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कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)

by कबीर साहेब

Source: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (origin)

Devanagarihipublished1,367 pages

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Page 137

चौहत्तरवाँ प्रकरण

प्रथम भागके प्रथम अध्यायका उपसंहार ।

वहांतक तो मैंने कालपुरुषके धर्मका विवरण किया, जिनमें फँसकर मनुष्य के पथ नहीं मिलता. कारण यह कि, यह अहंकार तथा भ्रममें फँस रहा है, न यह ईर्षा तथा अहंकारको छोड़ता है न इसको सत्यपुरुषकी भक्तिका मार्ग मिलता है, सब इसी अभिमानमें “कि, मैं बड़ा और मेरा धर्म तथा गुरु बड़ा” डूबे हुए हैं, कौन सत्यका इच्छुक है जो मिथ्याको छोड़कर, स्वसम्बेदकी सत्य शिक्षाकी खोज करे ।

ग़ज़ल आजिज़ ।

यह मुत कब्रिबर हुआ इनसान खाकी । जिधर देखो उधर सामान खाकी ॥
पड़ा जो फ़र्श पर लाचार कोई । रसाई अर्श इम्कान खाकी ॥
बहर काने तमाशा मजहरे जाता । वही खुद सूरते इनसान खाकी ॥
जो मुरशिदके कदमकी खाक होजा । सफ़ाकर आइनः ईमान खाकी ॥
कदम गाहे उसीकी जा सलामत । बजुज उसके नहीं दरमान खावी ॥
नहीं कोई दूसरा दुश्मन हमारा । कि खाकी शकलका शैतान खाकी ॥
हिमाकृतसे है पैवस्तः लजायज़ । सरीरो सूतवतो सुलतान खाकी ॥
न अपने अस्लको पहचानता है । हुआ मगरूर नाफ़रमान खागी ॥
सिफ़त तीनों बहम अरबः अनासर । बहम मखलूत हैं यकसान खाकी ॥
न इनसे आदमीको पेश दरती । तेरे बे फायदः अरमान खाकी ॥
न हो सगरूर खुद इल्मो अमलपर । कि बानीवेद और कुरआन खाकी ॥
मिलेगा आजजीसे हकको आजिज़ । करे अपनेको गर कुरबान खाकी ॥
इति श्री कबीर मन्शूरके प्रथम भागका प्रथम अध्याय ॥ १ ॥

प्रथम अध्यायका परिशिष्ट

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कबीर मन्शूरके इस अध्यायमें चौहत्तर प्रकरण हैं । अब आगे इस अध्याय का परिशिष्ट भाग दिया जाता है जिसके लिये पीछे कई स्थानोंमें टिप्पणी द्वारा सूचना दी जा चुकी है । इन प्रमाणोंको यह इसलिये दिया है कि, बहुतसे महंत संत सेवक सतियोंने अनुरोध किया है कि, जहाँ जहाँ ग्रन्थोंके प्रमाणकी आवश्यकता हो वहाँ वहाँ वह जरूर दे देना चाहिये । यद्यपि मेरा भी यही विचार था