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कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)

कबीर साहेब द्वारा

स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

Devanagarihipublished1,367 पृष्ठ

८ अध्याय प्राचीन भक्त

वर्तन और मूर्त बनाता है। कुम्हारसे बढ़कर कोई वर्तन अथवा मूर्त नहीं हो सकती। कारणसे कार्य बढ़कर नहीं हो सकता है।

अतः इस विराट् पुरुषने समस्त संसारको बनाया है। उससे बढ़कर उसकी सृष्टि कदापि नहीं हो सकती। इस कारण समस्त ऋषि मुनि सिद्ध साधु इत्यादि सर्वे उसकी गुलामी किया करते हैं, तथा प्रशंसा किया करते हैं।

सत्य पुरुषका प्रतिपादक पुरुषसूक्त।

सहस्रशीर्षापुरुषःसहस्राक्षःसहस्रपात् ॥ सभूमि ठं. सर्वतःस्पृत्वात्यतिष्ठद्-
शांगुलम् ॥ यजुर्वेद अध्याय ३१॥ मंत्र १ ॥ नारायण ऋषिः निचूदाव्य-
नुष्ठन्दः पुरुषो देवता। सब लोगोमें व्यापक जो प्रधान सत्य पुरुष नारायण
सर्वात्मा होनेसे अनन्त शिर और पाँववाला, व्यष्टि समष्टि सबमें व्यापकर नामिसे
दश अंगुल परिमित हृदयदेशको अतिक्रमण कर अन्तर्यामी रूपसेस्थित हुवा।
पुरुषऽएवेदठं.सर्वयद्भूतं यच्चभाव्यम् ॥ उतामृतत्वस्येशानोयदत्रे नातिरोहति ॥
यजुर्वेद अध्याय ३१ ॥ मंत्र २ ॥ यह जो अतीत ब्रह्मसंकल्प जगत् है जो
भविष्यत् ब्रह्मसंकल्प जगत् है। जो जगत् बीज अन्न परिणामसे वृक्ष नर पशु
आदिकरूपको प्राप्त होता है वह मोक्षका स्वामी महानारायणही है क्योंकि,
उससे भिन्न कोई भी नहीं है। एतावानस्य महिमातोज्यायय्यांश्चपुरुषः ॥
पादोस्यविश्वाभूतानित्रिपादस्यामृतन्दिवि ॥ य० अ० ३१ ॥ मंत्र ३ ॥ इस
महानारायणकी विभूति इतनीही है ऐसा नहीं बल्कि यह नहीं चित्
आत्मा महानारायणका इस संसारसे अतिशय करके अधिक है इस कारण समस्त
ब्रह्माण्ड इस महानारायणका चौथा अंश है। सत्यलोकमें इस त्रिपातकास्वरूप
बिनाशरहित है जिस कारणसे अनन्त सत्य पुरुष परब्रह्मही अपने भागमें अपनी
ज्योतियोंमें महानारायणरूप हुवा। त्रिपादूर्ध्वऽउदैत्यूरुषःपादोस्येहाभवत्पुनः ॥
तत्रोविष्वङ् व्याक्रामत्साशनानशनने। अभि ॥ य० अ० ३१ मं० ४ ॥
यह त्रिपातमहानारायण प्रथम ब्रह्माण्डसे ऊपर उत्कर्षतासे स्थित हुवा
फिर इस महानारायणका चतुर्थीश संसार विषे व्याप्त हुवा मायाप्रवेशके अनन्तर
देव तिर्यक आदिरूपोंकरके अनेक प्रकारका हुवा चेतन (प्राणीमात्र) और
अचेतन (पर्वत नदी आदि) को देखकर उनमें व्याप्त हुआ तथा जड़ चेतन सबमें
घुस गया। ततो विराडजायत विराजोअऽधिपुरुषः ॥ स जातोऽअत्यरिच्यत
पश्चादभूमिमध्येपुरः ॥ यजुर्वेद अध्याय ३१ मंत्र ५ ॥ पश्चात् उस महानारा-
यणसे ब्रह्माण्डदेह तथा उस देहको अधिकरणकरके उसका अभिमानो विराट्
पुरुष अतिश्रेष्ठ उत्पन्न हुवा। वह विराट् पुरुष प्रथम भूमिको रचता भया

