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कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)

by कबीर साहेब

Source: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (origin)

Devanagarihipublished1,367 pages

श्रीमद्भगवद्गीता अ. ३ श्लो. ४५ विवेचन

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चौहत्तरवाँ प्रकरण

प्रथम भागके प्रथम अध्यायका उपसंहार ।

वहांतक तो मैंने कालपुरुषके धर्मका विवरण किया, जिनमें फँसकर मनुष्य के पथ नहीं मिलता. कारण यह कि, यह अहंकार तथा भ्रममें फँस रहा है, न यह ईर्षा तथा अहंकारको छोड़ता है न इसको सत्यपुरुषकी भक्तिका मार्ग मिलता है, सब इसी अभिमानमें “कि, मैं बड़ा और मेरा धर्म तथा गुरु बड़ा” डूबे हुए हैं, कौन सत्यका इच्छुक है जो मिथ्याको छोड़कर, स्वसम्बेदकी सत्य शिक्षाकी खोज करे ।

ग़ज़ल आजिज़ ।

यह मुत कब्रिबर हुआ इनसान खाकी । जिधर देखो उधर सामान खाकी ॥
पड़ा जो फ़र्श पर लाचार कोई । रसाई अर्श इम्कान खाकी ॥
बहर काने तमाशा मजहरे जाता । वही खुद सूरते इनसान खाकी ॥
जो मुरशिदके कदमकी खाक होजा । सफ़ाकर आइनः ईमान खाकी ॥
कदम गाहे उसीकी जा सलामत । बजुज उसके नहीं दरमान खावी ॥
नहीं कोई दूसरा दुश्मन हमारा । कि खाकी शकलका शैतान खाकी ॥
हिमाकृतसे है पैवस्तः लजायज़ । सरीरो सूतवतो सुलतान खाकी ॥
न अपने अस्लको पहचानता है । हुआ मगरूर नाफ़रमान खागी ॥
सिफ़त तीनों बहम अरबः अनासर । बहम मखलूत हैं यकसान खाकी ॥
न इनसे आदमीको पेश दरती । तेरे बे फायदः अरमान खाकी ॥
न हो सगरूर खुद इल्मो अमलपर । कि बानीवेद और कुरआन खाकी ॥
मिलेगा आजजीसे हकको आजिज़ । करे अपनेको गर कुरबान खाकी ॥
इति श्री कबीर मन्शूरके प्रथम भागका प्रथम अध्याय ॥ १ ॥

प्रथम अध्यायका परिशिष्ट

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कबीर मन्शूरके इस अध्यायमें चौहत्तर प्रकरण हैं । अब आगे इस अध्याय का परिशिष्ट भाग दिया जाता है जिसके लिये पीछे कई स्थानोंमें टिप्पणी द्वारा सूचना दी जा चुकी है । इन प्रमाणोंको यह इसलिये दिया है कि, बहुतसे महंत संत सेवक सतियोंने अनुरोध किया है कि, जहाँ जहाँ ग्रन्थोंके प्रमाणकी आवश्यकता हो वहाँ वहाँ वह जरूर दे देना चाहिये । यद्यपि मेरा भी यही विचार था

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कि, इन प्रमाणोंकी जहाँ जहाँ आवश्यकता है ये वहीं वहीं दे दिये जायें किन्तु, कितने कारणोंसे वह न होसका, इसलिये यहा दे दिया है ।

प्रमाण कबीर वाणीका ।

देबो प्रकरण ५ पृष्ठ २२.

प्रथम वानी सुनियो चितलाई । आदि अंतकी संधि देहुँ बताई ॥
प्रथम आदि समरथ हत सोई । दुसरा अंस हता नहिं कोई ॥
आदि अंकुर सुरति तब कीन्हा । सात करीको गरभ तब दीन्हा ॥
इच्छा सूरति दुसरे उपजाई । सातो करी में चित्त बनियाई ॥
छिपा रूपहिं कीन्ह परगासा । स्वाति रूप इच्छा रहिवासा ॥
सात तेहिंते इच्छा उपजाई । भिन्न भिन्न परकार बनाई ॥
विमल शब्द विगसित तब भयेऊ । तब हुलासबुंद पाँच करिमें दयेऊ ॥
तब पांच अंड भयो उत्पानी । तत एक भिन्न परसानी ॥
नहिं तब धरनी नहिं अकासा । नहिं तब दुसरो हतो अवासा ॥
धावै अंड करै चौचन्दा । आपु अदेख और सहज अनन्दा ॥
तबकी बात नहीं कोई जाने । कहाँ समुझाय तो झगरा ठाने ॥
धर्मदास सुनियो चितलाई । फूटो अंड सूरतसे भाई ॥
सहज अंकुर बीज निरमाई । तिहिंकी इच्छा अंड उपजाई ॥
तब सरबनते साजी बानी । तेहिंते मूल सुरति उत्पानी ॥
अबोलबुन्दतेहिं सुरतिको दीन्हा । पांच अंश तब उत्पन कीन्हा ॥
पांचों अंस तब कहाँ बुझाई । पांचों अंडमें तुम जाओ समाई ॥
एकहिं एक अंड तब गयेऊ । आपहु आप कलामें ठयेऊ ॥
तबअविगति एक खेल बनावा । पांच सरूप पांचों अंडहिं आवा ॥
फूटो अंड तेज भई धारा । सबमें देखु पांच ततसारा ॥
पांच तत भिन्न भिन्न विस्तारा । सात अद्विस्ट तेहिंमाहिं संचारा ॥
देखि सरूप अंडकर भाई । सोहंग सुरति तबहिं उपजाई ॥
पुरुष सकती भई दौय प्रकारा । तिन्हको सोंप्यो उत्पन सारा ॥
तासों अंकुर भेद बतावा । वचन सुरत एक संग समावा ॥
ताते ओहं पुरुषको अंसा । ओहं सोहं भए दो बंसा ॥
तिनकी आज्ञा उत्पन्न कीन्ही । शब्द सनद उनहूको दीन्ही ॥
मूलसुरति औ पुरुष पुराना । रचना बाहेर कीन्ह अस्थाना ॥
ओहं सोहं अंडनमें रहेऊ । सकल सृष्टिके कर्ता कहेऊ ॥

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प्रथम अंकुर दूसर इच्छा उत्पानी । तिसर मूल चौथ सोहं ठानी ॥
ओहं सोहं की बंधानी । आठ अंस तिन्ते उत्पानी ॥
आठ अंस भए एकहि ध्याना । करता ख्रिस्टिको भयो परवाना ॥
करता सरूप आठ भए अंसा । तिन्हके भए सृष्टि सब वंसा ॥
तेज अंड अंचितकूं दीन्हा । प्रथम सुरत जब उत्पत कीन्हा ॥
जोहं अंस दुसरे भए भाई । धीरज अंड तिन्ह बैठक पाई ॥
तिसरे अंस अंक निरमाई । छमा अण्ड तिन्ह बैठक पाई ॥
चौथे अंस सुकृत है सारा । सत्य अंड है ताहि पसारा ॥
पांचऐ अंस हिरम्पर भाई । सुमत अंड तिन्ह बैठक पाई ॥
दोय अंस दोय करी समाने । तिनका भेद गुरुगम जाने ॥
एक अंस त्रिगुण अवतारा । ते सब सृष्टिके भये कडिहारा ॥
साखी—एती उत्पत सुरत की, भिन्न भिन्न परकार ।

