</td> <td style="text-align: center;">८२</td> </tr> <tr> <td>रचना सामग्रीके मांगनेका विवरण</td> <td style="text-align: center;">५२</td> <td>समुद्र मंथन वृत्तान्त</td> <td style="text-align: center;">८२</td> </tr> <tr> <td>कूर्मजीका सत्पुरुषके पास फरिहाद करना</td> <td></td> <td>ब्रह्माका वेद पाठ और पिताकी जिज्ञासा</td> <td style="text-align: center;">८३</td> </tr> <tr> <td>और निरंजनको दण्ड मिलना</td> <td style="text-align: center;">५३</td> <td>गायत्रीका प्रकट होना</td> <td style="text-align: center;">८४</td> </tr> <tr> <td>निरंजनका पुनः तपस्याकर बीज खेत मांगना</td> <td style="text-align: center;">५४</td> <td>पुष्पावतीकी उत्पत्ति और ब्रह्माकी वापसी</td> <td style="text-align: center;">८४</td> </tr> <tr> <td>बीज खेत अर्थात् आदि भवानीका</td> <td></td> <td>ब्रह्मा गायत्री और पुष्पावतीकी कथा</td> <td style="text-align: center;">८५</td> </tr> <tr> <td>उत्पत्तिका वर्णन</td> <td style="text-align: center;">"</td> <td>निरंजनका आद्याको शाप देना</td> <td style="text-align: center;">८७</td> </tr> <tr> <td>आद्यानिरंजनका वर्णन</td> <td style="text-align: center;">५५</td> <td>विष्णुका पिताके दर्शन राज्य पाना आदि</td> <td style="text-align: center;">"</td> </tr> <tr> <td>तीनों देवोंके प्राकट्यका वर्णन</td> <td style="text-align: center;">५६</td> <td>विष्णुको पिताका दर्शन होना</td> <td style="text-align: center;">८८</td> </tr> <tr> <td>चारों वेदोंके प्रागट्यका वर्णन</td> <td style="text-align: center;">५७</td> <td>शिवका शाप और वर पाना</td> <td style="text-align: center;">८९</td> </tr> <tr> <td>वेदकी उत्पत्ति प्रथम अक्षर पुरुषसे</td> <td style="text-align: center;">५७</td> <td>कर्मका बदला</td> <td style="text-align: center;">९०</td> </tr> <tr> <td>वेदके प्रचारक ब्रह्मा</td> <td style="text-align: center;">५८</td> <td>विष्णुका ब्रह्माको आश्रय देना</td> <td style="text-align: center;">"</td> </tr> <tr> <td>अथर्वण वेद मंडूक उपनिषदकी कथा</td> <td style="text-align: center;">५८</td> <td>माया सृष्टिकी उत्पत्तिका वृत्तान्त</td> <td style="text-align: center;">९१</td> </tr> <tr> <td>वेदके साथ क्रोड मंत्र, वेदोंका सार</td> <td style="text-align: center;">५९</td> <td>माया सृष्टिका विवरण</td> <td style="text-align: center;">"</td> </tr> </tbody> </table>
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<table border="1"> <thead> <tr> <th>विषय.</th> <th>पृष्ठ.</th> <th>विषय.</th> <th>पृष्ठ.</th> </tr> </thead> <tbody> <tr> <td>वंकुण्डकावृत्तान्त</td> <td>९२</td> <td>वैष्णव धर्मकी श्रेष्ठता</td> <td>"</td> </tr> <tr> <td>बहापुरी कौलास और अमरावती अदन</td> <td></td> <td>शांकरी संप्रदायका वृत्तान्त</td> <td>११३</td> </tr> <tr> <td>आदिका वृत्तान्त</td> <td>९३</td> <td>शांकरी संप्रदायसे मिलते और पन्थ</td> <td>११४</td> </tr> <tr> <td>अदन क्या है</td> <td>"</td> <td>भवसागर</td> <td>११५</td> </tr> <tr> <td>निरंजनने सत्य लोककी नकलपर अपने</td> <td></td> <td>बन्धन</td> <td>"</td> </tr> <tr> <td>लोक बनाये</td> <td>९४</td> <td>प्रथम भागके प्रथम अध्यायका उपसंहार</td> <td>११६</td> </tr> <tr> <td>तीनों पुत्रोंकी कृतघ्नता</td> <td>"</td> <td>गजल आजिज</td> <td>"</td> </tr> <tr> <td>आद्याकी पूजाका प्रचार</td> <td>९५</td> <td>प्रथम अध्यायका परिशिष्ट</td> <td>"</td> </tr> <tr> <td>पांचोंकी पूजाका निश्चित होना और</td> <td></td> <td>अनुराग सागरसे सृष्टिकी उत्पत्तिके</td> <td></td> </tr> <tr> <td>निरंजनका सर्वाधिपत्य</td> <td>"</td> <td>प्रकरणका प्रमाण</td> <td>१२२</td> </tr> <tr> <td>तपशिलाका वृत्तान्त</td> <td>९६</td> <td>सृष्टिके आदिमें क्या था</td> <td>१२३</td> </tr> <tr> <td>भवसागरका स्वरूप</td> <td>९७</td> <td>सृष्टिकी उत्पत्ति सत्यपुरुषकी रचना</td> <td>"</td> </tr> <tr> <td>दुःखितजीवोंकी पुकार व सत्यपुरुषकी गौहार</td> <td>९८</td> <td>सोलह सुतका प्रगट होना</td> <td>१२४</td> </tr> <tr> <td>ज्ञानी अर्थात् कबीर साहिबका सत्य-</td> <td></td> <td>निरंजनकी तपस्या और मान सरोवर</td> <td></td> </tr> <tr> <td>लोकसे तपशिलाके समीप जाना और</td> <td></td> <td>तथा सुन्नकी प्राप्ति</td> <td>१२५</td> </tr> <tr> <td>समस्त जीवोंके ठण्डा करनेका वृत्तान्त</td> <td>"</td> <td>निरंजनको सृष्टि रचनाका साज मिलना</td> <td>१२६</td> </tr> <tr> <td>जीवोंका भक्ति करनेकी प्रतिज्ञा करना</td> <td>१००</td> <td>सहजका धर्मरायके पास जाकर पुरुषकी</td> <td></td> </tr> <tr> <td>पूर्व देशमें काल पुरुषका जीवोंको फसानेके—</td> <td></td> <td>आज्ञा सुनाना</td> <td>१२७</td> </tr> <tr> <td>—लिये नानामत मतान्तरका प्रचार करना</td> <td>१०१</td> <td>निरंजनका कूर्मके पास साज लेनेको जाना</td> <td>"</td> </tr> <tr> <td>पश्चिमके चार किताबोंका वर्णन</td> <td></td> <td>वहुरि पुरुषका सहजको निरंजनके निकट</td> <td></td> </tr> <tr> <td>तौरीतमें उत्पत्तिका वृत्तान्त आदमकी पैदाइश</td> <td>१०२</td> <td>भेजना</td> <td>१२८</td> </tr> <tr> <td>आदम और हव्वाकी सन्तान</td> <td>१०३</td> <td>सहजका निरंजनके निकट पहुँचना</td> <td>१२९</td> </tr> <tr> <td>जलप्रलय और नूहकी किस्तीका वर्णन</td> <td>१०४</td> <td>आद्याकी उत्पत्ति</td> <td>"</td> </tr> <tr> <td>इब्राहीम पैगंबरका वर्णन</td> <td>"</td> <td>सत्यपुरुषका आद्याको मूल बीज देना</td> <td>"</td> </tr> <tr> <td>यूसुफ पैगंबरका वृत्तान्त</td> <td>१०५</td> <td>पुनि पुरुषका निरंजनके ढिग जाना</td> <td>१३०</td> </tr> <tr> <td>फिरऊनका वृत्तान्त</td> <td>"</td> <td>निरंजनका मानसरोवरमें आद्याको पाकर</td> <td></td> </tr> <tr> <td>मूसाकी उत्पत्तिका वृत्तान्त</td> <td>१०६</td> <td>मोहवश हो उसे निगलजाना और</td> <td></td> </tr> <tr> <td>दूसरी