कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)
Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)
कबीर साहेब द्वारा
स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
समीक्षा, मुहम्मद मुस्तफा
स्थानमें न्यायके लिये जावेंगे। हशर (महाप्रलय) गाह सदैवसे प्रचलित हो रहा है। पृथ्वीमें अनगिनती छिद्रसे तात्पर्य्य चौरासी लाख योनिसे है, अनगिनती योनि है सो सब भग है और आवहयात वीर्य है कि, यह आकाश अर्थात् ब्रह्माण्डसे उत्तरता है गर्भमें प्रवेश करके स्वरूप बनाता है। पुरुष आकाश है तथा स्त्री पृथ्वी है जब आरम्भमें पुरुष आकाश तथा पृथ्वी स्त्रीका स्वरूप हुआ तब वीर्य गर्भमें जाकर एकसे अनेक स्वरूप हो गया प्रत्येक छिद्रसे समस्त जीव निकल पड़े। न्याय यही है कि, अपने भाग्यानुसार सबको दण्ड तथा सुख है।
५५—देखो कुरानका चौबीस सिपारा सूरय मोमन (४) रकूअ (४५-४६) आयत पर्यन्त लिखा है कि, फिर बचा लिया खुदाने मूसाको बुरे दावसे जो करते थे और उलट पारी फिरऊनवालोंपर बुरी तरहकी विपत्ति। आग है कि, दिखा देती है उनको संध्यातक प्रातःकाल और जिस दिवस उठेगा कयामत (महाप्रलय) को प्रवेश करावेगा। फिरऊनवालोंको कठिनसे कठिन विपत्तिमें।
समीक्षा—कयामत (महाप्रलय) के पूर्व सहस्रों नरक तथा वैकुण्ठको जा चुके। सो बात पहले प्रमाणित हो गई। कयामत (महाप्रलय) की किसीको आवश्यकता नहीं रही। सकता की मृत्युको कब्रका कण्ट समझा गया। सुकर्मियोंको वैकुण्ठ तथा कुकर्मियोंको उस समय नरक दिखाई देता है। सब पुण्य फल तथा पापफल स्वप्नवत् बीत जाता है यह जीव अपने कर्मोंके अनुसार दुःख तथा सुखमें डाला जाता है। यहाँपर मैं मुसलमानोंकी प्रत्यक्ष गलती दिखाता हूँ। जो कोई सोचेगा समझेगा वो सुख पावेगा।
एक ब्रह्माण्ड है तथा दूसरा पिण्ड है। ब्रह्माण्ड तथा पिण्ड दोनोंका एक स्वरूप तथा एक अवस्था है, उसमें तनिक भी विभिन्नता नहीं, दोनोंके स्वरूपमें स्वरूप तथा एक अवस्था है, उसमें तनिक भी विभिन्नता नहीं, दोनोंके स्वरूपमें ब्रह्माण्ड पिण्डकी एकता है। सब पृथ्वीके तत्त्ववेत्तागण मानते हैं कि, पिण्ड तथा ब्रह्माण्ड दोनोंका एकही स्वरूप तथा अवस्था है। जब पिण्ड दोनोंका और ब्रह्माण्ड एकही स्वरूप तथा अवस्था है तो ब्रह्माण्ड तथा पिण्ड दोनोंको महाप्रलय भी एकही स्वरूपका होना चाहिये। अपने समयपर पिण्डका विनाश होता है अपने समयपर ब्रह्माण्ड नष्ट होता है। एकही स्वरूप नष्ट तथा स्थितिका है। पिण्डकी स्थिति थोड़ी है ब्रह्माण्डका वय अधिक है। दोनों अपने अपने आयुका दौरा पूरा करके नष्ट हो जाते हैं।
इस बातमें यहूदी ईसाई तथा मुसलमान सभी बहुत भूल करते हैं कि, पिण्डके विनाशको ब्रह्माण्डके विनाशके समयका हिसाब लगाते हैं। क्योंकि,
पिण्ड तो अब नष्ट हुआ उसके सुकर्म तथा कुकर्मका हिसाब ब्रह्मांडके विनाश-कालमें होगा । जब पिंडका प्रलय हुआ तब उसी समय उसका हिसाब किताब हो गया । जब ब्रह्मांडका प्रलय होगा तब भी सबका भलीप्रकार हिसाब होगा । सब जीव अपने कर्मोंके साथ परलोकमें दूसरी उत्पत्ति तक रखे जावेंगे, जिसको मृत्युका सकता कहते हैं मुसलमान लोग उसीको कब्रका दुःख कहते हैं । वह जो यथार्थ बात है उसको भूलकर महम्मदी हदीसोंके लिखनेवाले भौति भौतिकी बातें बनाते हैं । कहते हैं कि, जब मनुष्य मर जाता है तब फरिश्ते उसको खुदाके सनीप ले जाते हैं वहाँसे भले बुरेका चिन्ह लेकर फिर उसको कब्रमें ला रखते हैं । यह सब भूल है वे यथार्थ तात्पर्यको न समझकर बातको दूसरे ढङ्गसे कहते हैं । यदि ज्ञानकी स्वच्छता होती तो ऐसी त्रुटी भी न होती । यह क्या बात है कि, रोगी तो मर गया पर उसका कफन दफन सहस्र अथवा लाख बरसके उपरान्त किया जावे । अवश्य ही उसका हिसाब उसी समय होगा ।
५६—कुरान तथा हदीसोंसे प्रगट है कि, जब महाप्रलय हो चुकेगा तो इसके पीछे सबकी भलाई बुराईको तराजूपर धरकर तौलेंगे, प्रत्येक मनुष्य अपनी अपनी भलाई बुराईके अनुसार फल पावेंगा । जिसका पुण्य अधिक होगा वह वैकुण्ठको एवं जिसकी बुराई अधिक होगी वह नरकको जावेगा, जिसकी भलाई-बुराई समान होगी वह मध्यमें जावेगा । मुसलमान लोग नरक तथा वैकुण्ठका वृत्तान्त जैसा उनको कहना आता है वह कहते हैं । वैकुण्ठ तथा नरकके मध्य स्थानको स्पष्ट नहीं कहते । क्योंकि, इस स्थानको पृथिवी कहते हैं । जहाँ पर जीव देह धरता है भौति भौति की योनिमें आवागमन किया करता है । पृथिवी आकाश और नरकवासी सब आवागमनमें संलग्न हैं कोई भी इससे बरी नहीं है ।
५७ बच्चेकी उत्पत्ति—प्रदारजुलनबौअत और तफसीर जलाली इत्यादिमें लिखा है कि, जब बच्चा गर्भमें आता है तब फरिश्ते आत्माको लाकर बच्चेकी मूर्तिमें डाल देते हैं जब यह बालक मातृगर्भसे बहिर्गत होता है तब हँसता है रोता है । जबतक यह बालक अनजान रहता है तबतक उसको वैकुण्ठके सुख दिखाई दिया करते हैं उनको देख देखकर वह हर्षित होता हुआ हँसता है । उसकी दृष्टिसे विलुप्त होनेके पीछे रोता है यह अपनी माताके गर्भसे बहिर्गत होता है उसको संसारकी बुराई तथा पाप घेर लेते हैं वैकुण्ठके पदार्थोंसे परदा हो जाता है । अन्त पूर्णतया अन्धकार घेर लेता है । फिर यह योग्य अवस्थाको प्राप्त कर जप तप करता है जैसी इसकी भक्ति होती है वैसाही प्रकाश प्राप्त कर लेता है ।