कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)
Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)
कबीर साहेब द्वारा
स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
मनन
फरऊन हुआ ढूंन बर्मै सदर नशीं । दरियामें डूबा साधुकी तौहीन किया ॥
वेद और कुतुब ख्वानी मगरूर डूबे । जो सब उलमा साधुकी तौहीन किया ॥
गुरुपीर बतदवीर पनः उनकी जो छोड़ा। धर्मराज धरा साधुकी तौहीन किया ॥
बद फेली खजना हुये पर कुफ हो दिल । तारिक मरा साधुकी तौहीन किया ॥
सबयमकी खोराक ऐसे आदम आजिज । न कोई बचा साधुकी तौहीन किया ॥
ग्रन्थल
सर बसर सूली तर बदारे हमल । मअसियतके लिये करारे हमल ॥
वे गुणाहोंको कैंद कौन करे । आसियोंको हुआ मदारे हमल ॥
हमल दोजखमें जो हुआ महबूस । गन्धको गन्धकी नआर हमल ॥
केते हैं गन्दिगीके जो कीड़े । उनको ही बूदो काश प्यारे हमल ॥
होवे क्योकर पसन्द आदमको । यह जहन्मकी आमो गार हमल ॥
मुजरिमोंके लिये बना यह मकौ । बन्द हैं दर अजाबो नार हमल ॥
जब पड़ा कैंदमें पुकारे तू । दर्द दुख इन्द्र बेशुमारे हमल ॥
तोबः २ कर बसत मिन्नत । कीजिये गुफा र रुस्तगारे हमल ॥
अब न हरगिज भुलाऊं तेरा नाम । रख पनाह मुझको अज शरारे हमल ॥
सब गुनहगार बे गुनह न कोई । जिसका हैं सीत रोजगारे हमल ॥
वे गनाहान हैं सूरत अस्ल बसूल । गुनह आलूद हैं शिकारे हमल ॥
जहां जावे वहां मुक़दर हो । पुर है सब गर्द और गुबारे हमल ॥
एकसे छूट दूसरे हो बन्द । नहिं पायान हैं शब निहारे हमल ॥
जब मिहरबां हुये करीमे रहीम । कर दिया दूर भारी प्यारे हमल ॥
आया बाहर सो कौलको भूला । याद आवे न अपना यारे हमल ॥
फस मया पनियवी मोहब्बतमें । कौन पूछे वह गमगुसारे हमल ॥
जन्म साबिकका यह कसूर आजिज । पा उत्तर सर तल न चारे हमल ॥
ग़ज़ल—बैठे खुद जाय मैं जाकर दिल दीवाना मेरा ।
हुब्ब महबूब लगा कर दिल दिवाना मेरा ॥
काल चक्करसे बचैगा भी तदबीर है एक ।
मुरशिद पनः आकर दिल दीवाना मेरा ॥
सतगुरु कदमें खाक कोहल नूरसे देख ।
आँखोंमें सजा कर दिल दीवाना मेरा ॥
होवेगा अमर फेर मरेगा न कभी ।
उसकीही उलशको खाकर दिल दीवाना मेरा ॥
जान बखश तेरा पानी पाशोबः पीर ।
पाक हो इससे नहाकर दिल दीवाना मेरा ॥
सुखरूहो बदो कौनैन कदम उसकी पकड़ ।
फ़रमान उसकाही बाज कर दिल दीवाना मेरा ॥
यही तदबीर नहीं और छूटे तब आजिज ।
इसकीही गीतको गाकर दिल दिवाना मेरा ॥
ग़ज़ल—साहब जो कुल जहान, है साधुओंके बीचमें ।
वह आप बे गुमान, है साधुओंके बीचमें ॥
जावै जिधरको संत, सो जाहिर वहांही है ।
