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कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)

कबीर साहेब द्वारा

स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

Devanagarihipublished1,367 पृष्ठ

संसारसे भय और घृणा

हिन्दू धर्मकी दुर्दशा ।

संसारी अर्थात् गृहस्थाश्रमी फलदार वृक्षके समान हैं; जैसे फलदार वृक्षमें जब फूल फल लगते हैं उस समय नाना प्रकारके पक्षी आकर उस पर बासा लेते हुए कलोलें करते हैं; नाना प्रकारके मनोहर शब्द सुनाते हैं, जिसके सुननेसे बड़ा आनन्द प्राप्त होता है । जब वृक्ष फलदार नहीं होता, उसमें फूल फल नहीं लगते तो, उसपर काक, उलूक आदि आकर बासा लेते हैं । वेही अपनी कान फाड़नेवाली वाणी बोलते हैं, जिससे सुननेवालोंको बहुत बुरा लगता है । उससे घृणा उत्पन्न होती है । फिर वह वृक्ष काटने और जलानेहीके योग्य हो जाता है । ऐसेही गृहस्थाश्रमी जब संत और गुरुकी सेवा करते हैं तबतक भक्ति मुक्तिकी आशा होती है, नाना प्रकारके गुण उदारता सत्सङ्ग, दया, क्षमा आदि सब उनमें आकर स्थित होते हैं पर जब कृपणता और संसारी विषय भोगमें पड़कर अपना धर्म छोड़ बैठते हैं साधु गुरुकी सेवा छोड़कर सच्चे संतों और विद्वानोंकी अप्रतिष्ठा करने लगते हैं, उस समय पाश्र्वताको प्राप्त हो, नाना प्रकारके पाखण्डोंको धारणकर, नर्कके अधिकारी होते हैं ।

मुसलमानोंने बहुत अत्याचार और अन्यायसे हिंदुओंको मुसलमान बना लिया । जिन्होंने मुसलमान होना अस्वीकार किया, वे मार डाले गये, जो अपने मृत्युसे डरा वह मुसलमान हो गया पर तो भी हृदयसे अपने धर्मकाही प्रेमी रहा । क्योंकि जो, लोग मुसलमान हो गये उनकी सन्तान अद्यापि इस बातका स्मरण रखती है कि, हमारे पूर्वज क्षत्रिय, ब्राह्मण अथवा अमुक हिन्दू जातिके थे; जैसे किसी राजा और बादशाही सन्तान याद रखती है कि, हमारे पूर्वज राजा अथवा बादशाह थे ।

समस्त पृथ्वीभरमें हिन्दू जाति सबसे श्रेष्ठ और प्रतिष्ठित जाति है । भारतवर्ष सब देशोंका शिरोमणि है । भारतवर्ष और हिन्दुओंसेही समस्त, संसारमें धर्मका नियम फैलता है । बड़े बड़े सिद्ध महात्मा, ऋषि मुनि, औरतार तत्वज्ञ आदिका प्रागट्ठ यहाँही होता है । यहाँकेही ऋषि, मुनि, विद्वान् सब संसारके लोगोंको शिक्षा देते, लौकिक पारलौकिक मार्ग बतलाते हैं । इस देशका नाम हिन्दुस्थान है, अन्य देशोंको म्लेच्छ स्थान कहते हैं, क्योंकि, वर्णाश्रम, जाति आदिका सर्वोच्च विचार और विभाग इसी देशमें है, दूसरे देशमें नहीं है । वर्णाश्रमका विवेक और विभाग ऐसा उच्च और सर्वोत्कृष्ट सिद्धान्त है कि, जिसके द्वारा अपने वर्ण आश्रमका कर्तव्य शास्त्रानुसार करता हुआ मनुष्य शीघ्रही मुक्तिपथको पा लेता है । भारतवासी अपने धर्मके ऐसे प्रेमी हैं कि,

भर जाना तो इन्हें स्वीकार है पर अपना धर्म छोड़ना स्वीकार नहीं। इसका प्रमाण मुसलमानी राज्यके इतिहासोंसे मिल सकता है। क्या हुआ? यदि कुछ डरपोक, भीरु अथवा लोभी और कामियोंने हिन्दूधर्मको छोड़ दूसरा धर्म स्वीकार कर लिया। जो हिन्दू धर्मको छोड़, सर्वोत्कृष्ट हिन्दू धर्मके नियमोंको त्याग कर देता है वह उच्च अथवा श्रेष्ठ नहीं वरन् नीच और अज्ञानी समझने योग्य है।

