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कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)

कबीर साहेब द्वारा

स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

Devanagarihipublished1,367 पृष्ठ

मनुष्यके शिरका सर्प संग पुस्त जलमनुष्य मनकता शेष यहूदी अजीबुल खिलकत विचित्र पशु

चिल्लाता रहता हूँ कि, जिसका टुकड़ा मैं खाऊँ, हलाल करके खाऊँ चोरीसे बचाऊँ किसी भी बैरीको निकट न आने दूँ। प्रातःकाल सोता नहीं वरन् जागता रहता हूँ पर लोगोंके देखनेमें सोता दिखाई देता हूँ, पथमें मैं इस कारण बैठता हूँ कि, मैं अपने पापोंके कारण कुत्ता हो गया हूँ। यदि अब किसी साधु सन्त के चरणकी रज मुझपर पड़ जावे तो मैं मेरी कुत्तेकी देह छोड़ मनुष्यकी देह पाऊँ मैं भविष्यका वृत्तान्त जानता हूँ। जिसकेद्वारा मैं जान जाता हूँ कि, यह कार्य होगा अथवा नहीं, जो कार्य नहीं होनेवाला होता है उसी समय मैं कान फट-फटा देता हूँ कि, तू मत जा, तेरा कार्य सिद्ध न होगा। तेरा परिश्रम व्यर्थ जायगा। मैंने इस संन्यासीकी रोटी नहीं खाई, केवल उसके सिरहानेसे रोटी खींचकर एक स्थान पर गाड़ दी। क्योंकि, उस दिन मुझे एतवारका व्रत था, रोटी खाना स्वीकार नहीं था, केवल इसकी भलाईके लियेही मैंने रोटी लेली, क्योंकि, यह बासी रोटी खाता तो बीमार हो जाता। रोटी तो यह माँगकर खाता है औषध कहाँसे पाता?, जिस परमेश्वरने इसको इस समय रोटी दी है क्या सांझको न देगा? सांझके समय यह ताजी रोटी माँगकर खाले। जब श्रीरामचन्द्रने इस प्रकार समस्त बातें सुनीं तो राज्य कर्मचारियोंको आज्ञा दी कि, जाके देखो इस कुत्तेने कहाँ रोटी दबाई है? वह कुत्ता उनके साथ गया, जहाँ रोटी दबाई थी वो जगह बतला दी। उन लोगोंने रोटी खोदकर निकाल महाराजसे जाकर सारी बातें कह सुनाई। महाराजने कहा कि, अब तो यह कुत्ता निर्दोष सिद्ध हो गया संन्यासीका ही दोष है। महाराजा ने कुत्तेसे पूछा कि, तू क्या चाहता है, मैं इस संन्यासीको क्या दण्ड दूँ। उसने कहा कि, इसको शिवजीके मन्दिरका महन्त बना दीजिये। महाराजाने कहा कि, यह शिवजीके मन्दिरका महन्त हो जावेगा तो बड़े सुख चैनसे अपने जीवनके दिन बितावेगा। यह तो इसको कोई दण्ड न हुआ। कुत्तेने उत्तर दिया कि, हे महाराज! मुझको अपने पूर्व जन्मकी सुधि है, मैं शिव पूजा किया करता था, एक दिन मैंने मन्दिरमें घृतका दीप जलाया था जिससे शिवजीके चढानेका घृत मेरे नखोंमें समा गया। मैं रातको भोजन करने लगा तो गरम दालमें मेरे नाखूनका घी छुट पड़ा, मैं अचेतावस्थामें उसको खा गया। केवल उतने ही घी खानेके दोषपर मैं मनुष्यसे कुत्ता हो गया हूँ। मैं केवल उतना घी खानेके पापसे कुत्ता हो गया ऐसी अवस्थामें जब यह महन्त होकर शिवजीका प्रसाद खाया करेगा तो न जाने कितने जन्मतक कुत्ता होगा, किस कष्टमें फसेगा। इस कारण इससे बढ़कर इसको और क्या दण्ड है। कुत्ते के कथनके अनुसार वह संन्यासी शिवमन्दिरका महन्त बना दिया गया।

मनुष्यकीसी बातें—लेटेम्बर नामके एक मनुष्यने प्रांसककी विद्याशालामें इस प्रकार कहा है कि, एक कुत्तेको मनुष्यकीसी बोली सिखाई गई थी । वह स्पष्टरूपसे बोल सकता था आवश्यकताके अनुसार चाहता था कहवा मंगा लेता था ।

एक कुत्ता स्पष्टरूपसे एलिजिबेथका नाम लेता था । वह दूसरी बोली भी बोलता था पर साफ नहीं बोल सकता था ।

NATURAL-HISTORY.

डाक्टर गोल्ड स्मिथ साहिबकी नेचरल हिस्ट्रीमें लिखा हुआ है कि, एक बालकने एक कुत्तेको बिना सिखाये हुए मनुष्यकी बोली बोलते हुए देखा था ।

नानीकुतिया—पंजाब देशस्थ फीरोजपुर जिलेके भाई कोटकसबेमें एक कुतियाने चार बच्चे दिये । उसको एक जमींदारने ऐसा सोटा मारा कि वह मर गई । उसके बच्चे अनाथ होगये, भूखसे मरने लगे, मृत कुतियाकी माता अपने नातियोंसे स्नेह करने लगी । उनकी नानीको भी दो बच्चे हुए थे उसके दोनों बच्चे जीवित थे । अब उसने अपने दोनों बच्चोंको लाकर अपने नातियोंके साथ रखा उन छः बच्चोंका लालन पालन एक साथ उस नानी कुतियाने किया ।

डब्बू—फीरोजपुर जिलेके डरौली गाँवके पास कोपरीवाला नामक एक गाँव है । उसमें एक बहुत कृतज्ञ आज़ाकारी कुत्ता था । उसका स्वामी जो कुछ कहता वह वैसाही काम किया करता । जहाँ बिठा देता वहीं बैठ रहा । जब कहता कि, उठ अमुक स्थानको जा तो वह तुरन्तही चला जाता वह काय्य कर आता । भोजन बनता, घरके मनुष्य कहीं चले जाते तो वह चौकस बैठकर भोजनकी रखवाली किया करता । किसी मनुष्य तथा पशुकी सामर्थ्य नहीं थी कि, भोजनके निकट आ सके । उसका स्वामी आबे अथवा स्वामीकी स्त्री आबे तो आ सकती थी घरके लोग भोजन करती वार उसको भी दे दिया करते थे । स्वामीकी बिना आज़ा भोजनमें मुंह न लगाता था, उसके कितनेही गुण थे । एक दिन ऐसी घटना हुई कि, वह कार्तिक मासमें जब कि, कुत्तोंको काम सताता है कुत्ते कुतियोंके पीछे दौड़ते फिरते हैं, उस समय यह भी एक कुतियाके पीछे लगा । लोगोंने देखकर उस जमींदारसे कहा कि, तुम्हारा डब्बू कुत्ता कुतियोंके पीछे फिरता है । जब वह कुत्ता घर आया तो उसका स्वामी उस पर झिड़का । कहा कि, ऐं डब्बू ! तू भ्रष्ट हो गया, बूढ़ा होने पर भी तू कुतियोंके पीछे फिरा करता है ? क्या तुझे लज्जा नहीं आती । अब तू मेरे सामनेसे चला