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कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)

कबीर साहेब द्वारा

स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

Devanagarihipublished1,367 पृष्ठ

सिद्ध महात्मा और विद्याभिमानी

क्या जाने जाहिल वह साहिल सो कहाँ है ॥
क्या इल्मो अमल आमिल कामिल होवे लाशा ।
कर बन्दगी बे आजकी तब देख तमाशा ॥

जगत्को असत् प्रतिपादन

यह जगत् असत् है । यद्यपि यह सत् होकर भासता है तथापि मृगतृष्णाके जलके समान असत् है । असत्के ग्राहकोंको सत्य पदार्थ नहीं मिल सकता, सांसारिक पदार्थोंके अभिलाषी संसारमें ही रहेंगे । जिन लोगोंने संसार तुच्छ समझ लिया है उनका संसारसे प्रेम नहीं होता । यह संसार उसी मृगतृष्णाके जलके समान है, जो हिरणको दौड़ाकर मार डालता है । गर्मीके दिनोंमें जब हिरण प्यासा होता है, जलके लिये इधर उधर भटकने लगता है तो उस समय उजाड़ मैदानमें उसे दूरसे जल दीख पड़ता है । मृग, जल जानकर उसकी ओर दौड़ता है पर उसके निकट पहुँचते पहुँचते वह जल फिर उसको उतनीही दूर आगे दीख पड़ता है । इसी प्रकार अनेक बार दौड़ते दौड़ते हिरण थककर गिर पड़ता है, प्राण त्याग देता है । इस प्रकार इस संसारके भोग विलास त्रिविध तपोंसे तपे हुये, सुखके प्यासे जीवोंको, सुखदाई दीख पड़ते हैं पर इसकी प्रवृत्ति विषयोंमें होती है तो सुख मिलता नहीं—पर तृष्णा अधिकसे अधिक होती जाती है, अन्तमें निष्फलताके साथ मर कर आवागमनको प्राप्त होता है ।

सांसारिक वासनाके बद्ध पुरुष बारम्बार संसारी पदार्थोंकी इच्छा करके उसीमें फँसे रहते हैं, उसीके लिये प्रयत्न करते हैं, उसीके प्राप्त होनेसे आनन्द समझते हैं । ऐसे पुरुषोंका अंतःकरण मलीन रहता है, वे ईश्वरको प्राप्त नहीं हो सकते । क्योंकि, ईश्वरको प्राप्त होनेके लिये उनको प्रयत्न करनेका समयही नहीं मिलता । ऐसे लोग अपनी आयुको सांसारिक व्यवहारोंमें व्यतीत कर देते हैं । जो लोग सत्संग करते हैं उनको संसार बाजीगरके खेलके समान जान पड़ता है । जिस प्रकार बाजीगर नाना प्रकारके कौतुक दिखलाता है, कभी बाटिका लगा देता है, कभी उसे अन्तर्धान कर देता है । कभी किसीको मृतक करके जीवित कर देता है, कभी कुछ कभी कुछ आश्चर्ययुक्त कार्य कर दिखाता है पर उसकी सब जादूगरी मिथ्या होती है, उसी प्रकार इस संसारके सारे कार्य आश्चर्यमय हैं । उस सर्व शक्तिमान् बाजीगर (जगत्कर्त्ता) ने इस संसारकी रचना की है । जिस प्रकार बाजीगर कौतुक करता करता तमाशेको समेट लेता है उसी प्रकार ईश्वर जगत्का प्रलय कालमें प्रलय कर देता है । अज्ञानी जन इस कौतुकको देखकर आश्चर्य मानते हैं, पर जो पुरुष बाजीगरके कौतुकका

भेद जानता है, कभी धोखेमें नहीं आता। यहाँ पर मैं कई एक दृष्टान्त लिखता हूँ, जिससे लोगोंको संसारकी असत्यता प्रमाणित हो।

प्रथम दृष्टान्त।

सन् १८५७ में जब कि, हिंदुस्तानमें राज विद्रोह हुआ था, दिहली शाह अपराधी ठहराये जाकर शहरसे निकाल दिये गये थे। शहर लूट लिया गया था। उसी समय, महाराजा कपूरथलाके दीवान, रामजसमल नामक खत्रीको एक पुस्तक, लूटमें मिली थी जो स्वयम् शाहजहाँ बादशाहके हाथकी लिखी हुई थी, उसमें एक बात इस प्रकार लिखी थी।

