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कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)

कबीर साहेब द्वारा

स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

Devanagarihipublished1,367 पृष्ठ

हजरत नूह

तफसीर काबानीमें आया है कि, खुदा प्रतिदिवस तीन सौ साठ बार लौह महफूज पर दृष्टि करता है। जो चाहता है वह मिटा डालता है जो चाहता है बना देता है।

तफसीर हुसेनीमें लिखा है कि, जिस समय कुछ रात शेष रह जाती है तब खुदा लौह महफूज पर दृष्टि डालकर जो चाहता है वही बना देता है।

अबदुल्ला बिन अब्बास भी कहता है कि, खुदाने जो मुकद्दर किया है उसमें कदापि बदल बदल नहीं हो सकती। परन्तु रिजक, भौनस, सआदत और शकावतमें।

फखरुद्दीनने तफसीर कबीरमें लिखा है कि, आयत महो और असबातमें दो कौल हैं। प्रथम तो यह कि, महो और असबात दो वस्तुओंमें संयुक्त हैं। जैसे खुदाताला महो करता है रोजी और ज्यादा करता है। रोजी अजल, सआदत, शकावत, कुफ्र और ईमानकी भी यही दशा है। दूसरी यह कि, खुदा बन्दोंका हिसाब लिखता है। अतः जिस समय बन्दाने तोबा की तो वह तुरन्त ही उसका दोष मिटा देता है। जब वह दान देता है तुरन्त ही उसका कष्ट निवारण कर देता है।

समीक्षा—अब यहाँ विचार करना चाहिये कि, ऊपर लिखी पाँच बातोंपर समस्त व्यवहार परमार्थका आधार है। इन पाँच बातोंसे खुदाका कोई सम्बन्ध नहीं है। फिर किन बातोंसे उसका सम्बन्ध रखना समझा जावे, पाँचों बातें हमारे मायानुसार हैं फिर खुदा कौन है और हमसे क्या सम्बन्ध रखता है। किस बातमें हमारी सहायता कर सकता है? यह नहीं मालूम कि, मुहम्मदी भाग्यको क्या समझते हैं। आपहीतो खुदाको हमारे कार्योंसे अलग और बेत-अलुक बताते हैं आपही कहते हैं कि, खुदाने उत्पत्तिसे पचास सहस्र वर्ष पूर्व सबका भाग्य ठहरा दिया है। यह कैसे भ्रम तथा भूलकी बात है। फिर ऐसे अन्यायी खुदाकी बन्दना कौन करे। जब खुदाने पूर्वसे मनुष्यका भाग्य लिख रक्खा तो फिर अलग अलग कैसे ठहरा। किसीको भला तथा किसीको बुरा किस कारण बनाया यह अन्याय, क्यों किया। मुसलमान बेसमझीके धोखेमें पड़े हैं। यदि वे पूर्व देहसे उस देहमें आवागमन भी स्वीकार करें तो वस्तुतः उनकी बातें ठीक ठहरतीं।

३२—कयामतके दिनकी तीनबातें—कयामतके दिनके विषयके बाबमें तीन बातें लिखी हैं। प्रथम कहा है कि, कयामत (महाप्रलय) का एक दिन

पचास सहस्र वर्षके समान होगा । दूसरे स्थानमें लिखा है कि, एक सहस्र वर्षका होगा । फिर तीसरे स्थानमें लिखा है कि, पल झपकते कयामत (महाप्रलय) बीत जावेगी । यह तीनों बातें स्वीकार की नहीं जा सकतीं । जबतक तीन बार उत्पत्तिका होना स्वीकार किया न जावे । इसका तात्पर्य तो यह है कि, कयामत (महाप्रलय) का दिवस तो अवश्य ही पलके पलमें बीत जावेगा । कभी तो कयामत (महाप्रलय) के पीछे पचास सहस्र वर्षके उपरान्त संसारकी उत्पत्ति होती है और कभी सहस्र वर्ष पीछे । कभी कयामत (महाप्रलय) के उपरान्त उसी समय तनिक भी विलम्ब नहीं लगता । नवीन सृष्टि प्रगट होती है । अनेक कालतक शून्य रह जाता है । यही बात स्वीकार किये जाने योग्य है । इसी प्रकार बारम्बार उत्पत्ति स्थिति तथा विनाश हुआ करता है । सब जीवोंका आवागमन लगातार चलता रहता है ।

३३—सालिग्राम पूजनेकी प्रतिज्ञा—तफसील मदारकमें लिखा है कि, मीसाकका अर्थ प्रतिज्ञा है । खुदाने आदमको उत्पन्न करके बैकुण्ठमें प्रविष्ट होनेको पहिले बैकुण्ठके द्वारके सामने यह प्रतिज्ञा कराई थी । पर मुबारजुलन-बौवतमें लिखा है कि, भिहिश्तसे निकालनेके समय यह प्रतिज्ञा कराई गई थी । मदारकके अनुसार कदाचित् यह प्रतिज्ञा नाअमानमें ली गयी थी जो उरफातके निकट मक्कामें है, अथवा स्थान नेहारमें लीगई थी जो भारतवर्षमें कोई स्थान है । मआलमबकौलकलबी मक्का और तायफमें यह प्रतिज्ञा ली गई थी । उस प्रतिज्ञाका स्वरूप यह है कि, जब आदम मक्कामें हूज्ज करने गया तब उरफान पर्वतके पीछे मानमें सो गया । खुदाने अपनी कुदरतका हाथ उसकी पीठपर लगाया । आदमके समयसे महाप्रलय तक जो मनुष्य उत्पन्न हुये होते और होंगे चिउंटीके स्वरूपमें सृष्टि कर्मानुसार सब तुरंत बाहर निकल पड़े । उसी समय वे सब युवक बुद्धिमान हो गये । जब वे सब तरुणावस्थाकी पहुँचे उस समय खुदाने पूछा कि, क्या मैं तुम्हारा पालक नहीं हूँ ? वे बोले, कि, तू हमारा पालक है । अतः प्रतिज्ञा यही थी कि, तू हमारा खुदा और हम तेरे सेवक हैं । सभीोंने यह बात स्वीकार करली । खुदाने यह प्रतिज्ञा आदमजादसे ली । उस काले पत्थरको जो काबा घरमें है उनके हाथमें दिया । उस पत्थरको उनके हाथमें सौंपके फिर सभीसे कहा कि, अब तुम मुझको दण्डवत् करो । काले पत्थरको हाथ लगाओ । पर बहुतोंने दण्डवत् किया, बहुतोंने नहीं किया, यह पहली दण्डवत् हुई । दूसरी दण्डवत्में कितनोंने जो नहीं किया था पछताकर दूसरी दण्डवत् की, उनमेंसे कितनोंने : १ पहले किया दूसरोंने नहीं किया । इस कारण चार