कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)
Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)
कबीर साहेब द्वारा
स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
साधुओंके भोजन देनेका फल
योग और ज्ञान असत्य हैं उसी प्रकार अर्थ, धर्म, काम, मोक्ष निर्मूल और जल तरङ्गवत् हैं।
गजल ।
भूल मत यार यह शराब सुरआब । पिये हुयेमस्त दिल किया है कबाब ॥
झूठ को सच जान गलतीसे । यह खयालात सारे नकश बर आब ॥
पञ्च हंकार है तमाशए दिल । होते और जाते रहते मिसल हबाब ॥
वार सब रह खबर न पार कहै । कौन जानै सो बरतरीन जनाब ॥
लौलियां ह्विस जो जिस्मानी । कर दिया सारे शहरको खराब ॥
और इन्सान किस हकीकत में । औलिया अम्बिया अल्लाह ए हबाब ॥
अस्ल इसरार जाने आजिज कौन । दिल जो चाहे सो राग रङ्गो रबाब ॥
बटमार—जितने जीवन्मुक्त कहलाये सात ज्ञानभूमिकाके अनुरागी हुये किसीका छुटकारा न हुआ । इस कारण यह है कि, उन लोगोंने मनुष्यके यथार्थ धर्म न जाने धर्मके स्वरूप न पहचाने सबके सब एक दूसरेकी चाल पर चले आते हैं, सत्य बातको कोई स्वीकार नहीं करता । यदि कोई सत्यकी ओर झुके तो दूसरे लोग उसको भटका कर फिर अंधेरेमें डाल देते हैं इसको सत्यकी चाल पर नहीं चलने देते । सचार्ई रूपी मार्गमें अनेक बटमार लुटेरे हैं इस कारण सबही डूब रहे हैं ।
चार प्रकारके आनन्द ।
१ अज्ञानानन्द—जो सांसारिक रागद्वेषमें प्रवृत्त हो परलोक तथा ईश्वरी भयसे अचेत रहे, मदिरापान करता हो, मांस खाता और व्यभिचार तथा विषय-भोगमें फस रहा हो देहको सच जानकर उसीके शृंगारमें लगा हुआ हो, सदा स्वाद और विषय लम्पटताका अभिलाषी रहे ।
२ ज्ञानानन्दका—स्वरूप है कि, स्थूल सूक्ष्म और कारण—जो तीनों देह हैं इनके स्वरूप और तीनों अवस्थाको जानें, पांच तत्वके पञ्जीकरण को जानें, चारों अन्तःकरणका स्वरूप जानें, मायाकी उपाधियोंको त्याग करें, समझें कि, सब मायासे हैं, चेतन ज्ञानके सत्यसारमें आनन्द रहे अपने स्वरूप आत्माको श्रेष्ठ मानता रहे उसीमें अहम्भाव (अर्थात् वह मैं ही हूँ) भावना रख वारम्बार अभ्यास करें ।
३ विज्ञानानन्द—अवस्थामें क्रिया कर्ता और कर्म कुछ शेष नहीं रहता आत्मा स्वयम् प्रकाश विज्ञानानन्दमें मग्न रहता है और यह विज्ञान हंस सबसे श्रेष्ठ माना गया है ।
४ परमानन्द—वह है कि, सुरतीको सत शब्दमें लीनकर देवै सत लोकमें प्रविष्ट हो । यह पदवी सबसे उत्कृष्ट है । स्वसम्बेद इसीकी प्रशंसा करता है । इससे बढ़कर कोई पदवी नहीं है इस आनन्दको पानेपर इसके आगे सब आनन्द तुच्छ हैं । उक्त तीन पदवीमें जीवमुक्ति कहलाती हैं असत्य हैं । यह परमानन्द पद सत्य है ।
तत्त्वमसि इत्यादिका विशद वर्णन ।
यह जीव अपने यथार्थ स्वरूपको भूलकर झोंई को साई कहने लगा, अन्वेषण करते करते थक गया, भी चक्करमें पड़ा, योगी, जड़म सेवड़ा आदिके पास गया, जीव ईश्वरका तत्व पूछने लगा. उन्होंने इसे कर्म उपासना ज्ञान और साधनोंमें लगाया, नानाप्रकारके माहात्म्य बुनाये । चित्त चला बुद्धिने निश्चय करलिया, अहङ्कार उठा इस अहङ्कारकी गांठ पड़ी तो इसमें ऐसा विचार हुआ कि, हम सबसे पहलेही तरेंगे । इस प्रकार ज्ञानी और अज्ञानी सब धोखेमें पड़कर आवागमनमें प्रवृत्त हुये हैं ।
गुरुओंने जो झूठे विचार बतलाये सब मनुष्योंने उन्हींको सच करके मान लिया । उन्हीपर ऐसा निश्चय किया कि, कोई पारख पदको भी समझावें तो भी कोई नहीं मानता । जहाँ मन बुद्धिकी पहुँच नहीं वहाँ ब्रह्मका खोज क्यों कर होगा ? न कहीं, ब्रह्म न कहीं ईश्वर, न अल्लाह न खुदा न राम न रहीम, यह सब जीवके संकल्प मात्र हैं । एक यह जीव सत्य है, सब झूठ हैं, जहाँतक यह दौड़ता गया वहाँतक इसी प्रकार मानता गया । जहाँ पर यह थककर बैठ गया, वहाँ परब्रह्मका स्वरूप समझ लिया । जिसको इसने ब्रह्मका स्वरूप निश्चय कर लिया बोही इसका भ्रम है । इसका भ्रमही ब्रह्म ठहर गया । इस प्रकार यह भुलाकर चौरासीके बन्धनमें पड़ा तत्त्वमसिके तीन पदोंमें जकड़ा गया ।