कहें कबीर धर्मदाससों, आगे बंस असार ॥

धर्मदास बचन ।

साँचे सद्गुरु की बलिहारी । धर्मदास विनती अनुसारी ॥
धन्य भाग मोहि मिले गुसाई । अपनो कै मोहि लीन्हमुकताई ॥
चारि वेद अरु सास्त्र पुराना । सबहीके हम सुनिया ज्ञाना ॥
अविगति गति काहु नहिं जानी । जो तुम कही आदिकी बानी ॥
सुरत सोहंगके आठ भए अंशा । तिनके सृष्टि सबही भए वंशा ॥
अपरंपार है तिनका सेषा । अचित्य ख्रिस्टिको कहो विवेषा ॥
साखी—तुम निज सतगुरु सत्य हो, हम निज चिन्हा सोय
अचित ख्रिस्टिको भेद कहो, अविगति पूछौं तोय
धर्मदास तुम बडे विवेकी । तुम्हारे घटमें बुधि बड देखी ॥
अचित्य ख्रिस्टिको कहो पसारा । तेज अंड तिन्ह पाये सारा ॥
वाराहि पालंग अंड विस्तारा । तिहिमें पांच तत्त्व है सारा ॥
इनको बैठक आसन दीन्हा । अंड सिखर लोक तिन्ह कीन्हा ॥
प्रेम सुरति तिन कीन उपचारा । तिन्हते भयो अच्छर विस्तारा ॥
अच्छर सुरत तब मोहमें आई । ताते अंस चार निरमाई ॥
चारिअंस भये चारि परकारा । चौविध दीप चौविधहि पसारा ॥
प्रथम अंस पर माया भयऊ । सो पिरथी तत्त्व बीज निर्मयऊ ॥
दुसरे कूर्म भये अवतारा । पालङ्ग अठानवे कीन्ह विस्तारा ॥

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तिसरे अदली अंस निरमावा । सेसनाग सो नाम धरावा ॥
चौथे अंस भए धरमराई । जिन्ह पाप पुण्यको लेखा पाई ॥
चारि अंस अच्छर ते भयऊ । चार अंस चार मत ठयऊ ॥
तब समरथ अनिगति यक कीन्हा । पूरी नींद अच्छरको दीन्हा ॥
चौसठ जुगलौं सोय सिराई । तौलौं कैल सुरत ठहराई ॥
समरथ सुरति जल तत्त्व समानी । कैल अंड कीन्हा उत्पानी ॥
तेहि पीछे अक्षर पुनि जागा । मोह तत्त भये अनुरागा ॥
चक्रित होय अच्छर बिलखाना । सोई मोह सब स्लिस्ट समाना ॥
अंड स्लिस्टमें देखा भाई । व्याकुल भए यह किन निरमाई ॥
समरथ छाप अंड सिर दीन्हा । अच्छर छापदेखि सो लीन्हा ॥
सोई अंड जलमें बिहराना । जिनको वेद नारायण माना ॥
ताते जोत निरंजन भयेऊ । तिनको सब जग करता कहेऊ ॥
अच्छर सुरति समरथकी बानी । तेहि गुण खेल भए उत्पानी ॥
निरंजन नाम अच्छर ठहराई । अर्चित भेद नहिं पावै भाई ॥
कैलिहिं देखा सकल पसारा । तब अच्छर सो वचन उचारा ॥
देउ पिता मोहि आग्या सोई । जो कछु इच्छा उपज्यो मोई ॥
सेवा करत सत्तर जुग बीता । तब मुख बोलै पुरुष अतीता ॥
जाव पुत्र जहां प्रिथ्वीको मूला । तहां कूरम बैठे अस्थूला ॥
सृष्टि भंडार कूरमको भाई । सोलह माथ हथ चौसठ पाई ॥
चले निरंजन कुरम लगि आये । पुरुष ध्यानसे कुरम जगाये ॥
उत्पति हमकूं मागे देह । ना देहो तो मारिकै लेहैं ॥
तर्वाहि कूर्म अपने मन मानी । ऐतो कैल भयो अभिमानी ॥
हम माँगे कछु देब न भाई । जाउ पुरुष लगिवेगि सिध्दाई ॥
कैल कूर्मते युद्ध निर्मयऊ । माथा तीनछीन पुनि लयऊ ॥
लेकर माथै सुन्यमें आवा । कैल सुरत घट मोह समावा ॥
तीनों माथे भच्छ तब लीन्हा । तबते अच्छर पुरुष डर कीन्हा ॥
मनमें तब अभिमान समाई । त कर जोरिके सेवा लाई ॥
सोला चौकडी जब चलिआई । तब लगि निरंजन सेवा लाई ॥
अच्छरपुरुष जो कीन्ह विचारा । तिन्हको समरथ वचन उचारा ॥
विदेह बानि तब अच्छर पाई । तो बानी कन्या भइ भाई ॥
ताको बहुत सिखापन दीन्हा । अस्तंगी तिन कन्या कीन्हा ॥

दूसरी व्याख्या

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पुत्री निरंजन लागि सिधाऊ । तुमको समरथ सदा सहाऊ ॥
तब कन्या निरंजन लग आई । एक पाँव पर सेवा लाई ॥

