कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)
Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)
कबीर साहेब द्वारा
स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
लोगोंका शेखतकीके पास आना शेखतकीका कबीरजीको मरानेका प्रयत्न
कभी किसीसे पूर्णरौतिसे निवह नहीं सकता है। केवल एक नामके बदले तीनों लोकमें कोई वस्तु नहीं है जो दी जावे। गुरुही धर्मकी जड़ है जड़के सींचनेसे डाल पात सब हरे होते हैं। निश्चयके वृक्षमें सब फल फूल लगते हैं।
कंजूसकी कभी मुक्ति नहीं होती। यह बहुत बड़ा शैतान है, जिसके मनमें घुसता है वह जीवित ही मरा जैसा है, यह एक घृणा उत्पादक लत है। इससे स्वयम् परमेश्वरको घृणा होती है, समस्त पीर पैगम्बर सिद्ध साधु इसको बुरा जानत हैं। किसी प्रकारकी वन्दना सेवा मनुष्य करे पर कृपणता एक ऐसी वस्तु है जिससे वह सब विनाश हो जाती हैं। कंजूस सिद्धकी समस्त सिद्धि धूलमें मिल जाती है।
साखी—कामी तो बहुतै तरे, क्रोधी तरे अनन्त।
लोभी जिवडा ना तरे, कहैं कबीर सिधन्त ॥
साधुओंकी सेवा बहुत बड़ी पूजा है, भक्ति मुक्तिकी देनेवाली है। जो कोई साधुओंको भोजन इत्यादि देता तथा आवश्यकताकी वस्तुओंको इकट्ठा कर देता है उसकी सारी कठिनाइयाँ और पाप दूर हो जाते हैं। साधुओंकी कृपासे सारे पदार्थ प्राप्त होते हैं, साधु सारी युक्तियाँ बतलाते तथा सभी शुभ कार्योंको सिखलाते हैं, नरकसे बचाते, खींचकर वैकुण्ठको ले जाते हैं। ज्ञान एवं मुक्तिकी सारी युक्तियाँ समझाते हैं, समस्त भ्रम और धोखेको दूर कर देते हैं, साधु सत्यपदमें लगाते हैं, साधु संसारके सारे पदार्थोंपर आज्ञा करते हैं, साधु समस्त दुःख संतापको हर लेते हैं। साधुके समस्त पातक पृथक् हो जाते हैं। साधु साहब जुदे नहीं। साधु तो अनेक हैं। परन्तु वह साधु, जो समस्त भ्रम तथा धोखेको दूर कर दे, सत्यपदमें लगावे उससे विशेष प्रेम करे। उसीकी वन्दना सेवासे हार्दिक कामना पूर्ण होगी। रोटी कपडा इत्यादि आवश्यकीय वस्तुओंको दे। मान संमान तो समस्त साधुओंका करना चाहिये। वह साधु जो अपने स्वरूपके मिलनेका मार्ग बतलावे, साधु शिरोमणि वही है। साधुओंकी सेवा तथा आज्ञाका पालन सौभाग्यके चिह्न हैं। बड़े बड़भागी हैं जो साधुओंकी संगति करते हैं। साधुओंको भोजन देनेमें बड़ा पुण्य है। जगत्में उसके समान कोई नहीं है। साधुओंको वस्त्र देनेसे समस्त दुःख मिट जाते हैं। जबतक साधुके शरीरपर वस्त्र रहता है, तबतक देनेवालेकी सारी आपत्तियाँ दूर रहती हैं। साधुकी सेवासे समस्त बन्धनोंसे मुक्ति होती है। यदि साधुकी दया न हो तो कोई, मनुष्यताकी गतिको प्राप्त न हो। साधुओंकी दयासे मनुष्यधर्म तथा संसारकी सारी विद्याएं और बुद्धि प्राप्त करता है। बहुतेक साधु ऐसे भी हैं जो सत्यपुरुषकी भक्तिसे भटकाकर कालपुरुषकी भक्तिमें लगा
देते हैं । उनकी शिक्षा और बातोंसे उन्हें पहचान लेना चाहिये । ऐसा न हो कि, उनके धोखेमें आ जावें । ऐसे साधु कालपुरुषके दूत हैं उनसे सावधान रहे । जिस साधुमें अपने गुरुका ज्ञान हो, उस साधुकी शिक्षा मर्यादा तथा सेवा अपने गुरुके समान करे । धोखा धडी देनेवाले साधु, अपनी वार्तालापसे पहचाने जाते हैं ।
