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कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)

by कबीर साहेब

Source: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (origin)

Devanagarihipublished1,367 pages

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कबीर साहब नानक साहबके पास पञ्जाब देश आए, नानक शाहने अत्यंत आवभगत तथा सम्मानके साथ उनसे मिलकर कहा कि, जिस सेवाके निमित्त आप आज्ञा दें उसको मैं करूँ । कबीर साहबने आज्ञा दी कि, पाँच दिवसकी उत्पन्न हुई बछियाके स्तनमें दूध दुहकर मेरा कमण्डलु भर दो । नानक शाहने कहा कि, पाँच दिनकी पैदा हुई बछिया कैसे दूध दे सकती है ? कबीर साहबने कहा कि, यही मेरी सेवा है इसे ही तुम करो । नानक शाहने ढूँढ ढाँढ कर पाँच दिनकी उत्पन्न हुई बछियाको ला उपस्थित किया । उसके समीप दूध लेने गये । वह बछिया लात चलाकर भाग गई । नानक शाहसे कबीर साहबने कहा कि, अब तुम जाओ, मेरे नामसे उस बछियासे दूध माँगकर कमण्डलु उसके स्तनके नीचे रख दो, नानक शाहने बछियाके नीचे कमण्डलु रखकर कबीर साहबके नामसे दूध माँगा । बछियाके स्तनसे आपसे आप इतना दूध निकला कि, वह भर गया । कबीर साहबने नानक साहबसे कहा कि, ऐ नानकजी ! आपने बंदना तो बहुत की परन्तु अभीतक आपकी कमाईमें कमी है । आपका पंथ चलेगा बहुत लोग आपकी आज्ञामें चलेंगे । भविष्यत्में ये रङ्ग ढङ्ग होंगे । ऐसा बहुत कुछ नानक शाह से कबीर साहबने कहा । इसी ग्रंथमें नानक शाहके विषयमें भविष्य वाणी है । नानक धर्मका विवरण किया गया है जो कि, भविष्यत्में होनेवाला है । इसी स्थानपर यह साखी है । “तिल घोंटतारे लगे” इत्यादि है और इसी स्थानपर यह है :—

ऐसो दाता सत्य कबीर, सूखी नदी बहावे नीर ।

शूखेको खिलावैं खीर, नङ्गेको पहनावे चीर ॥ इत्यादि ॥

महाराजा श्रीरामचन्द्रजीको कबीर साहब (मुनीन्द्रजी) ने योगयुक्ति सब कुछ सिखलायी । सीताके चुराये जानेके समय अत्यंत कठिनाता उपस्थित हुई समुद्रोल्लंघन करना अत्यंत कठिन था । रामचन्द्रजीपर कबीर साहब की दया हुई । पत्थरोंपर सत्य नाम लिखा । उसके कारण बहुतेरे पर्वत तथा पत्थर तैरने लगे, पुल बन गया । इसी साहबकी दयादृष्टिसे लंकापर विजय पाकर मङ्गल-पूर्वक अपने घर पहुँचे । देखो ग्रंथ ज्ञानसंबोध तथा अन्यान्य ग्रंथोंमें ।

कृष्णचन्द्र बाँसुरी बजाकर गोपियोंका मन चुरा लिया करते थे, कबीर साहबने बाँसुरी बजायी, तीनों लोक मोह गये, जड़ चैतन्य सभी मोहित हुए । यमुना नदीका जल स्थिर होगया । स्थावर जङ्गल सभीको आनन्द आगया वह बाँसुरी ऐसी बजी कि, फिर कभी न बजी होगी । लोगोंने जाना कि, कृष्णचन्द्रने बजायी थी । गोप तथा गोपियोंकी बड़ी कामना थी कि, वैसी बंसी फिर बजे क्योंकि, उस बाँसुरीके बजानेवाले तो सत्य पुरुष थे । अभेद भावनामें होते हैं ।