देखे पलक उधारिके, कन्या आगे ठाढ़ि ।

उपज्यो मोहऊ प्रेम तब, विप्रित मनमें बाढ़ि ॥

पलक उधारि कैल तब देखा । अपने मनमें कीन्ह विवेका ॥

कहै कैल सुनो तुम बानी । मो कारन तुहि पुरुष उत्पानी ॥

हम तुम कीजै स्लिस्ट पसारा । तीनहि लोक सकल महिभारा ॥

तब अस्टंगी कैलसों कहाई । मोर तोर नहि होय सगाई ॥

मैं तोरि बहिनी तू मोर भाई । सो अनरीति सब दीन चलाई ॥

कहैं कैल सुनु आदि भवानी । हमरे वचन तुम काहै न मानी ॥

जो तुम कहा हमारा मानौ । तौ तुम उत्पति निरन ठानौ ॥

तब अस्टंगी कहै बुझाई । बिन अज्ञा तोहि पुरुष रिसाई ॥

बिन आज्ञा कूरम सिर छीना । ताते पुरुष अंत करि दीन्हा ॥

देखि स्वरूप कन्यहि को, मनमें रोष भराय ।

मनमें रोष भरयो जब, कन्यहिं लीन्हीं खाय ॥

लीलत कन्या कीन्ह पुकारा । पुरुष वचन ले हिये सम्हारा ॥

तब सुरति बनाते कैलहि मारा । कन्या तब उगलै वहि वारा ॥

यहि प्रपंच अच्छर सब कीन्हा । ताते कैल मती हरि लीन्हा ॥

कन्या सुरति तब गई भुलाई । जबते पेट कैलके आई ॥

पिता पिता कैल सो कहेऊ । मदन प्रचंड कैल छन भयेऊ ॥

अष्टांगी कैल एकमत कीन्हा । ताते सृष्टि रचवे मन दीन्हा ॥

कियो संयोग भयो त्रैवारा । जेठो ब्रह्मा लघु विष्णुकुमारा ॥

तीजे संभु विस्तुते छोटा । येक निरंजनही के ढोटा ॥

जैसे रूप निरंजनही, तैसे तीनों भाय ।

यह उत्पत है कैलकी, आगे स्लिस्ट उपाय ॥

करि परपंच सूत्र में गयऊ । मनमें बहुत आनंदित भयऊ ॥

यहि आनन्दमें गए भुलाई । ताते स्वासा सुरति उठाई ॥

तेहि स्वासाते वेद कढ़ि आई । रूप निधान चारों बने भाई ॥

हाथन पोथी सुरसुर बानी । ताते कैल भयो अभिमानी ॥

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चारि वेद सब मरम बतावा । तब चलि अच्छर शून्यमें आवा ॥
कैल प्रचंड भयो बरियारा । तब अच्छरते बुद्धि विचारा ॥
येतो कैल औ जीव विचारा । समरथ छाप लियो टकसारा ॥
अच्छर चलै अचिन्त लगि गयऊ । महासूत्र छोडि तब दयऊ ॥
तब अचित्य अच्छर समझावा । यह अविगति गति काहु ननपावा ॥
तुम तो सुरति हमारहि भाई । कैल सुरति समरथ निर्मायी ॥
लच्छ जीव नित करै अहारा । सवा लच्छ नितप्रति विस्तारा ॥
अंसवंस मिलि एक मत कीन्हा । चारों ज्ञान विचारि तब लीन्हा ॥
तुम गति हंसरूप है भाई । वह तो कैल जीव दुखदाई ॥
तुम समरथको ध्यान लगावो । अंतर गति समरथ सुख पावो ॥
चारि ज्ञानमें निरनय कीन्हा । सो निरनय चारि अंशको दीन्हा ॥
कहे कबीर धर्मदाससों, एता सकल पसार ॥
तीन सुरतिको खेल भयो, चौथे हंस उबार ॥

धर्मदास उवाच ।

धरमदास बहुतै सुख पावा । उठि सतगुरुसो विनती लावा ॥
सांचे वचन तुम्हारी बानी । आदि अंतकी निरणय ठानी ॥
कौन है अंड कौन है अंसा । कोहै अंस कौन है वंसा ॥
कौन कैल कौन गुण धारी । कौन स्निस्ट कौन संसारी ॥
एती बात मोहि सों भाखो । और गुप्त गोये जनि राखो ॥
विन देखी सबही कहै, सुनि पाई हम कान ।
सोई अदेख तुम दिखावहु, आदि अंत परमान ॥

सतगुरु कबीर उवाच ।

सुनि सतगुरु मनमें बिहँसानै । तुमसों धर्मनि निरनय ठानै ॥
तेज अंड है अच्छर बंसा । अचित्य अंस सोहं है हंसा ॥
निरंजन कैल चारि गुन धारी । तिन स्निस्ट अविगति संचारी ॥
तेज अंड अचित्त है अंसा । ओहं अंड जोहं है हंसा ॥
सत्य अंज जोहं है अंसा । सोरह तिनके उपज्यो वंसा ॥
पालंग पचीस तासु विस्तारा । पातालपांजी तिनको बैठारा ॥
तिसरो अंड छमा बखानी । अकह अंश तिन्हकी रजधानी ॥
अकहनामते सताविसै बंसा । तिन्हके सकल और हैं अंसा ॥

वेदके प्राकट्यपर मतभेद

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चौथा धीरज अंड है भाई । ताते सुक्ति अंस निरमाई ॥
वंश बयालिस तिनके कडिहारा । तिनकी सनद चलै संसारा ॥
पाँचे अंड सुमत निरमाई । अंश हिरम्भर बैठक पाई ॥
तिन्हके वंस सात परवानी । यह सब भेद लेहु पहिचानी ॥
पाँचहि अंड आठ भए अंसा । सात सुरति इक्कोत्तर बंसा ॥
चारि अंडको एक विचारा । दोए करीको भेद अपारा ॥
एक अंश कोई पार न पावै । सतगुरु निजही भेद बतावै ॥
सुरति सरूप हमही सब कीना । मान बंडाइ अंसनको दीना ॥
जब अतीत सुरत ठहरानी । सुरति समरथ घट आनि समानी ॥
दोई मछय एक आए समाई । तिन्हको नाम अच्छर ठहराई ॥
अक्षर इच्छा उपजी भावा । दूसर अंस कैल होय आवा ॥
आठवाँ अंस कालकी वानी । अच्छर घट जो आए समानी ॥
स्वासा होय बाहर कडि आई । तिन्हकी गति कोइ विरलै पाई ॥
पांच परगट तीन गुप्त पसारा । इनके अंस इग्यारह सारा ॥
चारि अंस भवतारन कीन्हा । चारि वेद निरंजन दीन्हा ॥
तीन देव स्त्रिस्टि अधिकारी । उपजनि बिनसनि दुखसुख भारी ॥
तिन चौरासी लच्छ बनावा । जीव अनेक बहुत निरमावा ॥
यह अविगति काहू नहि पावा । समरथ ऐसा खेल बनावा ॥
साखी-वेद कितेब जाने नहीं, पावे ग्यानी थाहू ।
तीन अंशलों सबही खेले, आगे अगम अथाहू ॥
इति कबीर बाणीका प्रमाण सृष्टि उत्पत्ति विषय ।

प्रमाण अनुराग सागर सृष्टि उत्पत्ति प्रकरणका ।

धर्मदास प्रश्न ।

अब साहब मोहि देहु बताई । अगर लोक सो कहौं रहायी ॥
लोक दीप मोहि बरनि सुनावहु । तिरषावन्तको अमि पियावहु ॥
कौने द्वीप हंसको बासा । कौने द्वीप पुरुष रहि बासा ॥
भोजन कौन हंस तहँ करई । औ बानी कहँ तहँ उच्चरई ॥
कैसे पुरुष लोक रचि राखा । द्वीपहिं को कैसे अभिलाखा ॥
तीन लोक उत्पत्ति भाखो । वर्णतहु सकल गोय जनि राखो ॥
काल निरंजन केहि विधि भयऊ । कैसे षोडश सुत निर्भयऊ ॥

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कैसे चार खानि विस्तारी । कैसे जीव काल बस डारी ॥
कैसे कूरम सेस उपराजा । कैसे मीनबराह्मिं साजा ॥
त्रय देवा कौने विधि भयऊ । कैसे महि अकास निरमयऊ ॥
चंद सूर कहु कैसे भयऊ । कैसे तारागन सब ठयऊ ॥
किहि विधि भइ शरीरकी रचना । भाषो साहेब उत्पत्ति बचना ॥
जाते संसय होय उछेदा । पाई भेद मन होय अखेदा ॥

छन्द—आदि उत्पत्ति कहो सतगुरु, क्रिपाकरि निज दासको ॥
बचन सुधा सु परकास कीजे, नास हों जम त्रासको ॥
एक एक विलोय बरनहु, दास मोहि निज जानिकै ॥
सत्य वक्ता सद्गुरु तुम लेब निश्चय मैं मानिकै ॥ १० ॥

सोरठा—निश्चय बचन तुम्हार, मोहि अधिक प्रिय ताहिंते ।
लीला अगम अपार, धन्य भाग दरसन दीये ॥ १० ॥

कबीर बचन ।

धरमदास अधिकारी पाया । ताते मैं कहि भेद सुनाया ॥
अब तुम सुनहु आदिकी बानी । भाषों उत्पत्ति प्रलय निसानी ॥

सृष्टिके आदिमें क्या था ?