इस घरकी निरदबान, है साधुओंके बीचमें ॥
कहने व सुननेमें कभी, जो आता ही नहीं ।
उस लाबयां बयान, है साधुओंके बीचमें ॥
हर तरफ़ जाके देख, जहां साधु मण्डली ।
इस लामकां मकान, है साधुओंके बीचमें ॥
आजिज न जान फर्क, साहब व सन्तमें ।
जो कुल पै मिहरबान, है साधुओंके बीचमें ॥
ग़ज़ल—कलियुगका ऐसा जोर है, वेद और कुतुब ख्वां शोर है ।
हर दिलमें पैटा चोर है, साधुकी पूजा उठ गई ॥
हुक्काम और शाहे जमां, पूछे नहीं आंबिद कहां ।
अन्धेर फैलै दर जहां, साधूकी पूजा उठ गई ॥
कोई कहता हम आलिम बड़े, मेरे हाथमें सब हत्यकड़े ।
सब दूर हकसे यों पड़े, साधूकी पूजा उठ गई ॥
दुनियामें सब अन्धेर है, यमराज सबको घेर है ।
फिर मौतमें क्या देर है, साधूकी पूजा उठ गई ॥
कोई दस किताबें पढ़ गया, अर्शबरी पर चढ़ गया ।
वह ज्ञान अपना गढ़ गया, साधूकी पूजा उठ गई ।
अरबी व तुर्की फ़ारसी, अंग्रेजी सो सब खारसी ॥
देखै कोई न आरसी, साधूकी पूजा उठ गई ।
जब हकसे अपने ऐठना, किया फिक्र हुजरे बैठना ॥
राजे निहां न पैठना, साधूकी पूजा उठ गई ॥
सब खाम कोई न पका, कोई न मस्तपर चढ़ सका ।
आजिज भी सबसे कहि थका, साधूकी पूजा उठ गई ॥
गजल ।
दोनों हैं बला बिहिश्त दोज व । उनको है सिला बिहिश्तव दोजख ॥
जिनको न खबर है अपने घरकी । आदम न चला बिहिश्तव दोजख ॥
जो दिल है तमीजो फिक खाली । है सूये बला बिहिश्तव दोजख ॥
मखसूस न यह बइत्र आदम । हैवांको भला बिहिश्तव दोजख ॥
इन्साको पसन्द वह न हरगिज । पुरखौफ़ गला बिहिश्तव दोजख ॥
एरा में आन कर अमल कर । फिर दोनों कला बिहिश्तव दोजख ॥
आवेगी जब यक हवा खिज़ानी । तब आग जला बिहिश्तव दोजख ॥
आदम हुआ बाहर अज अदन बाग । जब रोज़ ढ़ला बिहिश्तव दोजख ॥
खाली हैं ज़मान ज़मीने आजिज । खाक और ड़ला बिहिश्तव दोजख ॥
गजल ।
सोचकर दिलमें बे खबर आदम । छोड़ दे ख़्वाब और खुमर आदम ॥
कौन मजहब तेरा है कौन खुदा । पूजता किसको बे बसर आदम ॥
देख और सोचकर बफ़िक़ो तमीज । यह न मशरब है यह तो शर आदम ॥
जिसको तू पूजता खुदा करके । सो खुदा है न अजदर आदम ॥
भेडिया या भेडका बचो पानी । तुझको है खौफ़ और खतर आदम ॥
जिससे आरामकी उम्मीद तुझे । बेशक उससेही हो जरर आदम ॥
जिस प्यालेकी शौक़से पीता । आब हैवां न वह जहर आदम ॥
जो कि मुहसिन यकीन बाबरकी । करे वह जेर और अबर आदम ॥
जिसको जाना है ख़्वान मकां अपना । वह न हरगिज है तेरा घर आदम ॥
कर इबाबत तिहारतो तकवा । बेंतफ़क्कुर है बे समर आदम ॥
लाख चौरासीमें फ़िरा मारा । अब असल अपना ध्यान धर आदम ॥