(१) त्वम् पदसे दो प्रकारके अज्ञानका कथन ।
इस त्वं पदमें सबविषयी बंधे हुये हैं, इसको विशेष अपरोक्ष अज्ञान कहते हैं । जो खाना पीना स्त्री प्रसङ्ग करना, भोगविलास पसन्द करता है, अपने जात्याभिमानमें रहता है, वेद शास्त्र और गुरुको नहीं मानता, बुद्धिमानों और ज्ञानियोंकी निन्दा करता है, साधुओंका ठठुा करता है. उनसे कहता कि, यह अभागे हैं उत्तम सांसारिक सुखोंको छोड़कर धक्के खाते और दुःख उठाते फिरते हैं । मृगनैनीके सुखका आनन्द उनके भाग्यमें नहीं है । मुक्ति कोई पदार्थ नहीं केवल मनकी भ्रममात्र कल्पना है । जब मृत्यु होती है तभी मोक्ष हो जाती है, जबतक शरीर है तभीतक सब कुछ है, पीछे कुछ भी नहीं रहता. जिस प्रकार वृक्षसे पत्ता गिर
जाता है वह फिर वृक्षमें नहीं लगता इसी प्रकार संसाररूप वृक्षमें शरीररूप सब पत्ते लगे हैं। शरीर गिरा तो फिर कुछ शेष नहीं रहता। इस कारण शरीरको दुख देना महान् मूर्खता है। इस अपरोक्ष अज्ञानके दो प्रकार हैं—एक अपनी इच्छासे और दूसरा पर इच्छासे। जो अपनी अज्ञानतासे हो उसे विशेष अपरोक्ष-अज्ञान कहते हैं। जो दूसरोंकी इच्छासे अथवा दूसरोंके बचन पुस्तक आदियोंके सुनने और पढ़नेसे दृढ़ हो उसे समान अपरोक्ष अज्ञान कहते हैं।
दूसरेका नाम परोक्ष अज्ञान है, इसको समानाधिकरण बोलते हैं। जो इस अज्ञानमें होता है वह ईश्वरको अपनेसे भिन्न जानकर नाना प्रकारके साधन और तप आदिक करता है, इसके भी दो प्रकार हैं, एक सांसारिक, दूसरा पारलौकिक पारलौकिक। प्रथममें—सांसारिक कामनाओंकी पूर्णताके लिये देवताओंकी पूजा और उपासना भक्ति करते हैं। मनमें यह आशा रखते हैं कि, स्त्री, पुत्र, लक्ष्मी मान बड़ाई आदि प्राप्त हो। दूसरा वह है कि, जो अपने उद्धारके लिये नानाप्रकारके यम नियम आदिको धारण करते हैं। मनमें आशा रखते हैं कि, मेरी मुक्ति हो जावे। यह दूसरे प्रकारका साधन करनेवाला पुरुष बड़ा भाग्यवान् है इसीमें सब साधुलोग लगे हैं। नानाप्रकारके संयमों और तपस्याओंमें निमग्न हो रहे हैं। त्वंपदमें सब आज्ञानी लोग फँसे हैं इस अज्ञानका कुछ पारावार नहीं, अनन्त हो रहा है। कर्म उपासना, योग, ज्ञान आदिक जो कुछ तीन लोकमें तो रहा है वो सब लौकिक पारलौकिक विचार अज्ञानकी दशामें है। इसी अज्ञानमें सब पड़े हुए डुब डुब कर रहे हैं।
तत्पदसे दो प्रकारके ज्ञानका कथन।
तत्पदसे दो प्रकारका ज्ञान समान और विशेष है। जो उपाधि और ऋद्धि सिद्धि सहित हो। जिसको विशेष ज्ञान होता है, उसीको ईश्वर कहते हैं। जिसको समान ज्ञान होता है वह ज्ञानी कहलाता है, वह अपने सब गुण दोषोंको जानकर दूसरोंके भी सुख दुःखको जानता है, सब बातका विवेक रखता है। तीनों अवस्थाएँ और सब विषय वासनाके कर्तव्योंको मिथ्या समझता है, सारे संसारको स्वप्नके समान नाममात्रका जानता है, सारे संसारको स्वप्न और सङ्कल्पके समान निश्चित करता है, अपने आपको सत्य और शेष समझता है, इस ज्ञानका नाम परोक्ष ज्ञान है। यह भी दो प्रकारका है। एक तो यह कि, जिसमें सब प्रकारकी शक्ति ऋद्धि सिद्धि आदि साथ हो; जिसमें ईश्वरके छः ऐश्वर्य हों दूसरे ज्ञानका नाम समान ज्ञान है, इस ज्ञानवाला सब प्रकारके ऐश्वर्यको तुच्छ मिथ्या और दुखदाई एवं उपाधिमात्र समझता है। उसका निश्चय होता है कि,