तबकी बात सुनहु धर्मदासा । जब नहिं महि पताल अकासा ॥
जब नहिं कूर्म बराह औ सेसा । जब नहिं सारद गौरि गनेसा ॥
जब नहिं हते निरंजन राया । जिनजीवन कहैं बांधि झुलाया ॥
तेतिस कोटि देवता नाहीं । और अनेक बताऊँ काहीं ॥
ब्रह्मा विस्नु महेशुर नहिं तहिया । सास्त्र वेद कुरान न कहिया ॥
तब सब रहे पुरुषके माहीं । ज्यों बटबूच्छ मध्य रह छाहीं ॥

छन्द—आदि उत्पत्ति सुनहु धर्मनि, कोइ न जानत ताहि हो ॥
सबहि भो विस्तार पाछे, साख देऊँ मैं काहि हो ॥
वेद चारों नाहिं जानत; सत्य पुरुष कहानियां ॥
वेदको तब मूल नाहीं, अकथकथा बखानियां ॥ ११ ॥

सोरठा—निराकारते वेद, आदि भेद जाने नहीं ॥
पंडित करत उछेद, मते वेदके जग चले ॥ ११ ॥

ब्रह्मासे ऋषिमुनियोंकी श्रेष्ठता

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सृष्टिकी उत्पत्ति सत्पुरुषकी रचना ।

सत्य पुरुष जब गुप्त रहाये । कारन करन नहीं निरमाये ॥
समपुट कमल रह गुप्त सनेहा । पुहुप माहि रह पुरुष विदेहा ॥
इच्छा कीन्ह अंस उपजाये । हंसन देख हरष बहु पाये ॥
प्रथमहि पुरुष सब्द परकासा । दीप लोक रचि कीन्ह निवासा ॥
चारि करी सिंहासन कीन्हा । तापर पुहुप दीप कर चीन्हा ॥
पुरुष कला धरि बैठे जहिया । प्रगटी अगर वासना तहिया ॥
सहस्र अठासी दीप रचि राखा । पुरुष इच्छातै सब अभिलाखा ॥
सबै द्वीप रह अगर समायी । अगर वासना बहुत सुहायी ॥

सोलह सुतका प्रगट होना ।

दूजे सब्द जु पुरुष परकासा । निकसे कूर्म चरण गहि आसा ॥
तीजे सब्द सु पुरुष उच्चार । ज्ञान नाम सुत उपजे सारा ॥
टेकि चरन सम्मुख ह्वै रहेऊ । आज्ञा पुरुष दीप तिन्ह दयऊ ॥
चौथे सब्द भयो पुनि । जबहीं । विवेकनाम सुत उपजे तबहीं ॥
आप पुरुष किय दीप निवासा । पञ्चम सब्द सो तेज परकासा ॥
पँचऐ सब्द जब पुरुष उच्चार । काल निरंजन भौ अवतारा ॥
तेज अंसते काल होय आवा । ताते जीवन कहैं सन्तावा ॥
जिवरा अंस पुरुषका आहीं । आदि अंत कोई जानत नाहीं ॥
छठऐ सब्द पुरुष मुख भाषा । प्रगटे सहज नाम अभिलाषा ॥
सतऐ सब्द भयो संतोषा । दीन्हो दीप पुरुष परितोषा ॥
अठऐ सब्द पूरुष उच्चार । सुरति सुभाव दीप बैठारा ॥
नवमें सब्द अनन्द अपारा । दशऐ सब्द समा अनुसार ॥
ग्यारहें सब्द नाम निष्कामा । बारहें सब्द जलरंगी नामा ॥
तेरहें सब्द अचित्त सुत जानो । चौदहें सब्द सुत प्रम बखानो ॥
पन्द्रहें सब्द सुत दीनदयाला । सोलहें सब्द मैं धिरज रसाला ॥
सत्रहवें सब्द सुत योगसंतायन । एक नाल षोडश सुत पायन ॥
सब्दहिते भयो सुतन अकारा । सब्दहि ते लोक दीप विस्तारा ॥
अगर अमी दिय अंस अहारा । दीप दीप अंसन बैठारा ॥
अंसन सोभा कला अनंता । होत तहाँ सुख सदा वसन्ता ॥
अंसन सोभा अगम अपारा । कला अनन्तको वरने पारा ॥

वेद और किताबोंके मूलका वर्णन

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सब सुत करें पुरुषको ध्याना । अभी अहार सदा सुख माना ॥
याही विधि सोलह सुत भयऊ । धरमदास तुम चित धरि लेऊ ॥
छन्द-दीप करीको अनंत सोभा, नाहि बनत सो बने ॥
अमित कला अपार अद्भुत, सुतन सोभाको गने ॥
पुरुषके उजियारसे सुन, सबै दीप अंजोर हो ॥
सत पुरुष रोम प्रकाश एकहि, चन्द सूर करोर हो ॥
सोरठा-सतपुर आनंदधाम, सोग मोह दुख तहैं नहीं ॥
हंसनको विसराम, पुरुष दरस अँचवन सुधा ॥ १२ ॥

निरञ्जनकी तपस्या और मानसरोवर तथा सूनकी प्राप्ति ।

यहि विधि बहुत दिवस गयो बीती । ता पीछे ऐसी भई रीती ॥
जुग सत्तर सेवा तिन कीन्हा । इक पग ठाढपुरुषचित्त दीन्हा ॥
सेवा कठिन भाँति तिन कीन्हा । आदि पुरुष हरषित होय चीन्हा ॥

पुरुष वचन-निरञ्जनप्रति ।

पुरुष अवाज उठी तब बानी । कहा जानि तुम सेवा ठानी ॥
निरञ्जन वचन ।

कहैं धरम तब सीस नमायी । देहु ठौर जहैं बैठों जायी ॥
आज्ञा किये जाहु सुत तहवों । मानसरोवर दीप है जहवों ॥
चले धरम तब मानसरोवर । बहुतहरषचित्त करत कलोहर ॥
मानसरोवर आये जहिया । भय आनन्द धरम पुनि तहिया ॥
बहुरि ध्यान पुरुषको कीन्हा । सत्तर जुग सेवा चित दीन्हा ॥
यक पगु ठाढे सेवा लायी । पुरुष दयाल दया उर आयी ॥

