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कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)

कबीर साहेब द्वारा

स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

Devanagarihipublished1,367 पृष्ठ

६ अध्याय कुछ लीलाएं

छठवाँ अध्याय—तब महामाया मुसकराकर बोलीं, कि ऐ देवताओ ! तुममें और मुझमें कुछभी विभिन्नता नहीं, जो विभिन्नता मानता है वह नरकमें जायगा, ब्रह्मा और विष्णु और शिव सब मैं हूँ अन्य कोई नहीं, इस समस्त जगत्का कारण मैं हूँ । मैंने भिन्न भिन्न कार्योंके निमित्त अपने पृथक् २ नाम रखे हैं । समस्त वेद तथा शास्त्रोंमें मेरे पृथक् पृथक् नाम हैं । मेरीही कामनासे उत्पत्ति स्थिति और प्रलय सब कुछ है । ब्रह्माने महामायाकी स्तुति करके नवार्ण मन्त्र पाया । ब्रह्मा विष्णु और शिव तीनोंको उत्पत्ति स्थिति और विनाशके मन्त्र बतलाकर, महालक्ष्मी महाकाली और महासरस्वती विमानारूढ होकर अन्तर्धान हो गईं । ब्रह्माजीने नारदजीसे कहा कि, ए पुत्र ? तू समझ ।

सातवें अध्यायमें—ब्रह्माने नारदको निर्गुण और सगुणका समस्त रहस्य बतलाया । यह ब्रह्मा मायासे उत्पन्न हुवा । मायाही ब्रह्माका गुरु और पथदर्शक है । महामायाका उपदेश ब्रह्माको मिला ब्रह्माका उपदेश ऋषीश्वरोंको मिला । ऋषीश्वरोंका उपदेश समस्त जगत्को मिला । यह जगत् मायाका बन्धन है । काम क्रोधादिकी कामनाओंसे कलुषित हुआ है । ब्रह्मलोक कैलास आदिक सभीमें मायाका कौतुक है । अन्धा मनुष्य इसीमें भूल रहा है, यथार्थकी ढुढ़ाई कौन करे कि, वह क्या है ? जब ब्रह्माही बेसुध हुआ तो दूसरा कैसा सूचना पावे ? प्रत्येक मनुष्य बड़ोंसे सूचनाएँ पाते हैं । हमारा प्रपिता अति अज्ञानवश मायाके चक्करमें पड़ा डुबकियाँ खारहा है । मायाको समस्त संसारका बीज समझकर उसकी पूजामें संलग्न है तो अपनी सन्तानोंको क्यों न बही पथ बतावे । ब्रह्मा वेद पढ़ २ करभी मायाकी नदीमें डुबकियाँ खारहा है । इसी कारण मनुष्योंका हाथ पकड़नेके निमित्त तथा उनको मुक्तिपथ बतलानेके अर्थ किसी दूसरे गुरु तथा पथदर्शककी आवश्यकता है । ब्रह्मा तथा कर्मकी पथदर्शकताही अज्ञानी हम लोगोंके लिये बहुत नहीं है । ब्रह्मा बेचारा मुक्तिमार्गको क्या जाने उसकी पहुँच तो वेद ही पर्यन्त है । महामाया यथार्थ रहस्यको ब्रह्मासे कदापि न बतलाती । अपने भीतरसे बाहर न निकालती । पर ब्रह्मा इस भेदसे नितान्त ही अनभिज्ञ था, इस कारण माया उन सबोंसे श्रेष्ठ है । ब्रह्मा उसके अधीन है, सदैव उसको इस संसारके प्रबन्धका सोच करता है । जैसे प्रत्येक गृहस्थ अपने बाल बच्चोंके सोचमें रहता है वैसेही ब्रह्मा इस जगत्के विचारोंमें रहा करता है । यदि वह जानता कि, मैं क्या हूँ अथवा जगत् क्या है तो समस्त शंकाओंसे निवृत्त होकर अपने यथार्थ अंशकी ओर ध्यान देता । जब उसको अपने यथार्थ अंशसे मिलनेका ध्यान होगा तब वह निश्चय जगत्को तुच्छ मानेगा । फिर उसकी ओर वह दृष्टिपात भी नहीं करेगा । यह बात नहीं है,