किताब जबूरका वृत्तान्त</td> <td>१०७</td> <td>सत्यपुरुषका शाप पाना</td> <td>"</td> </tr> <tr> <td>तीसरी किताब इजीलका वृत्तान्त</td> <td>१०८</td> <td>पुरुषका शाप निरंजन प्रति</td> <td>१३१</td> </tr> <tr> <td>चौथी किताब कुरानका वृत्तान्त</td> <td>"</td> <td>सत्यपुरुषका योगजीतजीको निरंजनके</td> <td></td> </tr> <tr> <td>आठ वेदोंका वर्णन, निरञ्जनका पंथ</td> <td>१०९</td> <td>पास उसे मान सरोबरसे निकाल</td> <td></td> </tr> <tr> <td>आदि भवानी आद्याका पन्थ</td> <td>"</td> <td>देनेकी आज्ञा देकर भेजना</td> <td>"</td> </tr> <tr> <td>ब्रह्माका पंथ, विष्णु और शिवकापंथ</td> <td>१११</td> <td>भवसागरकी रचना</td> <td>१३३</td> </tr> <tr> <td>विष्णुका पंथ</td> <td>"</td> <td>सिन्धु मंथन और चौदह रत्न उत्पत्ति</td> <td>१३४</td> </tr> <tr> <td>प्रथम श्री सम्प्रदायके धाम क्षेत्रका वृत्तान्त</td> <td>"</td> <td>द्वितीय तृतीय बार सिन्धुमंथन</td> <td>१३५</td> </tr> <tr> <td>ब्रह्म संप्रदायके धामक्षेत्रका वृत्तान्त</td> <td>११२</td> <td>आद्याका तीनों पुत्रोंको सृष्टि रचनेकी</td> <td></td> </tr> <tr> <td>चौथे सनकादिक संप्रदायका वृत्तान्त</td> <td>"</td> <td>आज्ञा और पांच खानकी उत्पत्ति</td> <td>१३६</td> </tr> <tr> <td>चारों भाईके धाम क्षेत्रका वृत्तान्त</td> <td>"</td> <td></td> <td></td> </tr> </tbody> </table>
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<table border="1"> <thead> <tr> <th>विषय.</th> <th>पृष्ठ.</th> <th>विषय.</th> <th>पृष्ठ.</th> </tr> </thead> <tbody> <tr> <td>ब्रह्माका वेद पढकर निराकारका पता</td> <td></td> <td>२ अध्याय ।</td> <td></td> </tr> <tr> <td>पाना और मातासे पिताका पता पूछना</td> <td>१३६</td> <td>कबीर साहिबके प्राकट्य</td> <td>१७५</td> </tr> <tr> <td>ब्रह्माका पिताकी खोजको जाना</td> <td>१३८</td> <td>कबीरसाहिबको आंझरी द्वीपमें आना</td> <td>१७६</td> </tr> <tr> <td>विष्णुका पिताकी खोजका वृत्तान्त</td> <td></td> <td>निरंजन और ज्ञानीजीका वार्तालाप</td> <td>१७६</td> </tr> <tr> <td>आद्यासे कहना</td> <td>"</td> <td>ज्ञानीजी और धर्मरात्रिका वार्तालाप</td> <td>१७८</td> </tr> <tr> <td>पिताके खोजमें गये हुए ब्रह्माकी कथा</td> <td>१३९</td> <td>निरंजनके जालका वर्णन</td> <td>१७९</td> </tr> <tr> <td>ब्रह्माके लिये आद्याकी चिन्ता, गायत्रीकी</td> <td></td> <td>निरंजनका कबीरसाहिबसे वरदान</td> <td>१८०</td> </tr> <tr> <td>उत्पत्ति</td> <td>"</td> <td>छाया (विराट्) पुरुषका वृत्तान्त</td> <td>"</td> </tr> <tr> <td>ब्रह्माका गायत्रीकी खोजमें जाना</td> <td>"</td> <td>निरंजनका ज्ञानीजीकी अधीनता स्वीकार</td> <td>१८१</td> </tr> <tr> <td>ब्रह्माको जगानेके लिये आद्याका</td> <td></td> <td>निरंजन गोष्ठी</td> <td>"</td> </tr> <tr> <td>गायत्रीको युक्ति बताना</td> <td>१४०</td> <td>अनुरागसागरका प्रमाण</td> <td>१८९</td> </tr> <tr> <td>ब्रह्माका जागकर गायत्रीपर क्रोध करना</td> <td>"</td> <td>कबीर साहिबका सत्यपुरुषकी आज्ञा पाकर</td> <td></td> </tr> <tr> <td>ब्रह्माका गायत्रीको झूठी साक्षी देनेको</td> <td></td> <td>आगे बढ़ना</td> <td>"</td> </tr> <tr> <td>कहना और गायत्रीका ब्रह्मासे रति</td> <td></td> <td>कालका अपने बारह पन्थकी बात०</td> <td>१९२</td> </tr> <tr> <td>करनेकी बात कहना</td> <td>"</td> <td>कालका कबीर साहिबसे जगन्नाथ</td> <td></td> </tr> <tr> <td>सावित्री उत्पत्तिकी कथा</td> <td>१४१</td> <td>स्थापनाका वरदान मांगना</td> <td>१९३</td> </tr> <tr> <td>ब्रह्माका सावित्री और गायत्रीके साथ</td> <td></td> <td>धर्म रायका० कबीर साहिबको धोखा</td> <td></td> </tr> <tr> <td>माताके पास पहुँचना और</td> <td></td> <td>देकर उनसे गुप्त भेदका पूछना</td> <td>"</td> </tr> <tr> <td>सबका शापपाना</td> <td>"</td> <td>सत्ययुगका वृत्तान्त</td> <td>१९४</td> </tr> <tr> <td>आद्याका ब्रह्माको शाप देना</td> <td>१४३</td> <td>सत्य मुक्तका ब्रह्मादिकोंको उपदेश देना</td> <td>"</td> </tr> <tr> <td>आद्याका गायत्री सावित्रीको शाप देना</td> <td>"</td> <td>प्रमाण अनुराग सागरका</td> <td>१९५</td> </tr> <tr> <td>शाप देने पर आद्याका निरंजनके</td> <td></td> <td>कबीरसाहिबका ब्रह्मा-विष्णुके पास पहुँचना</td> <td>"</td> </tr> <tr> <td>डरसे डरकर पछिताना</td> <td>१४४</td> <td>कबीर साहिबका शेषनागके पास जाना</td> <td>"</td> </tr> <tr> <td>निरंजनका आद्याको शाप देना</td> <td>"</td> <td>ब्रह्मादिके ध्यान द्वारा राम नामका प्राकट्य</td> <td>१९६</td> </tr> <tr> <td>आद्याका निडर होना</td> <td>"</td> <td>पृथ्वीपर आनेकी कथा</td> <td>१९७</td> </tr> <tr> <td>विष्णुका गौरसे श्याम होनेका कारण</td> <td>"</td> <td>धोंधल राजका वृत्तान्त</td> <td>"</td> </tr> <tr> <td>आद्याका विष्णुको ज्योतिर्कादर्शन कराना</td> <td>१४५</td> <td>खेमसरीका वृत्तान्त</td> <td>"</td> </tr> <tr> <td>मायाका विष्णुको सर्व प्रधान बनाना</td> <td>१४७</td> <td>ठीका पूरने परही लोककी प्राप्ति</td> <td>१९८</td> </tr> <tr> <td>आद्याका महेशको वरदान देना</td> <td>"</td> <td>जीवोंके उपदेश करनेका फल</td> <td>"</td> </tr> <tr> <td>काल प्रपंच</td> <td>१४८</td> <td>आरतीका साज</td> <td>१९९</td> </tr> <tr> <td>अथ आदि मंगल</td> <td>१४९</td> <td>त्रेतायुगका वृत्तान्त</td> <td>२००</td> </tr> <tr> <td>शवास गुंजारका प्रमाण</td> <td>१५१</td> <td>मनुष्योंको मुक्ति प्रदान करना आदि</td> <td>"</td> </tr> <tr> <td>सोलह सुतकी उत्पत्ति</td> <td>१५४</td> <td>त्रेतामें जगतके मनुष्योंके विचार</td> <td>२०१</td> </tr> <tr> <td>आगेकी उत्पत्ति</td> <td>१५७</td> <td>मुनीन्द्रजीका रावणके पास जाना</td> <td>२०२</td> </tr> <tr> <td>तीनों देवोंकी प्राकट्य</td> <td>१६८</td> <td>मुनीन्द्रजीका अयोध्या जाना०</td> <td>२०३</td> </tr> <tr> <td>अम्बुसागरका प्रमाण</td> <td>१७२</td> <td>अनुरागसागरका प्रमाण</td> <td>२०४</td> </tr> <tr> <td>आद्या लीला, रागोंके नाम</td> <td>१७३</td> <td>धर्मरायकी चिन्ता</td> <td>"</td> </tr> <tr> <td>इकसठ रागिनियोंके नाम</td> <td>१७४</td> <td>विचित्र भाटकी कथा लंकामें</td> <td>२०५</td> </tr> </tbody> </table>