पुरुषवचन-सहजप्रति ।

विकस्यो पुहुप उठयो जब बानी । बोलत वचन उठयो अघरानी ॥
जाहु सहज तुम धरमके पास । अब कस ध्यान कीन्ह परगासा ॥
सेवा बहु कीन्हा धर्मराऊ । दियो ठौर वहि जहाँ रहाऊ ॥
तीन लोक तब पलमें दीन्हा । लिखि सेवकाइ दया आस कीन्हा ॥
तीन लोक कर पायो राजू । भयो आनन्द धरम मन गाजू ॥
जब का चाहे पूछो जाई । जो कछु कहै सो देउ सुनाई ॥

सहजका निरञ्जनके पास जाना ।

चले सहज तब सीस नवाई । धरमराय पहुँ पहुँचे जाई ॥
कहे सहज सुन भ्राता मोरा । सेवा पुरुष मान लइ तोरा ॥

वेदोंकी आज्ञा माननीय है

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अब का मांगहु सो कह मोही । पुरुष आवाज दीन्ह वह तोही ॥

निरञ्जनवचन-सहजप्रति ।

अहो सहज तुम जेठे भाई । करो पुरुष सो बिन्ती जाई ॥
इतना ठाँव न मोहि सुहाई । अब मोहि बकसि देहु ठकुराई ॥
मोरे चित अस भौ अनुरागा । देऊ देश मोहि करहु सभागा ।
कै मोहि देहु लोक अधिकारा । कै मोहि देहु देस यक न्यारा ॥

सहज वचन-सत्यपुरुषप्रति ।

चले सहज सुनि धर्मके बाता । जाय पुरुषसो कहे विख्याता ॥
जो कछु धर्मराय अभिलाषी । तैसे सहज सुनाये भाषी ॥

पुरुषवचन-सहजप्रति ।

छन्द

सुन्यो सहजके वचन, जबहीं पुरुष बैन उच्चारेऊ ॥
धरमसे सनतुष्ट हैं हम, वचन मम हिय धारे ॥
लोक तीनों ताहि दीन्हो, शून्य देश बसावहू ॥
करहु रचना जाय तहँवा, सहज वचन सुनावहू ॥ १३ ॥

सोरठा

जाहु सहज तुम वेग, अस कहि आवो धरमसो ॥
दियो सून्यकर थेग, रचना रचहु बनाइके ॥ १६ ॥

निरञ्जनको सृष्टिरचनाका साज मिलनेका वृत्तान्त ।

सहजवचन-निरञ्जन प्रति ।

आय सहज तब वचन सुनावा । सत्य पुरुष जस कहि समुझावा ॥

कबीरवचन-धर्मदास प्रति ।

सुनतहि वचन धर्म हरषाना । कछुक हरष कछु बिसमय आना ॥

निरंजन वचन-सहज प्रति ।

कहे धर्म सुनु सहज पियारा । कैसे रचौं करौं विस्तारा ॥
पुरुष दयाल दीन्ह मोहि राजू । जानु न भेद करों किमि काजू ॥
गम्य अगम्य मोहि नहिं आयी । करो दया सो युक्ति बतायी ॥
विन्ती करौ पुरुषसों मोरी । अहो भ्रात बलिहारी तोरी ॥
किहि विधि रचूं नौखंड बनाई । हे भ्राता सो आज्ञा पाई ॥
मो कहँ देहु साज प्रभु सोई । जाते रचना जगतकी होई ॥

ब्रह्माका वेद पाठ और पिताकी जिज्ञासा

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सहजका लोकको जाना ।

तबही सहज लोक पगुधारा । कीन्ह दंडवत बारम्बारा ॥

पुरुषवचन—सहज प्रति ।

अहो सहज कस इहवाँ आऊ । सो हमसों तुम सन्द सुनाऊ ॥

कबीर बचन—धर्मदास प्रति ।

कह्या सहज तव धर्मकी वाता । जो कछु धर्म कही विख्याता ॥

धर्मराय जस विन्ती लायी । तैसे सहज सुनायउ जायी ॥

पुरुषकी आज्ञा सहजसे ।

आज्ञा पुरुष दीन्ह तेहि बारा । सुनो सहज तुम वचन हमारा ॥

कूर्म उदर आहि सब साजा । सो ले धरम करे निज काजा ॥

विनती करे कूम सो जायी । माँगि लेइ तेहि माथ नवायी ॥

सहजका धर्मरायके निकट जाकर पुरुषकी आज्ञा सुनाना ।

गये सहज पुनि धर्मके पास । आज्ञा पुरुष कीन्ह परगासा ॥

विनती करो कूर्मसो जाई । माँगि लेहु तेहि सीस नवाई ॥

जाय कूर्म ढिग सीस नवावहु । करिहैं क्रिपा बहुत तब पावहु ॥

निरंजनका कूर्मके पास साज लेनेको जाना ।

चलिभो धरम हरष तब बाढो । मनहि कीन जुमान अतिगाढो ॥

जाय कूर्मके सन्मुख भयऊ । दंड परनाम एक नहि क्रियऊ ॥

अमी स्वरूप कूर्म सुखदाई । तपत न तनिको अति सितलाई ॥

करि गुमान देख्यो जब काला । कूर्म धीर अति है बलवाला ॥

बारह पालँग कूर्म सरीरा । छै पालँग धरम बलवीरा ॥

धावे चहुँ दिस रहै रिसाई । किहि विधि लीजे उत्पति भाई ॥

कीन्हो रोष कोपि धर्म धीरा । जाय कूर्मसे सन्मुख भीरा ॥

कीन्हो काल सीस नख घाता । दरते निकसे पवन अघाता ॥

तीन सीसक तीनहु अंसा । ब्रह्मा विस्नु महेशुर बंसा ॥

पाँच तत्त्व धरती आकासा । चंद सूर उडगन रहिवासा ॥

निसरचो नीर अगिन ससि सूर । निसरचो नभ ढाकन महि थूर ॥

मीन सेष बराह महि थम्भन । पुनि पिरथीको भयो अरम्भन ॥

छीना सीस कूर्मको जबहीं । चले परसेव ठाँव पुनि तबहीं ॥

जबही परसेव बुंद जल दीन्हा । उंचास कोट प्रिथ्वीको कीन्हा ॥

गायत्रीका प्रकट होना

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च्छीर ताय जस परत मलाई । अस जलपर प्रिथ्वी ठहराई ॥
बारह दंत रहु महिकर सूला । पवन प्रचंड मही अस्थूला ॥
अंड सरूप अकासको जानो । ताके बीच प्रिथ्वी अनुमानो ॥
कूर्म उदर सुत कूर्म उत्पानो । तापर सेस बराहको थानो ॥
सेस तीस या प्रिथ्वी जानो । ताके हेठ कूर्म बरियानो ॥
किरतम कूर्म अंडके माँही । कूर्म अंस सो भिन्न रहाही ॥
आदि कूर्म रह लोक मंझारा । तिन पुनि पुरुष ध्यान अनुसारा ॥

कूर्म बचन—सत्पुरुष प्रति ।

निरंकार कीन्हो बरियाया । काल कला धरि मोपहैं आया ॥
उदर विदार कीन्ह उन मोरा । आज्ञा जानि कीन्ह नहि थोरा ॥

पुरुष बचन—कूर्म प्रति ।

पुरुष अवाज कीन्ह तेहि बारा । छोटा बन्धु वह आहि तुम्हारा ॥
आहि यही बडनका रीती । औगुन ठावैं करहि वह प्रीती ॥