तिसके अनंतर देव मनुष्य आदिकोंके शरीरोंको बनाया ॥ तस्माद्यज्ञात्सर्वहुतः
सम्भूतंपृषदाज्यम ॥ पशूस्तौश्चक्रेवायव्यानारण्याग्राम्याश्चये ॥ य० अ० ३१
मंत्र ६ ॥ महानारायणसे दधिभिश्च आज्य (घृत) अथवा प्राण संपादन किये तैसे
ही वह महानारायण वायु अथवा प्राण हैं देवता जिनके ऐसे जो हरिण आदिक
वनपशु हैं अथवा आरण्यकांडसंबंधी इंद्रियें हैं तिनको और ग्राममें होनेवाले अश्व-
आदिक पशु अथवा प्रवृत्तिमार्गसंबंधी इंद्रियोंको उत्पन्न करते भये ॥
तस्माद्यज्ञात्सर्वहुतऽऋचःसामानि जज्ञिरे ॥ छन्दाऽऽसिजज्ञिरेतस्माद्यजुस्तस्मा-
दजायत ॥ य० अ० ३१ मंत्र ७ ॥ पश्चात् उस यज्ञपुरुष (महानारायण)
से साम (सामवेद) उत्पन्न हुवा उसके पीछे महानारायणसे छंद उत्पन्न हुए
उसके अनंतर महानारायणसे यजुष् (यजुर्वेद) उत्पन्न हुआ ॥ तस्मादशवाऽअ-
जायन्तयेकेचोभयादतः ॥ गावोहजज्ञिरेतस्मात्तस्माज्जाताऽअजावयः ॥ य०
अ० ३१ मंत्र ८ ॥ अश्व और अश्वोंसे अतिरिक्त जोगर्दभ आदिक और
खर्रचर हैं वे सब उत्पन्न हुए जो ऊपर नीचे दातोंवाले पशु हैं वे भी उत्पन्न हुए ।
तिस महानारायणसे गौवें उत्पन्न हुई बकरों व भेड़ भी उसी से उत्पन्न हुई ॥
तंयजम्बर्हिषिप्रौक्षन्पुरुषज्जातमग्रतः ॥ तेनदेवाऽअयजन्तसाध्याऋषयश्चये ॥
य० अ० ३१ मंत्र ९ ॥ जो साध्य देवता व सनकादिक ऋषि हैं वे सृष्टिसे
पूर्व उत्पन्न हुए उस यज्ञके साधनभूत विराट्पुरुषको अपने लोकमें प्रोक्षणआदि
संस्कारों करके संस्कृत किया और उस विराट्पुरुषरूप पशुद्वारा मानस योग
निष्पादन (सिद्ध) किया ॥ यत्पुरुषव्यदधुःकतिधाव्यकल्पयन् ॥ मुखडिकमस्या-
सीत्किम्बाहू किमूरूपादाऽउच्यते ॥ य० अ० ३१ मंत्र १० ॥ प्रश्न-महानारा-
यणसे प्रेरित हुए महत् अहंकार आदिसे विराट्पुरुषको उत्पन्न किया उस
समयसे कितने प्रकारोंसे अनेक प्रकारकी कल्पनाएँ की इस विराट्पुरुषके मुख
क्या हुवा ? बाहु क्या हुए, तथा ऊरू (जंवा) क्या हुए और पाद (पावें)
क्या था ॥ ब्राह्मणोऽस्यामुखमासीद्वाहुराजन्यः कृतः ॥ ऊरूतदस्यायद्वैशः
पद्मच ॐशूद्रोऽअजायत ॥ य० अ० ३१ मंत्र ११ ॥ उत्तर-इस विराट्पुरुषके
मुखसे ब्राह्मण उत्पन्न हुवा, भुजाओंसे क्षत्रिय उत्पन्न हुवा, ऊरू (जंघाओं) से
वैश्य उत्पन्न हुवा, पावोंसे शूद्र उत्पन्न हुवा ॥ चन्द्रमामनसोजातश्चक्षोऽसूर्योऽ-
अजायत ॥ श्रोत्राद्वायुश्चप्रणश्चमुखादग्निर जायत ॥ य० अ० ३१ मंत्र १२ ॥
और विराट्पुरुषके मनसे चंद्रमा उत्पन्न हुवा, नेत्रोंसे सूर्य उत्पन्न हुवा, कानोंसे
वायु और प्राण उत्पन्न हुए, मुखसे अग्नि उत्पन्न हुवा ॥ नाभ्याऽआसीदन्त-
रिक्ष ॐशीर्षागोऽधौः समवर्तत ॥ पद्मचाम्भूमिदिशः श्रोत्रात्तथालोकां ॥ २ ॥

