कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)
Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)
कबीर साहेब द्वारा
स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
राजा लवण
मंत्र जप करनेकी विशेष रीतिको मुद्रा कहते हैं। मीन मछली खाना, मांस, सबप्रकारका मांस खाना, सबप्रकारकी सराबपीकर मस्त होना, विवाहिता अविवाहिता सब प्रकारकी स्त्रियोंके साथ भोग करना। यदि सहृदय भग एक समय पूजन करनेको मिल जावे तो ये लोग साक्षात् मोक्ष मानते हैं। इस धर्मके बारह भेद हैं। सब एकसे एक बड़े चढ़े हैं। इसके लोग बड़े आनन्द और उत्साह पूर्वक अपने घृणित और नीच कर्मोंको करते हुये मोक्ष मानते हैं। इस धर्ममें जाति पौत्रिका बिलकुल विचार नहीं है। ब्राह्मण, क्षत्री, भंगी, चमार, मोची आदि नीच ऊँच जाति सब एक साथही खाते हैं। अनन्त जीवधारियोंकी हत्या करते हैं।
दैवी और आसुरी सम्प्रदाय।
इस संसारमें दो देवताओंके धर्म प्रचलित हैं। संसारके सब धर्म इन्हींके अन्तर्गत हैं। एकका नाम दैवी धर्म है। इसके अधिष्ठाता विष्णु देव हैं। दूसरी सम्प्रदाय है जिसके प्रवर्तक शिव हैं। दैवी सम्प्रदायकोही श्रीसम्प्रदाय अथवा विष्णु सम्प्रदाय कहते हैं। आसुरी सम्प्रदायको शैवी वा शांकरी सम्प्रदाय बोलते हैं।
विष्णु सम्प्रदाय सत्गुणी धर्म और मुक्तिका मार्ग है। शिव सम्प्रदाय तमोगुणी धर्म और नरकका कारण है। येही दो देवते और इनके दोनों मार्ग, जीवोंके मुक्ति और बन्धनके कारण और द्वार हैं। विष्णुभक्त मुक्ति और स्वर्गके अधिकारी होते हैं; जैसे कि, ढरुव और प्रह्लाद अपने परिवार सहित स्वर्गको गये। विष्णु सम्प्रदायमें एकसे कितनोंका भला होता है, पर शिव सम्प्रदायसे सिवाय अशुभ और दुःखके दूसरा कुछ नहीं।
मुहम्मदी कहते हैं कि, मुहम्मद साबहके कलमा पढ़नेसे मुक्ति मिलती है, जो मुहम्मदी कलमा नहीं पढ़ता उसकी मुक्ति नहीं होती। जैसा कि, मुहम्मद साहबके माता पिता नरकको गये। क्योंकि, कलमा नहीं पढ़ते थे। जो कोई कलमा पढ़े तो उसपर किसीका अहसान ही क्या हो सकता है? क्योंकि, जब कलमा स्वयम् मुक्तिदायक है, जिससे कि, कलमा उत्पन्न हुआ स्वयम् उसके माता पिताको कलमाकी क्या आवश्यकता है? इससे प्रमाणित है कि, जब मुम्मद साहब अपने माता पिताको मुक्ति नहीं दे सके, तो दूसरोंको किस तरह दे सकेंगे।
कलियुगमें शंकर और मुहम्मद दोनों शिवके औतार हैं। एकने भारत-वर्षमें संन्यास धर्म चलाया, दूसरेने पश्चिमी देशोंमें इस्लाम धर्म प्रकट किया।
महादेव आसुरी सम्प्रदायके आचार्य हैं, उनके द्वारा मुक्ति नहीं मिल सकती। हाँ यदि कोई शंख भी पाप कर्मोंसे रहित हो, पुण्यमें प्रवेश कर, दैवी सम्प्रदायको धारण करे तो समय पाकर अवश्य मुक्तिका अधिकारी हो सकता है। नहीं तो, जबतक शिवका आसरा करेगा आवागमनमें रहेगा, प्रकाशका मार्ग नहीं प्राप्त कर सकेगा।
सिंहावलोकन।
संसारमें जितने धर्म (मजहब) हैं सबके प्रवर्तक शिव और विष्णु हैं। ये दोनों देवते निरञ्जनकी ओरसे संसारमें वेद और किताबको प्रचलित करने के लिये नियत किये गये हैं। येही दोनों ब्रह्माण्डोंका प्रबन्ध करते हैं, इनके साथ सहायतामें ब्रह्मा भी रहते हैं, पर ब्रह्माकी पूजा कहीं नहीं होती। क्योंकि, इनको आद्याका शाप हो चुका है। इन देवोंमें विष्णु महाराज श्रेष्ठ हैं, येही सब संसारके कर्ताके नामसे पूजे जाते हैं। यह बात मैं प्रथम सिद्धकर आया हूँ कि, भारतवासी प्रगटहो विष्णुको पूजते हैं। अन्य योरप आदि देशवालेभी जिसका पूजन करते हैं जिसको ईश्वर मानते हैं वह भी विष्णुकाही रूपान्तर है। अरबके लोगोंके आँखोंपर पक्षपातका पर्दा पड़ा है पर मैंने पर्दा उघाड़कर कह दिया है जिसको मानना हो माने, न मानना हो तो उसकी इच्छा। इन्हीं विष्णु भगवान्की संसारमें पूजा हो रही है, दूसरा कोई नहीं है।
जो आदमका खुदा था वही इब्राहीम और मूसा आदिकका खुदा था। इब्राहीमकी संतानमें चालीस सहस्र पँगम्बर हुए,। सब उसी एक खुदाकी भक्ति करते आये। मुहम्मदतक जो अन्तिम पँगम्बर हुये सब उसीकी साक्षी भरते आये।
कुरान्सूरे उमरान ८३ आ० ३ सि० ९ रु.