देह यह और वक्त यह तेरा । अब जरा दिलमें होश कर आदम ॥
आदमी है तो होश कर आजिज । गर बहायम से हैं तो मर आदम ॥
गजल ।
वक्त गुज़रे पै अपने ग़म कीजे । याद खुद सानये सनम कीजे ॥
जाकर होश पास देख उसे । मुरदः दिल अपना फेर दम कीजे ॥
जिसको तू चाहता वह दूर नहीं । हुम्ब महबूब चश्म नम कीजे ॥
छोड़ दे सब जहानो बुतां पामाल । अपने मह आगे पुश्त खम कीजे ॥
नफ़स अम्मार दुश्मनों कर गिर्द । सोई सामान अब वहम कीजे ॥
होके आदम न होवे चौपाया । रूह अपनेपै मतसम कीजे ॥
तू अगर वस्ले यारखाह आजिज । दूर शहबात बिलकलम कीजे ॥
शब्द ।
कहां आदम कहाँ है यह बहायम । हैं सुबहत जिनकी तू मसहूर दायम ॥
न पावैं अक्ले इन्सानी सतूरां । तू कर दे जल्द तर्क यह लूम लायम ॥
गुरु चेले पड़े दर बहर काली । हैं खाते गोता सदहा दायम दायम ॥
जो दिल घोड़ा जगह अपनेको छोड़ा । करें फिर कौन वह बर जाय कायम ॥
करे तदबीर सदहा क्यों न आजिज । यह दिल गरिन्द क्योंकर हो मुलायम ॥
तरजीय बन्द ।
गुरु क्या चीज हम उसको न जाना । नहीं कोई साधु हम उसको न माना ॥
गुरु न आदमीका आदमी है । खुदा मुरशिद हम उसकोही पहिचाना ॥
हैं सब जुहला खबरक्या है खुदाकी । हैं आकिल हमवहम सबतें सयाना ॥
हुआ हैन हिन्दसामें कोई मारूफ । कोई कहलाव फिलसिफे जमाना ॥
कोई है डाक्टर आफ बार नामी । कोई है मास्टर आफ अस्टं दाना ॥
बहुत दुनियामें लकब मौसूफ । बसफ़े और कितने हैं निशाना ॥
हमारा ज्ञान सबके सर चढ़ा है । कि हमने इल्म अंगरेजी पढ़ा है ॥
मुअज्जिज उदहोंपर जब होके आवे । हुकम खुद खादियोंपर यों लगावे ॥
नहीं कोय मुसतन्द हो भड़कते । मेरे नज़दीक आने कोई न पावैं ॥
हुआ जब मगज पुर किब्रो मनीसे । न सूझे हक नज़र क्या इसको आ ॥
नहीं रब्बो रसूलो साधु गुरु क्या । नहीं कुछ देख नबीना बनावे ॥
हुआ दोज़हर जब यकजाय दिलमें । कुलुब खवानी व दौलत जो कहावे ॥
तो फिर क्योंकर न मुरदः होवे मर्दुम । निगह तब साधुगुरु हरगिज न आवैं ॥
हमारा ज्ञान सबके सिर चढ़ा है । कि हमने इल्म अंगरेजी पढ़ा है ॥
कोई है नेचरी कोई दिहरीया । कोई मन मौज अपनेमें लहरीया ॥
हमारी रह न आवे कोई रहज़न । कि हम हैं अपने चोरोंके फेरीया ॥
कि हम हुसियार और खुद फेल मुख्तार । डुबावें अपने दुश्मनको बदरिया ॥
मेरा दिल इल्म अंगरेजीसे रोशन । हमारी बहसमें न कोई ठहरिया ॥
कोई कूचा बकूचा लेकचरी है । कोई औरों नसायह पन्द करिया ॥
जबांदानी वमन्तिक सीख आजिज । हुआ हङ्कार कंसिरमें जोभरिया ॥
हमारा ज्ञान सबके सिर चढ़ा है । कि हमने इल्म अंगरेजी पढ़ा है ॥