ऽकल्पयन् ॥ य० अ० ३१ मं० १३ ॥ इस विराट्पुरुषकी नाभिके सकाशसे अंतरिक्ष (आकाश) उत्पन्न हुवा, शिरसे स्वर्ग उत्पन्न हुवा पावोंसे पृथ्वी उत्पन्न हुई कानोंसे दिशाएँ उत्पन्न हुई तथा इसी तरह विराट्पुरुषके शरीरसे भूआदिक लोक उत्पन्न हुए ॥ यत्पुरुषेणहविषादेवायज्ञमतन्वत ॥ वसन्तोऽस्यासीदाज्यंग्रीष्मऽद्वैतः शरद्द्वैतः ॥ य० अ० ३१ मंत्र ॥ १४ ॥ जिस कालमें विद्वानोंने विराट्देहरूप हवि (हवनकरनेका अन्न) करके ज्ञानयज्ञको विस्तारित किया तब इस ज्ञानयज्ञके लिये वसंत ऋतु घृत हुवा ग्रीष्म ऋतु हवन करनेके समिधाएँ हुवा । तैसेही शरद ऋतु हवि (होमकरनेका अन्न हुवा) ॥ सप्तास्यासन्परिधयस्त्रिः सप्तसमिधःकृताः ॥ देवायद्यज्ञन्तवाना अवधन्तपुरुषम्पशुम् ॥ य० अ० ३१ मंत्र १५ ॥ जिस कालमें विद्वानोंने ज्ञानयज्ञको किया उस समय विराट्पुरुषरूप पशुको बांधा अर्थात् भाव करते भये उस कालमें १२ महीने ५ ऋतुएँ ३ लोक १ यह आदिःय ऐसे २१ अथवा गायत्री आदि ७ अतिजगती आदि ७ कृत्य आदिक ७ ऐसे २१ छंद ये संपूर्ण समिध (होमकरनेकी लकड़ियाँ हुई । यज्ञेनयज्ञमयजन्तदेवास्तानिधर्मार्णिप्रथमान्यासन् ॥ तेहनाकम्भहिमानः सचंतयत्रपूर्वसाध्याःसन्तिदेवाः ॥ य० अ० ३१ ॥ मंत्र १६ ॥ और वे विद्वानोंने विराट्रूप, हविसंबंधी ज्ञानयज्ञकरके यज्ञपुरुष महानारायणका पूजन किवा । महानारायणपूजनसंबंधी वे धर्म मुख्य जहाँ प्रथम साध्य देवता स्थित हैं उस महानारायण सत्यलोकको महानारायणके भक्त महात्मा प्राप्त हुये ॥