सत्य पुरुषकी भक्तिके अतिरिक्त समस्त भक्तियाँ जाल तथा बन्धनमें डालनेवाली हैं । कालपुरुषका विष, ब्रह्मा विष्णु शिव सनकादिकसे लेकर सारे जीवोंमें समाया हुवा है । बिना सत्यगुरुकी दयासे कोई सत्यपदसे लग नहीं सकता, सारे शरीर और नक्षत्रोंमें कालपुरुषका जहर छिपा हुवा है । जिसको सत्यगुरु दया करके अपनी ओर खींचे वह आवे । दूसरेमें क्या सामर्थ्य, जो कि यमके नीचेसे निकल सके । धर्मरायके मन्त्रने समस्त मनुष्योंकी बुद्धिको अन्धी कर रक्खा है । किसीको इस विषयका सोच नहीं कि, मैं जानबूझकर क्यों कुएँमें पडता हूँ । मेरे पुरुषा तो सब इस धोखेमें पडकर मरे, मैं इस अंधकारमय पथपर क्यों चलूँ । इनकी बुद्धि डुबकियों खारही है । इसीसे सत्यको मिथ्या तथा मिथ्याको सत्य मान रही हैं । छुटकारेको बंधन तथा बंधनको छुटकारा समझ रही है, इनकी बुद्धि तथा चित्त ठिकाने नहीं है । इनकी पाशविक बुद्धिमें मनुष्यता लेश मात्रभी नहीं है ।
काम शास्त्र और चार पुस्तकें ये सब कालपुरुषके जाल हैं, उसने इस जाल में फँसाकर सारे मनुष्योंको मार लिया है, उन्हें ऐसा धोखा दिया है कि, जितने नाम सत्य पुरुषके थे वे सब अपने नाम प्रगट किये । सत्यपुरुषके धोखेमें सब मनुष्य कालपुरुषकी वंदना करने लगे, कालपुरुषने सत्यपुरुषका नाम छिपाया, यहांतक कि, यह भेद ब्रह्मा विष्णु और शिवसे भी नहीं कहा, इस धोखेसे सारे मनुष्य इस शिकारीके शिकार हो गए । जो कोई काम शास्त्र तथा चार पुस्तकोंसे पृथक् होगा उसको सूक्ष्म वेदके ज्ञानकी प्राप्ति होगी । जिनका प्रेम पुरुष वेदसे है, वे सूक्ष्म वेदसे कैसे प्रेम कर सकते हैं ?
विष्णुको तीनों लोकोंकी सरदारी तथा अधिकार मिला है । उसीके अधीन सब हैं, निर्गुण निरञ्जन और सगुण विष्णु येही समस्त लोकोंके रचयिता एवं कर्ता धर्ता हैं, विष्णु तीनों लोकोंमें सम्यक् रूपसे उपस्थित रहते हैं । दोनों रूपसे निरञ्जन तीनों लोककी ठकुराई करता है ।
तीनों लोकों और भवसागरका ठेकादार निरञ्जन है । सहस्र असंख्य चौकड़ी युगका उसका ठेका है । इतने समयतक तो बिना पारख गुरुके कोई मुक्ति नहीं पावेगा । जब ठीकाकी सीमा बीत जायगी तब अक्षर पुरुषके राज्यका समय आवेगा । इस राज्यमें समस्त जीवोंके छुटकारेकी आशा होगी ।
प्रथम सूक्ष्मवेद ब्रह्मसृष्टिमें था। जब कालपुरुषने भरमाया, सृष्टिकी रचना की, तब उसमें की सामयिक बातोंको निकालकर पुरुषमवेद बनाया। इस पुरुषम वेद यथामति समस्त सृष्टिको उपदेश दिया। अज्ञानी लोग इस पुरुषमयानी यानी पराकृत वेदको अपने धर्मका पथ और मोक्षकी सीढ़ी समझने लगे। निरञ्जनने अपनी सन्तानको पृथ्वीपर भोजना आरंभ किया। सहस्रों ऋषि मुनि पीर पैगम्बर पृथ्वी पर आए। कालपुरुष निर्गुण तथा सगुणकी भक्ति सिखलाते चले आए। इन ऋषीश्वरोंमें सहस्रोंने अपनी अपनी नई रीति निकाली। वेदकी शिक्षाको कठिन जान दूसरा पथ बताया। बहुभी कालपुरुषके फंदेमें फँसकर मरे। किसीने बिना पारख गुरुके सत्यलोकके पथको नहीं पाया।
जो कोई किसी जीवका रक्तपात करेगा, उसे उसका प्रतिशोध अवश्य देना पड़ेगा। जो कोई किसीको दुःख दे या मांसाहारी हो वह भी निश्चयही दुख पावेगा। अपना मांस उसको खिलावेगा। किसीका प्रतिशोध कोई कदापि नहीं छोड़ेगा।
मांसाहारी और शराबीभी मुक्ति नहीं पासकेंगे। जो पुरुष मुक्तिके इच्छुक हैं, उन्हें अच्छी तरह स्वच्छ तथा पवित्र रहना चाहिए।