यह उसी सत्य पुरुषकी आज्ञाका पालन कर रहा है तथा मोक्ष तक पालन करता रहेगा ।

शिवजी महाराजकी कथा ।

शिवजी समस्त देवताओंमें श्रेष्ठ हैं । सबके अग्रणी हैं, विष्णुके समान शिवजी की पूजा भी तीनों लोकोंमें हुआ करती है, पुराणों तथा समस्त शास्त्रोंके देखनेसे विशेषतः शिवपुराणसे आपकी श्रेष्ठता तथा बड़ाई प्रगट होगी, ये शिवजी जगत्के संहार करनेवाले हैं; बड़े वीर तथा साहसी हैं ॥

वाम मार्ग ।

वाममार्ग एक तरहका शिवका धर्म है । इस धर्ममें जाति पौत्तिका तनिक भी ध्यान नहीं किया जाता है । मंदिरा मांस मछली इत्यादि खाते पीते हैं । अघोर धर्म और अघोर क्रिया समस्त वाममार्गकी शिक्षासे है । विशेषतः योगी संन्यासी मुहम्मदी और शक्ति धर्मके अनेक प्रकारके मनुष्य सब इस मतमें भूत प्रेत राक्षस जिन्द और परी इत्यादि सब इसीमें हैं । यह पन्थ क्रोध लोभादिकका स्थल है । इस शिवका नाम भू है जिससे भवसागर स्थिर है । भव और भवानी दोनों इस भवसागरके सरदार हैं । प्रथम में लिख आया हूँ कि, उत्पत्तिके पूर्व महामाया तीनों भाइयोंको एक कौतुक दिखलाया कि, उन्होंने रक्तसे भरी हुई एक नदी देखा उसमें दुर्गन्धिसे भरा हुवा कूड़ा करकट देखा । इसे देखकर ब्रह्मा और विष्णु तो भाग गए परन्तु शिवजीने उसको चूतड़ोंके नीचे रखकर उसका आसन बना लिया । इस दुर्गन्धिमेंसे आदिभवानी निकल पड़ी वह शिवसे प्रसन्न हुई । शिवको अपना निजका किया । इस कारण भू और भवानी दोनों भवसागरके मूलही ठहरे । समस्त सौंसारिक वासनाएँ आपको भली जान पड़ीं । यह तमोगुण अज्ञानका मूल है । शिवजी क्रोधकी प्रतिमूर्ति हैं । जब तमोगुणी बुद्धि मनुष्यमें आती है तब समस्त कार्य सत्तोगुणके विरुद्ध करता है । तमोगुणी, मुक्ति एवं सत्तोगुणके विरुद्ध है । जब तमोगुण विजयी होता है तब मनुष्य भौति २ के दुष्कर्मों में फँसता है; उसका फल जो है सो संसारमें प्रगट है ॥

श्री कागभुसुण्डिकी उत्पत्ति ।

वसिष्ठ संहितामें अर्थवाद लिखा है कि, शिवजीके साथ अनेक स्त्रियाँ थीं वे समस्त देवियाँ कागके स्वरूपमें थीं । शिवजी विशेषतः पार्वतीजीसे प्रेमसंबंध जोड़ते हैं कारण यह कि, पार्वतीजी अत्यंत सुन्दरी तथा धर्मिष्ठा थीं । इस कारण अन्यान्य देवियाँ शिवजीसे विरुद्ध तथा पार्वतीजी को बँरिन होगईं । तब इनसबोंने आपसमें परामर्श करके एक दिवस पार्वतीजीको मार डाला । उनका सार पकाया