यह सोलह मंत्र आवश्यक माने जाकर यजुर्वेदसे उद्धृत किये गये हैं । मेरा विशेष तात्पर्य यह कि, सांसारिक मनुष्योंको मालूम होवे कि, वे लोग किसका पूजन करते हैं ? तात्पर्य यह कि, वे सच्चे परमेश्वरकी पूजन करते हैं, अथवा झूठे परमेश्वरकी । जो कोई सच्चे परमेश्वरकी पूजन करता है, वह सच्चा होजाता है । सो वे लोग जाने कि, यह समस्त सृष्टि विराट्पुरुषद्वारा है । उत्पत्ति स्थिति तथा विनाश सब उसीके गुण हैं । यह विराट्पुरुष समस्त रचना करता है । उसकी और अक्षर पुरुष जो लाहृत स्थानमें रहता है उसकी प्रेरणा भी होती है । जो सत्य पुरुष सबका स्वामी है, उसके आज्ञाकारी सब हैं । यहाँ वेदमें इसी सत्यपुरुषका प्रकरण दिखाया गया है । तथा विराट्का भी आया है । जो भवसागर है उसका रचयिता तथा राजा यह विराट्पुरुष अलख निरंजन है । सांसारिक मनुष्य लड़ते और झगड़ते हैं, इसको निराकार कहते हैं, न जाने सत्य कहते हैं, अथवा मिथ्या कहते हैं । जिसका उनचास करोड योजनाका शरीर हो वह निराकार कैसे कहलावे, जिससे समस्त गुण उत्पन्न होते हैं, सदैव उसके साथ रहते हैं, वह निर्गुण कैसे

कहलावे ? जितनी पूजा पाठ योग मुक्ति आदि हैं, सब इस विराटपुरुषही द्वारा उत्पन्न हुई हैं। सो सब खिलाड़ीका खेल है, सब लोग इस खिलाड़ीके खेलमें लग रहे हैं, खिलाड़ी को पहचान नहीं सकते कि, यह कौन है जो समस्त संसारको नचा रहा है ? जिसने इस खिलाड़ीको पहचान लिया, उसके खेलके भेदको जान लिया, फिर जादूगरका जादू और मंत्रादि इसपर फलित नहीं होता। उस जादूगर का जादू तबहीतक फलीभूत होता है जबतक यह भेदको नहीं जानता है। उसके जाननेकी बही रीति है जो वेदने बताई है।

जितने वेदपाठी हैं वे वेदके अर्थको अपनी अपनी बुद्ध्यानुसार करते हैं। कितने मनुष्योंने मिथ्याको सत्य प्रमाणित करनेका उद्योग भी किया है तथा अर्ब भी करते हैं। तो भी मिथ्या सत्यसे श्रेष्ठ माना नहीं जा सकता। जब हंसोंके सामने आवेगा तब दूधका दूध और पानीका पानी पृथक् होजावेगा। जो कोई अग्निको जल जानकर उससे नहावेगा तो वह निश्चय भस्म होजावेगा, वह अग्नि तो अपना स्वभाव कदापि नहीं छोड़ेगी। जो कोई विषको अमृतफल जानकर खावेगा वह निश्चय मर जावेगा, इसी प्रकार जो कोई अपने सुकर्मोंपरही भरोसा रखे सत्य-गुरुके करग्रहणके निमित्त उत्सुक न हो, उनको न मिले तो वह इस अंधकारमय समुद्रके पार कदापि न हो सकेगा, पर जब अच्छे कर्मोंका फल यहाँ तक उदय होगा कि, पारखी गुरु मिल जायगा तो सब बन्धनोंसे छूटकर सत्यलोक चला जायेगा।