कबीरबचन—धर्म प्रति ।

पुरुषबचन सुनि कूर्मअनन्दा । अमी सरूप सो आनन्दकन्दा ॥
पुरुष ध्यान पुनि कीन्ह निरञ्जन । जुग अनेक किये सेवा संजन ॥
स्वार्थ जानि सेवा तिन लाई । करि रचना बैठे पछताई ॥
धर्म राय तब कीन्ह विचारा । कहवालो त्रयपुर विस्तारा ॥
स्वर्ग मृत्यु कीन्हों पाताला । विनाबीज किमिकीजे क्याला ॥
कौन भांति कस करब उपाई । किहि विधि रचों शरीर बनाई ॥
कर सेवा माँगो पुनि सोई । तिहुँ पुर जीवित मेरो होई ॥
करि विचार अस हठ तिन धारा । लाग्यो करने पुरुष विचारा ॥
एक पाँव तब सेवा कियेऊ । चौसठ जुगलो ठाढे रहेऊ ॥

बहुरि पुरुषका सहजको निरञ्जनके निकट भेजना ।

छन्द—दयानिधि सतपुरुष साहिब, बस सु सेवाके भये ॥

बहुरि भाष्यो सहज सेती, कहा अब जाँचत नये ॥

जाहु सहज निरंजन पहैं, देउ जो कुछ मांगई ॥

कराहच बना पुरुष बचना, छल मता तब त्यागई ॥ १४ ॥

सहजका निरञ्जनके निकट पहुँचना ।

सोरठा—सहज चले सिर नाय, जबहि पुरुष आज्ञा कियो ।

तहैंवां पहुँचे जाय, जहाँ निरंजन ठाढरह ॥ १४ ॥

ब्रह्मा गायत्री और पुष्पावतीकी कथा

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देखत सहज धर्म हरपाना । सेवा बस पुरुष तब जाना ॥

सहजवचन ।

कहै सहज सुनु धर्मराया । केहि कारन अब सेवा लाया ॥

निरञ्जनवचन ।

धर्म कहे तब सीस नयायी । देहु ठौर जहँ बैठौं जायी ॥

सहजवचन

तब सहज अस भाषे लीन्हा । सुनहु धर्म तोहि पुरुष सब दीन्हा ॥

कूर्म उदर सो जो कछु आवा । सो तोहि देन पुरुष फरमावा ॥

तीनों लोक राज तोहि दीन्हा । रचना रचहु होहु जनि भीना ॥

निरञ्जनवचन ।

तबै निरंजन विनती लायी । कैसे रचना रचूँ बनायी ॥

पुरुषहि कहौ जोरि युग पानी । मैं सेवक दुतिया नहि जानी ॥

पुरुष सो विनती करो हमारा । दीजे खेत बीज निज सारा ॥

मैं सेवक दुतिया नहि जानू । ध्यान पुरुषको निसिदिन आनू ॥

पुरुषहि कहो जाइ यह बानी । देहु बीज अम्बर सहिदानी ॥

कबीरवचन-धर्मदास प्रति ।

सहज कह्यो पुनि पुरुषहि जाई । जस कछु कह्यो निरंजनराई ॥

गयो सहज निज दीप सुखासन । जबहि पुरुष दीन्हें अनुशासन ॥

सेवा वश सतपुरुष दयाला । गुण औगुण नहिंचित्ति किरपाला ॥

अद्याको उत्पत्ति ।

इच्छा कीन पुरुष तेहि बारा । अष्टंगी कन्या उपचारा ॥

अष्ट बाहु कन्या होय आई । बायें अंग सो ठाढ़ रहाई ॥

अद्यावचन ।

माथ नाइ पुरुष सो कहई । अहो पुरुष आज्ञा कस अहई ॥

पुरुषवचन अद्या प्रति । सत्यपुरुषको अद्याको मूलबीज देना ।

तबहीं पुरुष वचन परगासा । पुत्री जाहु धरमके पासा ॥

देहुँ वस्तु सो लेहु सम्हारी । रचहु धर्म मिलि उत्पत्ति वारी ॥

कबीरवचन-धर्मदास ।

दीन्हो बीज जीव पुनि सोई । नाम सोहँग जीव कर होई ॥

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जीव सोहँगम दूसर नाहीं । जीव सो अंस पुरुषको आही ॥
सकती पुनि तीन पुरुष उत्पाना । चेतनि उलंघनि अभया जाना, ॥
छन्द-पुरुष सेवावश भये तब अष्टंगहि दीन्ह हो ॥
मानसरोवर जाहु कहिया देहु धर्महि चीन्ह हो ॥
अष्टंगी कन्या हती जेहि रूप शोभा अति बनी ॥
जाहु कन्या मानसरवर करहु रचना अति घनी ॥ १५ ॥

सोरठा-चौरासी लख जीव, मूल बीज तेहि संग दे ॥

रचना रचहु सजीव, कन्या चलि सिर नायके ॥ १५ ॥

यह सब दीन्हे आदि कुमारी । मान सरोवर चलि भइ नारी ॥
ततछिन पुरुष सहज टेरावा । धावत सहज पुरुष पहिं आवा ॥

पुरुषवचन सहजप्रति ।

जाइ सहज धरम यह कहहूँ । दीन्ही वस्तु जस तुम चहहूँ ॥
मूल बीज तुम पहुँ पठवावा । करहु स्लिष्टि जस तुम मन भावा ॥
मान सरोवर जाइ रहाहूँ । तहँते होइ हैं स्लिष्टि उराहूँ ॥

पुनि सहजका निरञ्जनके ढिग जाना ।

चले सहज तहवाँ तब आये । धर्म धार जहँ ठाढ रहाये ॥
कहेउ सु वचन पुरुषको जबहीं । धर्मराय सिर नायो तबहीं ॥

निरञ्जनका मानसरोवरमें अच्छाको पाकर मोहवश हो उसे निगल
जाना और सत्पुरुषका शाप पाना ।

पुरुष वचन सुन तबहीं गाजा । मान सरोवर आन विराजा ॥
आवत कामिनि देख्यो जबहीं । धरमराय मन हरण्यो तबहीं ॥
कला उभय अष्टंगी केरी । धरमराय तिहिं दिदकै हेरी ॥
कला उदोत अंत कछु नाहीं । काल मगन हँ निरखे ताही ॥
निरखत धरम सुभयो अधीरा । अंग अंग सब निरखसरीरा ॥
धरमराय कन्या कह ग्रासा । काल स्वभाव सुनो धर्मदासा ॥
कीनो ग्राह काल अन्याई । तब कन्या चित विस्मय आई ॥
ततछन कन्या कीन्ह पुकारा । काल निरंजन कीन्ह अहारा ॥
तबही धर्म सहज लग आई । सहज सून्य तब लीन्ह छुड़ाई ॥
पुरुष ध्यान कूर्म अनुसारा । मोसनकाल कीन्ह अधिकारा ॥
तीन शीश मम भच्छन कीन्हो । हो सत्पुरुष दया भल चीन्हो ॥
यही चरित्र पुरुष भल जानी । दीन्ह सापसों कहीं बखानी ॥