हिन्दू धर्मकी श्रेष्ठता।

सालहानः सिफात हिन्दू हैं। नेकि'यो'की बरात हिन्दू हैं॥
जितने अक्'वाम हैं जमी'के ऊपर। सबमें यह खूब जात हिन्दू हैं॥
सम'र साब'का अमल' अपने। अस'लकी नक़लिया'त हिन्दू हैं॥
जब लताफ़त'से यह क'सीफ़ हुआ। आदिका शब्दोयात हिन्दू हैं॥
जितनी हैं धातु' इस जमी'के ऊपर। उमदासे उम्दः धातु हिन्दू हैं॥
याद हों हस'नः फेल दर'स जिस'को। कर सकू'न जिन समात हिन्दू हैं॥
यह जमीनपर दया धरम मूरत। जुहू'द व तक्'वा कना'त हिन्दू हैं॥
है हयात—अब'दी सम'र जिसका। उस शिबि'र डाल पात हिन्दू हैं॥
जाके जिस घरमें फिर नही खौ'। उसकेही मनजिला'त हिन्दू हैं॥
यही गुरु पीर सारे दु'नियाकं। सोई बाप और मातु हिन्दू हैं॥
बन्द'गी और तिहा'रत व तक्वा। मुकिअतके मौजिबा'त हिन्दू हैं॥
हिन्द'का कह कबीर मक्ति मुका'म। शिक'न मुशकि'लात हिन्दू हैं॥
नुकतः वा'रीक अ'कल जिनकी रसा'। मा'दिने म'दरकात हिन्दू हैं॥
जिसके साबि'त हैं धर्म और ईमान। काज़ी दीन मआमलात हिन्दू हैं॥
धरके तन जिसनेकी अमल अच्छे। वख्तखु'श रब्बदा'त हिन्दू हैं॥
है न वह व'स्फ़ और अबिन आद'म। हा'दी रा'हन जाता हिन्दू हैं॥
हा'ल मा'जी ज़माना मुस्तक'ब'ल। ना'ज़रीन कु'ल नु'कात हिन्दू हैं॥
हिन्दू होकर न ऐव'के रुख'कर। मुसतहक़ हक'र सिला'त हिन्दू हैं।

१ सदाचारी, २ पुण्य, ३ जातियाँ, ४ फल, परिणाम, ५ पूर्वजन्मका, ६ कर्म, ७ जैसैका तँसा, ८ छाया, ९ सूक्ष्मता, १० स्थूल, ११ रत्न, १२ शुभकर्म सदाचार, १३ शिक्षा, १४ जिसका, १५ स्थिति, १६ तप, १७ संयम, १८ संतोष, १९ सदाकी जिन्दगी, अमरता, २० फल। २१ वृक्ष २२ भय, २३ विश्राम, २४ संसार, २५ भक्ति, २६ शौच, शुद्धि, २७ कारण २८ भारतवर्ष, २९ स्थान, ३० नष्ट करनेवाला, ३१ कठिनता, विपत्ति, ३२ सारभेद, ३३ बुद्धि, ३४ पहुँची हुई, ३५ खानि, ३६ भेदसार, ३७ स्थित, ३८ भाग्यमान, ३९ ईश्वरकी दैन, ४० गुण, ४१ मनुष्य, ४२ पथदर्शक, ४३ मुक्ति मार्ग, ४४ वर्तमानकाल, ४५ भूतकाल, ४६ भविष्यत्काल, ४७ देखने वाले, ४८ सर्व, ४९ भेद, ५० दोष, ५१ सन्मुख, ५२ अधिकारी, ५३ स्वत्व,

बे ख'ब सारेको खब'र देते । कुत्र अ'कशफुल्लोगात हिन्दू हैं ॥
जाने न और अपने अ'स्ल से वस्ल । पाते सो दाव घात हिन्दू हैं ॥
औरकी अकल है न ऐसी र'सा । दीन दुनी मवत्रिसात हिन्दू हैं ॥
बे ख'बर सारे इसम'आजमसे । नाम मुअल्लिममें क'रात हिन्दू हैं ॥
नफसको मारकर मिलावें जो गर्द । बरी' अज तोह'मात हिन्दू हैं ॥
जन्म साबिकमेंकी जो ऐसी अमल । ह'सनःके हासि'लात हिन्दू हैं ॥
साध गुरु सेवकर भजन सुमिरन । देते खुम'स और जु'कात हिन्दू हैं ॥
वे ख'बर कौम सब जमींके ऊपर । वाकिफ़ अज वार'दात हिन्दू हैं ॥
होता हिन्दू है खुश'नसीब आजिज । धरते यम सर पैलात हिन्दू हैं ॥

प्राचीन समयमें भारतवर्ष, बड़ा प्रतापी और सर्व सम्पत्ति सम्पन्न देश था । इसके क्षत्रिय शूर बीरोंसे संसार भरके यीद्धा भय खाते हुए इनका लोहा मानते थे । किसीकी समर्थ नहीं थी कि, भारतपर आक्रमण कर सके । श्री महाराजा रामचन्द्रजीके समयमे बरबर देशके म्लेच्छोंने एका एक करके भारत पर आक्रमण किया था पर महाराजाने मार भगाया । इसीप्रकार अनेकबार विदेशियोंने इस पवित्र भूमिपर आक्रमण किया पर कभी सफलताका मुंह नहीं देखा ।