इस विराटपुरुषके एक हाथमें वेद है और दूसरे हाथमें राजदंड है और तीन लोकके समस्त जीवोंका राजा है। सबको अधीन कर रहा है, इसकी अधीनतासे कभी कदाचित् कोई बाहर जा सकता है। जिसपर कबीर साहबकी परम दया होती है उसको वह स्वयम् कालपुरुषके पञ्जेसे छुड़ाता है। मनुष्योंमें से ऐसा कोई नहीं है कि, अपनी पूजा पाठ तथा तपस्यासे सत्यपथ पावे। कारण यह हैं। कि, जब बड़ों बड़ोंको पथ नहीं मिला तो वे दूसरेको क्या दिखलावेंगे ? इसी कारण प्रायः ऋषि मुनि जन्मबंधुवे हुए। इन सबकी बुद्धिको कालपुरुषने विलोपित कर दिया है कुछ सूक्ष्मता नहीं है, कोई बूझता नहीं सब जिह्वाओं पर इसकी मुहर लग गई है। इस कारण वे लोग देखते हैं पर देखते नहीं। सुनते हैं पर सुनते नहीं। बोलते हैं पर बोलते नहीं। प्रत्यक्ष दुष्कर्मोंको देखते जाते हैं उसीका अनुसरण करते जाते हैं। फिर इनको मनुष्य कहना चाहिये अथवा मनुष्यतासे पृथक् ? वास्तवमें मनुष्य वह है जो बुराईको देखे और उससे तुरंत भाग जावे फिर उस पथपर कभी पैर न रखे ॥

अकालपुरुषके धार्मिक नियम ।

अकालपुरुषके धार्मिक ग्रंथ चार वेद हैं । ये चारों वेद मायासृष्टिके आरंभ कालमें प्रकट हुए । ये चारों ग्रन्थ वैदिकभाषामें निकलकर समस्त संसारमें फैल गए । वैदिक संस्कृत भाषा होनेके कारण इसके समझानेवाले धोखेमें पड़े । कारण यह कि, इसका अर्थ कोई किसी प्रकार और कोई किसी प्रकार करता है वास्तवमें वेदके भाषाकारोंमें किसीको ऐसी विद्या नहीं हुई कि, इस वेदकी यथार्थ अवस्था को जान सके । सबके सब शब्दार्थ लगाकर लोगोंपर अपना विचार प्रगट करते आए हैं । प्रत्येक मनुष्य अपने ढङ्गपर अपनी मृत्यनुसार आप समझाते रहे । विचारहीन सांसारिक मनुष्य जिस पथके अधीन हुए, उन्होंने वही अर्थ स्वीकार कर लिया । उनको उसी ढङ्गपर चलना पड़ा । उनको मिथ्या तथा सत्यकी क्या सुध, वे तो अपने गुरु तथा अग्रगामीकी पथदर्शकताको स्वीकार करके वही सत्य मानते हैं । वही ठीक ठहराते हैं । अयथार्थवक्ता विद्वानोंने लोगोंको भटका मारा । वेदकोशमें एक शब्दके अनेक अर्थ होनेके कारण जिस किसीको जो अर्थ अच्छा जान पड़ा वही अर्थ लगाया । अपने विचारके अनुसार विख्यात किया । वेदकी उलझनोंसे समस्त संसार अनभिज्ञ रहा । वास्तविक भेदको कोई न जान सका कि, इस यवनिकाके भीतर कौनसा रहस्य भरा पड़ा है । इस कारण समस्त संसार धोखेमें पड़ा । बिना भक्तिवेत्ताके तथा सत्यपुरुषकी भक्ति और मुक्तिमार्गको पहचाने नहीं जान सके । इस कारण कालपुरुषने वेदके वास्तविक पदार्थको छिण कर समस्त मनुष्योंको फँसा लिया । कबीर साहब सृष्टिकी उत्पत्तिकालसे लेकर आजपर्यन्त बराबर समझाते आते हैं कि, काल पुरुषके धोखेकी चालसे बचो परन्तु यह, जीव नहीं समझता, नहीं मानता । कारण यह कि, मनुष्योंकी बुद्धिपर परदा पड़ रहा है यदि वेदकी वास्तविकताको समझ जाय तो सत्यपुरुषको पाजाय ।