निरंजनका आद्याको शाप देना

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पुरुषका शाप निरंजन प्रति ।

लच्छ जीव नित प्राप्त करहू । सवा लच्छ नित प्रति विस्तरहू ॥
छन्द-पुनि कीन्ह पुरुष तिवान किमि मेटि डारो काल हो ॥

कठिन काल कराल जीवन बहुत करइ बिहाल हो ॥

यहि मेटत मुहि अब ना बने नाल । इक सुत षोडसा ॥

एक मेटत सबै मिटिहैं वचन डोल अडोलसा ॥ १६ ॥

सोरठा-डोले वचन हमार, जो अब मेटों धरमको ।

वचन करौं प्रतिपाल, देश मोर अब ना लहै ॥ १६ ॥

सत्पुरुषका योगीतजीको निरञ्जनके पास उसे मानसरोवरसे
निकाल देनेकी आज्ञा देकर भोजना ।

जोगजीत कहैं पुरुष बुलावा । धर्म चरित सब कहि समुझावा ॥

सत्पुरुषवचन-योगजीत प्रति ।

जोगजीत तुम बेगि सिधारो । धर्मरायको मारि निकारो ॥

मानसरोवर रहन न पावै । अब यहि देस काल नहि आवै ॥

जाके रहे धरम वहि देसा । स्वर्ग मृत्यु पाताल नरेसा ॥

धर्मके उदर माहि है नारी । तासो कहो निज शब्द सम्हारी ॥

उदर फारिकै बाहर आवै । कूर्म उदर विदारि फल पावै ॥

धरमरायसे कहो विलोई । वहै नारि अब तुम्हरी होई ॥

कबीरवचन-धर्मदास प्रति ।

जोग जीत चल भे सिर नाई । मानसरोवर पहुँचे जाई ॥

जोगजीत कहैं देखा जबहीं । अति भो काल भयंकर तबहीं ॥

निरञ्जनवचन-योगजीत प्रति ।

पूछा काल कौन तुम आहू । कौन काज तुम यहाँ सिधाहू ॥

योगजीतवचन-निरंजन प्रति ।

जोगजीत अस कहे पुकारी । अहो धरम तुम प्राप्त नाारी ॥

आज्ञा पुरुष दीन्ह यह मोही । इहिते बेगि निकारों तोही ॥

जोग जीतवचन-अद्या प्रति ।

जोगजीत कन्या सो कहिया । नारि काहे उदरमहँ रहिया ॥

उदर फारि अब आवहु बाहर । पुरुष तेज सुमिरो तेहि ठाहर ॥

विष्णुका पिताके दर्शन राज्य पाना आदि विष्णुको पिताका दर्शन होना

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कबीरवचन-धर्मदास प्रति ।

सुनिके धर्म क्रोध उर जरेऊ । जोगजीत सो सन्मुख भिरेऊ ॥
जोग जीत तब किन्हे ध्याना । पुरुष प्रताप तेज उर आना ॥
पुरुष आज्ञा भई तोह काला । मारहु माँझ लिलार कराला ॥
जोगजीत पुनि तँसो कीन्हा । जस आज्ञापुरुष तेहि दीन्हा ॥
छन्द-गहि भुजा फटकार दीन्हों, परेउ लोकते न्यारहो ॥
भयो त्रासित पुरुष ढरते, बहुरि उठेउ सम्हार हो ॥
निकसि कन्या उदरते पुनि, देख धर्महि अति डरी ॥
अब नाहि देखों देस वह, कहो कौन विधि कहैंवां परी ॥ १७ ॥
सोरठा-कामिनि रही सकाय, त्रासित काल डर अधिक ॥
रही सो सीस नवाय, आस पास चितवत खडी ॥ १७ ॥

निरञ्जनवचन-अद्या प्रति ।

कहे धर्म सुनु आदि कुमारी । अब जनि डरपो त्रास हमारी ॥
पुरुष रचा तोहि हमरे काजा । इकमति होय करहु उपराजा ॥
हम हैं पुरुष तुमहिं हौ नारी । अब जनिडरपो त्रास हमारी ॥

अद्यावचन-निरञ्जन प्रति ।

कहे कन्या कस बोलहु बानी । भ्राता जेठ प्रथम हम जानी ॥
कन्या कहै सुनो हो ताता । ऐसी विधि जनि बोलहु बाता ॥
अब मैं पुत्री भई तुम्हारी । तँ उदर मांझु लियो डारी ॥
जेठ बंधु प्रथमहिके नाता । अब तो अहो हमारे ताता ॥
निरमल द्विष्ट अब चितवहु मोही । नहिंतो पाप होय अब तोही ॥
मंद द्विस्टिन चितवहु मोही । नातो पाप होय अब तोही ॥

निरञ्जनवचन-अद्या प्रति

कहे निरंजन सुनो भवानी । यह मैं तोहि कहों सहिदानी ॥
पाप पुन्य डर हम नहिं डरता । पाप पुन्यके हमहीं करता ॥
पाप पुन्य हमहींसे होई । लेखा हमार न लेवे कोई ॥
पाप पुन्य हम करंब पसारा । जो बाझे सो होय हमारा ॥
ताते तोहि कहों समुझाई । सीख हमार लो सीस चढाई ॥
पुरुष दीन तोहि हम कहैं जानी । मानहु कहा हमार भवानी ॥

कबीरवचन धर्मदास प्रति ।

विहैंसी कन्या सुन अस बाता । इक मति होय दोइ रंगराता ॥

शिवका शाप और वर पाना

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रहस वचन बोली म्निदु बानी । नारि नीच बुधि रति विधि ठानी ॥
रहस वचन सुनि धरम हरषाना । भोग करनको मनमें आना ॥

