कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)
Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)
कबीर साहेब द्वारा
स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
महम्मद साहबकी मांग भृंगीकीटका दूष्णंतकी कविता
सच्चे मनुष्य हैं जिनमें बुद्धि है, जिनमें बुद्धि नहीं वे सब मनुष्यत्वसे परे हैं वे सब पूरे पशु समझे जाते हैं। इन्हीको डांगर ढोर कोड़े मकोड़े इत्यादि कहा गया है—
तमीजो अकल वनइसां अताय खुदावन्दी ।
वशकल आदम अलीं खुवासतो नरिन्दी ॥
बरुं खलोकु दरुं देख उसकी नीयत क्या ।
अगर तमीज नहीं फिर तो आदमियत क्या ॥
यह मनुष्य ज्ञानअन्ध हो एक ओरसे भागकर दूसरी ओर जाता है जिसमें कि, उसको सुख तथा आराम मिले, जब उधर भागकर जाता है तो देखता है कि, वही आग जिसमें पहले जल रहा था, वही उधर भी दिखाई देती है। यहाँ तक दशोंदिशा है यह दौड़ता फिरता है। जिधर जाता है उधर वही आग वही शूली और वही कसाई छूरी लिये गला काटनेको उपस्थित है, जब वह दूढ़ते दूढ़ते थक जाता है तब कहीं पड़कर आँख बंदकर बैठ रहता है, अपने मनमें सोचता है कि, अब मैं किधर भाग कर जाऊँ? कहीं पता ठिकाना नहीं लगता न कोई सत्य तथा सन्तोषका उपाय ही दिखाई देता है? इसी प्रकार षट्दर्शनके लोग, एक मतको छोड़ कर दूसरे मतको पसंद करते हैं। वही अग्नि उधर भी देखते हैं। हिन्दुओं तथा सैकड़ोंही पंथके लोगोंकी यही दशा है। कितने लोग हिन्दू धर्म छोड़कर मुसलमान तथा ईसाई आदि हो जाते हैं जब उधरका वृत्तान्त भलीभाँति मालूम हो जाता हो तो उनके अग्निस्वरूप दिखाई देता है। फिर क्या करें कोई वश नहीं रहा। जिस किसी भाग्यवान्को पारखगुरु मिलजाता है वो उसकी शिक्षा स्वीकार करता है तो सुख पाता है; इसी प्रकार इन तीनों लोकोंके समस्त जीव कालपुरुषकी अग्निमें जल रहे हैं वह सबको भून भूनकर खाया करता है। उसके धोखे दगाओंसे कोई किसी प्रकार भी नहीं बच सकता।
सारे स्वसंवेद का यह कथन है कि, सत्यपुरुषने कालपुरुषको तीनों लोकका राज्य प्रदान किया है यह अपने पूजा पाठसे बड़ाही बलिष्ठ हो गया है यहाँ तक कि, जब कबीर साहबके हंस पृथ्वीपर देह धरते हैं मनुष्योंको मुक्ति-प्रदानार्थ उनका पृथ्वीपर अवतार होता है तो कालपुरुष उनको धोका तथा दगा देता है। जब वे धोखेमें पड़ जाते हैं, तब स्वयम् कबीर साहब शरीर धारण करके इनको मुक्त कराकर कालकी पहुँचसे बाहर खींचकर सत्यस्वरूपी देह प्रदान करते हैं जिससे कालपुरुषका कोई वश नहीं चल सकता है। वे लोग सत्य-
पुरुषकी भक्तिके प्रचार संसारमें करते हैं । जो शिक्षा स्वयम् कबीर साहबकी है वही शिक्षा उनके हंसोंकी भी है ।
वेदोंसे तो भलीभाँति प्रमाणित हो चुका कि, संस्कृत भाषामें किसको कबीर कहते हैं ? वह अद्वितीय तथा बेजोड़ है ।
अब मैं कबीरशब्दके माअनी अरबीमें प्रगट करता हूँ—कबीर किन्निया कुबरा अकबर एकही बात है । कबीर उसे कहते हैं जिसमें किन्न, (गौख) हो उसका किन्न सदैव एक रस रहे न कभी घटे एवं न बढ़े । कबीर साहबने स्वसंबेदमें ऐसीही आज्ञा की है कि केवल मैंही एक कबीर हूँ दूसरा कोई नहीं हो सकता जिस किसी दूसरेमें किन्न होवेगा उसका शिर मैं तोड़ूंगा । अतः तीनों लोकोंमें सर्वश्रेष्ठ निरञ्जन है । जब उनके मनमें किन्नसमाया कबीर साहबसे सामना करनेके निमित्त प्रतुस्त हुआ तब कबीर साहबने एकही ऐसी चोट लगाई जिससे वे झोंझरी द्वीपको छोड़कर पातालको भाग गए । फिर दूसरा किन्न आदि भवानीमें पाया गया । तब कबीर साहबने उनको ऐसा ललकारा कि चरणों पर गिर पड़ी । फिर ब्रह्मा यम और शिवका किन्न (घमण्ड) दूर किया रामचन्द्रने जब राजा रावणको विजय किया तब उनमें कुन्न समाया अपनी भुजा पुजवाने लगे तब उनका भी कुन्न जाता रहा । कृष्णचन्द्रका किन्न नौसाल जरासिंधकी लड़ाईमें दूर हो गया । ऐसाही हिरण्यकशिपु, रावण, कंस, नमरुद, शदाद, फिरञ्जन इत्यादिका कुन्न दूर हो गया, किसीका न रहा । जिस किसीमें तनिक भी कुन्न होगा उसका छुटकारा कभी न होगा । निश्चय उसका शिर टूटेगा । केवल कबीरही कबीर है, दूसरा कोई कदापि नहीं हो सकता । इसीका कुन्न सदैव समान रहता है दूसरे किसीका नहीं । इस संसारमें जितनी सृष्टि है सब कबीर है । कुन्नसे खाली कोई नहीं, जिसपर वह सत्यगुरु दयालु हो वही कुन्नसे खाली हो सकता है । जिसको वह कुन्नसे खाली करता है उसको वह अपने तेजसे भर देता है । इस कारण किन्न उसीके योग्य है दूसरेके नहीं ; क्योंकि, कुन्नहीसे इस संसारका खेल खुल रहा है । इस कबीरके गुणकी तीनों कालके सिद्ध साधु और ऋषि मुनि इत्यादि बराबर बढ़ाई और प्रशंसा करते आए हैं । कोई कोई उनकी कृपासे उसको पहचान सकता है, उसकी प्रशंसा तो केवल वह स्वयम्ही जानता है, मैं तुच्छ दुर्बुद्धि मनुष्य क्या लिख सकूँ एवं क्या कह सकूँगा ? यदि मेरी अनगिनती जिह्वाएँ होतीं तो कुछ कह सकता । अतः मेरे निमित्त इतनाही यथेष्ट है कि इस विशुद्ध जगदीश्वरके चरणोंपर गिर अपने अपराधोंके निमित्त क्षमाप्रार्थी हो जाऊँ ।