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<table border="1"> <thead> <tr> <th>विषय.</th> <th>पृष्ठ.</th> <th>विषय.</th> <th>पृष्ठ.</th> </tr> </thead> <tbody> <tr> <td>मन्दोदरीकी कथा</td> <td>२०५</td> <td>सातवें साहूत, मूकाम, आठवें राहूत</td> <td></td> </tr> <tr> <td>मुनीन्द्रजीका रावणके पास जाना</td> <td>२०६</td> <td>स्थानका वर्णन, नवमें आहूत, स्थानक'</td> <td></td> </tr> <tr> <td>मधुकरकी कथा</td> <td>२०८</td> <td>वर्णन, दशवें जाहूत स्थानका वर्णन,</td> <td></td> </tr> <tr> <td>द्रापरयुगकी कथा</td> <td>२०९</td> <td>सत्यलोकका वर्णन</td> <td>२५०</td> </tr> <tr> <td>रानी इन्द्रमतीकी कथा</td> <td>"</td> <td>मुहम्मद साहिबको सत्य पुरुषका दर्शन</td> <td></td> </tr> <tr> <td>अनुरागसागरका प्रमाण</td> <td>२१०</td> <td>होना, पांचकलमांका वर्णन</td> <td>"</td> </tr> <tr> <td>३ अ० कलियुगका वृत्तान्त</td> <td>२२४</td> <td>पांचवें कलमेका वृत्तान्त</td> <td>२५१</td> </tr> <tr> <td>कलियुगमें शानीजीका पृथ्वीपर सत्य कबीर,</td> <td></td> <td>नवीबेर प्रकट होकर इबराहीम अद्दम</td> <td></td> </tr> <tr> <td>सैयद अहमद कबीर व शेख कबीर,</td> <td></td> <td>सुलतानको शिक्षा देने और</td> <td></td> </tr> <tr> <td>जिन्दा पुरुष आदि नामोंसे पृथ्वीपर प्रगट</td> <td></td> <td>शिष्य करनेका वृत्तान्त</td> <td>२५२</td> </tr> <tr> <td>होकर मनुष्योंके उद्धार करनेका वृत्तान्त,</td> <td></td> <td>दशसी बेर कबीर साहिबका काफिरिया</td> <td></td> </tr> <tr> <td>उत्थानिकां श्वपंचको सुदर्शन चेताना</td> <td>"</td> <td>देशमें प्रकट होना और उस देशके</td> <td></td> </tr> <tr> <td>कलियुगका प्रमाण</td> <td>२२५</td> <td>काफिरोंको समझाने तथा शिक्षा</td> <td></td> </tr> <tr> <td>द्रापरके अन्तमें श्वपच सुदर्शनको</td> <td></td> <td>देनेका वृत्तान्त</td> <td>२५३</td> </tr> <tr> <td>चेताना और कथां</td> <td>"</td> <td>खान मुहम्मदअली बादशाहको प्रबोध</td> <td>२५४</td> </tr> <tr> <td>दूसरी बार कलियुगमें कबीर साहिबके</td> <td></td> <td>फिरिश्तांका ध्यान</td> <td>२५५</td> </tr> <tr> <td>पृथ्वीपर प्रकट होनेका वृत्तान्त</td> <td>२२८</td> <td>ग्यारहवींबेर कबीर साहिबका प्रकट होना</td> <td></td> </tr> <tr> <td>जगन्नाथकी स्थापनाकी उत्थानिका</td> <td>२३०</td> <td>और शंकराचार्य सन्यासीको बोध</td> <td></td> </tr> <tr> <td>कबीर साहिबके जगन्नाथ स्थापना</td> <td>२३१</td> <td>देने और समझानेका वृत्तान्त</td> <td>२५६</td> </tr> <tr> <td>जगन्नाथ मंदिरकी स्थापनाका वृत्तान्त</td> <td>२३२</td> <td>बारहवीं बार रामानुज स्वामीजीको</td> <td></td> </tr> <tr> <td>कृष्णका इन्द्र दमन राजाको सपना देना</td> <td>"</td> <td>बोध करनेका वृत्तान्त</td> <td>२५७</td> </tr> <tr> <td>समुद्रके कोपका कारण</td> <td>२३३</td> <td>तेरहवीं बेर शेख मन्शूर आदिको बोध</td> <td></td> </tr> <tr> <td>भ्रम विमोचन</td> <td>"</td> <td>करनेका वृत्तान्त</td> <td>"</td> </tr> <tr> <td>स्वामी रामानुजाचार्य और जगन्नाथपुरी</td> <td>२३५</td> <td>कबीर साहिबके काशीमें चौदहवीं बेर</td> <td></td> </tr> <tr> <td>तीसरी बार कबीर साहिबका पृथ्वीपर</td> <td></td> <td>प्राकटयकी उत्थानिका</td> <td>"</td> </tr> <tr> <td>प्रकट होना इत्यादि</td> <td>२३६</td> <td>सत्य पुरुषकी आज्ञा, सत्य पुरुषके तेजका</td> <td></td> </tr> <tr> <td>कबीर साहिबका ४ थी ५ वीं छठीं और</td> <td></td> <td>लहर तालावमें उतरना</td> <td>२५८</td> </tr> <tr> <td>७ वीं बार प्रकट होने का वृत्तान्त</td> <td>२३७</td> <td>नीमा और नीरू</td> <td>१ २५९</td> </tr> <tr> <td>मुहम्मद साहिबको चेतानेका वृत्तान्त</td> <td>"</td> <td>श्वपच सुदर्शनके माता पिताके तीन</td> <td></td> </tr> <tr> <td>मुहम्मद साहिबके मेआराजके विषयमें</td> <td></td> <td>जन्मका वृत्तान्त (अनुराग सागरसे)</td> <td>"</td> </tr> <tr> <td>मत भेद</td> <td>२३८</td> <td>नीमा और निरूका बालक पाना</td> <td>२६१</td> </tr> <tr> <td>खुदा साकार</td> <td>२४२</td> <td>बालकके नाम धरनेको ब्राह्मणका आना</td> <td>२६२</td> </tr> <tr> <td>मुहम्मद साहिबका जलाली खुदा</td> <td>"</td> <td>काजियोंका नाम धरने आना और कबीर</td> <td></td> </tr> <tr> <td>मुहम्मद बोधका संक्षेपसार</td> <td>२४३</td> <td>नामका निश्चय होना</td> <td>२६३</td> </tr> <tr> <td>प्रथम नासूत मुकामका वर्णन</td> <td>२४६</td> <td>काजियोंका निरूको कबीरके कत्ल करने</td> <td></td> </tr> <tr> <td>दूसरे मलकूत मुकामका वर्णन</td> <td>२४७</td> <td>की सलाह देना</td> <td>२६४</td> </tr> <tr> <td>तीसरे जिबरूत मुकामका वर्णन</td> <td>"</td> <td>बालक कबीरका दूध पीना</td> <td>२६५</td> </tr> <tr> <td>चौथे, पांचवें और छठे मुकामोंका वर्णन</td> <td>२४८</td> <td>बाल लीला</td> <td>२६६</td> </tr> </tbody> </table>
