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कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)

कबीर साहेब द्वारा

स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

Devanagarihipublished1,367 पृष्ठ

मक्खियाँ, मक्खियों पर विश्व डाक्टर वाटयार्वी तथा फ्रानसिस हिउबर

व्यास—योऽहिंसकानि भूतानि हिनस्त्यात्मसुखेच्छया ।

कृष्णद्वैपायनः प्राह स्थावरत्वं स गच्छति ॥

अर्थ—जो अहिंसक पशु हिरन, शशा आदि इनको कोई अपने खानेके हेतु मारता है वह स्थावर योनिमें जावेगा ।

बृहस्पति—सन्तप्यते ततोऽजसं भजते च ददाति सः ।

मधुमांसनिवृत्तो यः प्रोवाचेदं बृहस्पतिः ॥

अर्थ—जो आदमी मांस नहीं खाता, वह सर्वदा तप करता है यज्ञ और दान भी करता रहता है ।

वसिष्ठ—यावज्जीवति यो मांसं विषवत्परिवर्ज्यं येत् ।

वसिष्ठो भगवानाह स्वर्गलोकं स गच्छति ॥

अर्थ—आदमी जबतक जीवे तबतक मांस न खावे, विष जान कर त्याग दे. उसको स्वर्गकी प्राप्ति अवश्य होगी ।

जमदग्नि—यो भक्षयित्वा मांसानि स्वतश्चापि निवर्तते ।

जमदग्निर्महाहैनं सोऽपि स्वर्गमवाप्नुयात् ॥

अथ—जो कोई मांस खाता हुआ स्वयं विचार कर अथवा किसीके कहनेसे मांस भक्षण छोड़ दे मृत्यु पर्यन्त न खावे, वह अवश्य स्वर्गको जावेगा ।

शुक्र—रूपमारोग्यमैश्वर्यं कान्तिं स्वर्यानमेव च ॥

प्राप्नोत्यहिंसः पुरुषः प्राहैवमुशना मुनिः ॥

अर्थ—जो हिंसा नहीं करता वह संसारमें सुन्दरता, लक्ष्मी, आरोग्यता, विद्या आदि शुभ गुणोंसे सम्पन्न होता है, मृत्युके बाद स्वर्गको जाता है ।

पराशर—सुवर्णदानं गोदानं भूमिदानं तथैव च ।

नोत्तमं प्राणदानाच्छ पराशरवचो यथा ॥

अर्थ—सोनादान, पृथिवीदान, गोदान ये सब श्रेष्ठ दान हैं, पर “जीवको न मारकर उसे प्राणदान देना” सबोंमें उत्कृष्ट है । यह पराशरजीका वचन है ।

इसी बातपर मार्कण्डेयजीकी भी साक्षी है —

स्वयंभू मनु—कर्मणा मनसा वाचा यो हंति न हि कश्चन ।

स मित्रं सर्वभूतानां मनुः स्वायम्भुवोऽब्रवीत् ॥

अर्थ—जो कर्मसे, मनसे और वाणीसे किसी प्रकार हिंसा नहीं करता, वह सब प्राणियोंका मित्र कहलाता है ।

हत्याके दोषी—हन्ता' चैवनुमन्ता' च विश्वस्ता' 'कयविक्रयी' ।

संस्कर्ता' चोपहन्ता च खादकश्चाष्ट' घातकाः ॥
धनेन क्रियको हन्ति द्युभोगेन च खादकः ।
घातको वधबन्धाभ्यामित्येवं भवि धेनुषः ॥

अर्थ—'मारनेवाला, 'मारनेका विचार करनेवाला, मारनेकी 'सम्मती देनेवाला, मांसका' बेचनेवाला, मांसका' मौल लेनेवाला, मांसको' पकानेवाला पकेहुये मांसका' परोसनेवाला, और मांसका' खानेवाला ये आठ घातक हैं ।

विशेष, करके हिंसा तीन प्रकारसे होती है । १—जो मांस मौल लेता है । वह तो दाम देकर जीवोंको मराता है क्योंकि, यदि मौल लेनेवाला न होता तो जीव न मारे जाय इससे मौल लेनेवाला पूरा पापी है । २—खानेवाला, खानेके स्वादके लिये मारता है, यदि वह न चाहे न मांसको खावे तो, जीव हत्या कौन करे ? । ३—हत्यारे वह हैं जो स्वयं जीवधारीको बाँधकर अथवा हथियारसे मारते हैं, सब भी एकही बात है, चोर और चोरके साथी न्यायमें तुल्यही है ।

जैसे स्वयंभू मनु कइयोंको हत्याका दोषी बताया है उसी तरह कबीर साहिबने भी अपनी साखीमें कई दोषी बनाये हैं कि—

आठ बाट बकरी गई मांस मुल्ला गयो खाय ।

अजहूँ खाल खटीकघर, विहिश्त कहो क्या जाय ॥

बकरी उपरोक्त आठ राहमें गई, उसका मांस मुल्ला खा गया अब तक उसकी खाल खटीकके घर है । वह खटीक निरञ्जन है उसीके हाथ उसकी खाल है, उसके कर्म तो उसके घरही है जिस मारनेवालेको बकरीकी योनिमें आवागमन अवश्य होगा तो बकरीके मारनेवाली विहिश्त क्योंकर जायगी, अपने कर्म के बीजसे फिर फिर देह धरेगा, जबतक उसकी खाल खटीकके घर रहेगी तबतक उनका विहिश्त प्राप्त न होगा । मारनेवालोंको वह खाल ओढ़नी पड़ेगी ।

मांस त्यागका फल ।

शाकमूलफलैर्मध्येः योवाऽदन्नेव भोजनम् ।

न तत्फलमवाप्नोति यन्मांसपरिवर्ज्जनात् ॥

अर्थ—उपवास तथा शाक, कन्द, मूल, फल आदि भक्षोंके खानेसे इतना फल नहीं मिलता, जितना कि, मांसको छोड़ देनेसे होता है ।

मधु मांसं च ये नित्यं वर्ज्जयन्तीह मानवाः ।

जन्म प्रभृति मद्यं च सर्वं ते मुनयः स्मृताः ॥

अर्थ—जो लोग मांस और मदिरासे आयु भर बचे रहते हैं; वे साधुओंके तुल्य हैं। अवश्यही सद्गतिको पावेंगे ।