छन्द-भग नहिं कन्याके हूती, अस चरित कीन्ह निरंजना ।

नख घात किये भगद्वार तत छिन, घाट उत्पति गंजना ॥

नखरेष शोनिता चला, तिहूँको सब खास आरंभनी ।

आदि उत्पति सुनुहु धर्मनि, कोउ नहिं जानत जम मनी ॥

त्रिबार कीन्ही रति तवैं, भये ब्रह्मा विस्तु महेस हो ।

जेठे विधि विस्तु लघु तिहि, तीजे सम्भू सेषहो ॥ १८ ॥

सोरठा-उत्पति आदि प्रकास, यह विधि तेहि प्रसंग भो ॥

कीन्हो भोगविलास इक मति कन्या काल ह्वै ॥ १८ ॥

भवसागरकी रचना ।

तेहि पीछे ऐसा भो लेखा । धर्मदास तुम करो विवेखा ॥

निरञ्जनवचन-अद्या प्रति ।

अगिन पवन जल मही अकासा । कूर्म उदरते भयो परगासा ॥

पाँचों अंस ताहि सन लीन्हा । गुन तीनो सीसनसो कीन्हा ॥

यहि विधि भये तत्व गुन तीनो । धर्मराय तब रचना कीनो ॥

कबीरवचन-धर्मदास प्रति ।

गुन तत सम कर देविहि दीन्हा । आपन अंस उत्पन कीन्हा ॥

बुन्द तीन कन्या भग डारा । ता सँग तीनो अंस सुधारा ॥

पाँच तत्व गुण तीनो दीन्हा । यहि विधि जगकी रचना कीन्हा ॥

प्रथम बुन्दते ब्रह्मा भयऊ । रज गुण पंच तत्व तेहि दयऊ ॥

दूजो बुन्द बिस्तु जो भयऊ । सतगुण पंच तत्व तिन पयऊ ॥

तीजे बुन्द रुद्र उत्पाने । तमगुण पंच तत्व तेहि साने ॥

पंच तत्व गुण तीन खमीरा । तीनों जनको रच्यो सरीरा ॥

ताते फिरि फिरि परलय होई । आदि भेद जाने नहिं कोई ॥

कहै धर्म कामिनि सुन बानी । जो मैं कहूँ लेहु सो मानी ॥

जीव बीज आहै तुव पास । सोले रचना करहु प्रगासा ॥

कहै निरंजन पुनि सुनु रानी । अब अस करहु आदिभवानी ॥

तीनो सुत सौप तोहि दीना । अब हम पुरुष सेव चित लीन्हा ॥

राज करहु तुम लै तिहुँ बारा । भेद न कहियो काहु हमारा ॥

कर्मका बदला

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मोर दरस तिहुँ सुत नहिं पैहँ । जो मुहि खोजत जन्म सिरैहँ ॥
ऐसो मता दिढेहो जानी । पुरुष भेद नहिं पावै प्रानी ॥
त्रय सुत जबहिं होहि बुधिवाना । सिधु मथन दे पठहु निदाना ॥

कबीरबचन धर्मदास प्रति ।

छन्द-कहेउ बहुत बुझाय देविहि गुप्त भये तब औहिहो ॥
सून्य गुफहि निवास कीन्हों भेद लह को ताहि हो ॥
वह गुप्त भा पुनि संग सबके मनै निरंजन जानिये ॥
मन पुरुष भेद उच्छेद देवे आपु परगट आनिके ॥
सोरठा-जीव भये मति हीन, परसि अगम सो कालको ।
जनम जनम भय खीन, मुरुचा करम अकर्मको ॥ १९ ॥
जीव सतावे काल, नाना कर्म लगायके ।
आप चलावै चाल, कस्ट देइ पुनि जीवको ॥ २० ॥

सिन्धुमथन और चौदह रत्न उत्पत्तिकी कथा ।

त्रय बालक जब भये सयाने । पठये जननी सिधु मथाने ॥
बालक मातै खेल खिलारी । सिन्धुमथन नहिं गयेउ खरारी ॥
तेहि अंतर इक भयो तमासा । सो चरित बूझो धर्मदासा ॥
धान्यो योग निरंजन राई । पवन अरंभ कीन्ह बहुताई ॥
यागो पवन रहित पुनि जबहीं । निसरे उवेद स्वास संग तबहीं ॥
स्वास संग आयेउ सो वेदा । विरला जन कोई जाने भेदा ॥
अस्तुति कीन्ह वेद पुनि ताहां । आज्ञा का मोहि निरगुन नाहां ॥
कह्यो जाय कर सिधु निवासा । जेहि भेंटे जैहौ तिहि पास ॥
उठी अवाज रूप नहिं देखा । जोति अगम दिखलावत भेखा ॥
चलेउ वेद पुनि तेज अपाने । तेज अन्न पुनि विष संधाने ॥
चले वेद तहँवा को जाई । जहँवा सिधु रचा धर्मराई ॥
पहुँचे वेद तब सिन्धु मँझारा । धर्मराय तब युक्ति विचारा ॥
गुप्त ध्यान देबिहिं समुझावा । सिन्धु मथन कहँ कस विलमावा ॥
पठवहु बेगि सिन्धु त्रय वारा । दिठकै सोचहु बचन हमारा ॥
बहुरि आप पुनि सिन्धु समाना । देवी कीन्ह मथन अनुमाना ॥
तिहुँ बालक को कहा समुझायी । आसिष दे पुनि तहाँ पठायी ॥
पैहो वस्तु सिन्धुके माहीं । जाहु बेगि तीनों सुत ताहीं ॥
चलिभौ ब्रह्मा मान सिखाही । दोइ लहुरा पुनि पाछे जाई ॥

विष्णुका ब्रह्माको आश्रय देना माया सृष्टिकी उत्पत्तिका वृत्तान्त

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छन्द-त्रय सुत बाल खेलत चले ज्यों सुभग बाल मरालहो ।
एक गहि छोडत मही पुनि एक कर, गहि चलत लटपट चालहो ॥
छनहिं धावत छन अस्थिर खड़े छनभुजहिं गर लावहीं ।
तेहि समयकी सोभा भली नहिं देवता कहैं गावहीं ॥

सोरठा-गये सिन्धुके पास, भये ठाढ तीनों जने ।
जुगति मथन परकास, एक एकको निरखहीं ॥ २१ ॥

प्रथम बार सिन्धुमंथन ।

तीनों कीन्ह मथन तब जाई । तीन वस्तु तीनों जन पाई ॥
ब्रह्मा वैद तेज तेहि छोटा । लहुरा तासु मिले विष खोटा ॥
भेटी वस्तु त्रय तीनों भाई । चलि भये हर्ष कहत जहैं माई ॥
मातापहैं आये त्रय बारा । निज २ वस्तु प्रगट अनुसारा ॥
माता आज्ञा कीन्ह प्रकासा । राखु वस्तु तुम निज २ पास ॥

द्वितीय बार सिन्धुमंथन ।

पुनि तुम मथहु सिन्धु कहैं जाई । जो जिहि मिले लेहु सो भाई ॥
कीन्ह चरित अस आदि भवानी । कन्या तीन कीन्ह उत्पानी ॥
कन्या तीन उत्पान्यो जबहीं । अंस वारि महैं नायो सबहीं ॥
पठयो सिधुमाहिं पुनि ताहीं । त्रय सुत मरम सो जानत नाहीं ॥
पुनि तिन मथन सिधुको, कीन्हा । भेंटयो कन्या हर्षित ह्वै लीन्हा ॥
कन्या तीनहु लीन्हे साथ । आ जननी कहैं नायउ माथा ॥
सब माताके आगे कीन्हा । माता बाँटि तिन्हन कहैं दीन्हा ॥
माता कहे सुनहु सुत मोरा । यह तो काज भये सब तोरा ॥
एक एक बाँटि तीनहुको दीन्हा । करहु भोग अस आज्ञा कीन्हा ॥
सावित्री ब्रह्मा तुम लेऊ । है लक्ष्मी विष्णु कहैं देऊ ॥
पारवती शंकर कहैं दीन्ही । ऐसी माता आज्ञा कीन्ही ॥
तीनउ जन लीन्ही सिर नार्ई । दीन्ह अद्या जस भाग लगाई ॥
पाई कामिनी भये अनंदा । जस चकोर पाये निश्चिचंदा ॥
काम वसी भए तीनों भाई । देव दैत दोनों उपजाई ॥
धरमदास परखो यह बाता । नारी भयी हती सो माता ॥

तृतीय बार सिन्धुमंथन ।

माता बहुरि कहे समझायी । अब फिर सिंधु मथो तुम जाई ॥