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<table border="1"> <thead> <tr> <th>विषय.</th> <th>पृष्ठ.</th> <th>विषय.</th> <th>पृष्ठ.</th> </tr> </thead> <tbody> <tr> <td>बृहत्कबीर कसोटीसे बाल लीला</td> <td>२६६</td> <td>चार गुरुकी कथा</td> <td>२९८</td> </tr> <tr> <td>नीरुके घर मांस आनेकी बातको जानकर</td> <td></td> <td>धर्मदासजीके ४२ वंशकी स्थिति</td> <td>२९९</td> </tr> <tr> <td>कबीर साहिबका अन्तर्धान होना</td> <td>२६७</td> <td>चारों गुरुकी प्रशंसा, उर्दूशेर</td> <td>"</td> </tr> <tr> <td>मुन्नत</td> <td>२६८</td> <td>४२ वंशकी प्रशंसाके उर्दू शेर</td> <td>३०१</td> </tr> <tr> <td>कुरबानी</td> <td>२६९</td> <td>कबीर साहिबके १२ पंथोंका सामान्य परिचय</td> <td>३०४</td> </tr> <tr> <td>कबीर साहिबकी मुन्नत वू. क. कसोटी</td> <td>"</td> <td>उनके भिन्न पंथ, महाप्रलयकी कथा</td> <td>३०५</td> </tr> <tr> <td>बालक कबीरका नीरुके घरसे अन्तर्धान</td> <td>२७५</td> <td>अन्तर्धान होनेकी कथा</td> <td>३०६</td> </tr> <tr> <td>बालक कबीरका काफिरकी व्याख्या करना</td> <td>"</td> <td>५ अ० कबीर पन्थके धार्मिक नियम</td> <td>३०९</td> </tr> <tr> <td>बालक कबीर वैष्णवके बाने-</td> <td>२७६</td> <td>कबीरसाहिबके लोक तथा हंसोंकी कथा</td> <td>३१४</td> </tr> <tr> <td>बालक कबीरकी ज्ञान कथनी और</td> <td></td> <td>कबीर साहिबकी मंगलवाणी</td> <td>३१५</td> </tr> <tr> <td>गुरुकी पूछ</td> <td>"</td> <td>६ अध्याय कुछ लीलाएं</td> <td>३१८</td> </tr> <tr> <td>गुरु करनेका वृत्तान्त (वू. क. कसोटी)</td> <td>२७७</td> <td>सम्मनके घर जाना</td> <td>३१८</td> </tr> <tr> <td>कबीररोपदेश</td> <td>"</td> <td>भैंसेसे वेदपाठ</td> <td>३२०</td> </tr> <tr> <td>कबीर साहिब और रामानन्द स्वामीका</td> <td></td> <td>जहांगीर, रामदास</td> <td>३२१</td> </tr> <tr> <td>वृत्तान्त</td> <td>२७९</td> <td>कमाल कमालीका जिलाना</td> <td>३२२</td> </tr> <tr> <td>स्वामी रामानन्दका कबीर साहिबको</td> <td></td> <td>पुस्तकोंका लिखाजाना</td> <td>३२३</td> </tr> <tr> <td>शिष्य स्वीकार करना</td> <td>२८०</td> <td>हनुमान्को पान २ सर्वांनन्द</td> <td>"</td> </tr> <tr> <td>कबीर साहिब और स्वामी रामानन्द-</td> <td></td> <td>तिल घोटकर पिलाना</td> <td>३२५</td> </tr> <tr> <td>जीकी गोष्ठी</td> <td>२८१</td> <td>नानकशाहसे दूध मांगना</td> <td>३२६</td> </tr> <tr> <td>४ अ. कबीरजीका आत्मविकास ।</td> <td></td> <td>गोरख कबीर</td> <td>३२७</td> </tr> <tr> <td>सिकन्दर लोधीका काशीमें आना, कबीर</td> <td></td> <td>कमालीका ज्ञान</td> <td>३२८</td> </tr> <tr> <td>साहिबका वहां बुलावा जाना, उनके दर्शन</td> <td></td> <td>आमीनका ज्ञान</td> <td>३२९</td> </tr> <tr> <td>बादशाहकी जलन दूर होना, सुलतानका</td> <td></td> <td>कबीर साहिबकी शिक्षा</td> <td>३३०</td> </tr> <tr> <td>उनपर विश्वास लाना</td> <td>२८४</td> <td>ऋषीश्वरोंके वचन</td> <td>३३८</td> </tr> <tr> <td>शेखतकीका क्रोध</td> <td>२८६</td> <td>शिवतन्त्रका प्रमाण</td> <td>"</td> </tr> <tr> <td>लोगोंका शेखतकीके पास आना</td> <td>"</td> <td>७ अ० विष्णुभगवान्</td> <td>३३९</td> </tr> <tr> <td>शेखतकीका कबीरजीको मरानेका प्रयत्न</td> <td>२८७</td> <td>इस्लाममें विष्णुकी प्रधानता</td> <td>३४४</td> </tr> <tr> <td>शेखतकीके कबीरजीपर जुल्म</td> <td>"</td> <td>प्राचीन नियम पत्र व खरकैल नवीकी</td> <td></td> </tr> <tr> <td>कबीर साहिबकी शाहसिकन्दरने</td> <td></td> <td>पुस्तकका सार</td> <td>३४६</td> </tr> <tr> <td>नम्रता पूर्वक बन्दना की</td> <td>२९१</td> <td>अनिको विष्णुरूप कहना</td> <td>३४८</td> </tr> <tr> <td>कबीरजीरके भंडारेकी कथा</td> <td>२९२</td> <td>भगवान् विष्णुके विषयमें कबीरसाहिबके शब्द</td> <td>३५०</td> </tr> <tr> <td>लक्ष्मीजीका कबीर साहिबको लुभानेकी</td> <td></td> <td>भगवान् रामचन्द्रजी महाराज</td> <td>३५२</td> </tr> <tr> <td>इच्छासे आना और विफल मनो-</td> <td></td> <td>पूरण ब्रह्म भगवान् कृष्ण</td> <td>३५४</td> </tr> <tr> <td>रथ होकर लौट जाना</td> <td>"</td> <td>विष्णुके उपकार</td> <td>३५६</td> </tr> <tr> <td>सत्यलोक</td> <td>२९५</td> <td>८ अध्याय प्राचीन भक्त</td> <td>३५७</td> </tr> <tr> <td>दश सोहंगका हाल</td> <td>२९६</td> <td>ब्रह्माजीकी कथा</td> <td>"</td> </tr> <tr> <td>धर्म प्रचलित करनेकी कथा</td> <td>२९८</td> <td>शिवजी महाराजकी कथा</td> <td>३६३</td> </tr> </tbody> </table>
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<table border="1"> <thead> <tr> <th>विषय.</th> <th>पृष्ठ.</th> <th>विषय.</th> <th>पृष्ठ.</th> </tr> </thead> <tbody> <tr> <td>वाममार्ग</td> <td>३६३</td> <td>उष्ट्रमेघ, मेघमेघ, मृगमेघ</td> <td>४०८</td> </tr> <tr> <td>श्रीकाग भुसुण्डकी उत्पत्ति</td> <td>"</td> <td>अजमेघ, बलि प्रदानकी रीति</td> <td>४०९</td> </tr> <tr> <td>निरंजनके चार दूत</td> <td>३६५</td> <td>११ अध्याय । पश्चिमकी पुस्तकें ।</td> <td></td> </tr> <tr> <td>मनु स्वायंभूकी कथा</td> <td>३६८</td> <td>मूसाकी पुस्तकें</td> <td>४११</td> </tr> <tr> <td>राजा इन्द्रकी कथा</td> <td>"</td> <td>प्रथम तोरीत</td> <td>"</td> </tr> <tr> <td>बृहस्पति और शुक्र नारद</td> <td>३६९</td> <td>दूसरी जबूर पुस्तक</td> <td>४१३</td> </tr> <tr> <td>वशिष्ठजी</td> <td>३७२</td> <td>नबियोंके पुस्तक</td> <td>"</td> </tr> <tr> <td>गीतम ऋषि, कपिलमुनि, दत्तात्रेय</td> <td>३७३</td> <td>करनतियुनके लिये पोलूस रसूलका पत्र</td> <td>४१५</td> </tr> <tr> <td>सनत्कुमार</td> <td>३७४</td> <td>अनागत वक्ताके कृत्य</td> <td>४१६</td> </tr> <tr> <td>भक्तबालक ध्रुव</td> <td>"</td> <td>चौथी पुस्तक कुरान</td> <td>"</td> </tr> <tr> <td>भक्त प्रह्लाद</td> <td>३७६</td> <td>अल्लोपनिषद्</td> <td>"</td> </tr> <tr> <td>अम्बरीष, भगवान् शुक्रदेव</td> <td>३७७</td> <td>कुरानका सूक्ष्मसार</td> <td>४१८</td> </tr> <tr> <td>भगवान् व्यास उनके अवतार</td> <td>३७९</td> <td>बलिका निषेध</td> <td>४२०</td> </tr> <tr> <td>जैनके तीर्थंकर, योगी गोरखनाथ</td> <td>३८०</td> <td>एक परमेश्वरपर कुरान</td> <td>४२७</td> </tr> <tr> <td>भगवान् बुद्ध</td> <td>३८१</td> <td>भीतरके अन्धे</td> <td>४२९</td> </tr> <tr> <td>शंकराचार्यजीका वृत्तान्त</td> <td>३८२</td> <td>कालपुरष किससे डरता है, माया</td> <td>"</td> </tr> <tr> <td>रामानुज स्वामीका वृत्तान्त</td> <td>"</td> <td>(जगत और देह)</td> <td></td> </tr> <tr> <td>रामानन्द स्वामी</td> <td>३८३</td> <td>चक्र निरूपण</td> <td>४३१</td> </tr> <tr> <td>तीन संप्रदाय</td> <td>"</td> <td>चक्रादिकोंका मान चित्र</td> <td>४३२</td> </tr> <tr> <td>१ अ० पश्चिमके