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कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)

by कबीर साहेब

Source: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (origin)

Devanagarihipublished1,367 pages

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पूर्वमीमांसाआदिकी प्रतिद्वन्द्वितामें उत्तर मीमांसा स्थापित की, श्रीरामानुजाचार्य, निम्बादित्य आदि दिव्य आचार्य पुरुषोंने जीव, ब्रह्म और माया विषयके विज्ञानोंको सर्वसाधारणोंके सामने रखा।

किन्तु महाराजा अशोकके वंशधरोंको निर्बल हो जानेके पीछे भारतका वैदेशिक प्रचार शिथिलप्राय हो गया क्रमशः दूसरे देश भारतके दावेसे निकल गये।

इतिहास एवम् पुरातत्त्वकी खोज तो हमें यह बताती है कि, महाराजा अशोकका इतना बड़ा साम्राज्य था जितना कि अशोकके बादकी कोई भी शक्ति आजतक नहीं बनासकी है न बनानेकी आशाही है। आजकी बौद्धोंकी ६३ करोड़ोंकी संख्या भगवान् बुद्ध देवके सार्वजनीन हितोपदेशके बदलेकीही है इसका निर्माण सच्चे उपदेशके आधार परही हुआ है यह कहीं भी लिखा हुआ नहीं मिलता कि बौद्धोंने कभी भारतसे बाहर विदेशोंमें तलवारके बलपर बौद्ध धर्मका प्रचार किया था जैसा कि इसलामके प्रवर्तकोंने धर्मप्रचारके नामपर असहाय जीवोंका रक्त पानीसे भी सस्ता बहाया है। बौद्ध धर्मका सच्चा सिद्धान्त अहिंसा था जिसका कि प्रचार केवल विश्वके निरीह प्राणियोंको शान्ति देनेके लिये किया गया था। यही भारतके वीरोंकी विशेषता है कि, यहाँके धर्म प्रचार भी सुख शान्ति पूर्वक एवं सुख शान्तिके लिये हुए। उनका यह सिद्धान्त कभी भी नहीं हुआ कि, परमात्माने हम राजाओंको इसलिये पैदा किया है कि, हमारे मजहबके न माननेवालों काफिरोंको कत्ल कर दिया करे एवम् धर्माचार्योंको धर्मप्रचारके लिये भेजा है।

किन्तु उनका तो यही विचार रहा है कि, हमे परमात्माने प्रजाका रंजन करनेके लिये भेजा है कि, उसे किसी तरह भी दुखी न होने दें तथा भारतके धर्माचार्य दिव्य सन्देश सुनानेके लिये आते हैं सत्यपुरुषका सामयिक अनुशासन जनताके सामने रख देनेका उनका कार्य है यह लोगोंकी इच्छापर निर्भर रहा है कि माने वा न माने, न तो इस विषयमें उन्होंने कभी बल-प्रयोगको उत्तम समझा है न कभी ऐसी आज्ञाही दी है।

जब मैं सांप्रदायिकताके संकीर्ण दायरेकी ओर जाता हूँ तो मुझे यह कहनेके लिये अवश्य बाध्य होना पड़ता है कि, संकीर्णता तो किसीकी भी सर्वाशतः सच्ची नहीं कही जा सकती चाहे वो अपने संप्रदायकी हो चाहे दूसरोंकी हो पर पश्चिमके धर्माचार्योंके हृदयमें चाहे कुछ भी हो कुछ एकको छोड़कर अपने सिद्धान्तों के प्रचारमें हिंसाका आश्रय सबने लिया है यही पूर्व और पश्चिमकी विभिन्नता है।

उनका तलवारके बलका धर्म प्रचार उन्हींके देशोंमें नियमित रहा हो यह बात नहीं है किन्तु उनके अनुयायियोंने मानव सत्यताको सिखानेवाले सब धर्मोंके गुरु एवम् आपसकी फूटसे स्वतः विदीर्ण हुए शिथिलेन्द्रिय इस वृद्ध भारतवर्षको भी धर्मके नामपर रक्त रंजित किये बिना नहीं छोड़ा। भारतवर्षकी सीमाके देशोंके बलपूर्वक इसलाममें दीक्षितकर लेनेके पीछे भारतवर्षकी बारी आई, सम्राट पृथ्वीराजके बाद भारतवर्ष मुसलमानोंके ताबे आया।

मुसलमान शासकोंने धर्म के नामपर बड़े २ अत्याचार किये प्रतिदिन बेगुनाहोंका रक्त पानीकी तरह बहाया जाता था हिन्दू धर्म ग्रन्थोंसे पानी गरम हुआ करते थे, हजारों कुलललनाएँ बेश्याओंसे भी बुरी बना २ कर बिठा दी जाती थी विशेष क्या कहा जाय यदि उस कालमें रौरव नरक भी मूर्तिमान् होकर भारतकी दुर्दशा देख लेता तो वह भी इसकी दशापर दो चार आसूँ बहाये बिना न रहता। देशभरमें त्राहि २ मची हुई थी जिनके हाथमें शासन सूत्र था वे अपना विशुद्ध कर्तव्य भुलाकर धर्म देशमें फँसकर पैशाचिक अत्याचार कर रहे थे। अन्तमें निर्दोषोंका खून रंग लाया, सत्य-