मुसलमानोंके अत्याचार ।

अढाई सहस्र वर्षसे देशके भाग्यने पलटा खाया, सिकन्दरसे लेकर महमूद गजनबी तक अनेक म्लेच्छ राजाओंने आक्रमण किया, क्रमशः मुसलमानोंका राज्य हो गया, मुसलमान बादशाहोंने भारतवासियोंपर बहुत अत्याचार किया, आलमगीर, औरंगजेब ( आदिकोने लाखों हिन्दुओंका वध किया । इनके धर्म-धर्मपुस्तकों धर्मस्थानों तथा मन्दिरोंपर ऐसा अत्याचार किया, जिसके वर्णनसे मनुष्यके रोम खड़े होते हैं । इसके अत्याचारसे लाखों हिन्दुओंने आत्महत्या की पर धर्म न छोड़ा ।

हिन्दुओंकी दृढता—विचारनेकी बात है कि, इन लोगोंने हिंदुओंको इमानदार बनाया कि, वे इमान ? वे स्वयम् कैसे थे ? जो लोग हिन्दुओंको पुण्यात्मा और इमानदार बनाना चाहते थे अथवा चाहते हैं वे स्वयम् अपनी ओर


१ अचेत, २ चेत, ३ भेदोंका कोश अर्थात् सारभेद जाननेवाला, ४ असल जाननेवाला, ५ असल, ६ पहुँचा हुआ, ७ सार नाम, ८ ईश्वरी भेदके शिक्षक । ९ विषयासक्त मन, १० रहित, ११ दोष, अवगुण, १२ उत्तम प्रशंसनीय, १३ प्राप्त करनेवाले, १४ ईश्वरार्पण दान पुण्य, १५ अपने उपाजित धनमेंसे ईश्वरार्थ गुरु आदिको देना, सार भेद, १६ भाग्यवान ।

दृष्टि करके देखें कि, क्या कमाई कर गये तथा करते हैं। म्लेच्छ भला हिन्दुओंको क्या मुक्तिमार्ग बतलावेंगे? स्वयम् तो अन्धकारमें फँसे रहकर सांसारिक तापोंसे तप रहे हैं; दूसरोंको क्या मार्ग बतावेंगे? इन म्लेच्छोंकी क्या सामर्थ्य कि, हिन्दुओंको अपने धर्मसे विचलित कर सके (नीच जातियों, नीच बुद्धिओंकी बात नहीं है।)

हकीक़ तराय।

अच्छे और सच्चे हिन्दुओंने जान तो दे दी पर कभी म्लेच्छोंके धर्मको शब्दोंसे भी स्वीकार नहीं किया। इस पर यह दृष्टांत हकीक़तराय नामक क्षत्रिय बालकका लिखता हूँ। जिससे पाठकगणोंको हिन्दुओंकी धर्म श्रद्धा और दृढ़ता प्रगट हो जाय। हकीक़तराय जातिके क्षत्रिय थे, इनका जन्म १७९१ सम्बत् वि० में आगरा शहरमें हुआ था। इनके पिता धनवान् और साहसी पुरुष थे। किसी कारण इनके पिता इनको साथ लिये हुये पंजाब देशके स्थाल कोट नगर जा रहे। हकीक़तरायकी ७ वर्षकी अवस्था हुई तो इनके पिताने एक मकतबमें विद्या अभ्यासके लिये बैठा दिया। हकीक़तराय दिन दूनी रात चौगुनी उन्नति करते हुये अपनी आयुके बारहवें वर्षमें पहुँचे। नित्य मुसलमान तालिब इल्मों (विद्यार्थियोंके) साथ वाद विवाद हुआ करता था, कभी कभी धार्मिकविषय भी छिड़ जाते थे। एक दिन वाद विवादके बीचमें ही एक मुसलमान लड़केने ज्वालामाईको गाली दी। हकीक़ तरायसे अपनी पूज्य देवीकी निन्दा सुनकर सहन नहीं होसका, उसने भी बीबी फ़ात्माको गाली दी। उस मकतबका शिक्षक मुसलमान था। मुसलमान विद्यार्थियोंने जाकर उससे कहा कि, हकीक़तराय बीबी फ़ात्माको गाली दी है। वह विद्यार्थियोंको लेकर काज़ीके निकट गया। हकीक़तरायकी बहुत शिकायत करके बीबी फ़ात्माको गाली देनेका समाचार कहा। काज़ीने बहुतसे मुल्लोंके साथ मिलकर यह निर्णय किया कि, हकीक़ तरायने पैगम्बर साहबकी पैंटी, बीबी फ़ात्माको गाली दी है, इस कारण यह प्राण दण्डके योग्य है। फिर यह मुकदमा नब्बाब खान बहादुर नामक लाहौरके शासकके पास पहुँचा। नब्बाबके सन्मुख हकीक़तरायने स्पष्ट कहा कि, पहले मुसलमान विद्यार्थियोंने ज्वालामाईको गाली दी तब मैंने पीछे कहा। नब्बाबने चाहा कि, बालक हकीक़तराय न मारा जाय, किसी प्रकार बच जावे पर दुष्ट काज़ी और मुल्लाओंने अपनी बड़ी भारी भीड़ एकट्ठी की, सबने मिलकर नब्बाबसे कहा कि, यदि तुम इस बालकका पक्ष करोगे तो हमलोग बादशाहसे नालिश करेंगे। काज़ियोंकी दुष्टता देख नब्बाब बहुत विवश और दुःखी हुआ।