महापुरुष</td> <td>"</td> <td>ब्रह्माण्ड</td> <td>४३९</td> </tr> <tr> <td>हजरत आदम तथा नूह महात्मा</td> <td>३८४</td> <td>पिण्ड तथा ब्रह्माण्ड</td> <td>४४८</td> </tr> <tr> <td>" इबराहीम और इसहाक आदि</td> <td>"</td> <td>नानकशाह और जन्दाका संवाद</td> <td>४५०</td> </tr> <tr> <td>" दाऊद और सुलेमान</td> <td>"</td> <td>समर्थन</td> <td>४५१</td> </tr> <tr> <td>" मूसा</td> <td>३८५</td> <td>प्रलयकी समानता</td> <td>४५२</td> </tr> <tr> <td>" ईसा</td> <td>३८९</td> <td>पाप पुण्यका हिसाब</td> <td>"</td> </tr> <tr> <td>योहन नवी</td> <td>३९३</td> <td>ब्रह्माण्ड पागल खाना</td> <td>४५३</td> </tr> <tr> <td>मुहम्मद साहिब</td> <td>३९४</td> <td>पागलोंके काम</td> <td>४५५</td> </tr> <tr> <td>१० अध्याय । विशेष बलि</td> <td>३९६</td> <td>हंसकबीरकी स्थिति</td> <td>४५८</td> </tr> <tr> <td>विराट् पुरुषके पहिले अवतारवाला सत्यपुरुष</td> <td>"</td> <td>१२ अध्याय : विश्वास</td> <td>४६०</td> </tr> <tr> <td>पश्चिमके माहात्माओंका विराट् दर्शन</td> <td>३९८</td> <td>विश्वासकी झलक</td> <td>"</td> </tr> <tr> <td>शरीर और विराटकी एकता</td> <td>३९९</td> <td>जीवकी हालत</td> <td>४६४</td> </tr> <tr> <td>विराटकी उपासना</td> <td>४००</td> <td>चार पशु</td> <td>४६६</td> </tr> <tr> <td>सत्य पुरुषका प्रतिपादक पुरुषसूक्त</td> <td>४०१</td> <td>नरपशु, दुष्टांत</td> <td>४६७</td> </tr> <tr> <td>अकाल पुरुषके धार्मिक नियम</td> <td>४०५</td> <td>दूसरा दुष्टांत</td> <td>४६८</td> </tr> <tr> <td>बलिप्रदान</td> <td>४०६</td> <td>गुरुपशु</td> <td>"</td> </tr> <tr> <td>यज्ञ शब्दार्थ, नरमेघ</td> <td>"</td> <td>अन्धोंका पन्य</td> <td>४७०</td> </tr> <tr> <td>अश्वमेघ, गोमेघ</td> <td>४०७</td> <td>नकटोंका पन्य</td> <td>४७१</td> </tr> </tbody> </table>
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<table border="1"> <thead> <tr> <th>विषय.</th> <th>पृष्ठ.</th> <th>विषय.</th> <th>पृष्ठ.</th> </tr> </thead> <tbody> <tr> <td>वेद पशु</td> <td>४७२</td> <td>राजा जग जीवन</td> <td>५६८</td> </tr> <tr> <td>त्रिया पशु</td> <td>४७३</td> <td>राजा जगजीवनकी रानियोंके नाम</td> <td>५७२</td> </tr> <tr> <td>उद्धारकी दवा</td> <td>४७४</td> <td>१५ अध्याय कबीर साहबके कलियुगके शिष्य</td> <td>५७३</td> </tr> <tr> <td>महम्मद साहबकी मांग</td> <td>"</td> <td>शाहंजाह इबराहीम अहम</td> <td>"</td> </tr> <tr> <td>भृंगीकीटका दूष्णंतकी कविता</td> <td>४७७</td> <td>श्रेष्ठ मन्शूर और शिवली</td> <td>५८२</td> </tr> <tr> <td>मनुष्यताका उपदेश</td> <td>४७९</td> <td>तत्त्वा और जीवा</td> <td>५८५</td> </tr> <tr> <td>निर्बुद्धिताके अंगकी साखियां</td> <td>४८२</td> <td>कबीर पन्यके प्रवर्तक महात्मा धर्म दासजी</td> <td>५८८</td> </tr> <tr> <td>मिथ्यात्व प्रतिपादन</td> <td>४८५</td> <td>महाराज वीरसिंह</td> <td>५९२</td> </tr> <tr> <td>शब्दका विषय</td> <td>४८७</td> <td>नौबाब विजलीखां, रविदास</td> <td>६११</td> </tr> <tr> <td>समस्त धर्मोंका वृत्तान्त</td> <td>४९१</td> <td>हस्तावलंबिनी कंजरी</td> <td>६००</td> </tr> <tr> <td>१३ अ० ज्ञानीजी महाराज</td> <td>४९५</td> <td>भक्त मीराबाई</td> <td>६०२</td> </tr> <tr> <td>ज्ञानीजीके नाम</td> <td>४९७</td> <td>शाहसिकन्दर लोधीकी दीक्षा</td> <td>६०४</td> </tr> <tr> <td>वेदमें कबीर</td> <td>५०७</td> <td>कमालजी</td> <td>६०५</td> </tr> <tr> <td>सुकृत, अग्रनाम</td> <td>"</td> <td>गरीब दास</td> <td>६०७</td> </tr> <tr> <td>उग्रनाम, कबीर शब्दके अर्थ</td> <td>५०८</td> <td>रहन-सहन</td> <td>६१७</td> </tr> <tr> <td>ऋषीश्वरोंका वचन</td> <td>५१३</td> <td>गुरुकी कृपा</td> <td>६१९</td> </tr> <tr> <td>कबीर शब्दका अरबीमें अर्थ</td> <td>५२२</td> <td>उनका शास्त्र</td> <td>६२५</td> </tr> <tr> <td>१४ अध्याय कबीरसाहबके प्राचीन शिष्य</td> <td>५२३</td> <td>मिश्रपन्योंके संस्थापक शिष्य</td> <td>६२७</td> </tr> <tr> <td>लोमश ऋषि</td> <td>५२४</td> <td>नानकशाह साहिब</td> <td>"</td> </tr> <tr> <td>कुष्ठम ऋषि</td> <td>५२५</td> <td>दादुरामजी</td> <td>६३७</td> </tr> <tr> <td>धनुष ऋषि</td> <td>५३०</td> <td>शिवनारायण दासजी</td> <td>६४०</td> </tr> <tr> <td>तात्पर्य</td> <td>५३१</td> <td>पापदास, राधास्वामी मतका सार,</td> <td>६४१</td> </tr> <tr> <td>गुप्तमुनि</td> <td>५३२</td> <td>इक्कीसवां हिदायत नामा</td> <td>६४२</td> </tr> <tr> <td>दत्तात्रेय और कबीर</td> <td>५३४</td> <td>घीसाजी</td> <td>६४६</td> </tr> <tr> <td>कबीर और नारद</td> <td>५३६</td> <td>१६ अध्याय । आद्या और निरंजन पर जीत</td> <td>६४७</td> </tr> <tr> <td>सनकादि और कबीर, कबीरजी और</td> <td></td> <td>आद्या और कबीर</td> <td>"</td> </tr> <tr> <td>ऋषभ नाथ, कबीर और भुशुण्डि</td> <td>"</td> <td>नाम मालाका संक्षेप</td> <td>६५६</td> </tr> <tr> <td>कबीर और राजा जनक</td> <td>५३७</td> <td>सुकृत आदि भेदसे ग्रन्थ</td> <td>६६०</td> </tr> <tr> <td>वज्र देशके राजा</td> <td>"</td> <td>शरण</td> <td>६६१</td> </tr> <tr> <td>राजा योग धीर</td> <td>५४३</td> <td>शरणगतके धर्म</td> <td>६६२</td> </tr> <tr> <td>राजा भूपाल</td> <td>५४५</td> <td>शरणगतके नियम</td> <td>६६३</td> </tr> <tr> <td>राजा अमरसिंह</td> <td>५४८</td> <td>हंसोंको चलाना</td> <td>६६६</td> </tr> <tr> <td>सत्य-व्रता और हापरके हंस</td> <td>५५१</td> <td>फुटकर उपदेश</td> <td>६६९</td> </tr> <tr> <td>शवपत्र सुदर्शन</td> <td>"</td> <td>गोरखजीका प्रश्न</td> <td>६७१</td> </tr> <tr> <td>पांडवोंका सुदर्शनकी श्रेष्ठता दिखाना</td> <td>५५८</td> <td>कबीरजीका उत्तर</td> <td>"</td> </tr> <tr> <td>मरुडजी महाराज</td> <td>५६२</td> <td>प्रासांगिक</td> <td>६७३</td> </tr> <tr> <td>दुर्वासा ऋषि</td> <td>५६७</td> <td></td> <td></td> </tr> </tbody> </table>
