कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)
Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)
कबीर साहेब द्वारा
स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
सिंहावलोकन
जो बोले संस्कृत मीठी तु मोरा । तेरा गर्दन भी धरकर काल तोरा ॥
तु अंगरेज़ी ो बोले बोल मैना । तेरा भी टूटेगा यकरोज़ डैना ॥
जो शिरीं बोल तूती फारसी है । पकड़ पिंजरेमें तुझको ड़रासी है ॥
ऐ मँढक तू सिलंगी बोल बोला । तेरे सरके ऊपर जमकर कलौला ॥
फ़रासीसी लातीनी सिख वैरा । तेरी गर्दन ऊपर भी छुरी फ़ेरा ॥
जो मेगपयी बोलयी सदहा जवानों । तुझे मारेंगे धर कहरवानों ॥
ज़ीलतसे रज़ीलत घरमें जावे । अगर सदहा जवानें सीख आवे ॥
हुआ हैवान तू इनसान मूरत । न पहचाना जो अपनी अस्ल सूरत ॥
किया था किसलिये आदमको पैदा । हुआ तू किसके ऊपर आनके शैदा ॥
तू खालिक याद कर अपना ऐ नादों । शबोरोज़ो शाम बाम दादों ॥
॥ ल-यह मान मड़क तेरा सो दो दिनमें गुज़रजा ।
यह भीड़ भड़क डेरा सो दो दिनमें गुज़रजा ।
यह शान और शौकत इधर उधरका सैर ।
हर चार सिम्त फेरा सो दो दिनमें गुज़रजा ॥
यह माल मुल्क जाह और हशमत व कुलाह ।
यह दुनअबी उरझेरा सो दो दिनमें गुज़रजा ॥
इससे न बड़ी नेमत है यह देह बशरकी ।
कागज़का दुनी बेरा सो दिनमें गुज़रजा ॥
सत नाम यक साहब सच पकडले आजिज़ ।
यह तेरा और मेरा दो दो दिनमें गुज़रजा ॥
छिपाया यारको ऐ शोर बखते । लखाया ग़ारको ऐ शोर बखते ॥
किया दिलने मेरे दिलबरसे परदः । जताया नाज़को ऐ शोर बखते ॥
रहे रहमां तू कर दिया बन्द । बताया मारको ऐ शोर बखते ॥
जहर धरदी हेयाते आबकर दूर । कियाबन्द कारको ऐ शोर बखते ॥
नहीं नेमत सरासर गन्दगाकी । लगा अम्बारको ये शोर बखते ॥
गया जब भूल आजिज़ ठग भूलाया । दिया दारको ऐ शोर बखते ॥
साधुसेवा जो त्याग दुनियादार । हर तरफ देख आगदुनियादार ॥
देख आतश जिधरको जावेगा । फिर किधर जावे भागदुनियादार ॥
साधुगुरु बिनकहां ठिकाना और । है पड़ा पीछे नाग दुनियादार ॥
कुछ कर सोच दिलमें ऐ नादां । अब तू उठ और जागदुनियादार ॥
तेरे दिलदीलः भी मुकदर है । मोडले अपनी बाग दुनियादार ॥
संत सेवा बिना न पावे राह । उनकी खिदमतमें लाग दुनियादार ॥
संतके जा पकड़ कदम आजिज । देख तब राग रँग दुनियादार ॥
साधु सेवा करो भला होवे । इससे तन मन जो निर्मला होवे ॥
साधु सेवा जो करे मुवारक सो । इससे दूर अपनी बला होवे ॥
संत गुरु बिन फ़तह न पावेगा । गर तेरे हाथ रह कला होवे ॥
संतकी, रोशनीसे तब कुछ देख । होवे जों रातदिन जो ढला होवे ॥
संत बिन हो न तू रहा आजिज । कौसाही गर तू दिलचला होवे ॥
मुरब्बा ।
दुनिया पड़े वनाम खुदा जो कमायेगा । गर पेटभरने अपनेसे ज्यादा तू पायेगा ॥
देनावहक जरूर तेरे हकमें आयगा । खुमस जकात भूल बनी मार खायगा ॥
हरगिजन भूल दुनिअबी खुमसजकातको । जिसने तुझको दिया उसलाय मौतको ॥
तकसीम करता है सोई हरयकके कूबतको । खुमसजकात भूल घनी मार आयगा ॥
देना तुझे जो कुछ है सो दहीके छुटेगा । गर देनेको न देवेतो घर काल कूदेगा ॥
दौलत मताअमाल सबयकरी रोज लूटेगा । खुमस जकात भूल घनी मार आयगा ॥
यह तुही शाही शहनशाह आलमी । छुटे नहीं बहुनिपान छुटेगा सो वहीँ ॥
जाहिरकी आखदेख वातिनकी भी बबी । खुसम जकात भूल घना मार खायगा ॥
खुमसबजकातदी नहीं कारूँ होहलाक । जिनको नहीं है वौफ खुदाबर तरी पाक ॥
करतेबसर रहे जिन्दगी अपनी वाक । खुमसजकात भूल घनी मार खायगा ॥
खुमः जकातजितने हैं जमीपरमुनकराँ । बेशक तू उनको जानलेकारूँ विरादराँ ॥
भड़केगायका जगज्रबरब्वेकहरमां । न खुमसजकातभूघनीमार खायगा ॥
सनतौसिपाहसाहबफिरते जहाँ तहाँ । उनके हवालेकर जो देना बहकसुबहों ॥
पीछेखजाना खासनआजिजहैशकवहाँ । खुमसजकातभूलघनीमार खायगा ॥
तर्जियाबन्दखम्सः ।
सूझता तुमको है नहीं अन्धा । इसलिये काल कैदमें बन्धा ॥
पावेगा भेद शब्दके सन्धा । कौन कह भेद तुझ उस रब्बकी ॥
संत सूरत हैं सांच साहबकी ॥
होवे साहब वहाँ हों संत । संत बिन तु कभी न पावे कंत ॥
मुनता लीलाअपार और बेअन्त । उनकी बातें हैं कुछ जुदेढबका ॥
संत सूरत हैं साँचे साहबकी ।