قُلْ آمَنَّا بِاللَّهِ وَمَا أُنْزِلَ عَلَيْهِ وَأَنزَلَ عَلَيَّ الْكِتَابَ
इसका अर्थ—तू कह—हम ईमान लाये अल्लाहपर जो कुछ उत्तरा हम पर इब्राहीम इस्माईल, इसहाक, याकूब, तथा उसकी सन्तान पर जो कुछ मिला मूसा, ईसा और सब नबियोंको खुदाकी ओरसे, हम भिन्न नहीं करते उनमेंसे किसीको हम भी उसीकी आज्ञामें हैं।
इसी प्रकारसे सब मनुष्य उसी खुदाकी भक्ति करते हैं। कोई किसी प्रकारकी बुद्धि विद्या और युक्ति क्यों न खर्च करे पर इन तीनों देवतोंकी
अधीनतासे नहीं निकल सकता । इसमें कुछ भी संदेह नहीं कि, सारे संसारके लिये एकही ईश्वर है । ईश्वर और शास्त्र होनेपर भी भिन्न भिन्न मजहब व रीति क्यों हुई ? इसका कारण यही है कि, मनुष्य अपने यथार्थ मनुष्यत्वसे रहित हो रहे हैं, देखनेकोही मनुष्य हैं पर यथार्थमें मनुष्य नहीं हैं । यदि इनको अपने धर्मकी सुधि होती तो एक धर्मको छोड़ दूसरे धर्मको ग्रहण न करते । जब कि, सब धर्मोंका प्रवर्त्तक एकही आचार्य है तो दूसरे धर्मको धारण करने एवं एकको छोड़नेसे क्या लाभ ? लोगोंकी बुद्धिपर अन्धकार छा रहा है, जिससे अपने धर्मके आशयको न समझकर, एक दूसरेके साथ, लड़ते झगड़ते, वाद-विवाद करते और भला बुरा कहते हुए मरते मारते हैं ।
विशेषतः वे हिन्दू लोग जो किसी कारणसे मुसलमान हो जाते हैं, यदि उनसे पूछो कि, तुम मुसलमान क्यों हुये ? तो प्रगटमें तो वे बहुत बातें बताते और अपने अवगुणोंको छिपानेका यत्न करते हैं पर भीतर ही भीतर हृदयमें पछताते हैं । कोई कोई स्पष्टही कह देते हैं कि, अपने धर्मकी अनभिज्ञता के कारण हमने अपना धर्म छोड़ दिया, अब हिन्दू लोग मुझे अपने धर्ममें नहीं लेते ।
भवतारण ग्रन्थमें लिखा है कि, कबीर साहबका वचन है कि, पूर्व जन्मके बड़े पुण्य और शुभ कर्मोंके प्रतापसे उच्चकुलमें जन्म होता है सांसारिक वैभव सम्पन्न होता है । पूर्वजन्मके ही पुण्य प्रतापसे रूप यौवन और उत्तम कुल मिलते हैं, जितने धनी और राजा महाराजा अथवा उच्चपद पर स्थित हैं, सब उत्तम और श्रेष्ठ कुलकेही होते हैं । अतः ब्राह्मण, क्षत्रियादि जो उत्तम श्रेष्ठ जातिके हैं वे कैसे प्रतिष्ठाके पात्र हैं ? यहाँतक कि, यदि इन जातियोंमें कोई विशेष गुण भी न हो तो भी अपनी उत्तम जातिके कारण प्रतिष्ठाको प्राप्त कर लेते हैं । यह उत्तम कुलकी विशेषता और गुण हैं । इसी प्रकार मुसलमानोंमें भी कुलवान् सैयदोंकी सब सेवा और भक्ति करते हैं वरन् ईश्वर भी श्रेष्ठ कुलवानोंपर विशेष दया करता है । देखो तौरेतमें—इब्रानी उत्तम कुलके थे उनपर ईश्वरकी विशेष दया थी । जो हिन्दू मुसलमान हो जाते हैं, अथवा ईसाई धर्मको स्वीकार कर लेते हैं वे क्या प्राप्त करते हैं ? उच्चकुल और श्रेष्ठ स्थानसे भ्रष्ट हो नीचकुल और अधम स्थानको ग्रहण करते हैं, अन्तमें जब वे समझते हैं तब शोककर पश्चात्ताप करते हैं । जैसे कि, बादशाह दरिद्र हो जानेपर करता है वैसेही हिन्दू अपने धर्मको छोड़कर दूसरे धर्मरूपी दरिद्रताको स्वीकार करते हैं । कोई हिन्दू उच्च और श्रेष्ठ कुलका ईसाई अथवा मुसलमान नहीं होता वरन् आठ कारणोंसे कोई कोई अपने धर्मको छोड़ता है ।