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<table border="1"> <thead> <tr> <th>विषय.</th> <th>पृष्ठ.</th> <th>विषय.</th> <th>पृष्ठ.</th> </tr> </thead> <tbody> <tr> <td>१७ अध्याय । बन्धनके कारण</td> <td>६८०</td> <td>अन्य योनिमें पूर्वके मनुष्य योनिके चिन्ह</td> <td>७४७</td> </tr> <tr> <td>हृदय</td> <td>"</td> <td>पुनर्जन्म पर भारतीय दर्शन</td> <td>७५०</td> </tr> <tr> <td>हृदयकी व्याख्या</td> <td>६८२</td> <td>आवागमन पर तीरीत</td> <td>"</td> </tr> <tr> <td>पांच वृत्ति</td> <td>७८९</td> <td>समीक्षा, तात्पर्य</td> <td>७५३</td> </tr> <tr> <td>मनके पांच अहंकार</td> <td>६९३</td> <td>राजा विपश्चितका उदाहरण</td> <td>"</td> </tr> <tr> <td>मनकी विषय वासना</td> <td>६९४</td> <td>तात्पर्य</td> <td>७५५</td> </tr> <tr> <td>वासनाओंकी जननी</td> <td>६९५</td> <td>सुलेमानके बाबमें ईश्वरी प्रेमकी झलक</td> <td>"</td> </tr> <tr> <td>कर्म</td> <td>७००</td> <td>तात्पर्य</td> <td>"</td> </tr> <tr> <td>कर्मके चिन्ह</td> <td>७११</td> <td>बादशाह बनूक दनजरका पशु होना</td> <td>७५६</td> </tr> <tr> <td>कर्मपर कबीर वचन</td> <td>७१३</td> <td>सच्चे झूठेका न्याय इसका तात्पर्य</td> <td>७५७</td> </tr> <tr> <td>नौ कोष</td> <td>७१७</td> <td>दाऊदका पुनर्जन्म</td> <td>"</td> </tr> <tr> <td>नौ कोषोंका विवरण</td> <td>७१९</td> <td>मतीकी इज्जल में आवागमन</td> <td>७५८</td> </tr> <tr> <td>आयु</td> <td>७२०</td> <td>तात्पर्य</td> <td>७६०</td> </tr> <tr> <td>१८ अध्याय । पुनर्जन्म</td> <td>७२२</td> <td>योहन्नाकी इज्जीलमें आवागमन</td> <td>७६२</td> </tr> <tr> <td>हजरत आदम</td> <td>७२३</td> <td>कयामतसेभी पहिले आवागमन</td> <td>"</td> </tr> <tr> <td>हजरत नूह</td> <td>७२५</td> <td>आवागमन पर कुरान</td> <td>७६३</td> </tr> <tr> <td>समीक्षा, हजरत इब्राहीम</td> <td>"</td> <td>मुहम्मद साहिबका आत्माका मोर और फल</td> <td></td> </tr> <tr> <td>हजरत इसहाक</td> <td>७२७</td> <td>होनेके बाद बीबी एमनाके गर्भमें जाना</td> <td>७६४</td> </tr> <tr> <td>हजरत याकूब या इसराईल</td> <td>"</td> <td>शैतानका आवागमन समीक्षा</td> <td>७६६</td> </tr> <tr> <td>याकूबका ब्याह</td> <td>७२८</td> <td>भाग्यानुसारीवस्तु</td> <td>७६८</td> </tr> <tr> <td>हजरत मूसा</td> <td>७२९</td> <td>समीक्षा, कयामतके दिनकी तीन बातें</td> <td>७६९</td> </tr> <tr> <td>हजरत मूसा और ख़ाजा खिज़्र</td> <td>७३०</td> <td>सालिग्राम पूजनेकी प्रतिज्ञा</td> <td>७७०</td> </tr> <tr> <td>मूसा और मौत</td> <td>७३१</td> <td>समीक्षा, यथार्थ तात्पर्य वैकुण्ठका पक्षी</td> <td>७७१</td> </tr> <tr> <td>मुहम्मदसाहिब और मुहम्मदे गिजाली</td> <td>"</td> <td>पूर्वके प्रेम आदि भाग्य</td> <td>७७२</td> </tr> <tr> <td>हजरत दाऊत नबी</td> <td>"</td> <td>हजरत शेख सादीका कौल</td> <td>७७३</td> </tr> <tr> <td>समीक्षा, सुलेमान</td> <td>७३३</td> <td>शेख फरीदुद्दीन अत्तार</td> <td>७७४</td> </tr> <tr> <td>घृणाकी दृष्टिसे देखनेका फल</td> <td>७३५</td> <td>इब्र, अब्बास संग आसूदका काला होना</td> <td></td> </tr> <tr> <td>योहन्ना नबी हजरत ईशा</td> <td>७३६</td> <td>सिद्धिका नाश</td> <td>"</td> </tr> <tr> <td>समीक्षा, मुहम्मद मुस्तफा</td> <td>७३७</td> <td>पूर्व जन्मका कुत्ता, इस्लामी फिरके</td> <td>७७५</td> </tr> <tr> <td>कुरानमें मूर्ति पूजा</td> <td>७३९</td> <td>मुहम्मद बोध</td> <td>७७६</td> </tr> <tr> <td>तात्पर्य—समीक्षा</td> <td>"</td> <td>प्रकृति नहीं बदल सकती</td> <td>"</td> </tr> <tr> <td>विशेष</td> <td>७४०</td> <td>अपनी आत्माका डालना</td> <td>"</td> </tr> <tr> <td>नबियों और उनके खुदापर एकदृष्टि</td> <td>७४२</td> <td>मनुष्यसे बन्दर</td> <td>७७७</td> </tr> <tr> <td>जीव योनि. चौरासी लाख योनि</td> <td>७४५</td> <td>नरक स्वर्गका जाना</td> <td>"</td> </tr> <tr> <td>अण्डजसे मनुष्य होनेके चिन्ह</td> <td>"</td> <td>तारीख मुहम्मदी</td> <td>७७८</td> </tr> <tr> <td>ऊभजसे मनुष्य होनेका चिन्ह</td> <td>७४६</td> <td>अबू दाऊद अबुहरीरा, समीक्षा</td> <td>"</td> </tr> <tr> <td>उद्भिजसे मनुष्य होनेका चिन्ह</td> <td>"</td> <td>मुहम्मद साहिबका आवागमन</td> <td>७७९</td> </tr> <tr> <td>पिंडजसे मनुष्य होनेका चिन्ह</td> <td>७४७</td> <td>समीक्षा, नरकमें देखा, समीक्षा</td> <td>७८०</td> </tr> </tbody> </table>
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<table border="1"> <thead> <tr> <th>विषय.</th> <th>पृष्ठ.</th> <th>विषय.</th> <th>पृष्ठ.</th> </tr> </thead> <tbody> <tr> <td>समीक्षा</td> <td>७८०</td> <td>एटलेश, शराब लेनेवाला, चेम्पेनका</td> <td>८०८</td> </tr> <tr> <td>बच्चेकी उत्पत्ति</td> <td>७८२</td> <td>औरंग औरटंग, गीरेला, एनजिना</td> <td>८०९</td> </tr> <tr> <td>समीक्षा</td> <td>७८३</td> <td>कोरोनकियाँ और पोस्ती गान्धी</td> <td>८१०</td> </tr> <tr> <td>जिनका सर्प होना लोह महफूजपर भाग्य</td> <td>७८४</td> <td>बराबरी, एम, दपये लेनेवाला, प्रत्युपकारी</td> <td>८११</td> </tr> <tr> <td>जीवोंका आनन्द, संन्यासीका उदाहरण</td> <td>७८५</td> <td>शराबी बन्दर</td> <td>८१२</td> </tr> <tr> <td>स्वप्नकी देह</td> <td>७८६</td> <td>पूर्व जन्म बेत्ता</td> <td>"</td> </tr> <tr> <td>मन्शूरका सम्स तबरेज और बुल्लेशाह होना</td> <td>"</td> <td>मृगेंद्र</td> <td>८१३</td> </tr> <tr> <td>अमीर खुशरू मोलवी रूप</td> <td>७८७</td> <td>कुमरसिंहजीका सिंह कांटा निकलवाने-<br>वाला</td> <td>८१४</td> </tr> <tr> <td>इमाम जाकर साहिब</td> <td>"</td> <td>इस्मारमन साहिबका मत</td> <td>"</td> </tr> <tr> <td>आदम और बैलकी बात</td> <td>"</td> <td>होप साहबका कथन</td> <td>"</td> </tr> <tr> <td>मसी हुद्जाल शौतानका, नरक जाना</td> <td>"</td> <td>कच्चे मांस खिलानेका दोष-शेरका प्रेम</td> <td>८१५</td> </tr> <tr> <td>वंचित रहनेका कारण, अचेतावस्था</td> <td>७८९</td> <td>रीछ और शेरकीमैत्री, तेंदुआ</td> <td>८१६</td> </tr> <tr> <td>स्वाभाविक