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कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)

by कबीर साहेब

Source: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (origin)

Devanagarihipublished1,367 pages

Page 252 of 1367

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Page 252

चौथा प्रकरण ।

कबीर साहबके जगन्नाथ स्थापनाकी कथा ।

इस समय कबीर साहबने अपने वचनका स्मरण किया । जैसा कि, मैं इतः पूर्व निरञ्जन और कबीर साहबकी गोष्ठीमें लिख गया हूँ कि, निरञ्जनने कबीर साहबसे निवेदन किया था कि, जब मेरा जगन्नाथका अवतार होगा, तब समुद्र मेरे मन्दिरको तोड़ेगा, उस समय आप कृपा करके समुद्रको हटाकर और मेरे मन्दिर को स्थापित कर देवें । तब आप वचनबद्ध हुए थे कि मैं तुम्हारा मन्दिर स्थापित कर दूंगा और समुद्रको हटा दूंगा उसी वचनके अनुसार कबीर साहब उड़ीसा देशमें आ उत्तरे और राजा इन्द्रदमनके पास जाकर बोले कि, हे राजा ! आप जगन्नाथके मन्दिरको बनाओ । तब राजाने निवेदन किया कि, महाराज ! समुद्र मंदिरको बनने नहीं देता, मेरा कुछ वश नहीं चलता, जब मैं बनाकर तय्यार प्रस्तुत करता हूँ तब वह आकर ढा जाता है, मैं क्या करूँ ? तब कबीर साहबने कहा कि, हे महाराज ! मैं इसी प्रयोजनसे आपके निकट आया हूँ । अब आप प्रसन्नतापूर्वक ठाकुरद्वार बनवाओ मैं समुद्रको हटा-दूंगा, अब उसका कुछ वश नहीं चलेगा । तब राजाने पुनः मन्दिरके बनवानेका प्रबन्ध किया और मन्दिर तय्यार होने लगा । कबीर साहब समुद्र तटपर गये और एक चबूतरा बनाकर आसा'को अपने सामने लगा और समुद्रकी ओर मुंह करके बैठ गये । उधर ठाकुरका मन्दिर बनकर तय्यार होनेके समीप आ गया । समुद्रने देखा कि, अब तो ठाकुरका मन्दिर पूर्ण होने पर आया है, तब बड़े वेगसे दौड़ा । उसकी लहरें आकाशको उड़ीं । जब वह लहरें मारता कबीर चबूतरेके समीप पहुँचा, तब सामने कबीर साहबको बैठे देखकर ठहर गया, आगेको बढ़ नहीं सका । फिर ब्राह्मणका स्वरूप धरकर कबीर साहबके पास आया और दंडवत् प्रणाम करके निवेदन किया कि, ऐ महाराज ! मैं तो ध्रोखेसे आया और जगन्नाथका मंदिर ढाहना चाहता । किन्तु सामने तो आप बैठे हैं मुझमें यह सामर्थ्य नहीं है कि, आगे बढ़ सकूँ । आप न्यायकर्ता हैं मेरा न्याय कीजिये । तब कबीर साहबने कहा कि, हे जलधे ! मैं तुम्हारा हाल जानता हूँ—परन्तु अब इस कलिकालमें जगन्नाथजीका माहात्म्य होगा तथा उनकी पूजा होवेगी इस कारण अब तुम ठाकुरका मंदिर उठने दो और किसी प्रकारकी बाधा उपस्थित मत करो । मैं तुमको इस मन्दिरके बदले द्वारकापुरी देता हूँ,

१ आसाका दूसरा नाम योगदण्ड हठयोगी लोग सुमेरको सीधा रखने अथवा श्वास बदलनेके लिये रक्खा करते हैं ।