कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)
Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)
कबीर साहेब द्वारा
स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
भीतरके अन्धे
हैं। पर जो वेदके सच्चे ज्ञाता होते हैं, वे बड़े भावुक हैं। उन्हें किसीसे द्वेष नहीं होता, न वो लुछचोंकी तरह मूर्तिकी निन्दा ही किया करते हैं।
साखी कबीर — वेद हमारा भेद है, हम वेदोंके माहिं।
जौन भेदमें मैं वसूँ, सो वेदौ जानत नाहिं ॥
कबीरजी कहते हैं कि, मेरा पता वेदसे मिल सकता है कि, मैं कौन हूँ। क्योंकि, हम वेदोंमें हैं, पर अपने आप पता नहीं लग सकता। कहना यह कि, पारखी गुरुकी आवश्यकता है। जिस भेदमें मैं रहता हूँ उसको वेद भी नहीं जानते। केवल नेति नेति कहकर इसकी ओर इशारा ही करते हैं।
यह वेदपशु अज्ञानावस्थामें सब कुछ करता है। मिथ्या तथा सत्यकी उसको तनिक भी सुध नहीं। यह वेदपशु वेद पाठकर घमण्डी होता है। कहता है कि, वेदमें यह बात लिखी है वेदमें वह बात लिखी है। यद्यपि वह पूर्णतया अनभिज्ञ है कि, वेद क्या है तथा किस निमित्त है? उसका वेद और वेद पाठपर इतना घमंड करना और इतराना पाशविक अवस्थामें है। समस्त वेदोंकी आत्मा केवल एक शब्द 'ओम्' है। जो कोई वेदकी आत्माको न पहचान, वेदपाठी होनेका प्रण करे वो कदापि वेदका विद्वान् न होगा। अतः अर्थानुसंधानके साथ वेद पाठ हो। उससे आत्माके जाननेकी चेष्टा करे।
त्रियापशु।
त्रियापशु उसको कहना चाहिये जो स्त्रीका पशु हो। वैसे वो स्त्रीका पशु यह सारा संसार है। स्त्री समस्त जीवोंको नचाया करती है। इस स्त्रीने अपनी गुलामीका फंदा सबके गलेमें डाला है। कामबाण सबके हृदयोंको भेद गया। इस कारणही समस्त मनुष्य मर गए। सांसारिक मनुष्योंकी तो गणनाही क्या है। यह बड़े बड़े सिद्ध साधुओंके हृदयको भी टुकड़े टुकड़े कर देती है। सन्तोष तथा धैर्य मनसे पृथक् हो जाता है। इस स्त्रीका नाम वासना तथा इच्छा है। उसने सबको बांध रक्खा है। इसीके कारण सबका आवागमन हो रहा है इसीके कारण भवसागरकी स्थिति है। यह मनुष्य तथा देवता किसीको भी नहीं छोड़ती। जबसे स्त्री पुरुषके साथ होती है उसी दिनसे तपस्या तथा व्रतसे मनुष्य वञ्चित रहता है। केवल स्त्रीकेही कारण बंधनमें रहता है। उसको उसी स्त्रीने अंधा कर दिया है। समस्त झगड़ों तथा बखेड़ोंकी जड़ स्त्री है। अनगिनती लोगोंके इसने मस्तक कटवाये, कटवाएगी और कटवा रही है। समस्त विद्या तथा कार्यकी वैरिन है, समस्त सांसारिक मनुष्य इसके ही प्रेममें फँसकर अपने सर्जन कर्तासे दूर हो गए हैं। जो कोई इससे प्रेम करेगा उसमें सर्जन कर्ताका
प्रेम तथा उसकी भक्ति न हो सकेगी । इस त्रियापशुमें तनिक भी मानुषिक बुद्धि नहीं होती । पर जब उसको मानुषिक शिक्षा मिले तो वास्तवमें वह मनुष्य बनजावे, नहीं तो सदैव इसी प्रकार फँसा रहेगा । इसको तनिक भी पहुँच, समझ तथा बुद्धि नहीं है कि, अपनी मुक्ति तथा छुटकारेकी युक्ति कर सके । उसके पास तनिक भी औषध नहीं कि बच सके ।
उद्धारकी दवा ।
उसके निमित्त केवल यही एक युक्ति है कि, यह साधु तथा गुरुकी सेवा करे । यदि यह साधु तथा गुरुकी सेवा न करेगा तो इसका बेड़ा कदापि पार न होगा । अवश्यही वह कालका भोजन बनेगा । इस संसारमें दो प्रकारके गुरु हैं—एक पाशविक तथा दूसरा मानुषिक । यदि इस सांसारिकको पाशविक शिक्षा मिलेगी तो उसके हृदयपर बुद्धिका कदापि विकास न होगा । इस संसारमें दोनों प्रकारोंके शिक्षक फिरते हैं । जो कोई उन दोनों गुरुओंमें पहचान करे, उन्हें पृथक् करके पहचाने, एकको छोड़कर दूसरेको ग्रहण करे वो सांसारिक बड़ा ही भाग्यवान् होगा । एक तो कपटी भेष बनाए कूट पुस्तकें लेकर हाथमें खप्पर लिए फिरते हैं । यह तो कालपुरुषका समाचार देते हुए उसकी सूचना चारों ओर फैलाते फिरते हैं । दूसरे श्वेत वस्त्र पहने हाथमें सूक्ष्म वेद तथा कमण्डलु लिये सत्यपुरुषके नामका प्रचार करते घूम रहे हैं । अतः जो कोई सत्यपुरुषके समाचारदाताओंके समाचारको स्वीकृत करेगा वह निश्चयही उत्पत्ति नदीके पार चला जावेगा । जिसने इस गुरुको पहचाना वह उनका चरणरज बन गया ।
मुहम्मद साहिबकी भाँग ।
मुसलमानी पुस्तकोंमें लिखा है कि, एक बार मुहम्मद साहबको जिब-राईल महाशय एक उद्यानमें ले गए । उसमें चालीस साधु बिलकुल नगन बैठे हुए थे । तब संध्याका समय निकट आया वे साधु सब भाँग घोटने लगे । जब भङ्ग घोंट चुके तब भङ्ग छाननेके निमित्त कोई वस्त्र नहीं था । उस समय मुहम्मदसाहबने अपने शिरसे साफा उतारकर दिया कि, इससे भंग छानो । तब उन साधुओंने मुहम्मदसाहबके साफेमें भाँग छानकर पीली । मुहम्मदसाहब पर प्रसन्न होकर नौ घूंट भङ्ग मुहम्मदसाहबको दीं उस नौ घूंट भङ्गके पीने से मुहम्मदसाहबको देवलोककी सुध मालूम हो गई । जो पदार्थ तथा आश्चर्यमय शक्तियाँ आपको मिलीं वह केवल उन्हीं नौ घूंट भङ्गसे थीं । तभीसे इस भङ्गके रङ्गसे मुहम्मदसाहबका साफा हरा हो गया । तबसे हातिमी जातिके श्रेष्ठोंने