चेतना</td> <td>७९०</td> <td>शेरका बच्चा</td> <td>"</td> </tr> <tr> <td>पुण्य पापके फलका संक्षेप</td> <td></td> <td>हाथी, सीलोनका हाथी</td> <td>८१७</td> </tr> <tr> <td>विचित्र आकार</td> <td>७९३</td> <td>हाथीकी उग्र</td> <td>"</td> </tr> <tr> <td>गजूवा</td> <td>७९४</td> <td>कृतज्ञता, पुत्रसे प्रेम, बनेलेकी बुद्धिमत्ता</td> <td>"</td> </tr> <tr> <td>मनुष्यके शिरका सर्प</td> <td>"</td> <td>मक्कारीका बदला, शिकारीको दण्ड</td> <td>८१८</td> </tr> <tr> <td>संग पुस्त जलमनुष्य</td> <td>"</td> <td>आसक्ति</td> <td>८१९</td> </tr> <tr> <td>मनकता शेष यहूदी</td> <td>"</td> <td>बच्चेका मां पर प्रेम, शिक्षण</td> <td>"</td> </tr> <tr> <td>अजीबुल खिलकत विचित्र पशु</td> <td>७९५</td> <td>दरजीको दण्ड</td> <td>८२०</td> </tr> <tr> <td>उनका</td> <td>"</td> <td>लिपी, गेंडा, बेफीगाकी सहायता, ऊंट</td> <td>"</td> </tr> <tr> <td>दोशिरके मनुष्य छातीमें शिर</td> <td>"</td> <td>ऊंटकी प्रतिहिंसा</td> <td>८२१</td> </tr> <tr> <td>घुटनेके नीचे कान, श्वान मुख</td> <td></td> <td>ऊंटनीका मोह, चूर २ कर दिया</td> <td>८२२</td> </tr> <tr> <td>अश्वमुख मनुष्य, पचास गजका</td> <td></td> <td>घ्राणशक्ति</td> <td>"</td> </tr> <tr> <td>मनुष्य एक टांगके मनुष्य, तात्पर्य</td> <td>"</td> <td>हवसियोंकी घ्राणशक्ति, घोड़ा, गोरखर</td> <td>८२३</td> </tr> <tr> <td>निर्गमसे निर्धारण</td> <td>७९७</td> <td>घोड़ोंके दो झुण्ड</td> <td>"</td> </tr> <tr> <td>पशुसे मनुष्य और मनुष्यसे पशु</td> <td>"</td> <td>जंगली घोड़े और भेड़िये</td> <td>"</td> </tr> <tr> <td>भेदका कारण</td> <td>"</td> <td>अरबी सरदारका घोड़ा वाजीगरोके घोड़े</td> <td>८२४</td> </tr> <tr> <td>महावीर, वैज्ञानिक, हाथी गोपाल दास</td> <td>८००</td> <td>बैल, सांड, बछड़ा और गऊ</td> <td>८२५</td> </tr> <tr> <td>ग्यारहवां द्वार मोक्षका अधिकारी,</td> <td>"</td> <td>बैलसे आदमीकी बातें</td> <td>"</td> </tr> <tr> <td>लिखनेका कारण</td> <td>८०१</td> <td>पूर्वके साधु</td> <td>"</td> </tr> <tr> <td>१९ अध्याय । जानवर</td> <td>८०२</td> <td>ज्ञानी बैल, साध्वी रामगऊ</td> <td>८२६</td> </tr> <tr> <td>बन्दर, चोर पकड़नेवाला बन्दर</td> <td>"</td> <td>जंगमोका बैल, भ्वालेकी रखवाली</td> <td>८२७</td> </tr> <tr> <td>जमीदारका बन्दर, बच्चेको निकाला</td> <td>८०३</td> <td>योग्य गऊ</td> <td>८२८</td> </tr> <tr> <td>गाड़ी हांकनेवाला, बुद्धिमती वानरी</td> <td>८०४</td> <td>चीता मारनेवाला सांड, राक्षसकी गाय</td> <td>"</td> </tr> <tr> <td>सेवक बन्दर, चंपेन, हम्बाका बन्दर</td> <td>८०५</td> <td>भिस्तीका बैल</td> <td>८२९</td> </tr> <tr> <td>रैंग कायप, शव लेनेवाला</td> <td>८०६</td> <td>न्यायकी प्रार्थना, विशेष बात</td> <td>"</td> </tr> <tr> <td>रोटी बनानी, मनुष्यकी सन्तान</td> <td>८०७</td> <td></td> <td></td> </tr> </tbody> </table>
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<table border="1"> <thead> <tr> <th>विषय.</th> <th>पृष्ठ.</th> <th>विषय.</th> <th>पृष्ठ.</th> </tr> </thead> <tbody> <tr> <td>धर्मात्मा भैंसा, भैंसकी कामात्मता, भैंसका प्रेम</td> <td>८३०</td> <td>निउफौण्ड लेण्ड डाग</td> <td>८५६</td> </tr> <tr> <td>महात्मा भैंसा</td> <td>८३१</td> <td>हिरण</td> <td>८५७</td> </tr> <tr> <td>गदहा</td> <td>८३२</td> <td>कस्तूरी मृग</td> <td>८५८</td> </tr> <tr> <td>गाना सुननेका शौकीन, न्यायकी प्रार्थना</td> <td>"</td> <td>पंचकमें घासका त्याग, बकरी</td> <td>"</td> </tr> <tr> <td>सुअर रीछ, रीछकी मैत्री</td> <td>८३३</td> <td>कथासुननेवाली, सदनाको उपदेश</td> <td>८५९</td> </tr> <tr> <td>बोरनियोंका रीछ, शाही शोक</td> <td>"</td> <td>भेड़, स्वदेश प्रेम, लोमड़ी</td> <td>"</td> </tr> <tr> <td>यीसनका रीछ</td> <td>८३४</td> <td>बिल्ली और डायन</td> <td>८६०</td> </tr> <tr> <td>रीछकी प्रतिष्ठा, स्तुतिसे खुशी</td> <td>"</td> <td>लांडकी डाइन बिल्ली, रक्त दानसे</td> <td></td> </tr> <tr> <td>यांत्रिक उपाय</td> <td>८३५</td> <td>आपत्ति, डायनकी सवारीकी शंका</td> <td>८६१</td> </tr> <tr> <td>मानुषी भोगी, भेड़िया</td> <td>"</td> <td>बिल्लियोंका प्रेम, चीलके रूपमें डायन</td> <td>८६२</td> </tr> <tr> <td>शाह एम्यूल्स तथा एम्स</td> <td>"</td> <td>उल्लूके रूपमें डायन</td> <td>"</td> </tr> <tr> <td>नरकन्या</td> <td>८३६</td> <td>बिल्लीके रूपमें, घात स्त्रीकी हत्या</td> <td>८६३</td> </tr> <tr> <td>भेड़ियेका पाला मनुष्य, चरक</td> <td>"</td> <td>चीलके रूपमें बूढ़ी डायन</td> <td>"</td> </tr> <tr> <td>स्मार</td> <td>८३७</td> <td>बगुलेके रूपमें मारा</td> <td>"</td> </tr> <tr> <td>कुता, रामकालका श्वान</td> <td>८३८</td> <td>निष्कर्ष, अन्तर्धान होना, विज्जू</td> <td>८६४</td> </tr> <tr> <td>मनुष्यकीसी बात</td> <td>८४०</td> <td>विज्जूओंका परस्पर प्रेम</td> <td>"</td> </tr> <tr> <td>नानी कुतिया, डब्बू</td> <td>"</td> <td>उपसम, चूहा, श्वेत चूहा</td> <td>८६५</td> </tr> <tr> <td>दूसरा, डब्बू, अन्तर्धामिनी कुतिया</td> <td>८४१</td> <td>सर्प सर्पोंके राजा, सर्प सभा</td> <td>८६७</td> </tr> <tr> <td>मोती राम, पठानका कुता</td> <td>८४२</td> <td>ढोसी पर्वतका नागराज</td> <td>८६९</td> </tr> <tr> <td>कुताकी योनिमें कर्जी</td> <td>८४३</td> <td>ग्रन्थकारका मत</td> <td>"</td> </tr> <tr> <td>कुता और संन्यासी</td> <td>८४४</td> <td>बाल रूपीका वीन प्रेम</td> <td>"</td> </tr> <tr> <td>विदुषी कुती, बुलहाउण्ड</td> <td>८४५</td> <td>साँड़ बननेवाला सांप</td> <td>८७०</td> </tr> <tr> <td>क्विसरोट जानका, कथन, स्केमेक्सका कुता,</td> <td></td> <td>स्त्री बननेवाली नागिन, यमदूत</td> <td>८७१</td> </tr> <tr> <td>अनुचितकी लज्जा, बेंडका लानेवाला</td> <td>८४६</td> <td>मानुषीके गर्भसे बाबा घासीराम सांप</td> <td>८७२</td> </tr> <tr> <td>डूबनेसे