इन्हीं चारों वेदोंसे जो चारों पुस्तकें निकली हैं और भिन्न २ भाषाओंमें उनका अनुवाद हो चुका है, उनके द्वारा वेदोंकी थोड़ीसी अवस्था जानी जा सकती है । क्योंकि, इसका यथार्थ ज्ञान होना सत्यपुरुषकी इच्छा पर निर्भर है । उसके मुँहसे अग्नि उत्पन्न हुई उसी पुरुषके मुँहसे ब्राह्मण उत्पन्न हुवा इस कारण ब्राह्मण को यज्ञ करने और करानेका भाग मिला । वेदपाठका अधिकारी विशेषतः ब्राह्मण ठहराया गया । यद्यपि इतरोंके निमित्त भी वेदपाठ अत्यन्त आवश्यक है । कारण यह कि, यह प्रथा समस्त संसारके निमित्त नियत की गई है, सबकी ऐतिहासिक बातें पृथक् हैं, कर्मकाण्ड एक जैसीही है ।

बलिप्रदान ।

बलिप्रदानके विषयमें समस्त बातोंका मिलान करके देखलो । सबमें मिलान ठहरेगा । बलिप्रदान सत्य तथा ठीक अवश्य है । कारण यह कि, इस विराट् पुरुषका भोजन है । अग्नि उसका मुख है । जो हृव्य वस्तुएँ वेदमंत्रोंको पढ कर या इसपुरुषका ध्यान करके अग्निमें डाली जाती हैं सो सब उसका भोजन है । वह उसको खाता है । इसी विराट् पुरुषके निमित्त बलिदान करना आवश्यक है । उत्पत्तिकालके आरम्भसे लेकर अबलें वही काम नियमानुसार होता चला आता है । इस महापुरुषके निमित्त बलिप्रदान नियत किये गये । इसी प्रकार महामाया की सभामें प्रत्यक्ष गला काटा जाता है । कोट कांगडा और कामरू कामक्षा आदि सहस्त्रों स्थानोंमें गले काटे जाते हैं । ये पांचों बटुक आदि भयानक तथा मनुष्यों को त्रास देनेवाले हैं । इन्हींकी पूजा वाममार्गके पुस्तकोंमें है । जो लोग उनकी पूजा कर उसे तो बलि करना आवश्यक है । बिना बलिके यह विराट्पुरुष प्रसन्न न होगा । भला जी ! यदि खेती करने वाला राजा अथवा पदाधिकारीको भूमि कर न दे तो खेतीका काम उससे निश्चय छीन लिया जावेगा । भला जी ! समस्त संसार तो उसकी प्रजा है । सबका सब सके हाथोंके नीचे हैं । फिर कैसे बलि न करें ? निदान यह बलि तथा बैसाही अग्नि पूजन प्राचीन कालसे चला आता है । वाममार्गी पंडित और मुल्ला क्राजी इत्यादि इस बलिप्रदान करनेके अगुवा तथा पथदर्शक हैं । इन बलिप्रदानोंके पापोंने सब जीवोंको आवागमनके बन्धनमें फँसा रक्खा है । इसी निर्दयता और प्राणघातके कार्यने समस्त मनुष्योंको निर्दयी बना दिया है । जो कोई वाममार्गी पश्चिमकी पुस्तकोंके अनुसार चलेगा, वह अवश्य बलिप्रदान करेगा । चारोंमें बराबर बलिकी आज्ञा है उन पुस्तकोंके मानने वाले सदैवसे करते आए हैं, पर वेद उनके विरुद्ध है । उसका तो सिद्धांत है कि, अस्तित्व नु तस्मादोजीयो यद्भि हव्येन ईजिरे यानी उस सत्य पुरुषका ध्यान ही सबसे बड़ा है ।

यज्ञ शब्दार्थ ।

देवपूजा, संगतिकरण और दान इन अर्थोंवाले यज्ञ धातुसे नङ् प्रत्यय होकर 'यज्ञ' शब्द बनता है । कोशकार हैमने इसका आत्मा, मख, नारायण और हुताश (अग्नि) अर्थ माना है । इसके विवरण कल्पसूत्र और श्रौतसूत्रोंमें भरा पड़ा है । पहिले पुरुष मखोंसे ही सत्यपुरुषको प्रसन्न करते हुए उसके पुण्यसे पापों को नष्ट किया करते थे । विराट् पुरुषको भी इसीसे तृप्त किया करते थे । आज