नव्वाबने पूछा इसके बचनेका कोई उपाय है या नहीं ? काजी मुल्लाओंने कहा कि, यदि यह बालक मुसलमान हो जाये तो बच सकता है । नव्वाबने हकीक़त-रायको गोदमें बैठा लिया । कहा कि, अब तू मेरा बेटा है, यदि तू मुसलमान हो जायेगा तो तेरेको अपना राज्य दे दूंगा । हकीक़तरायने साफ़ २ उत्तर दिया कि, मैं सांसारिक धन दौलत नहीं चाहता, मैं अपना धर्म नहीं छोड़ूंगा । हकीक़त-रायके माता पिताने भी समझाया कि, बेटा ! तू मुसलमान होना स्वीकार कर ले, तेरी जान बच जावेगी । हकीक़तरायने अपने माता पिताको बहुत समझाया कहा कि यह देह और संसार सभी नाशमान हैं, एक दिन सब नष्ट हो जावेंगे, किस दिन और किस सुखके लिये अपना धर्म छोड़ूँ ? माता पिता पुत्रके ज्ञान विवेकको देखकर कुछ विशेष नहीं कह सके । नव्वाबसे कहा कि, उसके तुल्य सोना चाँदी मुझसे लेलो इसकी जान छोड़ दो पर दुष्ट काजियों और मुल्लाओंने न माना । नव्वाबने हुकुम दिया कि, पहले इस लड़केके कोड़े मारो, छुरा चुभाओ, तलवार दिखाओ । यदि भयसे मुसलमान हो जावे तो अच्छी बात है । बधिकने वैसाही किया । हकीक़तरायको बहुत कष्ट और दुःख हुआ । पर बाहरे बहादुर ! ! ! ज़रा भी कष्टकी परवाह नहीं की । शरीर और सब संसार तथा मृत्युको धर्मकी अपेक्षा तुच्छ जाना । अन्तमें जब बहुत कष्ट देनेपर भी हकीक़तरायने मुसलमान होना स्वीकार नहीं किया तो बधिकको बध करनेकी आज्ञा हुई । बधिक तलवार लेकर हकीक़तरायके निकट गया उनकी सुन्दरता और कांतिको देखकर आशक्त हो गया, चित्त मोहवश ऐसा निर्बल होगया कि, तलवार हाथसे गिर पड़ी, स्वयम् रोने लगा वरन् गिर पड़ा । हकी तरायने बधिकको खूब समझाया कि, तू मत रोओ उठ खड़े हो, मेरा शिर काट लो तू स्वर्गको जायगा और ये सब काजी मुल्ला नरकको जायेंगे । अब यहाँसे मुसलमानो राज्य नष्ट हो जावेगा, सिकखोंका राज्य होगा ; तू किसी बातकी चिंता मतकर, मोहको त्याग मेरा शिर काटले । उस समय हकीक़तरायका अन्तःकरण प्रकाशित हो गया था । भविष्य कहने लगे । क्यों न हो ? जो अपने धर्मपर दृढ़ विश्वास रखता है, संसारसे धर्मको अच्छा समझता है, दैवी गुणोंको आसुरी गुणोंको अपेक्षा प्रेमकी दृष्टिसे देखता है, ईश्वरपर सच्ची श्रद्धा रखता है, उसको क्या दुर्लभ है ? बधिकने तलवार मारी, हकीक़तरायका शिर धड़से अलग जा गिरा । जिस समय बधिकने तलवार चलाई, उस समय लाहौर में अंधेरा छा गया, भूकम्प आया, नगरभरमें शोक फैल गया, सबके सब बालकसे लेकर बृद्ध तक रोने और हाथ मारने लगे । हकीक़तरायकी मृतक देहको नदी