सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
संग्रह पर लौटें

कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)

कबीर साहेब द्वारा

स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

Devanagarihipublished1,367 पृष्ठ

१० अध्याय । विशेष बलि

है वहाँकी पहुँच दुर्लभ है । जितने लोग सांसारिक वासनाओंके आनन्दमें फँसे हैं वे सब इन्हीं चारों श्रेणियोंमें रहते हैं । पर ये चारो श्रेणी बिना सत्यपुरुषकी कृपाके शूलीस्तम्भके सदृश हैं, समस्त जीव इन्हीं चारोंपर लटक रहे हैं । जिनके मनमें वासना है । उनमें कोई न बचेगा । इस भवसागरमें बिलकुल अंधेर हो रहा है । किसीके हृदयपर प्रकाश नहीं, न बल है कि, इस अंधरेसे बाहर निकल सके । परन्तु हों इससे वह मनुष्य बहिर्गत हो सकेगा जिसके निजके दो गुण हों । एक स्वच्छ बुद्धि, दूसरे सोचनेकी शक्ति । जिस मनुष्यमें ये दोनों गुण न होंगे वह अंधकारसे कदापि बहिर्गत नहीं हो सकेगा । यह भवसागर अंधेरपुर नगर है और इसमें चारों ओर अज्ञानता तथा मूर्खताकी लहरें हैं । इसमें समस्त जीव डूबते उछलते रहते हैं, जिसका एक उदाहरण मैं देता हूँ ।

उदाहरण—एक नगर था इसका नाम अंधेरपुर था । इस अंधेरपुर नगरीके राजाका नाम अंधेरी था । इस राजाके राज्यमें महा अंधेर था इस अंधेरपुरमें समस्त पदार्थ टकासेर बिकते थे । साग पात, अन्न घृत, मीठा इत्यादि सभी वस्तुएँ टका सेर बिका करती थीं । दैवात् उस नगरमें दो साधुओंका आगमन हुवा । उनमें से एकका नाम विवेक तथा दूसरेका विचार था । विचारने विवेकसे कहा कि, आओ भाई ! कुछ दिवसों पर्यन्त हमलोग इसी नगरमें निवास करें । कारण यह कि, यहाँकी समस्त वस्तुएँ सस्ती हैं भली भाँति खाएँ पीएँ, चैनसे जीवन व्यतीत करें । दोनोंने ऐसा विचार कर वहाँ रहना आरम्भ किया । भलीभाँति खा पीकर बड़े मोटे हुए । एक रातको उस नगरके एक महाजनके घरमें चोर लगे । उन चोरोंमें से एक चोर दीवारके नीचे दबकर मर गया, तब वे रोते हुए राजा अंधेरीके पास गये, न्यायके प्रार्थी हुए । इस बातके सुनतेही राजाने महाजनको बुलाकर कहा कि, तेरी ही दिवारके नीचे चोर दबकर मर गया अब तू फाँसी पावेगा । यह बात सुनकर उस महाजनने निवेदन किया कि, महाराज मेरा दोष नहीं, दीवार बनाने वालोंका दोष है कारण यह कि, उन्होंने निर्बल दीवार बनाई । तब राजाने राजगीरोंको बुलाया इनको उपस्थित कर राजाने उनसे कहा कि, हे राजगीरो ! तुमने महाजनकी दीवार निर्बल बनाई उसके नीचे चोर दबकर मर गया, इस कारण तुम फाँसी पाओगे, तब राजगीरोंने निवेदन किया कि, महाराज ! हमारा कुछ दोष नहीं इसमें समस्त अपराध मजदूरोंका है कि, उन्होंने हमको नितान्तही निर्बल गारा दिया इस कारणही दीवार निर्बल हो गई । तब राजाने मजदूरोंको बुलाकर कहा कि, तुमने निर्बल गारा बनाया इस कारण महाजनकी दीवार निर्बल होगई ।

उसके नीचे चोर दबके मर गया, इस कारण तुम फाँसी पाओगे तब मजदूरोंने कहा महाराज ! हमारा कोई दोष नहीं, काजीकी बेटी अच्छे अच्छे वस्त्र आभूषण पहनकर अटारीपर चढ़ गई उसके देखनेको हमारा मन दौड़ गया गारेकी ओर ध्यान नहीं रहा, इस कारण हमारा कोई दोष नहीं, दोष काजीकी लड़कीका है। तब राजाने काजीकी लड़कीको बुलाकर कहा कि, तू भली भाँति वस्त्र तथा आभूषण पहनकर अटारीपर चढ़ी तेरे देखनेके निमित्त मजदूरोंका हृदय ललचाया उन्होंने कच्चा गारा बना दिया, महाजनकी कच्ची दीवार हो गई, उसके नीचे चोर दबकर मर गया, इस कारण अब तू फाँसी पावेगी। तब काजीकी बेटीने कहा कि, महाराज ? मेरा कुछ दोष नहीं कारण यह कि, एक बादशाह ससैन्य इस पथसे जाता था, उसके देखनेहीके निमित्त मैं अटारीपर चढ़ी थी सो इस बादशाहका दोष है। तब राजाने आज्ञादी कि, जाओ बादशाहको पकड़ो, उस पर बादशाह की फौज दौड़ी, इधर उधर दूँढा, न बादशाह और न उसकी सैन्यको पकड़ सके, वह बलिष्ठ बादशाह राजाके पकड़नेसे न पकड़ा गया वह डंका देता हुवा अंधेरे नगरसे बाहर निकल गया, राजाका कुछ वश नहीं चला तब राजाने देखा कि, मेरा न्याय तो पूरा नहीं हुवा इस कारण बड़े दुःखमें बैठ था। इतनेमें राजाका मंत्री वहां आन उपस्थित हुआ। पूछा कि, महाराज ! आपके दुःखका क्या कारण है ? तब राजाने कहा कि, मैं चाहता था कि, बादशाहको गिरफ्तार करूं पर वह मेरे वशमें नहीं आया, न मेरा न्यायही पूरा हुआ यह महादुःख मेरे हृदयको बेधे डालता है। यह बात सुनकर मंत्रीने उत्तर दिया कि, आप दुःखी न हों हमारे अंधेरे नगरमें दो सण्ड मुसण्ड साधू फिरते हैं उनको आप फाँसीपर चढ़ावें, कारण यह कि, बादशाह तथा साधुओंकी मयदि समान होती है इस प्रकार आपका न्याय पूरा हो जावेगा। यह बात सुनकर वह अंधेरी राजा प्रसन्न हुवा, विवेक तथा विचार नामक दोनों साधुओंको पकड़ लिया। आज्ञा दी कि, इन दोनों साधुओं को फाँसीपर लटका दो। तब उन दोनों साधुओंने यह युक्ति की कि, आपसमें लड़ने झगड़ने लगे। एक कहता कि, मैं फाँसी चढ़ूँ, दूसरा कहता कि, मैं पहले चढ़ूँ। दोनोंको झगड़ते देखकर राजाने पूछा कि, तुम दोनों क्यों झगड़ते हो। तब उन्होंने उत्तर दिया कि, महाराज ! इसका कारण यह है कि, हम लोग बड़े ज्योतिषी हैं, लग्न तथा मुहूर्तसे भली भाँति विज्ञ हैं, भविष्यकी बातोंको जान लेते हैं और हमें यह जान पड़ा है कि, इस समय चार लग्न ऐसे हैं कि, इन लगनोंमें जो फाँसी चढ़ेगा सो सर्वोच्च भंगीपर अधिकृत होगा। जो पहले फाँसी चढ़ेगा वह