गृहस्थके लिये अपनी स्त्रीके, छोड़ दूसरी स्त्रियोंके साथ संभोग करना महापाप है। साधुके निमित्त विवाहिता अथवा बिन विवाही किसीसे भी संभोग न करना चाहिये।
गुरुकी आज्ञाको न माननेके समान मनुष्यके दूसरा कोई महापाप नहीं है।
सत्यगुरुकी शरण सब जीवोंके लिये सुखदायी है। उसीके शरणमें समस्त पातक क्षमा होंगे। इस कलियुगमें गुरुके प्रति पूरा कर्तव्य पालन कौन कर सकता है। परन्तु सत्यपुरुषको अपने शरणकी लज्जा है। उसकी शरण आकर धर्मपर स्थिर रहो। जो धर्मविमुख हुआ वह निर्दयी तथा घातक शैतानके जालमें फँस ही गया। सत्यगुरुके शरणपर पूरा निर्भर रहे और यह समझे कि, सत्यगुरु मेरे अपराधोंको क्षमा करेंगे। मेरी ओर नहीं बरन् अपनी दयाकी ओर दृष्टिपात करेंगे क्योंकि, उसका नाम पतितपावन है।
घमंडी तथा द्वेषीको कदापि सत्यपुरुषकी भक्ति नहीं होती।
जो मनुष्य बड़ाई और उच्चश्रेणी पाकर नम्र होगा, अपना शीश नवा दिया, धन पाकर दान तथा साधुसेवाको ग्रहण किया, उनके निमित्त भक्ति मुक्ति का द्वार खुला हुआ है।
वह मनुष्य जिसने ऐसा ध्यान किया कि, तुच्छ तथा सेवक हूँ। जितनी
मूर्तियों हैं, सब मेरे सत्यगुरुकी हैं । सब जीवोंमें गुरुकी कान्ति जाने तो वो मुक्ति का अधिकारी है ।
मैं अपने कार्योंका अधिकारी नहीं यही नहीं किन्तु, सत्यगुरुसे सहायता माँगता रहे कि, वह मेरी मनकामना पूर्ण करे । भले कार्योंमें सदैव उद्योग करता रहे ।
मैं नहीं जानता कि, मैं क्या हूँ मेरा परमेश्वर क्या है । इस कारण सत्यगुरु पर पूर्णतया निर्भर रहे कि, वह जब मुझको दृष्टिप्रदान करेगा, तब मैं जानूँगा ।
कालपुरुषके जितने धर्म, पृथ्वीपर प्रचलित हैं, सबमें वैष्णव धर्म श्रेष्ठ एवं सबका सरदार है । यह सतोगुणी धर्म है । इस धर्मके नियम तथा आज्ञाएँ सत्यपथकी सीढी है । सत्यपथ परम धामकी सोपान है ।
सत्यगुरु कबीरका नाम बंदीछोर है । वह सर्वाधिकारी है जिसको चाहे मुक्ति प्रदान करे । जिसको इस बातका पूर्णतया विश्वास होगया उसीका बेडा पार होगया समझो ।
सत्यपुरुष और कबीर साहबको जिसने एक जान लिया उसका बंधन टूट गया, वो कालके पञ्जेसे छूट गया । तन मन धन गुरुके अर्पण करना तो भलाईका सार है, परन्तु अपनी कमाईका दशवाँ भाग गुरुका हक है बुद्धिमान् पुरुष मुक्तिका भागी होता है ।
जो कोई मनुष्यताकी श्रेणी प्राप्त करने योग्य हो, उसीमें बुद्धि होती है । निर्बुद्धि सुन्दर मनुष्यभी पशु हैं । उनमें बुद्धि नहीं होती ।
पारख गुरु प्रत्येक स्थानपर उपस्थित है । परन्तु जबतक उसके पथमें अपने को मैं न्योछावर न करूँ तबतक उसका दर्शन न हो सकेगा ।
सब झूठे झूठोंके साथ मिलते हैं । जो कोई सत्य प्रेमी होगा वह झूठेके साथ कभी योग नहीं देगा ।
ये तीनों लोक विषवृक्षके ही फल हैं । प्रत्येक वस्तु, प्रत्येक खान, तथा प्रत्येक मकानमें विष भरा हुवा है । विना सत्यगुरुकी भक्तिके वह नसोंसे बाहिर नहीं होता ! न किसी अन्य युक्तिसे वो पृथक् हो सकता है ।
जान बूझकर विष खाना मनुष्यता नहीं है । आप सत्य पुरुषकी भक्ति करे और दूसरोंसे करावे और करते हुआओंको देखकर प्रसन्न हो यही वंदना है ।
प्रत्येक मनुष्य विना जाने बूझे अपने २ धर्मकी ओर खींचता हुआ द्वेष करता है । परन्तु मनुष्य वही है जो कि, द्वेष रहित होकर वह धर्म ढूँढ़े, जिससे कि, उसके आवागमनका मार्ग एक बारगीही बंद होजाय ।