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कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)

कबीर साहेब द्वारा

स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

Devanagarihipublished1,367 पृष्ठ

मुनीन्द्रजीका रावणके पास जाना

पञ्चीसवाँ प्रकरण ।

सत्यलोकका वर्णन ।

सत्य पुरुषके लोकमें जब हंस पहुँचते हैं, तब कालपुरुष उनको नमस्कार करता है । इन हंसोंका आगमन फिर कभी नहीं होता, वहाँ वे सदा सत्यपुरुषकी स्तुति किया करते हैं । वे हंस सत्यपुरुषके रूप हो जाया करते हैं । सत्यलोकके अधीन अट्टासी सहस्र द्वीप हैं, सब द्वीपोंमें सत्यगुरुके हंस आनन्द करते हैं । द्वीप द्वीपोंमें हंस स्वतंत्र फिरा कहते हैं, उन्हें कहीं भी रोकटोक नहीं है ।

इस तयलोकके गुणोंका वर्णन किसी प्रकार भी किया नहीं जा सकता है । जो कोई उस लोकको जावे उसको कालपुरुषके भयसे सदाके लिये छूट जाता है, इस लोकमें स्त्री पुरुषका भेद नहीं और न वहाँ काम क्रोधादिकी झंझट है । सब हंस सत्यपुरुषके स्वरूप हैं । शारीरिक विकार यहाँ तनिक भी नहीं है, सब हंस समस्त बुराइयोंसे पवित्र होकर सत्यपुरुषके साथ सदैव आनन्दमें रहते हैं ।

छठ्ठीसवाँ प्रकरण ।

मुहम्मद साहबको सत्यपुरुषका दर्शन होना ।

कबीर साहब मुहम्मद साहबको अपने साथ लेकर इस स्थानमें पहुँचे और सत्यपुरुषका दर्शन कराये । कबीर साहब और मुहम्मद साहब दोनोंने सत्यपुरुषको दंडवत् किया । मुहम्मद साहब सत्यपुरुषका दर्शन करके अत्यंत प्रसन्न और नम्र हुए । सत्यपुरुषकी दया तथा कृपा मुहम्मद साहबपर हुई तब मुहम्मद साहब कबीर साहबके अत्यंत अनुगृहीत तथा कृतज्ञ हुए । सत्यपुरुषकी ओरसे मुहम्मद साहबको कितनीही शिक्षा मिली, धर्म कर्मकी कुल आज्ञाएँ वहींसे प्रदान हुई । जब सब आज्ञाएँ मिल चुकीं, तब मुहम्मद साहबको कबीर साहबने पुनः मक्काममें पहुँचा दिया ।

सत्ताईसवाँ प्रकरण ।

पाँच कलमाका वर्णन ।

कबीर वचन ।

नबी मुहम्मद बन्दगी कीन्हा । दर्शन पायके भय लौलीना ॥
तहाँते फिर मृतलोक चलि आये । और निज नाम को पान भी पाये ॥
अब आपनो कौल फिर दीजे । पीछे पान जीवके लीजे ॥

साखी—शब्द भरोसे नामके, दिया नबीको पान ।

तब हम साँचे मानि हैं, जब फिर मिलोगे आन ॥

तुम आपनो फ़रमान चलाये । खुदको भेद तुम धरु छिपाये ॥
जो यह भेद तुम परगट करिहौ । तो तुम कौलके बाहर परिहौ ॥
चारो कलमः परगट भाखो । पँचवाँ कलमः गुप्त राखो ॥
पँचवाँ कलमः इल्म फ़कीरी । जाके पस्ने कुफ़ हो दूरी ॥
हम काशीको जात हैं भाई । उबलों अपनो कौल बजाई ॥
तुम पर दाय़ा समरथ केरी । पाँचों कलमः दिलमें फेरी ॥
साखी—हम काशीको जात हैं, तुम मक्के अस्थान ।
हम रामानंद गुरु करें, तुम देव जगत फ़रमान ॥
फ़रमान जग को दीजिये, उलटी अदल चलाय ।
तुम कलमः का हुक्मले, निभंय निसान बजाय ॥

मुहम्मद साहबको कबीर साहबने चार कलमः प्रगट करनेको कहा, और एक कलमः को गुप्त रखनेके लिये कहा । कुल पाँच कलमः मुहम्मद साहबको पढ़ाया जिसमेंसे एक छिपा रखनेके लिये कह दिया, चार कलमः मुसलमानोंको बतानेके लिये कहा । जब मुहम्मद साहब वह कलमः पढ़ा करते थे उस समय किसीको निकट आने नहीं देते थे, उस कलमका भेद मुहम्मद साहबके अतिरिक्त और कोई भी जानता नहीं था । कबीर साहबने मुहम्मद साहबको अपना पान दिया और मुहम्मद तथा मुहम्मदियोंको मुक्ति दिलानेकी आशा दिलाई । सो चार कलमः तो मुसलमानोंको मिले और पाँचवाँ कलमः स्वयम् मुहम्मद साहबके निमित्त था दूसरोंको उसका कुछ भी पता नहीं है ।

अट्टाईसवाँ प्रकरण ।

पाँचवें कलमका वृत्तान्त ।

मशकात बाब क्रैयाम शहर रमजान फ़स्ल औबल ज़ेद बिन साबितकी खायत दोखारी और मुसल्लमसे यों लिखा है कि, हज़रत रसूल अल्लाहने मस्जिद में चटाईकी एक झोपड़ी बनाई थी, और इस झोपड़ीमें अकेले निमाज पढ़ा करते थे । जब लोगोंने यह दशा देखी तो वे लोग आने लगे । तब भी कई रात्रियोंके उपरान्त एक रात्रिको आए बाहर नहीं निकले तब लोग बाहर खड़े खड़े खँखारने लगे, कदाचित् हज़रत आवाज सुनकर बाहर निकल आवें और निमाज़ पढ़ें परन्तु हज़रत न आये बल्कि कह दिया कि, तुम्हारी रुचि सबैव निमाजपर रहे—पर मैं इस कारण निमाजके निमित्त बाहर नहीं आता कि, कहीं खुदा इस निमाजको भी तुम पर फर्ज न करदे । क्योंकि, यदि यह तुम्हारा फर्ज होगया तो तुम उसको पूर्ण