बचानेवाला</td> <td>८४७</td> <td>सांप और बालक</td> <td>८७४</td> </tr> <tr> <td>रोटी खरीदनेवाला</td> <td>८४८</td> <td>मानुषी भाषापर तीरीत</td> <td>"</td> </tr> <tr> <td>बुद्धिमान् दण्डी</td> <td>"</td> <td>हदीस मुहम्मदी खुदाका शाप</td> <td>"</td> </tr> <tr> <td>गड़रियेका कुता</td> <td>८४९</td> <td>आदमका दश दण्ड</td> <td>"</td> </tr> <tr> <td>हाग साहिब</td> <td>८५०</td> <td>होवाको पंद्रह दण्ड, निष्कर्ष विरोध</td> <td>८७५</td> </tr> <tr> <td>मारटन साहिब</td> <td>"</td> <td>हीरा पुत्र होनेका आशीर्वाद</td> <td>"</td> </tr> <tr> <td>स्यायल डाग, रूप्योंकी सेंभाल</td> <td>८५१</td> <td>विषैला सांप, बिच्छू मरानेवाला अजगर</td> <td>८७६</td> </tr> <tr> <td>स्मानियल रोवरकुता, साम नामका कुता</td> <td>८५२</td> <td>भैंसके यनको पीनेवाला</td> <td>८७७</td> </tr> <tr> <td>पूडल डाग</td> <td>८५३</td> <td>मोटा छोटेमें, रागसे प्रेम</td> <td>"</td> </tr> <tr> <td>विविन्नपनिहा कुताकुतिया</td> <td>"</td> <td>शत्रुको मरानेवाला</td> <td>"</td> </tr> <tr> <td>प्रणदेनेवाला, भविष्य दृष्टि, वर्तमानका ज्ञाता</td> <td>८५४</td> <td>बच्चोंके लिये क्रोध, रेंट लिंग स्नेक</td> <td>९७८</td> </tr> <tr> <td>मास्टिकजातिका कुता</td> <td>"</td> <td>सांपसे खेल चेमर लेन</td> <td>"</td> </tr> <tr> <td>मास्टिककी बफादारी,</td> <td>८५५</td> <td></td> <td></td> </tr> <tr> <td>माउण्ट सेन्ट वर्नर्ड हाथ</td> <td>"</td> <td></td> <td></td> </tr> </tbody> </table>
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<table border="1"> <thead> <tr> <th>विषय.</th> <th>पृष्ठ.</th> <th>विषय.</th> <th>पृष्ठ.</th> </tr> </thead> <tbody> <tr> <td>चमर लेन रंगपर मत, विच्छू</td> <td>८७९</td> <td>हुद हुदपर कुरान, कप्तान वाउन</td> <td>"</td> </tr> <tr> <td>बादशाह का जहर</td> <td>"</td> <td>जर्मनी और फ्रांसके कबूतर मैना</td> <td>९०१</td> </tr> <tr> <td>रेशमका कीड़ा</td> <td>८८०</td> <td>चोर मैना, रोम सेन साहिब</td> <td>"</td> </tr> <tr> <td>गिरगिट, मकड़ी</td> <td>"</td> <td>तोता</td> <td>९०२</td> </tr> <tr> <td>चींटी, परवालियोंमें बादशाह और बेगम</td> <td>८८२</td> <td>निशानेबाज और लिपिके जानकारी</td> <td>"</td> </tr> <tr> <td>सहवास, सहवासके बाद मौत</td> <td>८८३</td> <td>राजा रसालुके तोता मैना</td> <td>९०३</td> </tr> <tr> <td>चींटियोंके पर, बच्चे</td> <td>"</td> <td>रसालुका अन्तर्दृष्टि तोता</td> <td>९०४</td> </tr> <tr> <td>बच्चोंका भोजन</td> <td>८८४</td> <td>लंगड़े तोतेकी बातें</td> <td>९०५</td> </tr> <tr> <td>चींटियोंका भोजन, भोजनपर युद्ध</td> <td>"</td> <td>एक चालाक तोता</td> <td>"</td> </tr> <tr> <td>चींटियोंके घर</td> <td>"</td> <td>हृष्य देशका तोता, झिङ्कीकी नकल</td> <td>"</td> </tr> <tr> <td>जंगी लड़ाई</td> <td>८८५</td> <td>तोतेकी ईर्ष्या</td> <td>९०६</td> </tr> <tr> <td>चुराने और चुरानेवालोंका रंग</td> <td>"</td> <td>ईर्ष्यसि हत्या, स्वाद</td> <td>"</td> </tr> <tr> <td>हृष्यकी चींटियाँ</td> <td>८८६</td> <td>तोतेकी चोरी पर आश्चर्य</td> <td>"</td> </tr> <tr> <td>चींटियोंका बादशाह और मुलेमान</td> <td>"</td> <td>सरायका तोता</td> <td>९०७</td> </tr> <tr> <td>दीमक राजा भोज और चेंटी (काशीके बकरियाकुण्डका इतिहास)</td> <td>"</td> <td>अभ्यागतोंसे बात</td> <td>"</td> </tr> <tr> <td>पक्षी गिद्ध</td> <td>८८७</td> <td>ट्रापर बातें, विलीयमका तोता</td> <td>"</td> </tr> <tr> <td>मिश्ठी कयरु, गिद्धोंका बादशाह</td> <td>८८८</td> <td>तोता नामा बुलबुल</td> <td>९०८</td> </tr> <tr> <td>जटायु तथा सम्पाति, उकाब</td> <td>"</td> <td>बुलबुलोंकी मानुषी वाचा</td> <td>"</td> </tr> <tr> <td>लगलग, व्यर्थका द्वेष</td> <td>८८९</td> <td>चण्डूल और सांप</td> <td>९०९</td> </tr> <tr> <td>घरेले और बनेलेकी ईर्षा</td> <td>८९०</td> <td>विचित्र कर्तव्य</td> <td>९१०</td> </tr> <tr> <td>लगलगोंका न्याय</td> <td>"</td> <td>समझदार चिड़िया</td> <td>"</td> </tr> <tr> <td>लगलगके राजाका न्याय</td> <td>८९१</td> <td>थसकी बोली, मुर्ख सीना, बड़ी आवाबील</td> <td>"</td> </tr> <tr> <td>अनुमान, राजहंस</td> <td>"</td> <td>सांप निकालनेवाली, रेल</td> <td>९११</td> </tr> <tr> <td>राजहंसिनीकी सावधानी</td> <td>८९२</td> <td>पफन, कासबीक, भुजंगा</td> <td>९१२</td> </tr> <tr> <td>मयूर, पेरू, गिनीफाउल</td> <td>"</td> <td>गोड स्क्रिउ, कुंज, इनी</td> <td>९१३</td> </tr> <tr> <td>बतख</td> <td>८९४</td> <td>हार्न बिल, कोकिला</td> <td>९१३</td> </tr> <tr> <td>नमरूह बादशाहकी बतख</td> <td>"</td> <td>हजार दास्तान बुलबुल</td> <td>९१४</td> </tr> <tr> <td>कौज, दोनोंकी प्रेमाधिक्यसे मृत्यु</td> <td>"</td> <td>जेकड़ा जे डेडुबर्ड, अनल पंख</td> <td>"</td> </tr> <tr> <td>कौवा तथा कुलाग, कागोंका न्याय</td> <td>८९५</td> <td>किंगा फिसर</td> <td>९१५</td> </tr> <tr> <td>खरगोशको शिकार</td> <td>"</td> <td>मृत्युकी सूचना देनेवाली, विशेष वक्तव्य</td> <td>९१६</td> </tr> <tr> <td>कुत्तेसे मित्रता, मानुषी वाक्</td> <td>"</td> <td>मक्खियाँ, मक्खियों पर विश्व</td> <td>"</td> </tr> <tr> <td>चोर बगुला मुर्ग</td> <td>८९६</td> <td>डाक्टर वाटयार्वी तथा फ्रानसिस हिउबर</td> <td>९१७</td> </tr> <tr> <td>मुरगावी, उल्लू, कारभो रेण्ट</td> <td>८९७</td> <td>मधु मक्खियोंकी तीन जातियाँ</td> <td>"</td> </tr> <tr> <td>चमगीदड, रक्त पीनेवाली</td> <td>८९८</td> <td>हिउबर</td> <td>९१९</td> </tr> <tr> <td>गायनाकी चमगीदड़ी</td> <td>८९९</td> <td>जलचर</td> <td>९२०</td> </tr> <tr> <td>फाखता या पण्डुक कबूतर</td> <td>"</td> <td>घडियाल बिल्वी और लोमड़ी</td> <td>"</td> </tr> <tr> <td>प्लेनीका मत</td> <td>९००</td> <td>घरेला घडियाल, मानुषी भोगी</td> <td>"</td> </tr> <tr> <td></td> <td></td> <td>आगस्तसका मछलियोंसे शकुन</td> <td>९२१</td> </tr> </tbody> </table>