बादशाह लिखता है कि एक दिन एक बाजीगर नाना प्रकारके कौतुक दिखाने वह एक तलवार लेकर आकाशकी ओर उड़ गया। ऊपर जानेके समय वह कहता गया कि "मैं खुदाके साथ लड़ाई करने जाता हूँ"। थोड़ी देरमें देखतेही देखते, वह आखोंसे छिप गया। अधिक समय न लगा होगा कि, ऊपरसे उसका धड़ (जैसे, हाथ, पोंच, आदिसे लेकर समस्त शरीरके) एक एक टुकड़े होकर नीचे गिर गया। अब उसकी स्त्रीने कहा कि, मेरा पति मर गया है, मैं सती होऊँगी। बादशाह तथा अनेक लोगोंने बहुत समझाया पर स्त्रीने एककी भी न मानी, लकड़ियोंका ढेर लगाकर अपने पतिके अंगोंको लेकर सती होगई। उसके जल जानेके पीछे थोड़ी देर बाद बाजीगर आनन्दमें भग्न नीचे उतरा। अपनी स्त्रीको न देखकर बादशाहसे अर्जकी कि, मेरी स्त्रीको बुलवा दिया जाय। बादशाहने कहा कि, तेरी स्त्री तो तेरी लाशके साथ जलकर राख होगई, पर उस बाजीगरने एकका भी कहना न माना। अन्तमें अपनी स्त्रीको ऊंचे शब्दसे पुकारने लगा, तो वह स्त्री बादशाही अटारीपरसे बोली कि, मैं महलमें हूँ। उसने पुकारा कि, चली आ। वह आनन्द पूर्वक हँसती हुई आगई।

बाजीगरका यह कौतुक देख बादशाह प्रसन्न हुआ। उसे बहुत कुछ पारितोषिक देकर बिदा किया।

द्वितीय दृष्टान्त।

सन् १८३० ई० में मैं अपनी जन्मभूमि आजमगढ़में थे। वह मेरे विद्यो-पार्जनका समय था। आजमगढ़में मच्छर नहीं थे। लोगोंसे पूछनेपर लोग कहते कि, यहाँके मच्छरोंको एक बाजीगरने बांध दिया है। मैंने पूछा कि, किस प्रकार? लोग कहते कि, एक समय यहाँके राजाके पास एक बाजीगर आया। उस समय राजा अपने राजमहलमें था। राजाको खबर पहुँची तो राजाने कहा कि, इस समय बाहर निकलनेसे मच्छर बहुत दुख देंगे। क्योंकि, मेरे शहरमें मच्छर

बहुत हैं । बाजीगरने कहला भेजा कि, मैं शहर भरके मच्छरोंको बाँधे देता हूँ, राजा साहब आकर मेरा खेल देखें । बाजीगरने अपने मंत्रके बलसे शहर भरके मच्छरोंको क़ैद कर दिया । राजा बाहर आया । बाजीगरने बहुत प्रकारके कौतुक दिखाये पीछे वही कौतुक दिखलाया वैसाही कर्तव्य किया जैसा कि, शाहजहाँ बादशाहके वृत्तान्तमें लिखा गया है । अन्तमें राजाने उपरोक्त बाजीगरको कतल करनेकी आज्ञा दी । अंतमें गिड गिडानेपर भी, अपने प्राणको बचाता हुआ न देखा तो बाजीगरने शाप दिया कि, “ऐ राजा ! तू कोढ़ी होकर बहुत दुःख पावेगा, तेरा राज्य नष्ट हो जावेगा, महान् कष्ट भोगकर प्राण त्यागेगा ।” पीछे बाजीगर तो मारा गया पर राजाको भी ठीक वैसेही विपत्ति, दुःख और कष्टोंका सामना कर प्राण त्यागना पड़ा ; जैसा कि, बाजीगरने शाप दिया था ।

बाजीगरकी समाधि—उपरोक्त बाजीगरकी समाधिपर एक खजूरका वृक्ष उगा जो कि, सीधा शहतीरके समान खड़ा था । राजाके वंशवाले उसपर खारूयेकी गिलाफ लगाते और उसकी पूजा किया करते थे । यदि वे उसकी पूजा नहीं करते तो उनको नाना प्रकार के विघ्नोंद्वारा बहुत दुःख हुआ करता था । नियत समयपर समाधिपर मेला लगा करता था, जिसमें हजारों आदमी इकट्ठे होते थे । राजाका किला टूट फूट कर दरियामें गिरता जाता था । राजाकी संतान, किला खजूर का वृक्ष, मेला और समाधिकी पूजा, मैंने अपनी आँखोंसे देखी थी ।

अनुमान होता है कि, उपरोक्त बाजीगर वही था, जिसने शाहजहाँ बादशाहको कौतुक दिखलाया था क्योंकि, बादशाह और राजा एकही समयमें हुए थे ।

राजाके परिवारका बालक—मूख राजाने विचारा था कि, यदि इस बाजीगरको मार डालूंगा तो यहाँके मच्छर ऐसे ही बँधे रहेंगे । अज्ञानतासे यह न सोच सका कि, जिस शरीरके सुखके लिये मैं ऐसा अनर्थ करता हूँ वह कबतक रहनेवाला है । इसका सुखही क्या है । उस पापका जो फल उसको प्राप्त हुआ वो तो ऊपर लिखा गया पर उसकी संतान भी महान् दुःखमय जीवन व्यतीत कर रही थी । उसी राजाके वंशका एक विद्यार्थी मेरे साथ पाठशालामें पढ़ने आया करता था जो महान् दुःखी था । उस समयके आजमगढ़ जिलाके मजिस्ट्रेट और कलेक्टरको धन्य है जिन्होंने, उसकी सब दशा देख उसके खानदानका हाल जान दया कर उसके पोषण पालनके लिये एक तहसीलदारीकी जगह दिलवा